मैथिली साहित्य’क मे अद्वितीय घटना. सितम्बर ०४, २००९.

9.3.10

छोट लोक - सुभाष चंद्र

छोट लोक धरती पर जन्मैत छैथ
दूबि जकाँ बढ़ैत छथि
पयर सँ दबाओल जाइत छैथ
आ कोनो चर्च के मारल जाइत छैथ !

पैघ लोक आकाश मे जन्मैत छैथ
आकाशे मे रहैत छैथ
जमीन की होइछ
ओ नहि जनैत छैथ !

बाचल, मध्यम
जे नहि कर्ता आ नहि पाचक
दूनू अधिकार सँ तिरोहित
ओ उगैत छैथ,
बढ़ैत छैथ लत्ती जकाँ
आओर,
सतह पर रहैत छैथ अचेतन मे
सपना देखैत संग
जूझैत छैथ स्वयं सँ
अंतरिक्ष सँ आगाँ नहि जा पबैत छैथ !
त्रिशंकु जकाँ बनि
ईच्छाक संग
स्वयं अपन स्वप्न कें
केंद्र बिंदु बनैत छैथ !!

1.2.10

नव पोथी : भोथर पेन्सिल सँ लिखल

-- करण समस्तीपुरी
"बारह गोट कथाक सँग्रह, जे आधुनिक मैथिलक जीवन सँघर्ष केँ प्रदर्षित करैत अछि. प्रत्येक कथा शहरक भागम-भाग सँ निकलैत अछि आ गामक कोनो कोनटी मे जा केँ खत्म होइत अछि। वा नहिँ तऽ गाम’क कोनो घर’क ड्योढ़ी सँ निकलि आधूनिक भारत’क कोनो मेट्रोपोलिटन शहर मे खत्म होइत अछि......।" ---- ई कहब छैन्ह आदि यायावर केँ। वीरान होएत मैथिलीक साहित्यिक क्षितिज पर एकटा नव हस्ताक्षर उभरि रहल छथि, आदि यायावर हुनके नाम छिऐन्ह । एक्किसम सदी केँ चकाचौंध मे यायावरजी ल'के आयल छथि "भोथर पेन्सिल सँ लिखल" अपन पहिल कथा संग्रह।
मात्र दर्ज़न भरि कथाक संकलन मे शिक्षा आ व्यवसाय से वैज्ञानिक यायावरजीक लेखकीय प्रतीभाक परिचय भेंट रहल अछि। हम एहि कथा द्वादाशीक सभ टा कथा प्रकाशनपूर्व आ प्रकाशनोपरांत पढने छी। अधिकतर कथा लेखकक सामाजिक फंटासीक परिणति अछि जाहि मे ओ रहस्य-रोमांचक पराकाष्ठाक स्पर्श केने छथि।
खिसकैत-दरकैत सामजिक मूल्यक प्रति आस्थावान लेखक ग्रामीण जीवनक सुघर आंचलिक चित्रण आ' आजुक जीवनशैली सँ ओकर तारतम्यता स्थापित करबाक कोशिश में छथि। रूढी पर प्रहार यायावारजीक कथाक प्रमुख स्वर छैन्ह। भौगोलिक चित्रण कथावस्तु के जीवंत बनाबैत अछि मुदा कतहु-कतहु आंचलिकताक निर्वाह मे लेखक पुनरावृति के शिकार सेहो भेलथि है। अपन कल्पनाक उड़ान मे लेखक पाठकक भावना सँ खूब उठा-पटक करैत छथि........ किछु आदर्श पाठक केँ अतिशयोक्तिक अनुभूति भ' सकैत अछि। शीर्षक कथा 'भोथर पेन्सिल सँ लिखल' मे एक्कहि टा सिक्काक दू टा पहलू केँ भावनाक धरातल पर रोमांचक चित्रण अछि। 'केहन प्रेम' कें बाल-मनोविज्ञान पाठकक माथा नोचे पर मजूर कए सकैत अछि। 'पढ़ल-लिखल लोक' आधुनिक जीवन-शैली मे शिक्षाक महत्व प्राकशित कए रहल अछि ओतहि 'छुतहरबा' सामाजिक व्यवस्था मे व्याप्त विद्रूप कुरीति पर व्यंग्याघात अछि। मुदा एहि संग्रहक सभसँ अनमोल रत्न अछि, नारीक समर्पण आ पुरुषक स्वामिवादी सशंक प्रवृतिमर्मभेदी कथा 'तैइस सालक मेहनति'
यायावारजीक शैली सरल छैन्ह जेकरा ओ व्याकरण मे बंधबाक कोनो प्रयास नहि केने छथि। आंचलिक उपमा गद्य के आओर सरस बना रहल अछि। शब्द-विशेष पर बलाघात सँ भावनाक मनोवांछित व्यंजना मे लेखक सफल छथि। रहस्य-रोमांचक सृजन मे हिनक लेखनी सिद्ध छैन्ह मुदा कतहु-कतहु लेखकक ई प्रवृति पाठकक भावना मे विरोधाभास सेहो उत्पन्न करा सकैत अछि।
मैथिलीक प्रतिष्ठित प्रतिष्ठान दिल्ली कें 'अंतिका प्रकाशन' सँ बहराएल एहि पुस्तकक मनमोहक आवरण पृष्ठ विषयानुकूल प्रतीत होएत अछि। यायावारजीक संकल्प आ हमर अनुमोदन मे कतेक सत्यता अछि ई जान्चय हेतु अपनेक मात्र एक सय साठि टाका खरचै पड़त।
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26.1.10

बदलत कोना? -रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'

लोक मरैत रहत सदैव, आतंकवादीक गोली सँ।
जनता ठकाइत रहत सदैव, क्रूर राजनेताक बोली सँ।
गरीब तंग रहत सदैव, पेटक किलकिलाइत भूख सँ।



कवि- श्री रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'
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सम्पर्क- +91-9239415921

स्त्री दबायल रहत सदैव, पुरुखक चमचमाइत बूट सँ।
सवर्ण डेराइत रहत सदैव, डोमक थूक सँ।
मिथिला दहाइत रहत सदैव, बेंगक मूत सँ।
बेटा बिकाइत रहत सदैव, मोटगर दहेज़ सँ।
बेटी जरइत रहत सदैव, आगिक लपेट सँ।
राशन घटल रहत सदैव, नहि होयत किछु भाषण सँ।
लोकतंत्र मे मारामारी रहत सदैव, हटय चाहत ने क्यो सिंघासन सँ।
देश सहमल रहत सदैव, कलियुगी रावण ओ कंस सँ।
किछु लोक चाहैत रहत सदैव, बचय समाज विध्वंस सँ।
अपने मे सब लड़ैत रहत सदैव, नहि होयत किछु झगरला सँ।
ई थेथर समाज एहने रहत सदैव, नहि बदलत बात छकरला सँ।