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8.5.08

इजोरिया राति में- कुन्दन कुमार मल्लिक

इजोरीया राति में छत पर टहलैत
दूर गगन केँ निहारैत
डूबि जायत छी, अपन अतीत में
अपन विगत’क स्मृति में
चन्द्रमा अपन चाँदनी सँ चमकि रहल अछि
मुदा एहि इजोरिया में उ बात नहिं अछि
जे पहिने होयत छल
बंगलोर’क चकाचौन्ध में इ अस्तित्वहीन अछि
गाम’क इजोरिया मोन पडैत अछि
फेर मोन पुलकित भs जायत अछि
मोन आबैत अछि कतेक रास बात
पोखरि’क कात में माछ मारनाय
आ महार पर बैसी के भूत-प्रेत’क बात
संगे-संग भय आ रोमांच’क अनुभव
ओकरे संग किछु आहट सँ सचेत भेनाय
आ आँखि बंसी’क तरेला पर अटकि जेनाय
तेखने हवा में सरसराहट सँ सिहरि जेनाय
आ फेर भूत-प्रेत’क बात केँ साकार भेनाय
आ लड्डू केँ भूत बनि केँ डरौनाय
एहेन कतेक रास बात अछि
जे प्यार आ रोमांच सँ भरल अछि
दादी’क प्यार आ माँ’क दुलार
माँ केँ सुग्गा आ कौआ बला रोटी बनेनाय
अँगना में कोरा में बैसा केँ खुऔनाय
चन्दा मामा केँ देखा केँ लोरी सुनौनाय
फेर सँ ओहि दुनिया में घुमय चाहैत छी
मुदा इ त एहेन भागल-बिसरल क्षण अछि
जे केखनो घुमि के नहिं आबैत अछि।

- कुन्दन कुमार मल्लिक,
ग्राम- बलियारी, डाक- झंझारपुर,
जिला- मधुबनी (बिहार)- ८४७४०४
ई-मेल-
kkmallick@gmail.com
सम्पर्क-+९१-९७३९००४९७० (बंगलोर)

15.4.08

फाँस- कुन्दन कुमार मल्लिक

कतेक बेर कानल होयब,
पार्श्व में गीत बाजि रहल छल,
“चिठ्ठी आई है, आई है,"
आई दू साल भs गेल गाम गेला
काल्हि फोन पर कहैत-कहैत
माँ कानय लागल, कहलक, बाउ,
कतेक बरख भ गेल अहाँ’क देखला
दशहरा बीतल, दीवाली बीतल
छठ बीतल, चौठ-चन्द्र बीतल
आब त पाबनि-तिहार याद नहिं रहैत अछि
दीवाली’क राति छल
असगरे छत पर बैसल छलहुँ
आस-पडोस’क छत जगमगा रहल छल
मुदा दीया-बाती’क स्थान बल्ब लय लेने छल
कतओ-कतओ दिया-बाती सेहो छल
जे बल्ब सभहक बीच घिरल
अपन अस्तित्व के लेल जुझि रहल छल
चारु तरफ फटक्का’क शोर छ्ल
ओहि शोर में खोजि रहल छलहुँ
शायद अपन अस्तित्व केँ
जेकर स्थिति ओहिना छल
जेना जड विहीन गाछ
हमर छटपटाहट बढि रहल छल
लागय छल जेना गला में कोनो फाँस अछि
हमर दम घुटि रहल छल
मोन एकदम बेगर भs गेल
ओहि फाँस के काटय लगलहुँ
मुदा हरेक चेष्टा के साथ ओ बढय लागल
अंत में थाकि के गिर पडलहुँ
फेर एकटा चेतना भेल
जे एकदिन हम सफल होयब
एहि फाँस के काटय में
फेर हम घुमि के जायब
आ एकदिन ओहि माटि-पानी में
हमर अस्तित्व विलीन भ जायत।

- कुन्दन कुमार मल्लिक,
ग्राम- बलियारी, डाक- झंझारपुर,
जिला- मधुबनी (बिहार)- ८४७४०४
ई-मेल- kkmallick@gmail.com
सम्पर्क-+९१-९७३९००४९७० (बंगलोर)

4.4.08

जिन्दगी

जिन्दगी एहिना छूटैत जायत अछि
जेना बान्हल मुठ्ठी सँ रेत
जेना निकलल रही कोनो यात्रा पर
आओर छूटैत जायत अछि बाग, बगीचा, खेत
पल-प्रतिपल छूटि रहल अछि
जेना टुकली’क रंग हाथ में
सभ दिन दैत अछि नव रंग जिनगी केँ
किछु खुशी आ किछु दुख साथ में
प्रतिपल जेना होय एकटा नवका गीत
देखा रहल अछि हर क्षण कोनो नव स्वप्न
जिन्दगी किछु सिखाबैत अछि हमरा
कतेक किछु बतबैत अछि हमरा
फेर एना कियैक भेल
एतेक सभ किछु होयतहु
लागैत अछि किछु अधुरा जेकाँ
किछु अछि जे बुझितहु नहिं बुझि पाबैत छी
किछु अछि जे हम समझि नहिं पाबैत छी
सदिखन आस जेकाँ रहैत अछि
प्रश्न’क जेना नदी बहि रहल अछि
सभ बेर एहि ‘किछु’ पर आबिके अटकि जायत छी
प्रश्न’क जवाब ताकैत-ताकैत भटकि जायत छी
सदिखन मोन खाली-खाली लागैत अछि
जेना किछु भेटनाय बाँकी अछि
आब बाट तकैत छी एक घूँट सिनेह केँ
आ पिऔनिहार होय हमर अपने
जिन्दगी!

- सुश्री शिल्पा अग्रवाल

अनुवाद- कुन्दन कुमार मल्लिक

(नोट- इ रचना मूलतः हिन्दी में सुश्री शिल्पा अग्रवाल, रुडकी, उत्तराखण्ड, ई-मेल- shill_urmi_active@yahoo.co.in केँ द्वारा लिखल गेल अछि। हुनक अनुमति सँ एहिठाम ओकर मैथिली रुपान्तरण प्रस्तुत कय रहल छी। एहि रचना केँ मैथिली स्वरुप दय के लेल किछु परिवर्त्तन कयने छी जे मूल रचना में नहिं अछि। हमर इ प्रयास केहन लागल ओहिपर अपनेक सभहक टिप्पणी'क प्रतीक्षा रहत।)