जलकुम्भी (कड़ी १)

ई धारावाहिक एक काल्पनिक कहानी मात्र अछि. बहुत सम्भव अछि जे एहि धारावाहिक कहानी'क पात्र, स्थान, आ कहानी खुदे कोनो व्यक्ति विशेष सँ मिलैत जुलैत होयत. तेँ एकरा अन्यथा नहि लऽ केँ एकरा एकटा कहानी बुझि पढ'क चाही. कोनो व्यक्ति विशेष केँ भेल हानि'क जिम्मेदारी लेखकगण'क नहिँ

बम्बई'क विक्टोरिया टरमिनल रेलवे स्टेशन. लोकल ट्रेन'क प्लेटफोर्म नम्बर 5. चारु तरफ भागम भाग. सब समय सँ पहिने गन्तव्य स्थान पर पहुँचे चाहैत छल. एहि क्रम में कतेको धक्कम-मुक्का. मुदा धक्कम-मुक्का रहितों सब आदमी एक दोसर सँ अनजान. भीड़ मे ठाढ़ प्रत्येक लोकनि असगरे बुझाइत. आ ओहि भीड़ मे रुद्र बाबु अपन पहचान केँ अपने ताकैत, नेरुल जेबाक लेल लोकल ट्रेन'क बाट तकैत छलाह.

हं रुद्र बाबु, मैथिल समाज मे इएह नाम, मुदा मुम्बई मे "झा साहब" आ प्रत्येक आफिसीयल फाइल मे "श्री रुद्रनारायण झा"क नाम सँ लोकप्रिय. भीड़ मे छुपल सन्नाटा के चीड़ केँ एकटा स्वर हुनक ध्यान के एकाग्रचित कयलन्हि. अवाज मे कियो नवयुवक मोबाइल पर बाजैत छलाह. माँ दुध'क उठौना कम नहि करिहैक. हम दोसर ड्राफ्ट पठा रहल छिहौक. एतय सब किछु बढियाँ छैक. आब हम खाना अपने सँ बनबैत छी, तेँ खेबाक पीबाक कोनो दिक्कत नहि. तु अपन स्वास्थ्य'क ध्यान राखिहैक.

रुद्र बाबु अपन पत्नीक ध्यान भँग करैत बजलाह। ऐँ सुनैत छी... देखियौक... देखियौक... हुनकर पत्नी बजलीह... अहाँ केँ त एहिना रहैत अछि. की देखबैक... एकटा युवक छथि आओर की... रुद्र बाबु जोर दैत बजलाह कनि कान दऽ के सुनियौक नहि... युवक अपन बात खतम करैत बजलाह... माँ हम स्टेशन सँ बाजि रहल छियौक... आवाज ठीक सँ नहि आबि रहल छैक. घर पहुँचि केँ फेर सँ फोन करबौक....


एकटा कोनो मैथिल नवयुवक छलाह जे कोनो बहुरष्ट्रीय कम्पनी मे काज करैत हेताह। एतबे अनुमान लगि सकलन्हि रुद्र बाबु केँ. मुदा एतबा काफी छल हुनका सँ परिचय करबाक लेल. हठाते लग जाए एक्के संग कतेको प्रश्न पुछि देल्थिन्ह, " एँ बौआ की नाम' भेल? कोन गाम घर भेल ? मुम्बई मे कतय रहैत छी आ की करैत छी?" करोड़ो अपरिचितक बीच मे एक चित-परिचित आवाज सुनि के ओहो नवयुवक केँ मोन गद-गद भ' गेलन्हि, कहल्थिन्ह, " हमर नाम भेल अमोल कुमार झा. गाम'क नाम ड्योढ़. एतय कम्प्युटर एशोसिएट्स नाम'क कम्पनी मे पिछला डेढ़ साल सँ कार्यरत छी. बड्ड नीक लागल अपने सँ भेँट क' केँ बम्बई सन महानगरी मे. मैथिली सुनि केँ कतेक आश्चर्य आ खुशी होयत अछि से की कहब! आ अपने'क परिचय?" हमर नाम भेल रुद्र नारायण झा, एतय नेरुल मे रहैत छी आ रेलवे मे आफिस सुपरीटेन्डेन्ट पोस्ट पर पिछला २५ साल सँ कार्यरत छी. ई हमर पत्नी आ ई हमर बेटी वर्षा थीकीह. एत्ते नेरुले मे कम्प्युटर ईन्जीनियरींग'क फाईनल ईयर'क विद्यार्थी थीकीह", रुद्रबाबु सेहो एके लाईन मे सब किछु कहि देलथिन्ह. "अपने कतय सँ ईन्जीनियरिंग केने छी ?" रुद्रबाबु'क बेटी, वर्षा, सेहो उत्साह सँ पुछि देल्थिन्ह. जी हम बी.एच.यू. सँ कम्प्युटर ईन्जीनियरिँग मे बी.टेक केने छी सन २००३ मे. "तखन त अहाँक सेलेक्श्न जे.ई.ई'क थ्रु सँ भेल होयत? कतेक रैंक छल" वर्षा के भेलेक जे किछू बेसीए पुछि देलिएक, मुदा एकटा भावरहित उत्तर पावि मोन शान्त भेलन्हि. "जी हमर सेलेक्श्न जे.ई.ई.'क थ्रू भेल छल आ हमर रैंक छ्ल ८९२ " अमोलो सहज भ' उत्तर देल्थिन्ह. स्त्री जाइतक ईएह चरित्र होइत अछि. अपना सँ नीचा व्यक्ति केँ देखि मोन मे अहं आ अपना सँ पैघ (हम उम्र) व्यक्ति के‍ देखि, कम्प्लीट सेरेन्डर. २२ वर्षीय वर्षा आई.आई.टी.'क नाम सुनि लगभग सेरेन्डर क' देने छलईह.

बौआ हम अहाँक गाम गेल छलहुँ १९६८ मे. हमर दादीक नैहरा अहीँक गाम मे छलन्हि. बच्चे मे जिद्द क' केँ गेल छलहुँ. अहाँक ताबत जन्मो नहि भेल होयत" रुद्र बाबुक पत्नी अपन उपस्थितिक संग्यान कराबैत अमोल'क ध्यान अपना तरफ केलथिन्ह. बौआ रहैत कतय छी मुम्बई मे. हुनकर सामान्य सन'क दोसर प्रश्न छलन्हि. जी हम एतय अ‍धेरी वेस्ट मे रहैत छी. कहियो हमर घर पर आऊ ने ? जी जरूर आयब. हमहु‍ ते मैथिल लोकन्हि सँ नेटवर्क बढेबा मे विश्वास करैत छी. ई हमर कार्ड अछि. अपन बिजिनेस कार्ड आगु कय युवक पुछल्थिन्ह, " अपनेक डेरा नेरुल मे कतय अछि. अगिला वीक-एण्ड्स पर हम हाजिर रहब. दू-गोट मैथिल'क सं‍वाद खतम भ गेल छल. कारण जे नेरुल'क लोकल ट्रेन प्लेट्फोर्म पर आबि गेल छल. अमोल शिष्टाचारवश प्रणाम कहि आगु बढ़ि गेलाह. वर्षा'क मोन मे छलैक जे ओहो कम सँ कम बाय-बाय कहि दैथि... मुदा हुनकर मोनमे बैसल ईन्फीरियरीटी-कम्प्लेक्स (सो काल्ड) हुनकर मुँह'क बात मु‍हे मे रोकि देल्कन्हि. मोन मे भेवो केलन्हि जे कहीं नवयुव'क बैड मैनर्स के नहि बुझि जान्हि. मोने मे सोचलन्हि ओ हमर लागिते के छथि. आ हमरा बैड मैनर्से के बुझि जेताह त हमरा ओहि सँ की घाटा. अपन मोन मे छुपल कथित ईन्फीरियरीटी-कम्प्लेक्स केँ जस्टिफाई करैत अपने आप के‍ कहल्थिन्ह।

राति केँ सुतय काल मे रुद्रा बाबु केँ कतेको बात मोन पड़य लागलन्हि. मुम्बई मे मैथिल'क गोष्ठी मे प्रत्येक मास जाइत छलैथ. ओ मैथिल लोकन्हि सँ भेँट घाँट कय केँ हुनका गाम घर सँ दूर रहिनाई कहियो नहि अखरलन्हि. कोनो काज तिहार पर हरदम मैथिल लोकनिक भीड़. सुख मे दूःख मे हरदम लोक साथ देबाक लेल तैयार. मुदा एहि युवक सँ कहियो भेँट नहि भेलन्हि. इएह सब बात सोचैत सोचैत अपन पत्नी सँ कहलथिन्ह, "सुनै छी.... आई जे युवक भेटल छलाह दू साल पहिने भेटल रहितथि ते कतेक बढ़िया रहितेक, अपन बुचिया लेल कतेक बढियाँ रहितैक. मुदा सब किछु अछेतो भगवान के किछु दोसर मँजूर छलन्हि".

"से आइयो अहाँके के रोकने अछि. दुनियाँक प्रत्येक प्राणी अपन हित के आगु मे राखि केँ काज करैत छैक. ते अहाँ किएक नहिँ रँजीत बाबु केँ जवाब दऽ दैत छिएक" रुद्र बाबुक पत्नी हुनका सलाह दैत कहलथीन्ह.


"व्यक्तिक पहचान हुनक बात सँ होयत अछि। बात'क दाम आ आदमी'क दाम बुझु एक्के. बात दऽ केँ पाछु हँटब हमर खानदान मे किओ नहि कयने छथि, ते हम कोना कऽ देब. आ यदि कऽ देलहुँ ते मुम्बई'क मैथिल समाज मे हमर नाक बचि जायत की", बिल्कुल किँकर्तव्यविमूढ़ भऽ रुद्र बाबु अपन पत्नी सँ कहलथिन्ह।

दरअसल किछु दुई साल पहिने नेरुले मे रहय वाला "रँजीत कुमार ठाकुर" सँ रुद्र बाबुक परिचय मैथिल'क गोष्ठी मे भेल छलन्हि. ओहि समय सँ पहिने ते हुनका नहि मालुम छलन्हि जे रेलवे स्टेशन'क एक तरफ रँजीत जी आ दोसर तरफ हुनकर किराया वाला घर छन्हि. मैथिल'क गोष्ठी सँ इएह बड़का फायदा होयत अछि. ओहि समय मे रँजीत, बैँक आफ बडौदा मे प्रोबेशनरी आफीसर'क पोस्ट पर नया नया नौकरी ज्वोईन केने छलाह. तीन भाए मे सबसँ छोट आ सब सँ सफल, रँजीत के पटना'क मुसल्लहपुर मुहल्ला मे ठीक पाँच साल लागल छलन्हि बैँक मे पी0ओ0'क तैयारी करय मे. सहरसा जिला'क पर्री गाम'क रहनिहार रँजीत'क पैघ भाइ सब एक तरहक बेरोजगार'क जिन्दगी बिताबैत छलैथ. ओ लोकनि रँजीत जेना भाग्यशाली नहि जे चटाक सँ आफिसर बनि बैँक मे नौकरी करतैथि. से सम्प्रति आब सहरसे मे किताब आ मेडिसिन दोकान खोलि अपन धिय-पुता'क लालन पालन करैत छथि. तेँ रँजीत'क समाज मे रँजीत'क बेसी आव-भगत छैक. गाम घर'क लोक अपन धिया-पुता केँ रँजीत जेना बनबाक उदाहरण दैत छैक.


रुद्र बाबु एक सोझ दिमागक सुलझल व्यक्ति छलाह. दुनियाँक रीति-रीवाज केँ बखुबी बुझैत छलाह. मैथिल गोष्ठी मे उठय वाला दहेज उन्मुलन'क बहस हुनका व्यर्थ बुझा पडैत छलन्हि. यथार्थ केँ बुझैत ओ वर्षा'क लेल यथा सम्भव दहेज'क इकट्ठा करबाक लेल छोट-मोट घूस लेबा केँ कोनो अनरगल नहि बुझैत छलाह. एकटा कुरीति दोसर कुरीति केँ बढबैत छैक, ई जानियो केँ कुरीति'क साथ देनाई भगवान'क खेल बुझैत छलाह.


मुदा ओएह मैथिल गोष्ठी मे रँजीत नामक युवक छलथिन्ह, रँजीत केँ अँग्रेजी मे सेल्फ-मेड कहल जाइत छैक. हुनका मेहनत'क फल आ करप्शन'क धन मे अँतर साफ साफ बुझल रहन्हि. खास तौर पर मुसल्लहपुर के सँघर्ष हुनकर आत्मदर्शन आ इच्छा शक्ति के आओर मजबुत बना देने छलन्हि. तेँ मैथिल गोष्ठी मे जँ बुजुर्ग एक दिन ई बात कहि देलखिन्ह, जे आई काल्हुक कोनो युवक मे ओ शक्ति नहि जे किओ बिना दहेज'क विवाह कऽ लेत, ते रँजीत सबसँ आगु भऽ कहलथिन्ह, "देखु अपने लोकनि सब युवक केँ एक्के सँग मे नहि राखियौक, हम तैयार छी बिना दहेज लऽ केँ विवाह करबाक लेल. मुदा लड़की पढल लिखल चाही. गोष्ठीए मे सँ एक लोकनि कहि देलखिन्ह, "ते अपने रुद्र बाबु'क बेटीए सँ किएक नहि विवाह कऽ लैत छी". एहि बात पर पुरा गोष्ठी सन्न भऽ गेल छल. रँजीतो हिम्मत बान्हि केँ कहलथिन्ह, "जँ रुद्र बाबु केँ कोनो आपत्ति नहि ते इ विवाह हम करबाक लेल तैयार छी". ओहि गोष्ठी मे रुद्र बाबुओ तैयार भऽ गेल छलाह. मुदा कहलथिन्ह जे वर्षा जे ओहि समय मे ईँजीनियरईँग'क सेकण्ड ईयर मे छलीह ओ हुनक फाइनल ईयर पास होयबाक बाट ताकथिन्ह.


सब किछु एत्तेक जल्दीबाजी मे एना भेलैक जे बुझु रुद्र बाबु एखनो मजाके बुझैत छलथिन्ह। ओ अपन पत्नीक मारफत सँ वर्षा के सेहो ओहि गोष्ठीक शाराश बता देलथिन्ह। मुदा वर्षा सेहो एकरा मजाके बुझैत छलीह. आ अपन माईक बात केँ कोनो रुपेँ सीरियसली नहि लेलखिन्ह.

हुनका एहि बात केँ सीरियसली नहि लेबाक एकटा आओर कारण छलैक. रुद्र बाबु दरभँगा-मधुबनी मे पढल-लिखल एकटा साधारण व्यक्तित्वा वाला साधारन लोक छलाह, मुदा वर्षा एकर विपरीत मुम्बई मे पलल-बढ़ल ईण्टरनेट'क दुनियाँ वाला अपन सुख-दुख अपने बुझे बाली, आत्ममर्यादित युवती छलीह. तेँ ओ एहन तरहक रिस्ता के कोनो सीरियसली नहि लय अपन दुनियाँ मे मस्त छलीह।

समय बीतल जा रहल छल. ओहि दिन'क बाद कहियो रँजीत वा रुद्र बाबु एहि विषय पर चर्चा नहि कयलन्हि. दूनू एक दोसर केँ बुझैत छलाह. रँजीत अपन मोन केँ द्रिढ़ केने छलाह मुदा रुद्र बाबु केँ केवल 99 प्रतिशत विश्वाश छलन्हि. मोन मे शँका छलन्हि तेँ प्रत्येक प्रतिफल लेल ओ तैयार छलाह. रँजीत ते सोचि समझि केँ हुनका डेरा पर आबैत छलाह मुदा रुद्र बाबु प्रत्येक रवि केँ साँझ मे हुनका सँ भेँट जरूर करथि.


मुम्बई मे पलल बढल वर्षा'क सोच मुम्बईया वाला जेकाँ आधुनिक छलन्हि. कोनो युवक सँग बात करबा मे कोनो परेशानी नहि. ओ बात करबाक काल मे लड़की आ लड़का मे फर्क नहि बुझैत छलीह. तेँ रँजीतो सँ ओ ओहिना व्यवहार करैत छलीह जेना अपन क्लास'क कोनो सँगी सँ. रँजीत जे हाले मे एकटा कम्यूटर कीनने छलाह ओहि मे ओ सोफ्टवेयर लोड करबाक लेल वर्षा बहुतो बेर हुनकर मोटरसाइकिल पर बैसि हुनकर घर गेल छलीह. बात'क क्रम मे जे वर्षा केँ रँजीत'क दू-टा बात बहुत पसँद भेलन्हि जे, (1) रँजीत हरदम नाप तोलि के लोजिकल बात करैत छलाह, आा दोसर जे (2) हुनका अपन गलती के मानबा मे कनिको देर नहि लागैत छलन्हि. ई दुनुटा बात सँ वर्षा केँ रँजीत इन्टेरेस्टिँग लागै लागल छलाह. मुदा अपन जीवन सँ कहियो गम्भीर नहि भेल वर्षा एहि बात केँ नहिँ सोचलथिन्ह जे रँजीत'क साथ ओ जीन्दगी बीता सकैत छलीह. अपितु, हुनका एना सोचबाक लेल मौके नहि भेटलन्हि. माइ-बापक कहल गेल बात केँ एखनो ओ मजाके बुझैत छलीह. रँजीत'क चुप्पी हुनकर विश्वाश केँ आओर बलवान बना देलकन्हि. मुदा रँजीत, वर्षा के आत्मीयता केँ एकटा पड़ोसी'क नम्र व्यवहार नहि बुझि हुनकर पिताजी'क कयल गेल पैसला'क एकटा अभिन्न पहलु मानैत छलाह. वर्षा'क निकटता हुनका वर्षा'क अघोसित सहमति बुझा पड़ैत छलन्हि. आ ओहि क्रम मे अपन एकटा दोसरे लोक मे छलाह.
आई राति के वर्षा के सेहो नीन्द नहि आबि रहल छलन्हि. मोन मे अन्तर्द्वद्व जारी छलन्हि जे, युवक केँ बाय-बाय नहि केला सँ युवक बैड मैनर्स के नहि बुझि जाथि. मुदा ओएह मोन फेर सँ बुझाबैत छलथिन्ह, जे ओ हमर लागिते के छथि. कखनो आइ.आइ.टी. आ कम्प्यूटर ओसोशिएट शब्द मोन केँ जोर सँ झकझोरैत छलन्हि कखनो ओ हमर लागिते के छथि, मामला केँ बुझा दैत छलन्हि. मोन मे भेलन्हि जे किएक नहि काल्हि ई-मेल कऽ दिऐक. हाल चाल पुछला सँ हमर बैड मैनर्स बैड मैनर्स नहि रहत आ मोन'क अन्तर्द्वन्द्व सेहो खतम भऽ जायत. पानि पीबाक बहाना कऽ डाईनिँग रुम मे राखल अमोल'क बिजिनेस कार्ड सँ हुनकर ई-मेल अपन डायरी मे लिखि फेर सँ कार्ड अपन स्थान पर राखि सुति गेलीह.

कहानी'क ई भाग पद्मनाभ मिश्र द्वारा लिखल गेल। एकरा आगु लिखबाक लेल प्रस्ताव आमंत्रित अचि।

7 comments:

Rajeev Ranjan Lall said...

पद्मनाभ जी, धारावाहिक के शुरुआत नीक बुझा रहल अछि। एकर दोसर भाग कहिया प्रस्तुत क’ रहल छी?

Abhishek Mishra said...

"तड़प रहे हैं कोटी-कोटी ग्राम देवता
अक्षत और जल के बिना ही नग्न मूर्छित हो,
सूखी आंत, मींचे दांत, पथ्राये हुए नैन
टकटकी लगाए हैं, पाटने कि ओर, दिल्ली कि ओर ।"
-- अमोघ
-- तार स्वर शीर्षक से (मैं तो तेरे पास में)

डा. पद्मनाभ मिश्र said...
This comment has been removed by the author.
vijay said...
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vijay said...

अपने एहि बातक जिक्र केलहुं जे रुद्रबाबूक मानसिकता आओर वर्षाक मानसिकता में अन्तर अछि, जाहि ठाम रुद्रबाबू अपन गामघरक परिवेश में बचपन बितौने छथि, ओहि ठाम वर्षा मुम्बई सन स्वप्न नगरी में एहि इन्टरनेटक दुनिया में पलल-बढ़ल छथि तेँ ई अन्तर स्वभाविक अछि...... कोन तरहें एकगोट तरुणीक मन में भावनाक संचार होइत अछि.... एहि बातक सुन्दर प्रस्तुतीकरण.... संगहि कतेको छुपल बात सामने अछि आओर आयत जे मैथिल आओर मिथिला समाजक रीति-रिवाज बनल अछि......प्रस्तुतीकरण अति आनन्ददायक...।
आगाक अंकक प्रतीक्षा रहत......

डा. पद्मनाभ मिश्र said...

राजीव जी,

अपनेक एहि धारावाहिक मे योगदानक हम बाट ताकि रहल छी. कहिया प्रस्तुत क’ रहल छी ???

Ashu said...

बहुत निक लागल. एकर दोसर भाग्क पर्तिक्श क र्हल च्हि.

कथा....भैरवी

कथा....भैरवी विवाहक पाँचम बरखक बाद अनायास भैरवीसँ चन्द्रेश्वर बाबाक मन्दिरमे भेट भेल छल। नरक निवारण चर्तुदशीक व्रत केने रही। मायक जिदपर...