अखबारक चोरी

भोर में उठि अखबार पढ़ै के हिसक भऽ गेला पर जौं अखबार नहि भेटौ तऽ मोन भूतिया जायत अछि। हमरो सैह स्थिति। एम्हर कहियो कहियो देखि रहल छलियेक जे अखबार बला नागा क’ रहल अछि। एहन स्थिति में लैपटोप खोलि के भोरका पेपर पढ़नाय पहाड़ काज भऽ जाय। विचार केलियेक जे अखबार बला के डपटि के कहबै एहि बेर तऽ नहि अनठेतै। भोर में तऽ विचारते रहि गेलियऽ अखबार बला के कहय के मुदा कहियो नींद टूटय छः बजे भोरहरवा में तखन ने। खैर १०-१५ दिनक बाद अखबार बला पाई माँगय लऽ आयल तऽ जोर से बरसलौं ओकरा पर जे ओ कियेक नागा करैत छैक, इत्यादि। ओ कहलक जे ओ कहियो नागा नहि केलकै यऽ एहि बेर। तखनो हम ओकरा डपटैत पाँच टा टका कम देलियेक जे तों की केलहिन से तों जान, हमरा अखबार नहि भेटलौ तऽ हम पाई काटि लेबौक। बेचारा किछ नहि कहलक आ चलि गेल। हमरो भेल जे जरूर अखबार नहि देने हेतै तैं मानि गेल आ चुपे चलि जायत रहल।

काल्हि १५ अगस्त के फेर अखबार नहि आयल। मोन के केहुना के शांत केलौं आ बाजार जा कऽ एक टा अखबार कीन के आनलौं, चूँकि १५ अगस्त पर किछु विशेष परिशिष्ट आबय बला रहैक। अखबार पढ़ला के बाद बगल बला घर में गेलौं। ओहि में हमर संगी रहैत अछि। ओकर माँ-बाबूजी अखन एतय छथिन ओकरा लग तऽ हम हुनका सब से बात करय के लाथे गेल छलहुँ। अखबार प्रकरण तेहन हमर मनोमस्तिष्क पर असर कयने छल जे ओतहु चर्चा केलियेक जे आय काल्हि हमर अखबार बला अकसरे मटिया दैत छैक, से ओ सब कोन अखबार बला से अखबार लैत छथिन। एहि पर ओ कहला जे आय तऽ भोर में अहाँक गेट पर तऽ हम अखबार देखने छलहुँ जखन हम भोर में घूमि के आबैत रही।

हमर माथा ठनकल। ई के भऽ सकैत अछि। एहि मकान में तऽ सब पाई बला सब रहि रहल छैक। केकरा एहन खगती भेलय यऽ जे ३-४ टका के अखबार चुरा रहल छैथ। संगे ग्लानि सेहो भेल अपना पर, कियेक तऽ अखबार बला के गलती नहियौ रहैत हम ओकर पाँच टका एहि हिसाब से काटि लेने रहियेक जे किछु आर्थिक हानि भेने ओकरा अखबार नागा करै के प्रवॄति बदलि जेतैक। आब कोना के पता लगाओल जाय जे अखबार कतय जाय छैक आ कोनो गारंटी नहि जे जाहि दिन हम सब चेत के रहबय, ओही दिन अखबार गायब हेबे टा करतै। एकटा संगी के विचार भेलै जे चोर पकड़ेला पर झटाक सऽ एक तबड़ाक दऽ देबाक चाही चाहे ओ जे कियौ होयथ। दोसर कहलक जे गाँधीगिरी अपनायल जाय, आ किछु दिन कष्ट काटि के अलार्म के मदत स’ भोर उठि, अखबार में एकटा पर्ची छोड़ि देल जाय जे "महानुभाव, अहाँ जे कियो छी, हम सब अहाँ के अखबार पढ़ै के प्रवृति से अत्यन्त प्रभावित छी, मुदा हमरो सब लेल भोरका अखबार के विरह असह्य अछि, से एकटा काज करू जे अहाँ अपन पता लिख के एतय छोड़ि दियऽ जाहि से हम सब अखबार बला के अहुँ ओतय एकटा अखबार पठा देमय लऽ कहि देबैक। अखबारक खर्चा के हमरा दिस सऽ अहाँक अखबार से लगाव चिरन्तर राखबा के लेल प्रोत्साहन राशि बुझब। अहाँक दर्शनाभिलाषी, राजीव रंजन लाल"

आय भोर में अलार्म तऽ बजल मुदा हमर हिम्मत नहि छल उठय के भोर में ६:०० बजे। अखबार अखन तक नहि आयल छल। हम अपना के उठै के हिम्मत नहि देखि अपन संगी के कहलिये जे आय चुपचाप सुत। आय ओ नहि एतौ। शनि दिन हम सब अपन कार्यक्रम राखबय। मुदा ओ कहलक जे ओ उठि रहल छै देखै के लेल। हम कहलिये जे बेस, अखबार बला एक बेर अखबार दऽ जेतैक तखन हमरो उठा दिहैं। आ कि तखने अखबार बला आयल आ अखबार दऽ गेल। चारा तैयार छल। शिकार के इंतजार छल। हमर संगी सामना में दोसर बिल्डिंग के छत पर चलि गेल आ हम अखबार के दरवाजा पर छोड़ि अंदर से किल्ली लगा लेलियेक। करीब आधा घंटा बाद बगल बला घर के चाचा के शोर सुनायी पड़ल। ओ कहला, यौ राजीव, अखबार अंदर करू, नहि तऽ काल्हिये जकाँ कियो ल के चलि जायत। हम दरवाजा खोलि के हुनका सऽ अखबार लेलौं आ ओ जायत रहला। तखन हमर संगी के फोन आयल जे हम अखबार के फेर से बाहर राखि दी, ओ छत से सभटा नीक जकाँ देखि रहल छै आ किछु देर और इंतजार कऽ के देखै लऽ चाहैत छै। बेस, फेर अखबार बाहर राखि देलियै। भोरका नींद के त्याग मुश्किल प्रतीत होइत छल। तखने ५-७ मिनट बाद हमर संगी के फोन आयल जे एकटा छौड़ा अखबार उठा के जा रहल छैक आ हम दरवाजा खोलि के ओकर पकड़ी। दरवाजा खोलि के ओकरा धेलौं। ओ सकपका गेलै। ओकर हाथ में तीन-चारि टा अखबार छलै। करीब १४-१५ साल के एकटा लड़का। अखबार तऽ हमरो गायब छल, लेकिन पकड़ला पर ओ कहलक जे ओ अपने अखबार बेचै बला छै। हमहुँ अखबार उठाबैत नहि देखने छलिययै। तखने हमर संगी सेहो चारि मंजिला छत से नीचा उतरि के आयल आ छौड़ा के डपटि के पूछलक जे ओ एतय की करय लेल आयल छै। ओ छौड़ा बहुत आराम से टूटल हिन्दी में कहलक जे ओ तऽ एतय डेली आबैत छैक अखबार देबाक के लेल। कोन घर में अखबार दैत छैक, ई पूछला पर ओ कनि सोचय लागल आ हड़बड़ी में उपर के कोनो घर में इशारा केलकै। हमरा बुझा गेल जे ई हमरा सब के ठगि रहल छैक। तखने तीन-चारि गोटा और जुटि गेल। हमरा भेल जे, जौं ई छौड़ा गलत नहि हेतै तऽ झुठ्ठे एक दु थापड़ केकरो से खा जेतैक, से हम ई पूछि के कि जौं ओ अखबार चुरौने छै तऽ सही सही बाजौ। छौड़ा नहि गछलक। तखन हमर संगी जे छत से देखै छल ओ ओकर भेद खोललक। हमर संगी जे बतेलक से हम दंग रहि गेलिययै। जेकरा हम लगभग निर्दोष बुझि लेने छलियेक से साइकिल से भोर में खाली हाथ ओ बिल्डिंग में घुसल छलै आ जेकर-जेकर पेपर बाहर भेटलै ओकरा हंसोथैत बाहर जा रहल छल, तखन हम ओकरा धयने छलियेक। चूँकि ओ छत पर से सभ टा देख रहल छलै, ओकरा सब किछ स्पष्ट छल। बाद में छौड़ा के डाँटैत भगेलियेक, कियेक तऽ ओकर झूठ बाजला सऽ हमर संगी सब के पित्त चढ़ि गेल छलै आ ओ सभ ओकरा मारै लऽ तैयार भऽ गेल छलै।

आब बुझाय यऽ जे फेर अखबार चोरी नहि हेबाक चाही।

5 comments:

डा. पद्मनाभ मिश्र said...

राजीव जी;

बहुत दू:ख भेल अपनेक अखबार चोरी भेला सँ. मुदा सँगहि खुशी से भेल एतेक बढ़ियाँ सँ अपने एकरा लिखलहुँ. एके तरह के आर्टिकल देखि केँ मोनोटोनस लागैत छल. अपनेक लेख एकर शोभा बढा देलक. अपनेक प्रयास जारी रहत इएह हमर इच्छा.

धन्यवाद

luvlotus said...

namaskar.... hamara lag dewnagari lipi nahi ahi, tahi duare roman san kaaj chalaa rahal thikaun.... ahaank prayaas prashamsaniya ahi... akhbaar chori hoyba san hamro dukh bhel... muda aab etbe kaamnaa karait chhii je ehen ahaan ker sang ehen phero nahi homay!

Santos Jha said...

अहाँ के अख़बार चोरी भेला सं हमरI अपन मोन परे य , हमरो अख़बार आ रोजगार समाचार कियो चोरा ले य मुदा लेखक त लेखक होई य बड़ निक लागल अहाँ के लेख

S M Jha said...

राजीव जी,
आन्हा के अखबार त चोरी होइत च्हल लेकिन ह्म्मर अखबार त हमरा आन्खिक सामने स हमर परोसी ल लैत च्हल और कहैत च्हल जे "पध्ने के बाद मे दे देन्गे". साफ दकैती.
आन्हाक ई लेख खूब नीक लागल

Kundan Kumar said...

प्रिय राजीवजी नमस्कार,
अहाँक प्रेरणा सs किछु लिखय के प्रयास कय रहल छी. आई भोर स बहुत रास मैथिली रचना पढ़य के भेटल. अहाँक हम बहुत आभारी छी जे अहाँ हमरा अपन मातृभाषा के एतेक नजदीक आनलहूँ. कोन रुपें अहाँ के धन्यवाद कही समझ में नहीं आयत अछी. कहल जायत छैक जे-

जिसे निज देश, निज गौरव, न निज भाषा का मान हैं,
वह नर नहीं नर पशु निरा हैं और मृतक समान हैं!

एखन धरि हिंदी आ उर्दू सिखय के चक्कर में जेना मैथिली बहुत पाछू छुटि गेल. मुदा एखनो ज्यादा देर नहीं भेल अछि. कहल जायत छैक जे "भोर के बिसरल जदी सांझ के घर आबी जाय त ओकरा बिसरल नहीं कहल जायत छैक." ए अहं के प्रेरणा छी जे आई हम पहिल बेर मैथिली में किछु लिखय के प्रयास क रहल छी. एही स पहिने किछु-किछु हिंदी में लिख लैत छलहूँ. अहाँ के अखबार के चोरी के बारे में पढ़लहूँ, दुःख भेल!
मुदा एही कारणे दुःख नहीं भेल जे अहाँ के अखबार चोरी होयत छल और अहाँ अपन आदतानुसार भोर में अखबार नहीं पढी पाबैत छलहूँ.
दुःख एही कारणे भेल जे समाज में बढ़ैत बेरोजगारीक समस्या और बदलैत सामाजिक स्वरुप मानव के एहनो कर्म करय के लेल बाधित कs दैत छैक. बात सिर्फ दू-चारि टका के नहीं छैक, बात छैक बदलैत सामाजिक परिवेश के.
अहाँ अपन रचना के एकटा व्यंगक रूप दs के छोड़ी देलीयैक. हमरा विचार में यदि अहाँ सिक्का के दोसर पक्ष पर किछु ध्यान दैतियैक त ई रचना के स्वरुप किछु और होयतैक. एही ठाम अहाँ विचार करू जे ओ व्यक्ति (ओकरा चोर कहनाई उचित नहीं) कोन विवशता स ई कर्म करैत छल. एहिथाम हमरा एकटा कहानी याद आबि रहल अछि जे किछु दिन पहिने हिंदी साहित्य पत्रिका "हंस" में प्रकाशित भेल छल. एखन हमरा कहानी आ ओकर रचनाकार के नाम मोन नहीं आबि रहल अछि. ओही कहानी में छल कोना अपन बेटा-पुतोहू सs उपेक्षित एकटा वृद्ध अपन छोट-छोट जरुरत के लेल पड़ोस के बारी सs फूल चोरी करैत छल.
की एकरे नाम विकास छैक? की एही कारणे स हमर देश आर्थिक महाशक्ति बनत? की एकरा सेंसेक्स के आसमान छुबैत स कोनो संबंध छैक? एहन बहुत रास प्रश्न सब छैक जकर उत्तर भेटनाई बहुत मुश्किल अछि.
बहुत बात भेल. पहिलम बेर मैथिली में लिख रहल छी. किछु गलती भs गेल होयत त क्षमाप्रार्थी छी. एही पर अपनेक टिप्पणीक प्रतीक्षा रहत.

धन्यवाद-
कुन्दन कुमार मल्लिक,
ग्रुप सनोफी अवेंटिस,
बंगलोर (भारत)
दूरभास- +९१-९७४०१६६५२७.
E-mail- kkmallick@gmail.com
kundanmallick@yahoo.com

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