विरह

सजन हमर छथि दूर हम स’,
मोन कोना के लागय री,
बलम हमर छथि दूर हम स’,
मोन कोना के लागय री।

सपना में देखलहुँ जे मूरत हुनकर,
मोने मोन मुसकाय री,
एक बेर देखतौं जे सूरत हुनकर,
दिल हमर हर्षायत री।
सजन हमर छथि दूर हम सं...

सभक सजन छथि संगे हुनकर,
हमर किया तरसाय री,
कतेक बरस गेल बीत हमर,
ई बरस कोना बिताय री।
सजन हमर छथि दूर हम सं...

अबकि जे औता ऊ पास में,
नहि देबैन हम जाय री,
सोना के देबैन्ह बान्हि सोना सँ,
देखबैन्ह कोना छुड़ाय री।
सजन हमर छथि दूर हम सं...

4 comments:

शैलेन्द्र मोहन झा said...

Excellent!

निशान्त कुमार said...

This is the first poem ever written by Minu. Critically it lacks the aesthetics of poem and more or less resemble a song, but in spite of that her first effort is really admirable. No offense Di. ;-)
Both thumbs up!!

पद्मनाभ मिश्र said...

मीनू जी;

स्वागत अछि अपनेक. आ बधाई हो पहिल प्रयासक लेल. अपने सँ एहि काज के आगू बढेबाक लेल अपेक्षा रहत.

हम धन्यवाद दैत छिअन्हि शैलेन्द्र मोहन झा आ प्रणव झा जी केँ. आशा अछि जे अपने लोकनिक लेखन कलाक प्रतिभा भीतर सँ निकलि बाहर आयत आ कतेक रास बात केँ अपनेक विचार सँ सम्मानित करत.

कुन्दन कुमार मल्लिक, जय मिथिला, जय मैथिली! said...

मीनूजी,
नमस्कार,
हम श्री पद्मनाभ मिश्र जी के बात स सहमत छी आओर एहि पहिल प्रयासक लेल नि:सन्देह अपनेक धन्यवादक पात्र छी. अपनेक रचना मे जाहि बातक कमी झलकति अछि ओ अछि अध्ययनक कमी. किछु लिखय स पहिने अध्ययन करु. उम्मीद अछि जे अपनेक एहि बात पर ध्यान देबैक. हमरा एहि बात के अनुमान अछि जे लेखन कोनो समान्य चीज नहि छैक. आओर हमर ई भावना नहि अछि जे हम अहान के हतोत्साहित करी. मुदा आलोचना एकटा स्वतंत्र विधा छैक आओर ओकर अपन एकटा अलग महत्त्व छैक. आओर एहि मे हमर किछु विशेष रुचि अछि. बिना आलोचना वा समालोचना के कोनो रचना अपन पुर्ण अस्तित्व के नहि पाबि सकैत अछि.
अपनेक मे हमरा किछु विशेष सम्भावना देखाय परि रहल अछि. कारण ई जे एक तs अपनेक मैथिली मे लिखय के प्रयास कयलहू आ दोसर ई जे अहाँक कविता मे अपन माटि-पानीक सुगन्ध अछि. हमर शुभकामना स्वीकार करू.
अहाँक जवाबक प्रतिक्षा रहत.

धन्यवाद-
कुन्दन कुमार मल्लिक
ग्रुप सनोफी-एभेंटिस,
बंगलोर (भारत)

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