जब मैने एक जाट को चुड़ा-दही-चीनी खिलाया था

जाट आओर मैथिल एक दोसर'क विपरीतार्थ'क शब्द भेल। मैथिल'क स्वभाव नम्र आ जाट'क स्वभाव उग्र। इम्हर कोनो बात सीधे-सीधे कहबाक आदत नहिँ, कान केँ घुमा के पकड़बाक आदत तऽ जाट'क स्वभाव बिल्कुल स्ट्रेट-फोरवार्ड, मौसी केँ बाप'क सारि कहबा मे कोनो सँकोच नहि। इम्हर जाट रेजिमेण्ट ते उम्हर मैथिल पन्डिताई। उम्हर मक्कई'क रोटी आ सरसों'क साग तऽ इम्हर चुड़ा-दही-चीनी। इम्हर हरिमोहन झा ते उम्हर सुरेन्द्र शर्मा। तेँ पाठक लोकनिक ह्यूमर केँ बरकार राखैत यदि हम वर्णन करी जे जखन हम जाट केँ चुड़ा दही खुऔने होयब ते केहेन दृश्य भेल होयत।

वस्तुतः राजीव जी'क चुड़ा-दही-चीनी'क सँस्मरण सँ हमर मोन उत्प्रेरित (catalytic effect) भऽ गेल। मुख्यतः ई सँगति'क असर छी। हिनका सँ जहिया सँ जान पहचान भेल आ ओ जहिया सँ "कतेक रास बात'क लेल लिखनाई शुरु केलाह तहिया सँ ओ हमरा लेल ठीके एकटा उत्प्रेरक'क काज कऽ रहल छथि। राजीव जी अहाँ केँ फेर सँ धन्यवाद। अच्छे.. तऽ राजीव जी सँ सीख लऽ केँ चुड़ा-दही चीनी'क हमहुँ एकटा सँस्मरण बता रहल छी।

बात सन 1991'क थीक। हमर पिताजी श्री मोहन मिश्र जे गोरखपुर मे रेलवे मे कार्यरत छथि ओ तीन गोटा गैर-मैथिल केँ भोज पर आमँत्रित कयने छलथिन्ह। ओहि समय में हम मैट्रिक परीक्षा गाम सँ दऽ केँ हुनके लग आयल छलहुँ। जिन्दगीक शुरुआत'क 14 साल हम गाम में बितौलहुँ आ गामे से मैट्रिक'क परीक्षा दऽ केँ अपन बाबुजी लग गोरखपुर आयल छलहुँ। हमर बाबूजी गोरखपुर में कार्यरत छलाह आ किराया'क मकान में असगरे रहैत छलाह। हुनकर तीन टा अभिन्न मित्र छलन्हि। तीनों में सँ ओ कथित जाट छलथिन्ह श्री एस एन सिँह, उम्र पचास साल, एकटा कालेज में प्रिंसीपल। मुखर व्यक्तित्व, बेसी बाजय वाला, पाँच फीट एगारह इँच लम्बा, भारी-भरकम शरीर इत्यादि-इत्यादि, माने जे पूरा तरह सँ टीपिकल जाट। तीनों मे सँ कियो मिथिला'क संस्कृति सँ परिचित नहि। आ चुड़ा-दही-चीनीक तऽ बाते जुनि पुछु।

रवि'क दिन छल आ हम सब शनि'क साँझ में गाम सँ 24 घँटा'क यात्रा पुरा कऽ केँ पधारल छलहुँ। गाम सँ टटका चुड़ा आ दही पौरा केँ आनने छलहुँ। दही के फ्रीज में राखल गेल छल। हमर बाबूजी अबिते पहिने तीनों टा अभिन्न मित्र के निमंत्रण देबय चलि गेलाह। हुनका लोकनि के सूचित कयल गेल जे मिथिला'क सबसँ दिव्य भोजन खुवाओल जायत।

तीनों गोटा रवि'क दिन में 11 बजे पधारि गेलाह। एक घँटा तक पहिने गप्प ठहाका भेल तदुपरान्त पापा हमरा मकान मालीक' बाड़ी सँ केरा'क पात आनय कहलथिन्ह। से हमहुँ जल्दीए सँ आनि लेलहुँ।

तीनों गोटा में सँ एस० एन० सिँह हठाते पुछलन्हि, "ये केला का पत्ता क्या करेँगे मिश्रा जी ?"
हमर पापा कहलथिन्ह, "इस पत्ते पर पूजा किया जाएगा"।
तीनों गोटा चकित आ भ्रमित छलाह, "अरे भाई खाने के लिए आए हैँ या पूजा करने के लिए?"
दोसर कोठली में हम पानि छीटलहुँ तदुपराँत बोरा सँ आसन लगा देलहुँ। हम कहलिन्हि, "पापा सब किछु रेडी अछि, आबि जाऊ"।

तीनों आदमी आ हमर बाबुजी अपन अपन आसन पर बैसि गेलाह। बारीक'क काज हमरे करय पड़ल। हरदमे'क तरहेँ एस० एन० सिँह फेर सँ पुछि देलाह, "भाई आपके मिथिला में अजीब टाईप का पूजा होता है, ओ भी केला के पत्ते पर !!"। हमर पापा उत्तर देलथिन्ह, "भाई आगे-आगे देखिए होता है क्या?" पापा हमरा इशारा कयलथिन्ह। हम चारु गोटा'क आगु राखल पात में लप्प सँ चुड़ा देबय लागलहुँ। एस० एन० सिँह फेर सँ पुछि देलाह, " अरे भाई इतना चिऊड़ा से पूजा करवाओगे क्या? भगवान थोड़े से चुड़ा से भी खुश हो जाएँगे"।
"अरे भाई मैंने बोला न, चुप चाप आगे देखते जाइए, कैसे पूजा होता है", हमर पापा एस० एन० सिँह केँ चुप करैत बजलाह।

तदुपराँत हमर पापा तीनू गोटा केँ चुड़ा भीजाबे लेल कहलथिन्ह। ओ अपन पात में राखल चुड़ा केँ भींजा केँ तीनों गोटा केँ सीखाबे लगलाह, चुड़ा केँ मुलायम बनेबाक गुड़। हँसी ठहाका में चुड़ा भीजि केँ मुलायम भऽ जा चुकल छल। पापा'क फेर सँ इशारा भेल आ हम डेकची में गाम'क पौरलाह दही चारु गोटा'क पात में देबय लागलहुँ।

"अरे भाई तुम्हारे यहाँ यह पूजा करने का ढँग अजीब सा है" एस० एन० सिँह फेर सँ बजलाह, अब इतना सारा दही से पूजा का क्या काम"। बाँकी दूनू आदमी अचँभित सेहो होइत छलाह।

क्रमशः पापा'क इशारा भेल आ हम चारु गोटा'क पात में एक-एक मुट्ठी चीनी दऽ देलयैन्हि। पापा नैवैद्य'क मँत्र पढ़लाह। ओ तीनो गोटा सोचैत छल जे आब पूजा शुरु भेल अछि। मुदा एते रास चुड़ा-दही-चीनी हुनका लोकन्हि केँ किछू बुझि में नहि आबैत छलन्हि।

ओ लोकन्हि सोचैत छलाह जे असली पकवान एहि पूजा'क बाद मे दोसर कोठली सँ आयत। मुदा हुनका लोकन्हि केँ कनियोँ नहि आशा छलन्हि जे असली भोजन ई थीक। हमर पापा कहलथिन्ह, "सिँह साहब शुरु कीजिए। मिथिला का यही मुख्य भोजन है" एस० एन० सिँह केँ उदाहरण दय हमर पापा बतबऽ लागलथिन्ह। एस० एन० सिँह बहुत हिचकिचाहट'क साथ हमरा एकटा चमच्च देबाक आग्रह कयलथिन्ह। पापा हुनका मना कऽ देलथिन्ह जे चुड़ा दही चीनी' असली स्वाद हाथे सेँ खाय में भेटैत छैक। एस० एन० सिँह शुरु कयलाह खयबा लेल आ 400 ग्राम चुड़ा आ तीन पाव दही कोना खतम भऽ गेल से पता नहि। हमर पापा बताबे लगलाह चुड़ा-दही-चीनी'क महिमा।

पहिने हरिमोहन झा, खट्टर काका, इत्यादि-इत्यादि। एकटा जाट मैथिल'क रँग- आ ढँग मे रँगि गेल छल। ... [ किछु हमरा बारे मे जानू ]

P.S. हे खट्टर काका सुनैत छी...?? की नहि?? चुड़ा-दही-चीनी'क अहाँक एकछत्र राज्य'क अहाँक कुर्सी डगमगा रहल अछि. एकटा जाट ओहि पर कब्जा करऽ चाहैत अछि. जल्दी सँ अटेणडेन्स लगाबु एहि ब्लोग पर...

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