जलकुम्भी (भाग-५)

` -लेखक: पद्मनाभ मिश्र

एखनि धरि अपने लोकनि पढ़लहुँ रँजीत’क घर’क लोक केँ रँजीत सँ अपेक्षा, रँजीत’क भेल कथा केँ अस्वीकार कऽ देनाई, वर्षा’क अमोल सँ प्रभावित भेनाइ आ ओकर बाद हुनका रँजीत मे एकटा महान व्यक्ति’क गुण भेटनाई, अमोल’क पिता’क श्री वैद्यनाथ झा जीक चिन्ता. आब आगू पढू...

रँजीत’क अपन भेल कथा केँ अस्वीकार कऽ देल्थिन्ह मुदा एकर असर ई भेल जे रँजीत’क घर पर सब किओ बुझु जे आमिल पीने छलैथि. सब इएह बुझैत छलाह जे रँजीत आब हाथ सँ निकलि गेलाह. एत्तेक बढ़ियाँ कथा केँ ओ ठुकरा देलथिन्ह. सब केँ इएह होइत छलन्हि जे ग्रेजुएट लड़की आबि केँ रँजीत दशा मे कोन सुधार कऽ देथिन्ह?. रँजीत’क तर्क जे ओ कम सँ कम ग्रेजुएट लड़की सँ एहि लेल विवाह करए चाहैत छथि जाहि सँ कम पढ़ल लिखल लड़की के विवाह मे परेशानी भेला पर महिला’क शिक्षा केँ बढ़ावा भेटए. गाम’क लोक ताहि मे आगि मे घी देबाक काज करन्हि. लोक सब कहन्हि जे एकटा ईश्वरचन्द विद्यासागर बँगाल मे आजादी सँ पहिने भेल छल जे विधवा महिला सँ विवाह कए विधवा विवाह केँ प्रोत्साहित केलथिन्ह आ दोसर ईश्वरचन्द एहि गाम मे भेल अछि. लोक सब गाम मे इएह कानाफूसी करैथि जे जे रँजीत मुम्बई मे कोनो मराठी लड़की के फेर मे पड़ि गेल छथि आ कोनो मन्दिर मे विवाहो कए नेने छथि. लोक’क लाज सँ आब महिला’क शिक्षा’क तर्क दऽ रहल छथि. किओ कहैथि जे आई सँ बीस साल पहिने मट्रिक पास लडकी पूरे गाम मे नहि भेटैत छल आई एकटा यूवक मैट्रिक पास केँ पढ़ल लिखल मानिते नहि छथि. किओ कहैथि जे हुनका महानगरी के हवा लागि गेल छन्हि. किओ कहैथि जे धिया पूता के महानगर पठेवे नहि चाही. पिछला एक महीना सँ जहिया सँ रँजीत एहि कुटमैती केँ ठुकरने छलाह लोक सब राजनीति’क चर्चा कम आ रँजीत’क चर्चा बेसी करैथि.

रँजीत’क परिवार केँ बहुत अपरतिव लागैन्हि. हुनका लोकनि केँ होइन्हि जे हो ना हो लोक’क बात सत्य भऽ जाए. रँजीत’क परिवार केँ मोन भेलन्हि जे जा केँ रँजीत केँ देखबाक चाही जे ओ की कऽ रहल छथि. हुनकर एकपीठिया पैघ भाए "विमल" रँजीत के बिना बतौने मुम्बई एबाक तय कऽ लेल्थिन्ह. कानो कान किनको खबरि नहिँ पहुँचे ताहि लेल ओ किनको नहि कहल्थिन्ह जे ओ कतय जा रहल छथि. बाजार जाए अगिला सप्ताह’क रिजर्वेशन करबा लेल्थिन्ह. रँजीत’क चिट्ठी पत्री जे आबन्हि ओहि मे रँजीत’क पता ठीकाना लिखले रहन्हि. विमल सोचलाह जे बिना बतौने जँ रजीत’क घर पहुँचि जाएब ते ओतय ठीक ठीक पता चलि जाएत जे रँजीत की ठीके विवाह छथि, वा कोनो लड़की के चक्कर मे पड़ल छथि वा कोनो आओर बात छैक.

ई विमल’क मुम्बईक पहिल यात्रा छल. मुम्बई के बारे मे कतेक बात सुनने छलथि. ट्रेन मे बैसल बैसल बहुत चीज करबाक प्लान केलथिन्ह. सोचैत छलाह जे मुम्बई’क गेटवे आफ इन्डिया देखब, मुम्बई मे डबल डेकर बस मे बैसब, लोकल ट्रेन मे देखैक चाही जे कतेक भीड़ रहैत छैक, आ कोनो तरह जुगाड़ कऽ केँ कोनो एकटा फिल्म’क सूटिँग जरूर देखब. रँजीत’क बारे मे ते सब किछु जानकारी भेटिए जाएत. आ ई बहाना से बढियाँ छैक जे हम कहि देब जे हम मुम्बई घुमए आएल छी. रँजीत केँ कोनो शको नहि हेतैक.

विमल जखन शनि’क भोर मे मुम्बई सेन्ट्रल स्टेशन पर उतरलाह ते अबाक रहि गेलाह. एत्तेक बड़का स्टेशन. आब ओ कतय जेताह से किछु नहि फुड़लन्हि. स्टेशन सँ बाहर जाए ओ रँजीत’क पता देखा रास्ता पुछबाक कोशिश केल्थिन्ह ते किओ ओहि मे सँ मजाक केलथिन्ह, किओ बिहारी भैया कहि अपमानित केलथिन्ह. बएहि मे हुनका एकटा सज्जन भेटि गेलन्हि जे मजाक ते नहि केल्थिन्ह मुदा हुनका ओहि पता पर पहुँचबाक रास्ता बता देलथिन्ह. जवाब ई छ्ल जे मुम्बई सेन्ट्रल मे रिक्शा वा आटो किछो नहि चलैत छैक तेँ अहाँ टैक्सी लऽ लिअ. विमल टैक्सी स्टैण्ड पर जा किराया पुछलथिन्ह ते फेर सँ आवाक रहि गेलाह. चारि सय टाका टैक्सी वाला माँगि रहल छलन्हि. मोन मे भेलन्हि जे गाम सँ मुम्बई’क किराया पाँच सय टाका आ मुम्बई मे एक जगह सँ दोसर जगह जेबाक किराया चारि सय टाका. किछु फुड़ि मे नाहि आबैत छलन्हि जे की करबाक चाही.

आब हुनका लग कोनो चारा नहि छलन्हि. ओ सोचलथि जे रँजीत केँ फोन करबाक चाही नहि ते ओ रँजीत’क डेरा नहि पहुँचि सकैत छलाह. मोन मे भेलन्हि जे यदि रँजीत सचमुचे विवाह केने हेताह ते कोनो ने कोनो भाँजे पता ते चलिए जाएत. यदि ओ हुनका नहि बजौताह ते हुनका सँ किओ न किओ सबटा पैसा ठैकि लेतन्हि. सब किछु सोचि विचारि ओ रँजीत के फोन केलथिन्ह. पहिने ते रँजीत के बुझि मे नहि आयल जे विमल बिना बतौने मुम्बई तक कोना आबि गेलाह. केवल मुम्बई घुमनाईये टा नहि भऽ सकैत छैक. मुदा आब कायल किछो नहि जा सकैत छैक. तेँ हुनका स्टेशन पर किताब’क दोकान’क सामने मे ठाढ़ रहबाक लेल कहि ओ लोकल ट्रेन सँ मुम्बई सेन्ट्रल पहुँचि गेलाह.

विमल पूरा मोन बनौने छलाह जे रँजीत’क एक एकटा गतिविधि’क ओ लेखा जोखा राखथिन्ह. विमल देखलाह अबितहिँ रँजीत हुनका पैरि छुबि प्रणाम केलथिन्ह. एकपीठिया होयबाक चलते रँजीत हुनका सँ मुँह लगौने छलाह. हुनका विश्वासे नहि छलन्हि जे रँजीत अचानक एत्तेक शिष्ट भऽ जेताह. रँजीत हुनका किछु दूरि लोकल ट्रेन सँ आ किछु दूरि बस सँ यात्रा कराबैत अपन घर लऽ गेलाह.

घर जा केँ विमल देखलैथि जे हुनकर घर बहुत बढ़ियाँ सँ सजल छन्हि. सब समान उपस्थित छलन्हि. हलाँकि ओ जानैत छलाह जे रँजीत साफ सफाई के पूरा ध्यान रखबा वाला लोक छथि. मुदा हुनकर मोन मे बसल बात जे हो ने हो रँजीत सचमुचे विवाह केने छथि आ हुनका फोन केला’क उपरान्त अपन कनियाँ के कतओ नुका देने छथि. एहि दुनियाँ मे सबसँ खराप चीज होयत अछि "पूर्वाग्रह". पूर्वाग्रह मनुष्य’क सोच पर लगाम लगा दैति छैक. पूर्वाग्रह सँ ग्रसित व्यक्ति इनार’क बेँग होइत छैक जे अपन उपर के आकाश केँ देखि सोचैत छैक जे दुनियाँ एहि सँ पैघ नहि. पूर्वाग्रह सँ ग्रसित व्यक्ति केँ कोनो अन्तिम निर्णय नहि लेबाक चाही. एखन विमल पूर्वाग्रह सँ ग्रसित छलाह आ रँजीत’क प्रत्येक गतिविधि केँ ओ ई सोचि विश्लेषण करैत छलाह जे रँजीत सचमुच विवाह कऽ नेने छलाह. ताहि कारणेँ ओ बिसरि गेल रहथि जे रँजीत बचपने सँ साफ सफाई पर बेसी ध्यान देब वाला व्यक्ति छथि.

विमल शनि दिन पहुँचल छलाह. शनि दिन तऽ रँजीत’क आधे दिन’क आफिस छलैक तेँ बेरहट खेबा सँ पहिने रँजीत घर चलि आयल. अपना लेल आ विमल लेल माछ-भात अपने सँ राह्नलिखिन. रँजीत केँ एत्तेक आगत स्वागत करैत देखैत विमल केँ नहुएँ नहुएँ ई बात झूठ लागए लागलन्हि जे रँजीत सचमुचे विवाह कऽ नेने अछि. खाना खाए दुनू भाए बैसि गेल गाम घर’क बात करबाक लेल. रँजीत विमल केँ कहलथिन्ह, "भाई जी, एखन कनि काल अहाँ आराम कौ लिअ साँझ के अपना लोकनि चलब मुम्बई घुमबाक लेल. आई अपना सब चेम्बूर घुमि के आयब. रास्ता मे अहाँ के देखाएब आर.के.स्टूडियो, हाँ ओएह राजकपूर वाला स्टूडियो". विमल खुश छलाह आ अचम्भित सेहो. मोन मे होइत रहन्हि मुम्बई कतेक बढ़ियाँ जगह अछि, जकर केवल नामे टा सुनने छलहुँ ओकर आई सद्यः दर्शन करब.

धीरे धीरे समय बीतल जा रहल छल. रवि दिन विमल केँ गेट-वे-आफ़-ईन्डिया घुमाएल गेल. रँजीत से हुनकर बेसी मान आदर केलथिन्ह. एत्तेक सब किछु देखि विमल केँ विश्वास होमय लागलन्हि जे गामे के लोक सब बुरबक अछि हमर एत्तेक बढ़ियाँ भाए केँ बदनाम कऽ देलक अछि. जखन रँजीत आफिस चलि जाथि तखन फोन सँ विमल गाम मे पिछला दिन भेल घटनाक्रम केँ वर्णन करैथि. ई सब वर्णन सुनि हुनकर बाँकी घर’क लोक केँ से विश्वास भऽ गेल छलन्हि जे रँजीत बिल्कूल सही सलामत छथि. ओ कतओ विवाह नहि केने छथि. मुदा विमल केँ ओ लोकनि प्रत्येक दिन रँजीत’क गतिविधि पर नजर राखबाक लेल नव नव तरीका सँ कहथिन्ह, मुदा अगिला दिन हुनका लोकनिक प्रत्येक आशँका झूठ भऽ जान्हि. अगिला शनि दिन धरि तक विमल केँ आ हुनकर घर’क बाँकी लोक केँ पूर्ण विश्वास भऽ गेल छलन्हि जे रँजीत मे कोनो दोष नहि. तेँ विमल केँ हुनकर घर’क बाँकी लोक कहथिन्ह जे आब जखन रँजीत’क बारे मे पूरा जानकारी भेटिए गेल अछि ते मुम्बई मे रहला सँ कोनो फायदा नहि. तेँ अगिला ट्रेन मतलब सोम’क भोर भेने पकड़ि गाम आबि जैथि.

उम्हर वर्षा के मोन मे एकटा मैथिल’क इमेज जे बनल छलन्हि ओहि मे धीरे धीरे सुधार भेल जाइत छलन्हि. खास तौर पर ओ जाहिया सँ रँजीते’क विचार सुनने छलथि. पहिने हुनका मोन मे छलन्हि जे मैथिल केवल कटाउझ करे वाला होइत अछि. हमेशा एक दोसर केँ नीचा देखाबए वाला. कोनो दू टा मैथिल मे पूर्ण तरहेँ कहियो मेल नहि भऽ सकैत छैक. दुनियाँ कतबो विकास करन्हि मैथिल के उपर मे कोनो असर नहि, मुदा एक मैथिल केँ विकास करैत देखि दोसर मैथिल’क करेजा पर साँप जरूर लेटाबे लगैत छैक. हुनका होइत छलन्हि जे मैथिल’क इएह प्रकृति हुनकर विकास मे वाधक होइत छन्हि. तेँ दुनियाँ कतय सँ कतय बदलि गेल मैथिल अपन जगह ओहि ठाम कटाउझ करैत ठाढ़. नहि आगू बढब आ नहि बढए देब. मुदा जहिया सँ ओ रँजीत’क विचार सुनने छलीह हुनकर विचार बदलि गेल छलन्हि. यदि पूरा विचार नहि बदलल छलन्हि ते ओ रँजीत केँ कम सँ कम आदर्श मैथिल मानैत छलीह.

रँजीत विमल’क कारण पिछला दू सप्ताह सँ रुद्रबाबूक घर नहि गेल छलाह. वर्षा केँ ई बात मोन मे खटकैत छलन्हि. होइत छलन्हि जे कहीँ हुनकर कोनो बात ते खराप नहिँ लागलन्हि. भऽ सकैत छैक जे हुनकर बाबूजी’क कोनो बात खराप लागल होइन्हि. वा इहो भऽ सकैत छैक जे हुनकर मोन खराप होन्हि. मोन भेलन्हि जे फोन कय पुछल जाए. फेर सोचय लागलथिन्ह जे यदि ओ कोनो बात सँ नाराज छथि ते फोन पर हुनका नहि कहि सकैत छथि वा यदि हुनकर मोन खराप छन्हि तेँ कम सँ कम देखबाक चाही. तेँ फोन केला सँ कोनो फायदा नहि. अतः रवि’क साँझ मे पाँच बजे वर्षा तैयार भऽ रँजीत’क घर दिस विदा भऽ गेलीह.

हुनकर घर पर पहुँचि ओ घँटी बजेलथिन्ह. घर मे विमल टी.वी. देखैत छ्लैथि आ रँजीत किचेन मे किछु काज करैत छलाह. विमल गेट खोलि देलथिन्ह. देखैत छथि जे बाइस साल’क कोनो सुन्दर लड़की गेट पर ठाढ़ छलन्हि. गेट खोलि ओ अपन चेहरा पर एकटा प्रश्नवाचक भाव बनाए चकित छलाह. हुनकर चेहरा’क भाव स्पष्ट रुप सँ वर्षा केँ पुछैत छल जे अहाँ के छी ? कतय सँ आयल छी? एतय अहाँ के की काज अछि ? आ सबसँ अन्त मे हुनकर चेहरा स्पष्ट रुप मे प्रगट करैत छलन्हि जे जरूर अहाँ रास्ता बिसरि गेल छी? एतय हमर छोट भाए रहैत छथि.

अमोल वर्षा सँ प्रत्येक प्रश्न’क जवाब चाहैत छलाह, तुरन्ते, फटा-फट. मुदा वर्षा केँ हुनकर चेहरा सँ उपजल भाव केर सब प्रश्न नहि बुझि मे आयलन्हि. केवल एतबी टा बुझि सकलीह जे किओ सज्जन पुछैत छथि जे एतय अहाँ के कोन काज. वर्षा विमल केँ ईशारा करैत पुछलथिन्ह, "हमरा रँजीत जी सँ भेँट करबाक अछि". विमल केँ किछु बुझि मे नहि एलन्हि केवल किचेन दिस इशारा कहैत जोर सँ कहल्थिन्ह, "रँजीत !".

रँजीत किचेने सँ पुछल्थिन्ह, "भाई जी के आएल छथि?"

विमल जवाब किछु नहि देलथिन्ह. मुदा रँजीत’क आवाज सुनि वर्षा सरसरायल हुनकर किचेन दिस विदा भऽ गेल्थिन्ह. विमल केँ किछु बुझि मे नहि आबि रहल छलन्हि, बिल्कूल अवाक! एकटा बाइस साल’क सुन्दर लड़की रँजीत’क किचेन मे सीधे घुसि जैत छैक, एकर की मतलब होइत छैक से विमल केँ नीक जेकाँ बुझल छलन्हि.
उम्हर वर्षा केँ देखिते रँजीत किचेन सँ सीधे बाहर वाला कमरा मे आबि गेलाह. विमल दिस इशारा कए कहल्थिन्ह, "ई हमर पैघ भाए छथि पिछला शनि केँ गाम सँ आयल रहथि मुम्बई घुमबा’क लेल". वर्षा केँ भेलन्हि जे हाथ जोड़ि हुनका प्रणाम काएल जाए. मुदा हुनका बुझल छलन्हि जे किछु मैथिल हाथ जोड़ि प्रणाम करबा केँ खराप मानि सकैत छथि. खास तौर पर गाम घर सँ आयल मैथिल मे एहेन सम्भावना बेसी भऽ सकैत छैक. अतः मोन मारि केँ झुकि केँ विमल’क पैर छुबि लेलथिन्ह. विमल किछु बाजि नहि रहल छलाह, मुदा हुनका मोन मे एक हजार प्रश्न उठि रहल छलन्हि. प्रश्न कहु वा शँका.

घर मे बैसल वर्षा सँ रजीत बात चीत करैत छलाह. कनि देर मे रँजीत कहल्थिन्ह चलू अहाँ बैसू हम चाय बना केँ आनैत छी. वर्षा केँ भेलन्हि जे विमल फेर सँ खराप मानि जेताह. तेँ ओ रँजीत सँ एत्तेक जिद्द केल्थिन्ह जे रँजीत हुनका किचेन जा केँ चाय बनेबा सँ नहि रोकि सकलाह. वर्षा जखन किचेन मे चाय बनबैत छलीह ते विमल तीन टा बात सोचि हतप्रभ छलाह, "एकटा बाइस साल’क सुन्दर लड़की जकरा बारे मे रँजीत कहियो चर्चा नहि केने छलाह, जे हुनकर कोनो ख्याल करैत बिना सीधे किचेन पहुँचि जाति छैक, जे हुनकर झुकि केँ पैर छुबैत छैक, जे किचेन जा केँ खुदे चाय बनेबा’क जिद्द करैत छैक. एहि सब बात’क मतलब हुनका नीक जेकाँ बुझल छलन्हि. हुनका मोन मे होइत छलन्हि जे ओ गाम घर मे जरूर रहैत छथीन्ह मुदा कोनो लड़की कोनो लड़का’क एत्तेक निकटता मे कोन परिस्थिति आबि सकैत छैक. मोन मे होइत छलन्हि जे एक थप्पड़ मारी रँजीत केँ आओर पुछी, "तोँ हमरा बुरबक बुझैत छहक". मुदा ओ किछु बाजलाह नहि.

विमल केँ अगिला भोर भेने ट्रेन पकड़बाक छलन्हि. मोन मे एक हजार प्रश्न छलन्हि. कतेक हिसाब माँगबाक छलन्हि रँजीत सँ. मुदा हुनका लग टाइम नहिँ छलन्हि. ओ किछु नहि बजलाह. सीधे गाम पहुँचि सबटा खीस्सा अपन घर’क लोक केँ सुनौलन्हि. सब लोकनि आब इएह निर्णय पर पहुँचलाह जे रँजीत ओहि लड़की’क चक्कर मे विवाह नहि कऽ रहल छथि. मुदा आब कैले की जाए. कानो कान गाम’क कोनो दोसर लोक केँ नहि बुझि मे आबे ताहि लेल ओ सब लोकनि स्तब्ध भऽ गेलाह. सब लोकनिक इएह विचार छलन्हि जे रँजीत ते इज्जत माटि मे मिलेबे केलक मुदा ओ लोकनि सेहो हुनका मजा चखा देथिन्ह. जिन्दगी बहुत पैघ अछि रँजीत केँ आइ नहि काल्हि घर परिवार’क जरूरत ते हेबे करतन्हि तखन हुनका सबक सिखाओल जाएत.

उम्हर अमोल’क घर मे अलगे परिस्थिति छलन्हि. अमोल’क बहिन ’विभा’ केवल देखबे टा मे सुन्दर कनि कम छलीह मुदा सर्व गुण सम्पन्न छलीह. एम.फिल मे पढ़ैत छलीह मुदा मोन मे कोनो अहं नहि. किओ देखि के एक्के बेर मे कहि सकैत छथि जे ओ पूर्ण रुप सँ घरेलू लड़की थीकीह.

जँ जँ दिन बीतय अमोल’क बाबूजी श्री वैद्यनाथ झा जी’क चिन्ता बढ़ैत जान्हि. मोन मे छलन्हि जे कम सँ कम अगिला लगन मे बेटी’क विवाह भऽ जान्हि. अपने तेँ शरीर सँ लाचार छलाह. कतओ आबि जा नहि सकैत छलाह. तें पूरा कुटमैती दोसरे लोक पर निर्भर छलन्हि. ओ बाट ताकैत छलथिन्ह विभा’क विवाहक मुदा अमोल लेल बेसी घटकैती आबए. मानू जे लोक’क बस मे रहितैक ते अमोल केँ उठा कऽ लऽ जाएतैथि.

एक दू टा जगह बात सेहो भेल छलन्हि मुदा लड़का वाला एत्तेक पैसा माँग केलथिन्ह जे वैद्यनाथ बाबू सँ सम्भवे नहि छलन्हि. कतेक दिन सँ अमोल हुनका कहैत छलन्हि जे इन्टरनेट पर विभा’क प्रोफाईल दऽ दैत छी लड़का वाला अपने आप औताह. मुदा हुनका ई इन्टरनेट इत्यादि पर कोनो विश्वासे नहि छलन्हि. कहैत छलाह पता ने विभा’क फोटो के कोन दुरूपयोग भऽ जाएत. मुदा आब चारू तरफ सँ ठोकर खा के मोन भेलन्हि जे अमोल ठीके कहैत छथि. मोन भेलन्हि जे एक बेर एकरो देखि लेल जाए. तेँ अमोल केँ फोन कए कहल्थिन्ह जे विभा’क परिचय इन्टरनेट पर दऽ दियौक.

अमोल इन्टरनेट पर ते विभा’क परिचय दऽ देल्थन्हि आ नाम पता’क जगह पर अपनो फोन नम्बर दऽ देलथिन्ह. फोन पर की कहु आ ई मेल सँ की कहु बहुते रास कुटमैती’क प्रस्ताव आबए अमोल लग आबए लागल. अमोल केँ खरापो लागए जे एत्तेक कुटमैती’क प्रस्ताव मुदा एक्को टा वास्तविकता मे परिवर्तित भऽ पाएत वा नहि. अमोल एक-एक प्रस्ताव केँ अपन बाबूजी श्री वैद्यनाथ मिश्र लग भेजि दैथि.

प्रत्येक रिश्ता पर वैद्यनाथ बाबु पहुँचि जाथि. बायो-डाटा आ फोटो भेजि दैथि. मुदा प्रत्येक लोकनि इएह पुछि दैथि जे अहाँ विवाह मे कतेक खर्च करब. सब के सब एत्तेक लोभी. एक महीना भेल दू महीना भेल विवाह’क एक पर एक विवाह’क प्रस्ताव हुनका लग आबन्हि मुदा आई तक एकोटा वास्तविकता मे नहि परिवर्तित भऽ सकल. सब लोकनि इएह पुछथिनह जे विवाह मे कतेक खर्च करब. ओहि मे सँ किओ हुनकर शरीर’क अवस्था पर पसीझए वाला नहि. बहुतो हुनका इएह कहन्हि जे अमोल सन हुनका बेटा छन्हि नहि जानि कतेक पैसा हुनका भेटतन्हि. अन्त तक विवाह नहिएँ भेल. वैद्यनाथ जी केँ इन्टरनेट केर सत्ता पर जे विश्वास होमय लागल रहन्हि ओ फेर खतम भऽ गेल छलन्हि. मोन मे एकेटा कशिस रहन्हि जे आई यदि भगवान हुनका शरीर सँ लाचार नहि केने रहितथि ते कतेक दिन पहिने विवाह भऽ गेल रहितैक. अमोल से सँग नहि रहैत छलन्हि. ई बात केँ ओ बहुत बढ़ियाँ सँ बुझैत छलाह जे अमोल नौकरी छोड़ि अपन बहिन’क घटकैती नहि कऽ सकैत छलाह.

क्रमशः...

1 comment:

श्री जीतमोहन झा (जीतू) said...

भैया हम अपने सs सहमत छी अपने क जे निक लागे करू

कथा....भैरवी

कथा....भैरवी विवाहक पाँचम बरखक बाद अनायास भैरवीसँ चन्द्रेश्वर बाबाक मन्दिरमे भेट भेल छल। नरक निवारण चर्तुदशीक व्रत केने रही। मायक जिदपर...