पढ़ल लिखल लोक (पद्मनाभ मिश्र)
-लेखक: पद्मनाभ मिश्र हमरा जानबाक लेल एतय क्लिक करु
पचपन बर्षक श्री रामचन्द्र पाठक बहुत पैघ खानदान सँ छलाह. हुनकर दादाजी दरभँगा महाराज’क व्यक्तिगत सलाहकार छलाह. कहल जाएत छैक जे हुनका बिना पुछने महाराज कोनो काज नहि करैत छलाह. मुदा रामचन्द्र पाठक जी’क बाबूजी ओतेक भाग्यशाली नहि छलाह. सरकार दरभँगा राज्य’क विघटन के बादे हुनका सँ जमीन्दारी छिन लेल्कन्हि. ओ ते पाठक जी के माए छलीह जे अपन गहना जेवर बेचि केँ पाँच बीघा खेत कीनलन्हि.
मुदा से की माएक मरला’क बादे पाँचो बीघा जमीन तीन भाए मे बँटि गेल. हिनका हिस्सा मे आएल डेढ़ बीघा छओ धूर. ओ ते कहु भगवान’क कृपा छलन्हि जे हिनका सरकारी प्राइमरी स्कूल मे नौकरी भेटि गेलन्हि, नहि ते दूँ साँझक अदहन पर आफद भऽ जैतन्हि.
भगवती तीन टा धिया पूता देने छलन्हि दू टा बेटा आ एकटा बेटी. तीनो बहुत होनिहार. मुदा एके टा गलती भऽ गेलन्हि पाठक जी सँ. बेटा’क पढ़ाई लिखाई लेल ते साँझ’क साँझ बिना तरकारी तीमन के खेलाह मुदा बेटी केँ नहि पढेलाह. बेटी जखन पहिल बेर मैट्रिक परीक्षा मे फेल भऽ गेलीह ते दुनू प्राणी इएह निर्णय लेलाह जे बेटी केँ ते दोसर घर जेबाक अछि, आई ने काल्हि हुनका घरे-गृहस्थी सम्हारनाय छन्हि ते आगू पढ़ा के की फायदा.
भगवान हिनकर जिन्दगी केँ फेर सँ बदलि देलकन्हि. दुनू टा बेटा पढ़बा मे बहुत तेज रहन्हि. पहिल बेटा केँ बी.एस.सी. केलाक अगले साल मे इन्कम टैक्स मे नौकरी भेटि गेलन्हि. दोसर बेटा सबसँ छोट छलन्हि आ एखन एम.एस.सी. मे पढ़ैत छलाह. बी.एस.सी. तक हमेशा फस्ट क्लास फस्ट. सब इएह कहन्हि जे एक्के बेर मे ई बी.पी.एस.सी. क्वालिफाई कऽ जेताह. बेटी ते पहिल बेटा सँ छोट छलीह आ दोसर बेटा सँ ज्येष्ठ, मुदा हुनकर विवाह बेटा सँ पहिने कऽ देल्थिन्ह. दिल्ली मे सेन्ट्रल सेक्टेरिएट मे जमाए काज करैत छलाह. अक्सर रामचन्द्र पाठक जी केँ दोसर लोकनि केँ कहैत सुनल गेल छल जे जमाए केँ ते अठारहे हजार टाका मासिक छैक मुदा उपरी आमदनी लगभग ३० हजार’क. बुझू पचास हजार’क पारे.
रामचन्द्र पाठक जी केँ जीवन फेर सँ ओहिना फलैत फूलैत भऽ गेलन्हि. केवल एके टा मलाल रहि गेल छलन्हि जे बेटी केँ नीक सँ नहि पढ़ा सकलाह. तेँ पैघ बेटा शैलेन्द्र’क विवाह करबा सँ पहिने सोचि नेने छलाह जे पुतोहु करब ते पढ़ल लिखल. शैलेन्द्र’क उपनायन ते बच्चे मे भऽ गेल छलन्हि आ विवाहो नौकरी के तुरन्त बादे कऽ देलथिन्ह. पुतोहु एम.काम केने छलथि. पहिने ते सगा-सँबँधी लोक कहने छलन्हि जे पढ़ल लिखल पुतोहु आनब ते अहाँ’क बीमार कनियाँ के सेवा करतीह. मुदा रामचन्द्र जी किनको नहि सुनलन्हि. बेटी केँ नहि पढ़ेबा’क गलती ओ फेर सँ नहि दोहरेबा’क लेल चाहैत छलाह. तेँ शैलेन्द्र सँ कनि बीसे पढ़ल पुतोहु केलन्हि. शैलेन्द्र’क पोस्टिँग पटना मे छलन्हि आ मास मे दू बेर ओ गाम चलिए आबैत छलाह.
छोट बेटा जखन एम.एस.सी के परीक्षा दऽ के एलन्हि ते हुनकर उपनयन करबाक मोन भेलन्हि. नहिँ जानि कहिया ई बी.एस.सी. बास करताह आ बी.पी.एस.सी. मे सेलेक्ट हेताह. फेर हिनकर तुरन्ते विवाह कऽ अपन पितृ धर्म के निभा’ भगवान’क इह-भगत मे लागि जेताह.
उपनयन दिन निश्चित भऽ गेलन्हि आ क्रमशः सब सगा सँबँधी के नोत-हकार गेलन्हि. शैलेन्द्र से एक मास पहिने अपन कनियाँ नेहा केँ गाम पठा देलथिन्ह. बँसकट्टी सँ एक सप्ताह पहिने रामचन्द्र जी’क बेटी शीला से घर चलि एलन्हि. ई पहिल बेर छल जखन विवाह’क बाद कोनो काज त्योहार मे अपन घर आयल छलीह. आ अपन घर मे भौजी के देखि रहल छलीह. जी हँ ओएह भौजी जे अबितहिँ शीला’क जगह लऽ नेने छलीह. ओ ओएह घर मे अपन डेरा जमेने छलीह जाहि मे शीला बचपन सँ विवाह धरि रहल छलीह. चारि कोठली’क मकान मे ओएह रूम जाहि मे ओ कनियाँ पूतरा’क विवाह सँ लऽ अपनो विवाह’क सपना सजेने छलीह. ओ ओएह रुम छल जाहि सँ निकलय वाला कोनो फरमाइस’क अवहेलना नहि होइत छल. ओएह घर जाहि मे रामचन्द्र जी’क सबसँ प्रिय वस्तु छल. आब ओ घर कोनो आन लोक’क भऽ गेल छल. एक दोसर घर सँ आएल कोनो दोसर स्त्री’क भऽ गेल छल. जाहि सँ कोनो फरमाइस नहि निकलए अपितु अपन कर्तव्यपरायणता’क लेल अपन स्त्री जीवन केँ कोनो इस्तेमाल काएल जाए एकर निर्णय लेल जाए. आब ई घर शीला’क भौजी नेहा’क भऽ गेल छल.
नहि जानि किएक, ई बात बुझितहुँ जे विवाह’क बाद लड़की दोसर घर’क भऽ जैत छैक आ हुनकर नैहर आब हुनकर भौजी’क सासूर भेल आ हुनकर बचपन वाला घर आब नेहा’क भेल, शीला केँ ई बात नहि पचैत छल. मोन करैत छलन्हि जे जा केँ भौजी केँ कहि दी जे जाबए धरि हम एतय एहि घर मे रहब हमरा एहि ठाम रहय दिअ. मुदा हिम्मत नहिँ होइत छलन्हि जे ओ बात कहथि.
देखाबैक लेल भौजी सँ बहुत दुलार करैत छलीह. हुनका लग बैसि हुनकर केस बान्हि दैत छलैथि, अपन श्रृँगार’क वस्तु हुनका दैत छलैथि. सँगे-सँग बाजार घुमे जाथि, एके साथ खाना खाथि मुदा मोन मे ई बात हरदम खटकैत छलन्हि जे एक दोसर घर’क एकटा लड़की हमर घर मे हमरे जगह लऽ नेने अछि. हुनकर बुद्धि कहन्हि जे दुनियाँक इएह नियम थीक, विवाह’क बाद घर मे बेटी’क जगह पुतोहू लऽ लैत छैक मुदा हुनकर हृदय कहन्हि जे ई बात बर्दाश्त सँ बाहर. बुद्धि आओर हृदय मे हरदम यूद्ध चलैत रहन्हि. कखनो बुद्धि हावी ते कखनो हृदय हावी. हृदय कुदि कुदु केँ बुद्धि पर प्रहार करय लागलन्हि आ मोन केलकन्हि जे कम सँ कम एक बेर भौजी के कहल जाए जे ई हमर थीक अहाँ दोसर रुम लऽ लिअ.
आई उपनयन मे चारि दिन बचल छल. परसू नेहा’क पति शैलेन्द्र से पटना सँ आबि जेताह. एक बेर शैलेन्द्र आबि गेलाक बाद अपन भैया सँ शीला किछु नहि कहि पेतीह तेँ जल्दी जल्दी रुप चेन्ज कऽ लेबऽ चाहैत छलीह. इएह सब सोचि शीला नेहा’क रुम दिस चलि गेलीह. नेहा अपन रूम मे बैसि अँग्रेजी’क कोनो मोट उपन्यास पढैत छलीह. शीला केबाड़ लग ठाढ़ छलीह मुदा नेहा अपन उपन्यास पढ़बा मे व्यस्त छलीह. हुनकर ध्यान शीला दिस नहि पड़लन्हि.
शीला लगभग पाँच मिनट केबाड़ लग ठाढ़ छलीह मुदा नेहा हुनका दिस तरो आँखि सँ नहि देखलीह. शीला केँ भेलन्हि जे ई जानि बुझि केँ अनठा रहल छथि. तेँ केबाड़ पर अपन औँठी सँ ठक-ठक करैत बजलीह, “भौजी की भऽ रहल अछि”.
के शीला आउ ने बैसू न. हम ते एहि उपन्यास मे बाझल छी. बहुते नीक उपन्यास छैक. कैलिफोर्नियाँ एकटा अजीब सन चोर’क कहानी छैक जे लोक’क घर सँ केवल जूता चोराबैत छलैक. मुदा ओतुका पोलिसो ओहिना छैक. आब जल्दीए चोर पकराबे वाला छैक. छोड़बा’क मोने नहि कऽ रहल अछि. शीला के भेलन्हि जे ई अँग्रेजी वाला किताब देखाए हमरा ताना मारि रहल अछि. किछु नहि बाजलैथि मुदा पैर पटकैत ओतय सँ चलि गेलीह.
राति मे खाना खेबाक सँ पहिने नेहा शीला लग गेलीह आ बजलीह, “कोनो बात छल की? ओहि समय मे हम व्यस्त छलहुँ”.
“हँ भौजी एकटा बात छल. हमरा कहबाक छल जे, रुम मे अहाँ रहैत छी विवाह सँ पहिने ओ हमर रुम छल” शीला बजलीह
नेहा जवाब देल्थिन्ह, “हँ से अहाँक भैया कहैत छलाह. जे विवाह पूर्व ई रुम अहीँ के छल”
“आब एकरा अहाँ हथिया नेने छी”. शीला’क बात खतमो नहि भेल छल कि नेहा बजलीह, “से ते हेबे करैत छैक ने. बेटी गेल पुतोहु आएल बात बराबर के बराबरे. बेटी’क स्थान आब पुतोहु लऽ लेलैथि. की खरापी?”
नहि जानि किएक शीला के भेलैक जे हुनकर भौजी हुनकर मजाक उड़ाबैत छथि. अपन माए केँ जाके कहल्थिन्ह, “माँ आब हम एतय जाबए धरि रहब अपन पुरनके घर मे रहब, हमरा दोसर जगह नीँद नहि आबैत अछि ”
शीला’क माए हुनका बहुत बुझेबा’क कोशिश केलथिन्ह. मुदा हुनका उपर कोनो प्रभाव नहि पड़लन्हि. हारि केँ हुनकर माए केँ नेहा केँ बुझेबा’क लेल जाए पड़लन्हि. नेहा’क घर मे जा केँ हुनका कहल्थिन्ह, “कनियाँ, एकटा बात कही?”
नेहा कहल्थिन्ह, “जी माँ जी कहु ने”
“अहाँ एहि घर के छोड़ि शीला वाला घर मे चलि जाउ, ओ बचपने सँ एहि घर मे रहने छैक आब कहैत छैक जे दोसर घर मे ओकरा नीँद नहि आबैत छैक” शीला’क माए नेहा सँ कहल्थिन्ह.
नेहा कहल्थिन्ह, “माँ एहि घर मे हमर एत्तेक समान छैक? शीला वाला रुम एखन छोट छैक ओहि रुम मे गेला’क बाद पैरो राखबाक जगह नहि रहतैक”.
शीला’क माए केँ भेलन्हि जे शैलेन्द्र केँ आबए दैत छिएक ओएह बात केँ सम्हारि लेत. तेँ ओतय सँ चलि गेलीह. नेहा केँ भेलन्हि जे शीला एहेन बचपना किएक देखा रहल छथि. कनि जा केँ बुझेबा’क चाही. शीला अपन घर मे छलीह आ नेहा आब हुनकर केबाड़ केँ ठक-ठकबैत अन्दर गेलीह मुदा पाछू-पाछू शीला’क माए से चलि एलीह.
शीला केँ बुझबैत नेहा बजलीह, “ शीला अहाँ ते बुझनूक छी, एहेन बचपना वाला बात किएक करैत छी, अहाँक बुझल अछि जे ई रुम बहुत छोट छैक आ एहि मे हमर समान एलाक बाद पैरो राखै के जगह नहि भेटतैक, तेँ चेन्ज करबा’क प्लान छोड़ि दियौक”.
शीला केँ भेलन्हि जे हमरे बाप’क घर मे हमरे उपर शासन भऽ रहल अछि. ओ नेहा केँ कहल्थिन्ह, “ते की अहाँ के छोट घर मे रहबाक नहि आदत अछि की?”
नेहा बजलीह, “नहि हमरा आदत नहि अछि? आ एत्तेक छोट घर मे एत्तेक समान हमरा किछु नहि फुरा रहल अछि”
शीला बजलीह, “लागैत अछि जे अहाँ’क बाप’क घर मे रुम’क बदला मे सबटा कन्फ्रेन्स हाले टा अछि”
विवाह भेला’क बाद कोनो लड़की अपन पिता’क घर सँ किछु आनैथ छथि वा नहि से नहि जानि मुदा अपन बाप’क इज्जत हरदम अपन सँग मे राखने रहैत छथि. कोनो स्त्री’क बाप’क सँदर्भ चाहे नीक मे हो वा बेजाए मे स्त्री’क लेल एक चुनौती होइत छैक. नैहर’क कोनो आदमी यदि ई बात कहने रहतन्हि ते कनियोँ खराप नहि लगितन्हि अपन बाबूजी’क प्रतिष्ठा केँ एना सरेआम नीलाम होमय नहि देबय चाहैत छलीह. हुनकर बाबूजी’क घर छोट अछि की पैघ ओकरा उपर मे टिप्पणी करए वाला शीला के थीकीह. दुनियाँ मे कोनो स्त्री बाँकी कोनो सँबन्धित के बारे मे किछो बर्दाश्त कऽ सकैत छैक मुदा बाप’क नामो लेला सँ हुनका खराप लागि सकैत छैक. नेहा’क आँखि तामस सँ लाल भऽ गेलन्हि. देह काँपे लागलन्हि, कहल्थिन्ह, “हमर बाप के बीच मे किएक आनए छी आ अहाँ के की पता जे हमरा बाप’क घर मे केहेन घर छैक?”
शीला बजलीह, “नीके ने कहैत छी, पैघ-घर छोट घर बाजि रहल छी, लागैत अछि अहाँ’क बापक घर मे रुम नहि कन्फ्रेन्स हाल होइत अछि”
पहिने नेहा के भेलन्हि जे शीला पहिल बेर आवेग मे आबि किछु बाजि देलैथि. मुदा आब हुनका होइत छलन्हि जे ओ इ सब जानि बुझि के बाजल छथि. फेर भेलन्हि जे हिनका सँ मुँहे लगेने कोनो नीक बात नहि. कम पढ़ल लिखल छथि किछो बाजि सकैत छथि. तेँ बात केँ आगू बढेबा सँ बढ़ियाँ अछि जे एतय सँ चलि जाए. ओ ओतय सँ जाए लागलीह.
हुनका जाइत देखि शीला के भेलन्हि जे हुनकर बात पर भौजी कोनो ध्यान नहि देलथिन्ह. तामस आओर बढ़ि गेलन्हि. जोर सँ कहल्थिन्ह “हमरा सबटा बुझल अछि अहाँ बापक घर मे केहेन आ कतेक टा के घर अछि.”
नेहा फेर सँ तामस सँ काँपय लागलथिन्ह. आदमी के तामस मे कोनो निर्णय नहि लेबाक चाही. तामस मे आदमी केँ कम बाजबाक चाही. तामस मे मोन’क बात मुँह पर खटाक सँ आबि जाइत छैक. नेहा’क तामस अपन चरम-अवस्था मे छलन्हि, शीला केँ जवाब देलथीन्ह, “हम गँवार लोक सँ बात नहि करैत छी?”
आगि केँ नेहा’क “गँवार नामक शब्द” रुपी घी भेटल. “की की बजलहुँ, गँवार! माँ देखैत छीहीक तोहर पुतोहु तोहर बेटी केँ गँवार कहैत छैक” शीला नेहा’क लऽग मे उठि केँ एना आयलीह जेना मानू ओ हुनका मारि देतीह. भयँकर धधरा उठि गेल. शीला’क माए हुनका दुनू लोकनि केँ अलग कए देलथिन्ह.
मुदा ई धधरा पुआर’क धधरा नहि छलैक. ई सुखाएल तेतैरक गाछ मे लागल धधरा छल. जकर धधरा ते बुझि जेतैक मुदा ओकर अन्दर मे आगि कम सँ कम एक सप्ताह रहतैक. तेसर दिन उपनयन छल. आ ओहि मे एहेन आगि. काल्हि सँ हकार पुरिनिहार वाली एतीह जँ हुनका लोकनि केँ बुझि मे आयत ते की होयत.
राति भेने शीला’क माए सबटा खिस्सा रामचन्द्र जी के सुनौलैथि. शीला हुनकर अपन कोखि’क फल छलीह आ जेना प्रत्येक स्त्रेगण केँ विश्वास रहैत छैक जे हुनकर कोखि कखनो खराब नहि भऽ सकैत छैक. शीला’क गलती बुझलो पर जे कहानी रामचन्द्र पाठक लेल सुनाएल गेल छल ओहि मे शीला’क गलती केँ नजर अन्दाज कऽ देल गेल छल. मुदा रामचन्द्र जी केँ अपन बेटी’क बारे मे बढियाँ सँ बुझल छल.
नेहा अपन घर मे हरदम नुकाएल छलीह. कुम्हरम सँ एक दिन पहिने शैलेन्द्र पटना सँ आबि गेलाह. नेहा सँ उपनयन’क विधि व्यवहार मे भागेदारी नहि लैति देखि हुनका सँ एकर कारण जानबाक कोशिश केलथिन्ह. पहिने सोचने छलैथि जे उपनयन’क बादे सब किछु शैलेन्द्र सँ कहथीन्ह. मुदा नेहा केँ फेर सँ शीला द्वारा अपन बाप’क बेज्जती याद आबि गेलन्हि.
ओ बाजए लागल्थिन्ह, “की हम एही द्वारे जन्म लेलहुँ अपन बाबूजी केँ अहाँक घर मे बेइज्जती करेबाक लेल. हमर बाबूजी की एही द्वारे हमरा पढौलन्हि जे हुनकर हम नाक कटाबिअन्हि?”
शैलेन्द्र चकित छलाह पुछलथिन्ह, “की भेल?”.
जवाब मे नेहा के किछु नहिँ फुड़लन्हि. जोर जोर सँ कानए लागल्थिन्ह. आ कानिते कानिते शैलेन्द्र केँ सब किछु बता देलथिन्ह. स्त्री’क नोर मे अपार शक्ति होइत छैक. स्त्री’क नोर जतय कोनो व्यक्तिगत अवसाद केँ दूर करबा मे सहायक होइत छैक ओतैये ई महाभारत करेबा मे सक्षम होइत छैक. आ सबसँ बेसी स्त्री’क नोर हुनकर पति’क सीधे हृदय केँ छलनी करबा मे समर्थ होइत छैक. आ सबसँ पैघ जे स्त्री’क नोर हुनकर पति’क मस्तिष्क केर उपर मे एकटा बाहरी आवरण लगा दैत छैक जकर आगू मे हुनकर पति केँ किछु नहि देखा पड़ैत छैक. स्त्री’क नोर स्त्री’क पति केँ पालतू बना दैत छैक. इएह सब बात शैलेन्द्र सँग सेहो भेलन्हि. हुनका तामस सँ देह काँपए लागलन्हि. आँगन मे हकार पुरिनिहार सब बैसल छलीह. से किछु विचार मे नहि एलन्हि. आँगन मे जा जोर जोर सँ चीकरैत शीला केँ कहय लागलाह.
“तोरा किछु लाज-विचार छौक की नहिँ. तोँ हमर ससूर जी के लालन पालन केने छी?”, शैलेन्द्र’क चेहरा तमतमाएल छल ओ आगू आओर किछु बाजए वाला छल कि शीला कहलथिन्ह, “से भैया अपन कनियाँ’क पक्ष किएक लऽ रहल छी? हुनका सँ पुछियौक ने, जे हमरा गँवार किएक कहलैथि?”
“खबरदार जँ आई सँ नेहा’क बाबूजी’क नाम लेलीह ते, जीभ काटि केँ फेकि देबौक”, शैलेन्द्र ई बात कहि केँ ओतय सँ चलि गेलाह.
ओना ते शैलेन्द्र बचपने सँ शीला केँ डाँटैत छलाह. शील से हुनका पैघ भाए’क सब सम्मान दैत छलीह. मुदा अपन कनियाँ लेल ओ जीभ कटताह से हुनका बर्दाश्त नहिँ भेलन्हि. आ ओहु मे पूरे समाज’क सामने मे. सब हकार पुरनिहार’क सामने मे. शीला अपना घर मे जा केँ जोर जोर सँ कानय लागलीह. ओ निर्णय कऽ नेने छलीह जे आब ओ अपन घरे मे रहतीह.
दिन ते बीति गेल. मुदा स्त्रीगण सब मे एक कान सँ दोसर कान मे चर्चा पसरि गेल. रातोँ रात ई बात पूरे समाज मे पसरि गेल. लोक दाँत’क तऽर मे आँगुर काटए. सब गोटे ओहिठाम इएह बात’क चर्चा होमय. किओ शीला केँ ठीक कहैथि ते किओ नेहा केँ. रामचन्द्र पाठक जे अपन पूर्वज’क राजशाही ठाठ बाट केँ फेर सँ जीबाक लेल दम्भ भरैत छलैथि, हुनकर सम्मान केँ पूरे समाज’क सामने मे बेटी आ पुतोहु’क लड़ाई खराप कऽ देने छलन्हि.
भोर भेने उपनयन छलैक. हकार पुरिनिहार फेर सँ आँगन आएल छलीह. आएल छलीह उपनयन’क हकार पुरबाक लेल आ ध्यान छल शीला आ नेहा’क उपर मे. मुदा शीला अपन घर मे सुतल छलीह. हुनकर माए गेलथिन्ह हुनका उठेबाक लेल. कहल्थिन्ह, “शीला पूरे समाज’क लोक आयल छथि चल ओतैये बैसि”.
“से हमर ओतय कोन काज अछि. अपन पुतोहु के कही जा के बैसतो” शीला बाजलीह.
“ओ ते बैसले छथीन्ह तोहूँ चल”. हुनकर माए कहल्थिन्ह.
“काल्हि पूरे समाज’क सामने मे एहि औरत’क चलते भैया हमरा बेइज्जत केलैथि. आब जाबए धरि भौजी सबहक सामने मे हमर पैर पकड़ि माफी नहि मानतीह हम नहि जाएब. एक्के ठाम कहि दैत छी नहि जाएब.” शीला अपन पक्ष राखैत कहलथिन्ह.
हुनकर माए हुनका कहल्थिन्ह, “से भौजी तोरा सँ पैघ छथिन्ह. तोरा पैर पकैड़ि कोना माफी माँगथीन्ह.”
“से आब जे हो” शीला अपन बात पर अड़ल छलीह.
शीला’क माए जा के शैलेन्द्र के कहल्थिन्ह “उपनयन मे जँ शीला नहि भाग लेत ते लोक की कहत, आ ओ कहैत छै जे जखन भौजी माफी माँगतीह तखने हम जायब. नेहा शैलेन्द्र’क बगल मे ठाढ़ सब किछु सुनि रहल छलीह.
शलेन्द्र के आब अपरतिव लागि रहल छलन्हि. एकेटा बहिन छलन्हि लोक’क सामने मे ओकर एत्तेक बेईज्जती नहि करबाक चाही. शीला ते बचपने सँ दुलारु छलीह. बचपन मे एत्तेक कतेक बात केँ ओ माफ कऽ दैत छलाह. आ कहिए देल्थिन्ह ते की भेल. बेचारी चारि दिन लेल आयल छथि चलि जेतीह. इएह सब सोचि हुनका बहुत खराप लागैत छलन्हि. मोन मे होइत छलन्हि जे छोट बहीन थीकिह जाकेँ माँफी माँगि ली.
नेहा शलेन्द्र’क बगल मे ठाढ़ छलीह. होइत छलन्हि जे ओएह गलती केने छथि. अपन माए-बाप लग सब दुलारु होइत छैक. ओ अपन भैया लग कतेक दुलारू बनल रहैत छथीन्ह. अपन पति’क उपर मे हुनका आओर दया आबैत छलन्हि. मोन मे होइत रहन्हि जे हुनकर ई स्थिति’क लेल ओएह जिम्मेदार थीकीह.
मोन मे विचारि लेलथि जे जाकेँ शीला सँ माफी माँगि लैत छी. शैलेन्द्र केँ छोड़ि शीला’क घर गेलीह. सीधे पैर पकड़ि माफी माँगबाक प्रयास केल्थिन्ह.
शीला जल्दी सँ अपन पैर छोड़ा उपर कए लेल्थिन्ह. भेलन्हि जे किओ देखि नहि लिअ. नहि ते लोक कहतन्हि कतेक छोट बुद्धि के छथि अपना सँ पैघ लोक सँ पैर छुबा माफी माँगि रहल छथि. शीला कहल्थिन्ह, “भौजी अहाँ हमरा सँ पैघ छी हमरा पाप’क भागेदारे नहि बनाउ”. हमरा भैया कतेक दुलार करैत छलैथि, “काल्हि कहलैथ जे हम जीभ काटि देब”.
शैलेन्द्र अपन कनियाँ सँगे शीला’क घर दिस गेल छलाह आ हुनका सँग किछु हकार पुरिनिहार सेहो. ओ सब लोकन्हि शलेन्द्र’क कनियाँ केँ हुनकर बहिन सँ माफी माँगैत देखने छलैथि. ओहि बीच मे शैलेन्द्र शीला लग जा केँ बजलाह, “छोटकी हमरा माफ नहिँ करबेँ”.
शीला केँ आब आओर खराप लागैत छल. कहल्थिन्ह, “भैया माफ करु एकर सभ’क दोषी हमहीँ छी. हमरे भेल जे भौजी एतय आबि केँ हमर जगह लऽ नेने छथि. हमर आँखि मे परदा पड़ि गेल छल जे विवाह’क बाद घर पुतोहु के भऽ जाएत छैक.
शैलेन्द्र अपन बहिन’क माथ पर हाथ फेरैत कहलथिन्ह, “ई घर तोरो छीयौक”.
पाछू भीड़ मे रामचन्द्र जी अपन पुतोहु केँ अपन बेटा-बेटी मे मेल कराबैत देखि नेने छलैथि. आँखि मे नोर हुनको चलि एलन्हि. बाजि किछु नहि सकलाह. मुँह सँ एक्के बात निकललन्हि, “पढ़ल लिखल लोक एहने होइत अछि. छोट छोट पर झगड़ा नहि बढाबैत अछि, अपितु ओकरा खतम करबा दैत छैक.”.
उपनयन’क ढोल फेर सँ बाजए लागल. काज बढ़ियाँ सँ सम्पन्न भेल. समाज’क लोक रामचन्द्र पाठक’क घरक सब कहानी देखने छलैथि. मुदा सब घर जा के एक्के बात बजैत छलैथि, “पढ़ल लिखल लोक एहने होइत छैक”.


3 टिप्पणी (Give your comments):
बहुत निक ल।गल ।
नीक प्रस्तुति! प्रेमचन्द'क लिखल "बडे घर की बेटी" मोन पडि गेल।
Sir,
Utkrist chhal muda kichhu aur bhavnatmak bihari sambhav chhal.
Post a Comment