इ सपना केकर अछि- कुन्दन कुमार मल्लिक

मुम्बई- 23 मार्च, 2008
इ सपना केकर अछि,
अन्न नहिं, जल नहिं, सडक नहिं,
मुदा मोबाइल नेटवर्क अछि,
माथा पर छत नहिं आ नहिं अछि अस्पताल,
आ नहिं धिया-पूता’क लेल स्कूल,
जेतय एखनो धिया-पूता सभ ईंटा भठ्ठा में
अपन बालपन झोंकि रहल अछि,
मुदा ओतय मोबाइल नेटवर्क अछि!

बिडला, अम्बानी आब तरकारी बेचि रहल अछि,
तरकारी बेचय बला सभ भीख माँगि रहल अछि,
शहर में धराधरि अट्टालिका बनि रहल अछि,
मुदा एखनो आम आदमी छतविहीन अछि,

गली-गली में पिज्जा हट, के.एफ.सी. खुलि गेल अछि,
ओतय कतेक पेट पीठ में धँसल अछि,
माय अपन करेजाक टुकडा बेचि रहल अछि,
स्त्रीगण अपन अस्तित्व बेचय लेल बाध्य अछि,

वैश्वीकरण के मायाजाल में फँसल
इ सपना केकर अछि?

- कुन्दन कुमार मल्लिक, बंगलोर, सम्पर्क- +91-9739004970

7 comments:

Rajeev Ranjan Lall said...

"अन्न नहिं, जल नहिं, सडक नहिं,
मुदा मोबाइल नेटवर्क अछि,
"
भावपूर्ण कविता, महीन सोच, बढिया प्रस्तुति।
एनाही आगा लिखैत रहु।

करण समस्तीपुरी said...

Kundanji,
sarvpratham hum apnahi aa je koi hammar pratikriya dekhtaah hunka saon maafee chaahab ki Devnagree fontak abhav mein apan matribhasha seho Raoman mein likh rahal chhee. Sanch kahi ta humra ahaan sa ehan paripakwa sochak aash nahi chhal. Heyo, ahaan uppar saon hassi-thattha mein kushal dekhait chee muda chhee ahaan "Chhupa Rustam" ! Dhanyawaadak saathe bhavishyo mein ehne pravaah banal rahbaak shubh kamna ! Vishesh kee kahu, Ehina aagal rahu !!!

पद्मनाभ मिश्र said...

कुन्दन जी;
एतेक बढ़ियाँ कविता’क दिल सँ बधाई. हमर कम्पनी हमर हाथ काटि लेलक अछि. हम ब्लोगर पर दिन मे लोगिन नहि कऽ सकैत छी. मुदा अहाँ लोकनि सँ एकेटा आग्रह जे प्रत्येक लेख पर टिप्पण्णी जरूर दी.
हम काल्हि अहाँ के मोबाईल पर फोन केने छलन्हुँ. मालूम भेल अहाँ बँगलोर मे नहि छी.

Anonymous said...

अहांक पर्यास कफी सरह्नीय अछी. हम अहां स एहि सब विश्य पर लिख्वाक ज्रुर आगरह क्र्व.
Birendra Kumar Mallik

कुन्दन कुमार मल्लिक said...

उत्साहवर्धन के लेल अहाँ सभ केँ सादर धन्यवाद। अहाँ सभ स अपेक्षा अछि जे हमर कमी आ गलती पर हमर ध्यान आकृष्ट कराबी।
पद्मनाभजी अहाँ स गप नहिं भs सकल ताहि लेल क्षमाप्रार्थी छी। किछु विशेष कार्यवश मुम्बई गेल छलहुँ आ आई भोर में बंगलोर पहुँचलहुँ। अहाँ'क फोन के प्रतीक्षा रहत।

pankaj said...

kundan jee,

apnek soch ke ham dad dai t chi je etek door tak soch lai chiyai, dekhait ta hamhu sab chiyai relince ke prachar lekin dimag nai laga pavait chi, aha ka bahut bahut dhanyawad. bahut badhiya soch yai, lagal rahu, anahite aaguo likhait rahu aur hamra sab ke margdarshan karbait rahu.

Rajiv said...

कुन्दन जी,
अहांक प्रयास सराहनीये अछि और ओहियो से सराहनीये अहांक सुक्छ्म सोच अछि.
कविता बहुत हि भावपुर्ण एवम बढिया अछि हमर बहुत बहुत शुभकामना.

अहांक
"अमर जी"