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25.3.08

हमर गामक यात्रा

झट्कारैत बढल जाइत रहौ । Station पर जा पत्ता लागल जे ट्रैन अक समय मे घोर परिवर्तन कयल गेल छल । पहिने भोर, दुपहर आ सांझ क तीन बेर जे चलैत छल से दुटा पर सिमित भेल छल , केबल भोर आ सांझ । जाहि कारणे लोक अक चाप तेना बढल छल ज समय स दु घण्टा पहिने हे स सिट छापल गेल रहय । कहुना क एकटा सिट पर नज़र गेल आ झट द दबोचलौ । यात्रि अक हेतु बनायल डब्बा मालगाडी अक सन बुझिपडैत छल । केबार आ खिड्की अक सरी एकोटा नहि रहिगेल छल । किछु नोचल गेल कहादुन त किछु रौद-बसात स गैइल गेल । अगल बगल स सुग्गर अक बच्चा सभ दौरैत छल....जकर दुर्गन्ध स नाक फ़ाइट रहल छल ।

जेब स रुमाल निकालि मुह झप्लौन.....ओहि स आयल सेन्ट अक सुगन्ध बहुतो क हमरा दिस आकर्षित कयलक । परिछन कालक द्श्य जका, हम बैसल आ चारु दिस स लोक घेर्ने हमरा निहारैत छल । एक गोट सज्जन हमरा उपर स पैर तक घुरैत कहला, "कि यौ एना चमैक-दमैक क सासुरे जा रहल छि कि?"

आश्चर्य भ हम अपना के निहार्लौ, बस फ़ुल बाहिके भेस्ट , जिन्सके पेन्ट, कन्भर्स (Converse) अक जुत्ता .....अहि मे सासुर बला बात कतय स अलय । मुस्कियैत कहलियैन ," जी नहि । हम अप्पन गाम क लौट रहल छि ।"

तकरा बाद त हुनकर प्रश्नक पिटारा तेना खुलल जे बन्द होयाबाक नाम नहि लेलक । लागि रहल छल जे कोनो घटक छैथ आ हम बर बाबु । बर्तालाप अक चक्कर मे समय तेन बितल जे कखन ट्रैन चलल आ गाम अक हल्ट आयल पत्ते नहि भेल । निक समय के लेल धन्यबाद दैत हुन्का स बिदा मग्लौन आ झोरिया ल फ़ेर स झटकारैत गेलौ । प्रत्येक डेगमे उमंग आ उत्साह उमैड़ि रहल छल । खुसिक लहैर तेना उछैल रहल छल जे बाट मे भेटल सभ अन्चिन्हार लगैत छला । नज़ैर केबल मा-बाबुजी क तकैत रहय या त परिवारक अन्य सदस्य के जिन्का भैर-पाज़ पज़ियाबितौ ।

4 टिप्पणी (Give your comments):

अजित कुमार झा said...

Sahar ak daud dhoop sa jaan jogabait ...kichhu kaal gaam - ghar mon parait...kichhu appan bhasa me likhbak prayas kayne chhi ..chhamaprarthhi truti sav lel ..sang laagal sudhhar kari likhait rahbak sankalp la rahal chhi . Apnek sallaha-sujhaab ak sahridaya swagat karab.Dhanyabaad ! Jai maa mithila!

कुन्दन कुमार मल्लिक said...

अजीतजी,
सुस्वागतम् आ एहि प्रथम प्रयास'क लेल शुभकामना। एहि सँस्मरण में अपन माटि-पानी के प्रति छटपटाहट प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होयत अछि जे प्रशंसनीय अछि। निरंतर प्रयास सs अपनेक लेखन में सुधार आयत। यदि सम्भव होय त किछु मैथिली पोथी पढू।
एहिना लिखैत रहू!

सादर-
कुन्दन कुमार मल्लिक, बंगलोर
सम्पर्क- +91-9739004970

पद्मनाभ मिश्र said...

अजीत जी;
पहिल पोस्ट’क लेल बधाई. दोसर पोस्ट’क बाट ताकि रहल छी.

Rajeev Ranjan Lall said...

बहुत साल भऽ गेल गाम गेला आ ओही संस्मरण के अहाँ सहजे चित्रित कयलहुँ।

नीक प्रयास आ बधाई पहिल रचना के लेल। एनाही आगाँ एहि से नीक प्रस्तुति लऽ के आऊ से हमर अपेक्षा अहाँ सँ।

धन्यवाद,
राजीव रंजन लाल