हमर गामक यात्रा

झट्कारैत बढल जाइत रहौ । Station पर जा पत्ता लागल जे ट्रैन अक समय मे घोर परिवर्तन कयल गेल छल । पहिने भोर, दुपहर आ सांझ क तीन बेर जे चलैत छल से दुटा पर सिमित भेल छल , केबल भोर आ सांझ । जाहि कारणे लोक अक चाप तेना बढल छल ज समय स दु घण्टा पहिने हे स सिट छापल गेल रहय । कहुना क एकटा सिट पर नज़र गेल आ झट द दबोचलौ । यात्रि अक हेतु बनायल डब्बा मालगाडी अक सन बुझिपडैत छल । केबार आ खिड्की अक सरी एकोटा नहि रहिगेल छल । किछु नोचल गेल कहादुन त किछु रौद-बसात स गैइल गेल । अगल बगल स सुग्गर अक बच्चा सभ दौरैत छल....जकर दुर्गन्ध स नाक फ़ाइट रहल छल ।

जेब स रुमाल निकालि मुह झप्लौन.....ओहि स आयल सेन्ट अक सुगन्ध बहुतो क हमरा दिस आकर्षित कयलक । परिछन कालक द्श्य जका, हम बैसल आ चारु दिस स लोक घेर्ने हमरा निहारैत छल । एक गोट सज्जन हमरा उपर स पैर तक घुरैत कहला, "कि यौ एना चमैक-दमैक क सासुरे जा रहल छि कि?"

आश्चर्य भ हम अपना के निहार्लौ, बस फ़ुल बाहिके भेस्ट , जिन्सके पेन्ट, कन्भर्स (Converse) अक जुत्ता .....अहि मे सासुर बला बात कतय स अलय । मुस्कियैत कहलियैन ," जी नहि । हम अप्पन गाम क लौट रहल छि ।"

तकरा बाद त हुनकर प्रश्नक पिटारा तेना खुलल जे बन्द होयाबाक नाम नहि लेलक । लागि रहल छल जे कोनो घटक छैथ आ हम बर बाबु । बर्तालाप अक चक्कर मे समय तेन बितल जे कखन ट्रैन चलल आ गाम अक हल्ट आयल पत्ते नहि भेल । निक समय के लेल धन्यबाद दैत हुन्का स बिदा मग्लौन आ झोरिया ल फ़ेर स झटकारैत गेलौ । प्रत्येक डेगमे उमंग आ उत्साह उमैड़ि रहल छल । खुसिक लहैर तेना उछैल रहल छल जे बाट मे भेटल सभ अन्चिन्हार लगैत छला । नज़ैर केबल मा-बाबुजी क तकैत रहय या त परिवारक अन्य सदस्य के जिन्का भैर-पाज़ पज़ियाबितौ ।

5 comments:

अजित कुमार झा said...

Sahar ak daud dhoop sa jaan jogabait ...kichhu kaal gaam - ghar mon parait...kichhu appan bhasa me likhbak prayas kayne chhi ..chhamaprarthhi truti sav lel ..sang laagal sudhhar kari likhait rahbak sankalp la rahal chhi . Apnek sallaha-sujhaab ak sahridaya swagat karab.Dhanyabaad ! Jai maa mithila!

कुन्दन कुमार मल्लिक said...

अजीतजी,
सुस्वागतम् आ एहि प्रथम प्रयास'क लेल शुभकामना। एहि सँस्मरण में अपन माटि-पानी के प्रति छटपटाहट प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होयत अछि जे प्रशंसनीय अछि। निरंतर प्रयास सs अपनेक लेखन में सुधार आयत। यदि सम्भव होय त किछु मैथिली पोथी पढू।
एहिना लिखैत रहू!

सादर-
कुन्दन कुमार मल्लिक, बंगलोर
सम्पर्क- +91-9739004970

पद्मनाभ मिश्र said...

अजीत जी;
पहिल पोस्ट’क लेल बधाई. दोसर पोस्ट’क बाट ताकि रहल छी.

Rajeev Ranjan Lall said...

बहुत साल भऽ गेल गाम गेला आ ओही संस्मरण के अहाँ सहजे चित्रित कयलहुँ।

नीक प्रयास आ बधाई पहिल रचना के लेल। एनाही आगाँ एहि से नीक प्रस्तुति लऽ के आऊ से हमर अपेक्षा अहाँ सँ।

धन्यवाद,
राजीव रंजन लाल

Avijeet Mishra. said...

aahha sb lok samne bohot ninm yogyata aour,gyan rakhai chhi hm...
apitu appan bhasa aur sanskriti k lel sajag bna ke lel pryatnaseel chhi

apan bhasa k ate sammidh site dekh k bohot neek lagal....
ahan sb ke hamar pranam...
jai maithli"

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