ग़जल- गलती (सुभाष चन्द्र)

गलती

हम ओकरा देखि नहिं सकल,
नहिं जानि केहेन चेहरा छल,
दर्दक चिडय जेखन आयल,
चारुकात अन्हरिया छल,
हम जेखन मुस्कियैत छलहुँ,
आँखि सँ बुन टपकैत छल,
हमर किस्मत पर दुर्दिन’क छाया छल,
इ तs हमर गलती छल,
परछाई पर भरोसा कएल,
परछाई के कोन दोख,
ओ तs शब्दविहीन छल,
डिबिया’क टेमी नागिन जेकाँ,
अन्हार देबाल पर बुझैत छल,
एकसरि में बीन सँ बेसी सुनसान’क घोर छल,
जेकर नाव टकरायल राति भरि तूफान सs,
ओहि बेचारा के देह कछेर पर ठहरल छल!!
-------------------------------------------------------------------------------
सजा

यदि नहिं दैतहुँ सजा हमरा,
त उमर भरि रहि जायत टीस हमरा,
सबहक नजरि रहत हमरे दिस,
एना नहिं धीरे स बजाउ हमरा,
की बतबैत अछि इ लकीर सभ,
मुठ्ठी खोलि के देखू एकरा,
टिमटिमैत भोरक तरेगन,
दs रहल अछि आस हमरा,
हमरा जैबाक नहिं अछि मंजिल पर,
कियैक शोर पाडैत अछि रस्ता हमरा,
हम सितमगर, फरेबी, झूठा छी,
की की नहिं कहलक ओ हमरा,
हमरा बिर्रो बनि के जाय दिअ,
कियो शोर पारि रहल अछि हमरा।

- सुभाष चन्द्र, नई दिल्ली, सम्पर्क:- +91-98718 46705, ई-मेल- subhashinmedia@gmail.com

2 comments:

आदि यायावर said...

दिनो-दिन स्तर मे सुधार सराहनीय अछि. शुभाष जी केँ कतेक रास बात’क मुख्य धारा मे शामिल भेनाई आवश्यक

करण समस्तीपुरी said...

ग़ज़ल मैथिली भाषा'क लेल बेशक नव विधा छी आ एहि में योगदान'क हेतु सुभाष जी निश्चय प्रसंशा'क पात्र छथि ! मुदा भाषा परिवर्तन वा जे कारण होए, हमरा एहि में ग़ज़ल के नैसर्गिक कोमलता नहिं भेंटल ! अपने'क अगिला रचना से विशेष अपेक्षा रहत !!!