दस पाइ मे रामदीन के आलूकट

पुरान गीत

दस पाइ मे रामदीन के आलूकट,
दू टाका मे लाइटहाउस के फ्रंट टिकट
एमएलएकेडमीक गेट पर मात्र चवन्‍नी मे भेट जाइत छल गणेशीक भूजा
पांच पाइ मे यादवजी के झोरा सं बहराइत छल पाचक
अइ महगी के जमाना मे स्‍वादक ई पुरान गीत तहिना अछि
जेना ऑल इंडिया रेडिया के उर्दू सर्विस दुफरिया मे गबैत अछि
मेरे पिया गये रंगून वहां से किया है टेलीफून तुम्‍हारी याद सताती है

मल्‍टीप्‍लेक्‍स

अंगना मे एकटा क'ल गाड़ल छल
करगर हाथ सं पानि अबैत छल
नेनपन मे क'लक कात मे ठाढ़ हम पिछड़‍ि जाइत रही कतेको बेर
लबकी काकी घोघक कोर सं मुस्किया दैत छलीह
कमनाहरि 'बउआ बउआ' क' क' दौगैत आबैत छल
कहैत छल - पिच्‍छड़ दिस किएक जाइत छैं

पचीस बरखक बाद एकटा मल्‍टीप्‍लेक्‍स मे तहिना पिछड़‍ि गेलहुं
लोकबेद लबकी काकी जकां ठिठियाए लागल
एकसरि ठाढ़ भेलहुं अपना बलें
समुच्‍चा पिच्‍छड़ छल
ततेक चिक्‍कन जे मुंह देखि सकी अइ मे

भरि जुआनी मे हमरा जीबा मे असोकर्ज होइ-ए
गैरमैथिल कनिया कहय छथि -
तुम बूढ़ों की तरह बातें मत किया करो!

8 comments:

करण समस्तीपुरी said...

अविनाश जी,
एखन धरि हम सब अपनेक कहे छलौंह, "तुम्हारी याद सताती है !" बड नीक लागल अपनेक नव प्रस्तुति ! एहि ब्लोगक आदिकाल में प्रकाशित अपनेक रचना जतय हमरा अपनेक प्रसंशक बना गेल ओतहि ई प्रस्तुति एक गोट विशेष आस जगौने अछि ! अपनेक सघन सक्रियता अपेक्षित !

करण समस्तीपुरी said...
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Rajesh said...

avinash jee!!

Ekta ajeeb drishy san bhent karelon, swatah man me sabikak baat yaad aabi gel. badd nik lagal.
ahina kichh aar puranka uddheshal smarank prastuti ke ahan san aas ahi.

Bishe dosar ber..
Rajesh Jha

डा० पद्मनाभ मिश्र said...

ई कहानी अविनाश जी’क नहि कमोवेश मिथिला’क गाम सँ जूड़ल प्रत्येक लोकनिक अछि. जतय ई कविता गाम’क मोन पाड़ि देलक ओतैये वर्तमान वस्तुस्थिति पर कटाक्ष सेहो प्रेसित काएलक. निम्नलिखित बात फेर ओएह एकलाख टाका वाला:
...भरि जुआनी मे हमरा जीबा मे असोकर्ज होइ-ए
गैरमैथिल कनिया कहय छथि -
तुम बूढ़ों की तरह बातें मत किया करो!" ......

मुदा अविनाश जी’क तारीफ नहि काएल जाए ओही मे बढ़ियाँ. पिछला बेर तारीफ केलहुँ तऽ हुनका एक साल लागलन्हि दुबारा उपस्थिति दर्ज करबा मे. नहि जानि एहि बेर’क तारीफ मे तेसर बेर कहिया एताह. अतः जाबय धरि ओ सक्रिय रुप सँ हिस्सेदारी नहि लए छथि हुनका सँ मुँह फुलेने फायदा...

कुन्दन कुमार मल्लिक said...

मोन पडि गेल ओ दिन जेखन टिफीनक घंटी लागितहि स्कूलक गेट पर ठाढ विक्रम भूजाबलाक ठेला दिस भागनाय। ओना अहाँ केँ त' गैर मैथिल कनिया कहलथि जे "तुम बूढ़ों की तरह बातें मत किया करो"। हमरा त' एकगोट तथाकथित आधुनिक मैथिल कनिया कहलथि जे हम सभ दिन गँवार के गँवारे रहि गेलहुँ।
@ पद्मनाभजी, अहाँ के कहनाय सही अछि जे अविनाशजी सँ मुँह फुलेनाइये उचित रहत।

Rajeev Ranjan Lall said...

अलग स्वाद छल एहि ब्लोग के, जहिना गणेशी के भुजा में आ रामदीन के आलूकट में।

सुमित ठाकुर said...

लाइट हॉउस के जिक्र सुनी क हमरा याद अबि गेल ओ सब सिनेमा जे सातवी कक्षा पढैत समय जिला स्कूल से भाग का देखने छल्लौ वोही ठा इमाम बाड़ी में हमर निवास छल जे मुदा किछु कारन स हम सब बेच देलिये आब दरभंगा के दोसर कोन में घर अछी ओहिठाम से लाइट हॉउस एतेक दूर छै जे ओता नही जाय पाबय छि .
बहुत निक पद्य एक दम गणेश के भुजा सनक

Rajiv said...

अविनाश जी,
अहांक पद्य बहुत नीक लागल आ कतैको गप मोन परी गेल. सब पहिलैये बहुत किछु लिख देने छैत ताहि लेल हम एतबै कहब जे, एहने रचना लिखल करु जे मन के छु लै.

अहांक
अमरजी

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