काका काकी दहेज लेलथि

कक्का भोरे बिदा भेलाह
जीट-जाट आ कान्हि छटा
पुछलहुँ कक्का एना कतए
कहल जे जाइ काल टोक नञि ने
अबए छी कने बजार भेने
मीठ पकवान आ मिठाई नेने
एम्हर काकी घरकेँ नीपल
सर सफाई कका चमका रहल
कोन अवसर जे एना भ’ की रहल
पुछलहुँ जे काकीसँ कहलनि
बौआ आइ घटक आबि रहल

अच्छा तँ दोकानक सजावट छी ई
ग्राहकक स्वागतक तैयारी छी ई
सभ किछु आइ नव तेँ लागि रहल
भाइजीयोक मुँह चमकि रहल
कान्हि छटाक’ केश रँगा क’
पान चबाबैत कुर्तामे बान्हल
जतेक बढ़िया समान ततबे बढ़िया दाम
बनीमाक राज कक्काक’ खूब नीकसँ बुझल

घटक जी अएला निहारि क’ देखला
ठोकि बजा क’ सभ किछु परखला
भाइजीपर ओ’ फेर बोली लगेलथि
मोल तोल केँ ल’ क’ खूब भेल घमर्थन
सवा चारि लाखमे भेल बात पक्का
देखू आजु हम्मर भैयि बिकेलथि
लागनिक सूद-मूर सभ उप्पर भेलन्हि
जमा-पूँजीकेँ खूब नीकसँ भजओलथि
कक्का काकी आइ हमर दहेज लेलथि
निमुख बरद जेकाँ भैय्या बिकेलथि
कक्का काकी आइ हमर दहेज लेलथि
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7 comments:

Anonymous said...

Bhut nik,satch me eh kiya mikat bhaijee aye ahan bikelow kael ham,paso kiyo aur...,Sirf bolala se ni hoyat hamar aur aanhake aaga aabpart.mita de dehaj sabd maithila se...
Name Vsahant jha
Vill=post =HANUMANNAGAR BHOUR (MUDHUBANI)

आदि यायावर said...

अजीत जी, अहाँक रचना’क बहुत दिन सँ बाट ताकि रहल छलहुँ. आई देखलहुँ तऽ मोन खुश भऽ गेल. अहाँक पद्य सही जगह निशाना लगेलक अछि, बिल्कूल टू द पोइन्ट. हम ताकैत रहि गेलहुँ मुदा कोनो कमी नहि नजर आएल. आगू एहिना लिखैत रही, तकर अपेक्षा,

पद्मनाभ मिश्र

कुन्दन कुमार मल्लिक said...

वाह अजीत जी,
अहाँ अपन आठ महीनाक चुप्पी तोडैत एक बेर फॆर अपन उपस्थिति दर्ज करबैत दहॆजक दोकान पर खूब जोरगर चोट कयलहुँ। रचना नीक अछि आ सभसँ पैघ गप इ जॆ कथ्य आ शिल्प मॆ कोनो तरहक भटकाव नहि। एहिना अहाँ सक्रिय रही आ एतॆक पैघ विश्राम नहि ली सैह आग्रह।

एकटा गप आर जे केवल रचने टा सँ नहि वरन् टिप्पणीक माध्यम सँ सेहो सक्रिय रही तकरो अपॆक्षा।

@ वसंत झा जी,

हमरा बुझने एहि मंच पर अपनेक इ पहिल टिप्पणी छी ताहि लॆल अपनेक धन्यवाद आ हार्दिक स्वागत। संगे आग्रह जॆ एहिना रचना सभ पर अपन विचार दैत रही।
सादर-सप्रेम
कुन्दन कुमार मल्लिक

अजित कुमार झा said...

क्षमाप्रर्थि छी बिलम्भ हेतु | आ कोटि कोटि धन्यबाद प्रोत्साहन अक लेल | आगा स क्रियाशिल रह्बाक आस्वासन दैत छी |

subhash said...

kawita nik bani paral achhi. kathya seho samichin, yehi per sabke chintan karbak chhahi.

Subhash chandra, new delhi

करण समस्तीपुरी said...

Neek rachna achhi ! ek ta vikat saamaajik kuriti par jorgar vyangya !! Agila ber kichhu nayaapan ke apekshaa rakhait chhee !
Dhanyaawaad !!!

Raju said...

Its really a wonderful poem, Ajit. Its really wonderful master piece. I really appreciate the way you have composed it.

I read it and felt as if I am right there in the set of poem.

Keep it up.

Good luck and expect more cultivable poems like these from you.

Regards,

Rajesh Chaudhary

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