गाम'क गप-व्यवहार

माटीक घर आ फूस'क चार नीक लागैत अछि !
हमरा गामक गप-व्यवहार नीक लागैत अछि !!

गेल छलहुँ हम डेढ़ बरख पर,
अप्पन सुंदर गाम !!
लाल- लाल लिच्ची छल लुधकल,
हरियर-पीयर आम !!
आमक चटनी के'र चटकार नीक लागैत अछि !
हमरा गामक गप-व्यवहार नीक लागैत अछि !!

रवि, बृहस्पति आ मंगल दिन,
ओतय लागैत अछि हाट !
शहर'क माल'क बात करब कि,
जखन देखब ओ ठाठ !
हटिया पर'क बात-विचार नीक लागैत अछि !
हमरा गाम'क गप-व्यवहार नीक लागैत अछि !!

हरल-भरल सुषमा संपन्न थिक,
ई प्रकृतिक बेटी !
मोन करैत अछि एकर कोरा में,
भs निचिंत हम लेटी !
प्रकृति सुताक सहज श्रृंगार नीक लागैत अछि !
हमरा गामक गप-व्यवहार नीक लागैत अछि !!

एखनहु बुझलहुँ कि ने बुझलहुँ,
ई थिक मिथिला धाम !
जतय जनमली सीता मैय्या,
जतय बियाहल राम !!
गंडक, कमला केर जलधार नीक लागैत अछि,
हमरा गाम'क गप-व्यवहार नीक लागैत अछि !!

- करण समस्तीपुरी

एकसरि- सुभाष चन्द्र

1. एकसरि

भटकैत-बौआइत छी, एम्हर-ओम्हर
लोक कहैत अछि कोनो भूत-पिशाच'क असर
एतय चर्च नहिं करब ओकर
टीस रहि जायत उमरि भर
देखल जहिया सँ परछई ओकर,
भटकैत छी, एक शहर सs दोसर शहर
के कहत एक्के बाट'क बटोही छी
अलग-अलग होयत अछि सभहक रस्ता
ओहिठाम करैत छी प्रार्थना
जतय नहिं कोनो देबाल
आ नहिं कोनो घर
रहैत छी एकसरि।
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2. मजबूरी
अन्हरिया फेर घेरलक आई,
आबि गेल फेर नव प्रभात
एहि चिडैं के किछु नहिं बुझल
होएत कोन डारि पर बसेरा आई
चहुँ ओर घुमैत अछि करिया नाग
ताकू ओ,
कतय अछि सपेरा आई
कतेक हरियल-भरल-पूरल
भs गेल बोन-झाँखुर
फूल'क सुगन्ध सँ आई
एहिठाम त फूल खिलैत छल
कोना कय पतझड'क भेल एतय ठौर
होयत रक्षक'क कोनो मजबूरी
जे बनि के आयल लुटेरा आई
सभ केँ छन्हि तूफान'क भय
जाहि में डूबल अछि हमर शरीर आई।
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3. बिछुडन
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जे सच अछि अहाँ सँ कहैत छी
आई हम धरैन जेकाँ खसैत छी
घेर लैत अछि पुरनका स्मृति
जेखन हम एकसरि उदास रहैत छी
ओ सभ तs भs गेल गंगाजल
मुदा, हम सागर में भसियाइत छी
जहिया सँ अयलहुँ एहि शहर में
दुख हरेक दिन बिछुडन'क होयत अछि।
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(एक बेर फेर श्री सुभाष चन्द्रजी'क रचना लय के आयल छी। एहि मंच पर युवा रचनाकार सुभाषजी'क इ दोसर प्रस्तुति छी। हुनक दूनू रचना गजल शैली में अछि। पेशा सँ पत्रकार सुभाषजी हिन्दी आ मैथिली साहित्य में सेहो सक्रिय छथि। एहि मंच पर हुनक पहिल रचना आ परिचय के लेल एतय क्लिक करु
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