सिंगरहार- श्री विवेकानन्द झा

- श्री विवेकानन्द झा
एक दिन अनचॊकहिं लिखऽ लागलहुं कविता
आ ई शताब्दीक अंतिम दशकक शुरुआती बर्ख छल
आ पुनः कतेकॊ बर्ख आंखिक सॊझां संऽ बीतैत गेल
एक दिन, एक दिन करैत
आ एक दिन
लागल कविता लिखबाक सामर्थ्य नहि रहल शेष
लागल हम प्रतिगामी आ खराप लॊक भऽ गेल छी
तें तऽ रूसि रहली कविता हमरा संऽ

Vivekanand Jha मधुबनी जिलान्तर्गत मधेपूर थाना अन्तर्गत तमौरिया स्टेशन लऽग’क बाथ नामक गाम’क निवासी श्री विवेकानन्द झा सम्प्रति नई दुनियाँ मे पत्रकार छथि. हिन्दी साहित्य’क अतिरिक्त हिनका मैथिली साहित्य मे विशेष रुचि छन्हि. प्रस्तुत कविता हुनक कतेक रास बात’क लेल दोसर रचना छिअन्हि



मुदा आब पुनः ओ सटल चलि आबि रहल अछि
तऽ लगै अय जे हम फेर संऽ नीक लॊक 
बनि रहल छी
हृदय हमर फेर भगवती घर केर निपलाहा धरती बनि रहल अछि

आ एखन इक्कीसवीं सदीक पहील दशक खत्म हॊअ लेल
अपन अंतिम बर्खक शुरुआत में जुटि गेल अछि
उमेद करैत छी अहि निपलाहा माटि पर 
खसतै पुनः कविताक सिंगरहार 
आ पुनः सुवासित हेतै ओकर, हमर, हमरा सबहक दुनिया|

5 comments:

subhash said...

मौन स पैघ कोनो भाषा नहीं, एकर अर्थ सेहो सुगम नहीं होइत अछि. शब्द जे व्यक्त होइत अछि , बेसी कल अप्पन अर्थ आ सन्दर्भ स विलग भ जायत अछि. मुदा, मौन के जहन कियो बुझय लागैत अछि त ओकरा शब्द के लाबैन पर जरेबाक चाही . तहन ने लाबैन परक दीप से घुप अन्हार मे इजोइत हयत. श्री विवेकानंद जी के रचना कमोबेश एहनइ छैन्ह.
ओना एही पर व्याक्या विन्यास के मर्मज्ञ श्री कारन जी आ गहिर भाव के संग यायावर जी के विचार पढ़बाक जिज्ञासा बनल अछि...

करण समस्तीपुरी said...

विवेकानंद जी कें पत्रकारक लेखनी मे एक टा सम्पूर्ण साहित्यकार नुकाएल अछि ! सत्यम शिवम् सुन्दरम् !!

Dayakant said...

विवेकानंद जी अपनेक साहित्यकार बेसी पत्रकार कम बुझना जाईत छि ! अहाँके पत्रकारक लेखनी मे एक टा सम्पूर्ण साहित्यकार नुकाएल अछि ! कविता बहुत बेसी नीक लागल आशा करैत छि जे पत्रकारिता के संग साहित्य में सेहो योगदान करब !

आदि यायावर said...

केशव जी,
मानि लिअ अहाँ हमरा न्योत दऽ केँ खाना पर बजबैत छी. अहाँक कनियाँ बहुत नीक खाना बनौने छथि. मुदा बारीक अहीँ छी आ हमरा परोसि केँ स्वयँ खुआ रहल छी. हमरा आगू मे सचार लागल अछि. मुदा निम्न रुप सँ:
राहैड़’क दालि आ पुदीना के चटनी एके बाटी मे काते कात. आलू-कोबी के तरकारी आ रायता अगल बगल मे एक दोसर मे मिलि सामँजस्य बना रहल अछि. तिलकोर थारी मे राखल अछि कठगर दही के सँग बलजोरि कऽ रहल अछि. बासमती चाउर’क भात टिनहा गिलास मे ठूसल बाट ताकि रहल अछि. आ नेवैद्य देला’क उपरान्त अहाँ हमरा मगही पान खुआ देलहुँ. एकर मतलब जे अहाँ अपन कनियाँ केर मेहनति आ पाक कला दुनू केँ अपन हस्तकला सँ तृप्त कऽ देलहुँ.

साहित्यो मे ओहने बात होएत छैक. किछु तत्सम शब्द आ सँस्कृतनिष्ठ वाक्य केँ साहित्य नहि कहल जा सकैछ. ओकरा पाठक केँ परोसबाक ढँग होएबाक चाही. प्रत्येक शब्द आ वाक्य पाठक केर मोन मे हिलकोर आनबाक चाही. अनेरोँ कोनो शब्द’क प्रयोग नहि होएबाक चाही. अँग्रेजी मे कहल गेल अछि "Your every word is indespensible". कठिन शब्द’क प्रयोग आसान गप्प नहिँ. कठिन शब्द केँ कोनो भी वाक्य मे यथोचित सत्कार भेटबाक चाही. कठिन शब्द’क प्रयोग केवल बहुते योग्य लोक कऽ ओकरा यथोचित सम्मान दऽ सकैत छथि. शब्द केँ साहित्य मे यथोचित सम्मान नहि भेटला सँ ओहिना स्थिति होइत छथि जेना उपर वाला उदाहरण मे "अहाँक कनियाँ द्वारा नीक खाना’क सँग भेल अछि". पाठक’क स्थिति न्योत खेनिहार सन भऽ जाइत छैक.

रहल बात विवेकानन्द जी’क. तऽ प्रत्येक शब्द सँग ओ यथोचित व्यवहार कर’ जानैत छथि. शब्द एहने चुनैत छथि जकर ससम्मान आदर भऽ सकैत छथि. एतबे नहि... हुनकर हाथ मे लोहार’क हथौड़ी सँग सोनारक हथौरी से छन्हि. आ कखन कोन हथौरी’क उपयोग काएल जाए, से नीक सँ जानैत छथि. आ एक पाठक केँ "सम्पूर्ण रचना भेटैत छन्हि".

हुनका सन’क लोक सँ भेँटि कऽ बहुत शाँति भेटैत अछि जे एखनो मैथिली’क भविष्य उज्ज्वल अछि.

डा० पद्मनाभ मिश्र

कुन्दन कुमार मल्लिक said...

विवेकानन्द जीक काव्य एहि मंच के नव आयाम प्रदान करैत अछि। बिम्ब, शब्द-संकलन हरेक दृष्टिकोण सँ हुनक दुहू रचना एक सँ बढि के एक अछि। उम्मीद अछि जे एहिना निपलाहा माटि पर खसतै पुनः कविताक सिंगरहार आ पुनः सुवासित हेतै ओकर, हमर, हमरा सबहक दुनिया |