आई फेर मोन उदास अछि …….

आई फेर मोन उदास अछि !
आँखि मे अतीत ,
आ जी मे प्यास अछि !
आई फेर मोन उदास अछि !!

दिवालीक दीया आ होरीक रंग !
लडिकपन के संगी, गामक हुरदंग !!
नुक्का-छिप्पी ओ झगड़ा-लड़ाई !
पोखरिक भीड़ पर पसरल अमराई !!
बहुरत कखन ओ दिन,
लगौने ई आस अछि !
आई फेर मोन उदास अछि !!

महुआ के मह-मह आ गमकैत आम !
अंगराई धरतीक नयनाभिराम !!
कोइली-पपीहरा गाबय मल्हार !
भौंराक गुंजन आ वसंती बयार !!
विरहक बैरी,
आएल मधुमास अछि !
आई फेर मोन उदास अछि !!
***
- करण समस्तीपुरी

9 comments:

Mired Mirage said...

बहुत सुन्दर कविता। मैथिली न जानने वाला भी समझ सकता है। मैथिली के बढ़ावे के लिए किया गया यह ब्लॉग प्रयास सराहनीय है।
घुघूती बासूती

रंजीत said...

उदासी कें कारणो बुझैक मन भेल,मुदा किवता स पता नै चलल। ओना बड नीक िबम्ब अछि किवताक। उम्मीद जें आगां उदासीक कारणों बतायब।
शुभकामना

अल्पना said...

I too went into my youthful days reading your poem.I thoroughly enjoyed it

shiv jha said...

गामक मोन ह्रदय के झकझोरी क राखी देलक! कविता में दर्द संग सहानुभूति महशुस करैत मोन दंग भ गेल! अपनेक मनियै व् नई मुदा हमारा विस्वाश अछि जे इ कविता अपनेक ह्रदय स निकलल अई! आ कतेको के ह्रदय के स्पर्श करतनी! अपनेके हमरा आ हमारा दिश स बहुत बहुत सुभकामना! शिवेश_झा "शिव" मैथिलि (नाटककार)

subhash said...

keshav jee,
अतिस्योकती नहीं मणि त चैतावर के समय सम्दोउन बुझाय ई कविता...
ओना कविता के बिम्ब निक अछि, जाकर प्रसंशा होबक चाही.. आब त गाम स दूर रहबाक आदित भ गेल अछि. येही लेल दुखी नहीं होव...

आदि यायावर said...

केशव जी,
अतिव्यस्त भेला’क कारणेँ टिप्पण्णी नहि देलहुँ. दोसर बात जे जँ हमर कनियाँ अपने मोने दऽ टिप्पणी दऽ देलैथ, तऽ हमर कोनो विशेष जरुरत नहि बुझना गेल :).
हमर आलोचनात्म’क प्रतिक्रिया एना अछि: कविता’क ताना बाना बहुत नीक, सँवेदना केँ उत्प्रेरक शक्ति देबा मे बिल्कूल सफल, मुदा कविता १००% सम्पूर्ण नहि लागि रहल अछि. हमरा बुझने कविता मे छन्द’क प्रयोग (देशज शब्द मे "तुकबन्दी") उपयोगी नहि बुझा रहल अछि. ्दोसर दृष्टि सँ देखला पर बुझाएत अछि जे यदि छन्द अपन जगह नीक अछि तऽ ओ कविता मे पन्च लाइन’क अनुभूति आनबा मे बाधक लागि रहल अछि. हमरा इहो नहि बुझल अछि जे एकरा १००% मे कोना बदलि सकैत छी. दिमाग’क एकटा कोन सँ आवाज आबि रहल अछि जे "रुप-रेखा चेन्ज केला पर कविता १००% सम्पूर्ण भऽ जायत".

मुदा कतेक रास बात पर ई कविता’क परशेन्टाइल (percentile) ९०% सँ उपर रहत.

Rajiv Ranjan said...

केशव जी नमस्कार!
कविता पुर्ण नहि अछि, जेना बुझा रहल अछि जे एहि मे किछु रहि गेल.चुकि हम सहित्य के विशेश जानकार नहि छि. ताहि लेल हम अपन विचारो नहि राखि सकैत छि.
मुदा एहो गप कहब जे कविता के सुरुवात बढिया अछि.
अपनेक
राजीव

कुन्दन कुमार मल्लिक said...

की कहू करण जी, मोन त' हमरो बड्ड आबैत अछि । उदास सेहो होयत अछि । मुदा अपन कर्त्तव्यबोध आ वैह गप "न दैन्यं न पलायनम |

एक बेर फेर नीक प्रस्तुति ।

करण समस्तीपुरी said...

प्रेरणाक अगाध स्रोत आदरणीय पाठक वृन्द कें सादर धन्यवाद ! प्रकाशन-काल हमरो लागैत छल जे रचना अपूर्ण छी, कियेक कोनो टा रचना का पूर्णता ओकर आलोचना-समालोचना मे निहित होएत छैक ! घुघूती बासूती आ रंजीत जी के एहि ब्लॉग पर पदार्पनक लेल धन्यवाद !! अल्पना जी, ई जानि बड़ नीक लागल जे रचना अपनेक यौवन काल में पहुंचा देलक ! सुभाष जीक "चैत में समदाउन वाला" व्यंग्य बड़ सटीक छैन्ह मुदा जों साहित्य के देश आ काल के सीमा में आबद्ध करबैक तहन त' एकरो रोज अखबारे जेंका बदलैक पडत ! आदि यायावर जी के टिपण्णी निःसंदेह सर्वोच्च सम्मान के अधिकारी छैन्ह मुदा हमरा बुझने आलोचनाक स्थान अगिला रचना में होएत छैक ! तैं ई हमरो नहि प्रतीत भए रहल अछि जे एकर रूप रेखा कोना परिवर्तित कएल जाए ! किए त' कोनो टा प्रकाशित रचना नौ मास धरि गर्भ मे पोसलाक उपरांत जन्मल शिशु के समान होएत छैक, जेकर रूप रेखा गर्भे मे निर्धारित भए जाएत छैक आ कालांतर मे ओहि मे स्वतः विकास होएत रहैत छैक ओहि मे जों प्लास्टिक सर्जरी द्वारा रूप रेखा बदलबाक प्रयासो करब त' प्राकृतिक सौंदर्य नष्टे भए जाएत ! चलू, बड़ लफ्फाजी भेल ! एक बेर फेर अहाँ सभ लोकनिक मार्गदर्शन के लेल आभार आ संघे संघ ई विश्वाश राखू जे हम अप्पन अगिला रचना मे अपनेक अमूल्य सुझाब के लाभ उठएबाक प्रयास अवश्य करब !!