दर्पण- श्री सतीश चन्द्र झा

अछि दर्पण टांगल देबाल पर
देखि लेब किछु क्षणिक ठहरि क'।
करब कर्म जे अपन दिन भरि
आयत मुख पर भाव उतरि क' ।
बनतै नहि प्रतिबिम्ब झूठ के
उचित कर्म सँ छिटकत आभा।

कवि- श्री सतीश चन्द्र झा, व्याख्याता, दर्शन शास्त्र, मिथिला जनता इंटर कॉलेज, मधुबनी


अनुचित करब मोन किछु टोकत
विकृत बनत मुँहक शोभा ।
जहिया बैसब असगर कहियो
करब जीवनक लेखा-जोखा।
झहरत बूँद आँखि सँ ढप-ढप
रंगहीन लागत जग धोखा ।
छै बताह इ अहं मोन के
जौं जागत नहि सूतत कहियो।
बाँधि लिअ सामर्थ्य हुअए त'
भरि मुठ्ठी बालू के कहियो।
करब अपार अर्थ धन संचय
संस्कार नहि उपजत धन सँ ।
बिलहि देत संतानक भविष्य
दुख-सुख सबटा भोगब तन सँ।
चलू ताकि क' आबू कखनो
अछि धरती जे पैरक नीचाँ।
देखियौ सुन्दर कतेक लागै छै
ओस दूभि पर जेना गलैचाँ ।
आसमान अछि दूर एतय सँ
नहि देखू अछि मात्र कल्पना ।
लागत चोट पैर मे कहियो
जीबू जे अछि ल' क' अपना।

10 comments:

MUMBAI TIGER मुम्बई टाईगर said...

बहुत सुन्दर * * * * *
आभार

मुम्बई टाईगर
हे प्रभु यह तेरापन्थ

Rajeev Ranjan Lall said...

जहिया बैसब असगर कहियो
करब जीवनक लेखा-जोखा।
झहरत बूँद आँखि सँ ढप-ढप
रंगहीन लागत जग धोखा ।
सतीश जी, स्वागत अहाँ केर एहि मंच पर। अहाँक कविता अत्यंत प्रभावी छल आ मोन के छू गेल। एनाही आगाँ सेहो हमरा सभ के दर्पण दिखाबय के काज करू।

-सादर
राजीव रंजन लाल

करण समस्तीपुरी said...

बाँधि लिअ सामर्थ्य हुअए त'
भरि मुठ्ठी बालू के कहियो।
करब अपार अर्थ धन संचय
संस्कार नहि उपजत धन सँ ।

ओह रे ओह ! कि जादू अछि अपनेक लेखनी मे !! एहन सुन्दर उपमा, एहन सुन्दर उपमेय, एहन साधु शब्दावली आ ओहने सुन्दर सन्देश !!! कविताक प्रभाव के कि कहल जाए ?? वो त' इहे बात से सिद्ध अछि जे एक युग से सूतल राजीव रंजन लाल जी के सेहो जगा देलक !!!! स्वागत, शुभ-कामना आ अगिला रचना के प्रतीक्षा !!!

विवेकानंद झा said...

नीक कविता लेल धन्यवाद कवि केँ
आ प्रस्तुति लेल कतेक रास बातक संपादक समूह केँ सेहॊ

सुभाष चन्द्र said...

कविता सब तरहे उत्कृष्ट. विशेष की कहल जे..

Baban said...

today I have visited first time this site I have to happy to see this our own Mithili web sit. And I hope in feature it will be more increase.
Thanks
Tarun Kumar Karn
Sindhuli (Nepal)

satish said...

hamar kavita nik lagal se sab lokani ke bahut... bahut.. dhanyabad aa RAJEEV JEE ke bishes,

Ashish jha said...

Hi....jus now i went inside ur poem or view wtevr is tis,but it s quit good and impressable for me.... really these r d things which we mus hv 2 implement in r lif.
Thanks to u tat u kept ur view on d site.

Neelam said...

apn bhasha me paper padi ke bad nik lagal. Man bhabuk bha gel.Gamak yad aabi gel. Ahi le ham e paper ke samucha team ke dil son dhanyavad d rhl achhi.

Neelam Mishra
Doordarshan
New Delhi

Rajiv Ranjan said...

आयत मुख पर भाव उतरि क' ।
बनतै नहि प्रतिबिम्ब झूठ के
उचित कर्म सँ छिटकत आभा।


अनुचित करब मोन किछु टोकत
विकृत बनत मुँहक शोभा ।
जहिया बैसब असगर कहियो
करब जीवनक लेखा-जोखा।
झहरत बूँद आँखि सँ ढप-ढप
रंगहीन लागत जग धोखा |

bahut nik kavita, ek ber ta yena laagal jena pura jivan darsan likhi dene chhi.
shirsha bahut hi uchit sange kavita ke bakhaan nhi kail ja sakait achhi.
ummid je ahank kavita
padhay vaste bhetait rahat...


ahank
amarji

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