घिढारी के मंत्र

आदरणीय पाठक गण,
किछु सामयिक व्यस्तता आ किछु तकनिकी अव्यवास्थाक कारण
हम अहाँ लोकनिक "गरिमा आ पलास" कें अगिला भाग ससमय नहि उपलब्ध करएबा हेतु
क्षमा-प्रार्थी छी. हम शीघ्रे कथाक अगिला भाग सँ अपने लोकनिक रु-बा-रु करएबाक वचन
के साथ विजय दशमी पर अपने लोकनिक मनोरंजन हेतु लए क' आएल छी एक
गोट पुरान गप्प. पढू आ प्रतिक्रया दए उत्साह-वर्धन करू !
दुर्गा पूजाक शुभ कामनाक साथ,
- करण समस्तीपुरी
हंसियों

मजाक मे सीखल बात कखनो-कखनो कतेक मर्मान्तक उपयोगी भ' जाएत छैक, एहि बातक प्रतीति हमारा स्नातकक अन्तेवासी छात्र जीवन मे भेल. स्कूल मे पंडीज्जी माट साब जेखन शब्द-रूप यादि कराबैथ तहन मोने मोन कतेक अपशब्द कहिऐन्ह ! 'लट-लकार' महा-बेकार आ 'लंग लकार' भंग डकार बुझाए ! मुदा 'हर' धातु के क्रिया-रूप ख़ास कए प्रथम पुरुष मे - "हरामि हरावः हरामः'' खूब मोन से पढ़ब करिऐक ! स्वाइत अगिला पांति के जोरगर आवाज बुझि मास्टर साहेब के भेलैन्ह जे संस्कृत मे चटिया सबहक खूब अनुरक्ति अछि. आ हमहु सभ गुरूजी के ई आभाष नाहि होमए दिऐक जे ई "हरामि हरावः हरामः'' के अखंड जाप संस्कृत मे अभिरुचि छी कि महज एक स्वांग ! खैर, गुरूजी गेला कहि, आ चेला गेल बहि ! मुदा बहैतो-बोहाएत किछु विद्या त' रहिये गेल. ओना साहित्य से व्यक्तिगत रूपे हमारा तखनो लगाव छल. तैं "येनांग विकार तृतीया" भन्ने नहि बुझिऐक मुदा "राजद्वारे श्मशानेच यः तिष्ठति सः बान्धवाः" वाला फकरा आ "कार्येषु दासी कर्मेषु मंत्री ! भोजेषु माता शयनेषु रम्भा" वाला श्लोक ने यादि करए मे कोनो आलस आ नहि ओकर अर्थे बुझाए मे कोनो खोंखी !! करत-करत अभ्यास ते संस्कृत के किछु श्लोक ता एना रटा गेल जेना गामक झगरा मे जनि जाति गारि पढैत अछि! एहि तरहे स्कुलिया शिक्षाक मेट्रिक घाट पर कात लगा कालेज मे विज्ञान संकाय मे दाखिल भेलौंह ! फेर त' दू-तीन साल धरि संस्कृत से नहि कुनो भेंट आ नहि कुनो बात ! मुदा साहित्यक मोह स्नातक मे फेर अपना दिस झीक लेलक ! तदुपरांत त' एकर रसास्वादन करैते छी !!
तखन हम स्नातकोत्तर प्रथम वर्ष मे छी आ झा जी स्नातक अंतिम वर्ष मे ! दुन्नु लोकनि साहित्य के छात्र ! साहित्य, साहित्यकार, पत्रकार, सामाजिक सरोकार आदि विषयक नित्य सांझ मे होए वाला परिचर्चा से मैत्री प्रगाढ़ होएत गेल. हाँ ! दुन्नु आदमी मे एक गोट और समानता अछि - आर्थिक रूप से कमजोर पारिवारिक पृष्ठ-भूमि ! ओहि ठाम झा जीक किछु पूर्ण-कालिक आ किछु सामयिक यजमान सेहो छथि जतए से पूजा-पाठ, विधि-व्यवहार, संस्कार आदि से आबए वाला दक्षिणा झा जी लेल त पैघ सहारा छैन्हे बरमहल हमरो सभ के सिंघारा-लिट्टी के जोगार अछि! लगनक समय मे झा जीक व्यस्तता किछु विशेष बढि जाएत छैन्ह ! वर्तालापक क्रम मे हम्मर संस्कृत उच्चारण से प्रभावित ओ पूजा-पाठ मे हमर सहायता सेहो लैत छथि! हमरो विनोदी मोन के ई काज एक टा अद्वितीय मनोरंजन बुझाएत अछि !
ऐंह .... अजुका लगन त बड़ जोरगर छैक ! भिनसरे अन्गैठी लैत झा जी कहि रहल छथि... दिन मे मगरदही मे एक गोट जनेऊ करेबाक अछि, फेर थानेश्वर थान मे एक-गोट व्याह आ राति मे फेर काशीपुर मे विवाह !!! कहै छैक नहि, ‘भगवान दैत छथिन्ह त' छप्पर फारि के....’ से झा जीक मुँहक बात खतमो नहि भेलैन्ह कि एक गोट आओर यजमान पहुंचि के अनुनय विनय कए रहल अछि ! पंडी जी, काल्हि हम्मर बेटी के लगन छैक आ आई पूजा ! मुदा पूजा कराएत के ? आई त झा जी पहिनहि ब्लैक मे बुक छथि ! झा जी हमारा पुछैत छथि ! हमहूँ हंसिये मजाक मे राजी भ' जाएत छी ! सांझ मे फेर यजमान बजाबए लेल आबैत अछि ! आई हम्मर संस्कृत ज्ञानक 'अग्नि-परीक्षा' अछि ! तें किछु घबराहट त' अछि मोन मे मुदा प्रकट नहि करैत छी ! हाँ, झा जीक डेलबाह सेवकराम के सभ किछु बुझल छैक ! ओ हमारा साथे अछि ! से किछु भरसाहा अछि !
एम्हर जा धरि हम हाथ पैर धोवैत छी, ओम्हर सेवक सभ जोगार केने तैयार अछि ! हमहूँ झट याजमानक चुरू मे पानि दए, "अपवित्रः पवित्रो वा... पढ़ाबैत पान सुपारी कलश-गणेश कए फट से "एकदा मुनयः सर्वे.... से होएत 'लीलावती-कलावती कन्या...' के कथा कहैत "ॐ जय जगदीश हरे...." करवा दैत छी ! एम्हर हम अप्पन पोथी पतरा समेट रहल छी कि एक झुंड जनि जाति आबि के पंडी जी ओम्हर चलियऊ ! आब ओम्हर चलियऊ के शोर करब शुरू कए दैत अछि ! हम पुछैत छी, "आब ओम्हर कि छैक ? पूजा त' भ' गेल... छुटैते महिला मंडल के मुखिया उपहासपूर्ण स्वर मे कहैत छथि, यौ पंडी जी ! त' घिढारी नहि करेबैक ? ले बलैय्या के... आब त' फँसि गेलौंह... ओ त’ सत्य-नारायण कथाक पोथी छल त' पढि देलियैक... आ अब घिढारी की होएत छैक ? एक बात त' बुझैत छियैक ने, लगन मे उमताएल मिथिलानी के सभ से चोटगर निशान पंडीये जी पर पड़ैत छैक ! से हमरा मौन देख ओ सभ रसगर व्यंग्य-बाण छोड़ी रहल छथि ! हमरा मोने मोन झा जी पर तामस उठि रहल अछि, 'ओ हमारा कहलथि ने किए जे एतय घिढारियो छैक...' !! मुदा एखन त' सभ से महत्वपूर्ण अछि ई यजमानीक जाल से निकलनाय ! खैर जल्दबाजी के अभिनय करैत हम कहैत छी " जल्दी घिढारी के तैय्यारी करू नहि त हमारा छोडू... दोसरो ठाम काज अछि!" कहि त देल मुदा आब की ? हमरा त एहि विषय मे किछु बुझि नहि ! फेर ध्यान आएल, जे कतेक रास लगन व्याहक खेलल सेवक त' हमरा संघे अछि, तहन एकरे से मंत्रणा कएल जाए ! सेवक हमारा घिढारी के विध बता कहैत अछि जे जाऊ ने किछु पढि देबैक... के बुझैत छैक... !! मुदा हमारा लग यक्ष प्रश्न छल कि पढ़ल कि जाए ! इएह उहा-पोह मे ओम्हर सभ तैय्यारी कए जनि-जाति गीत-गारि गाबैत पंडी जी के शोर क' रहल छथि ! हमरा ई चारि डेग चारि कोस लागि रहल अछि ! खैर ... ओतहुका सिचुएशन पर आधारित चट-पट एक टा मंत्र गढैत छी! कन्या आ कन्याक माता-पिता घी लेने ठाढ़ छथि आ आब गोबर के बनल गोसाईं पर ढारता ! ओम्हर विधि चालू होएत अछि आ एम्हर हम्मर मंत्र,
"माता सहित पिता पुत्री ! घृत धारम खरा-खरी !!"
यजमान हमरा साथे-साथ पॉँच बेर इएह मंत्र के दोहराबैत छथि. हतप्रभ गीत-गाईन सभ प्रशंसाक दृष्टि से देखैत छथि, स्वाइत पहिल बेर हुनका लोकनिक गिढारीक मंत्र बुझि मे आबि रहल छैन्ह... सभ किछु सकुशल, सानंद संपन्न ! हमहू यथेष्ट दक्षिणा आ सम्मानक संग बिदा होएत छी ! त' आब कहियौ, सत्ये ने... "हंसियों मजाक मे सीखल बात कखनो-कखनो बड़ उपयोगी भ' जाएत छैक !"
- करण समस्तीपुरी

4 comments:

मनोज कुमार said...

खूब जोरदार अछि करण जी। मिथिलाक बिबाहक बढिया चित्र खिचलौं। हंसैत हंसैत पेट फूल गेल। बहुत बहुत बधाई। एहने व्यंगक प्रतीक्षा में छी।

SANDEEP KUMAR said...

Bahut Jordar likhal gel aichh ahan ke ghatna....

आदि यायावर said...

"घीढारी के मन्त्र" व्यँग सँ भरल आ साहित्य’क अनुशान मे चुनल शब्द, पाठक केँ नीक अनुभूति दैत छैक. एहि सँस्मरण मे कतओ ठहराव नहि अछि जे हठाते एहि रचना केँ आओर बेसी मनोरँजक बना दैत छैक.

पद्मनाभ मिश्र

कुन्दन कुमार मल्लिक said...

हमरा इ प्रसंग करण जीक मुख सँ सुनय के सौभाग्य भेटि चुकल अछि। पाठकगणक बुझबाक खातिर इ स्पष्ट कय दी जे स्वयं करणजी कन्हैयाजीक शिष्य आ खट्टर ककाक अनन्य भक्त छथि। खट्टर कका स' त' अपनेक लोकनि अवश्ये परिचित होयब मुदा इ कन्हैया जी के छथि से करणे जी सँ पुछियौन्ह। <:)>