सिंगरहार- श्री विवेकानन्द झा

- श्री विवेकानन्द झा
एक दिन अनचॊकहिं लिखऽ लागलहुं कविता
आ ई शताब्दीक अंतिम दशकक शुरुआती बर्ख छल
आ पुनः कतेकॊ बर्ख आंखिक सॊझां संऽ बीतैत गेल
एक दिन, एक दिन करैत
आ एक दिन
लागल कविता लिखबाक सामर्थ्य नहि रहल शेष
लागल हम प्रतिगामी आ खराप लॊक भऽ गेल छी
तें तऽ रूसि रहली कविता हमरा संऽ

Vivekanand Jha मधुबनी जिलान्तर्गत मधेपूर थाना अन्तर्गत तमौरिया स्टेशन लऽग’क बाथ नामक गाम’क निवासी श्री विवेकानन्द झा सम्प्रति नई दुनियाँ मे पत्रकार छथि. हिन्दी साहित्य’क अतिरिक्त हिनका मैथिली साहित्य मे विशेष रुचि छन्हि. प्रस्तुत कविता हुनक कतेक रास बात’क लेल दोसर रचना छिअन्हि



मुदा आब पुनः ओ सटल चलि आबि रहल अछि
तऽ लगै अय जे हम फेर संऽ नीक लॊक 
बनि रहल छी
हृदय हमर फेर भगवती घर केर निपलाहा धरती बनि रहल अछि

आ एखन इक्कीसवीं सदीक पहील दशक खत्म हॊअ लेल
अपन अंतिम बर्खक शुरुआत में जुटि गेल अछि
उमेद करैत छी अहि निपलाहा माटि पर 
खसतै पुनः कविताक सिंगरहार 
आ पुनः सुवासित हेतै ओकर, हमर, हमरा सबहक दुनिया|

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