मैथिली साहित्य’क मे अद्वितीय घटना. सितम्बर ०४, २००९.

9.3.10

छोट लोक - सुभाष चंद्र

छोट लोक धरती पर जन्मैत छैथ
दूबि जकाँ बढ़ैत छथि
पयर सँ दबाओल जाइत छैथ
आ कोनो चर्च के मारल जाइत छैथ !

पैघ लोक आकाश मे जन्मैत छैथ
आकाशे मे रहैत छैथ
जमीन की होइछ
ओ नहि जनैत छैथ !

बाचल, मध्यम
जे नहि कर्ता आ नहि पाचक
दूनू अधिकार सँ तिरोहित
ओ उगैत छैथ,
बढ़ैत छैथ लत्ती जकाँ
आओर,
सतह पर रहैत छैथ अचेतन मे
सपना देखैत संग
जूझैत छैथ स्वयं सँ
अंतरिक्ष सँ आगाँ नहि जा पबैत छैथ !
त्रिशंकु जकाँ बनि
ईच्छाक संग
स्वयं अपन स्वप्न कें
केंद्र बिंदु बनैत छैथ !!

4 टिप्पणी (Give your comments):

मनोज कुमार said...

बड नीक लागल ई व्यंग्यात्मक रचना पढि कय।

Santosh Kr. Mishra said...

Dear Subhash ji,

aaha ke ee je chhot, paigh aa maddhayam barga ke lok ke bare me likhane chhi: -

kabita silpagat rup sa nik chhai.

ek tham matre rhythm tutai chhi.

mudha karmake pradhanta ke aawashyak mahasus hoi chhai.

Regards

Santosh Kr. Mishra

SANDEEP KUMAR said...

ओ उगैत छैथ, बढे छैथ.
मोन में आबे से करैत छैथ.
भाव जीवनक लैत छैथ.
नीक जकां लिखैत छैथ.

बड़ नीक कविता ..... बढ़िया शब्दावली. मोन घेवर घेवर भय गेल.
संदीप (पंकज)
लुधियाना

करण समस्तीपुरी said...

यथार्थ विषय, साधु चित्रण, मारक व्यंग्य ! श्री संतोष मिश्र जी कें महीन साहित्यिक टिपण्णी हेतु धन्यवाद !! मुदा हमरा एहि कविता में 'वर्ग-विभाजन' नहि परंच विभाजित वर्गाक विडम्बनाक स्वर प्रतीत होएत अछि !! ख़ास कए माध्यम वर्गक विडम्बना 'तर धरती नहि ऊपर वज्र...' !!
सुन्दर रचना ! साधुवाद !!!