छोट लोक - सुभाष चंद्र
छोट लोक धरती पर जन्मैत छैथदूबि जकाँ बढ़ैत छथिपयर सँ दबाओल जाइत छैथआ कोनो चर्च के मारल जाइत छैथ !पैघ लोक आकाश मे जन्मैत छैथआकाशे मे रहैत छैथजमीन की होइछओ नहि जनैत छैथ !बाचल, मध्यमजे नहि कर्ता आ नहि पाचकदूनू अधिकार सँ तिरोहितओ उगैत छैथ,बढ़ैत छैथ लत्ती जकाँ आओर, सतह पर रहैत छैथ अचेतन मेसपना देखैत संग जूझैत छैथ स्वयं सँ अंतरिक्ष सँ आगाँ नहि जा पबैत छैथ !त्रिशंकु जकाँ बनिईच्छाक संगस्वयं अपन स्वप्न केंकेंद्र बिंदु बनैत छैथ !!


4 टिप्पणी (Give your comments):
बड नीक लागल ई व्यंग्यात्मक रचना पढि कय।
Dear Subhash ji,
aaha ke ee je chhot, paigh aa maddhayam barga ke lok ke bare me likhane chhi: -
kabita silpagat rup sa nik chhai.
ek tham matre rhythm tutai chhi.
mudha karmake pradhanta ke aawashyak mahasus hoi chhai.
Regards
Santosh Kr. Mishra
ओ उगैत छैथ, बढे छैथ.
मोन में आबे से करैत छैथ.
भाव जीवनक लैत छैथ.
नीक जकां लिखैत छैथ.
बड़ नीक कविता ..... बढ़िया शब्दावली. मोन घेवर घेवर भय गेल.
संदीप (पंकज)
लुधियाना
यथार्थ विषय, साधु चित्रण, मारक व्यंग्य ! श्री संतोष मिश्र जी कें महीन साहित्यिक टिपण्णी हेतु धन्यवाद !! मुदा हमरा एहि कविता में 'वर्ग-विभाजन' नहि परंच विभाजित वर्गाक विडम्बनाक स्वर प्रतीत होएत अछि !! ख़ास कए माध्यम वर्गक विडम्बना 'तर धरती नहि ऊपर वज्र...' !!
सुन्दर रचना ! साधुवाद !!!
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