अनचिन्हार सन अपन (कथा)- सुभाष चन्द्र

आई संजूक दुरागमन छैक। आईसऽ करीब एक बरिसक पूर्वक गप्प अछि। पोड़का साल बैसाख मे ओकर वियाह भेल रहैक। वियाह मे कतै खुशी रहै, संजूक मोन खुशी सऽ आह्लादित रहैक। विवाह सँ पहिनहि ओ अपन मन-मंदिर मे कतेक सुन्नर वरक कल्पना कयने छल? वियाहक नाम सुनितै ओकर मन रोमांचित भऽ जाइत छलै। वियाह सऽ किछु दिन पहिनहि ओ अपन मामाक डेरा पर दरभंगा मे रहि कय बी.ए. प्रथम वर्षक परीक्षा दय रहल छल आ ओहि क्रम मे ओकर-वियाह ठीक भेलै। वियाह ठीक होबाक प्रत्येक चरण सऽ ओ पूर्णरूपेण अवगत छल। वियाहक दिन सऽ मात्र एक सप्ताह पहिनहि ओ अपन गाम पहुंचल। गाम मे जखन उतरबरिया ओसारा पर ओकर वियाहक गप्प होइत छलै तऽ ओ ओहि बीच सऽ उठि कऽ अपन घर चलि जाइत छल। एवम्ï प्रकारे विघ्न-बाधा के पार करैत ओकर वियाह सम्पन्न भेलै।

Subhash Chandraलेखक- श्री सुभाष चन्द्र,
युवा पत्रकार सुभाष जी पत्रकारिताक संग हिन्दी आ मैथिली दुहू साहित्य मे सक्रिय, एखन धरि दू गोट हिन्दी पुस्तक प्रकाशित आ "कतेक रास बात"क लेल नियमित रुप सँ लेखन आ वर्तमान मे एकर सम्पादक सदस्य सेहो। संगे एकगोट नव मैथिली पत्रिका निकालबा लेल सेहो प्रयासरत। सम्प्रति "प्रथम इम्पैक्ट" नामक पाक्षिक पत्रिका मे कार्यरत आ दिल्ली मे निवास।
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- सम्पादक।

वियाहक बाद संजू पहिले सऽ बेसी सुंदर जानि पड़ैत छल, ओकर ललाट श्रीयुक्त बुझना जाइत छलै। अपन वर सऽ वैह बेसी सुन्नर व आकर्षक छल। मुदा ओकरा लेल तऽ ओकर पति परमेश्वर छलखिन, ब्रह्मा के लेखा-जोखा मानि कऽ ओ अपन वर के सहर्ष स्वीकार केलक। एखन अपन विवाह सऽ ओकरा कोनो तरहक शिकायत नहि छलै। भऽ सकैछ, मन मे कोनो तरहक बात होबो करैऽ तइयो ओकरा ककरो आगू व्यक्त नहि करैत छल। विवाहक पंद्रह दिनक बाद संजूक वर जीविकोपार्जनक लेल परदेश चलि गेलखिन, जतय ओ काज करैत छलाह। आब तऽ मात्र चिठ्ठी पतरीक सम्पर्क शेष रहि गेल छलै। समय-समय पर पावनि-तिहार मे ओकर वर गाम अबैत छलखिन।

गामक कण-कण सऽ परिचित बीत-बीत जगह सऽ मित्रता ओ अपन मामा आ बाबूजीक दुलारि संजू-के ई गाम घर छोड़ऽ पडि़ रहल छलैक। जहिया ई 'दुरागमन' शब्द ओकर कान मे सन्हिआयल रहै, छटपटा गेल छल संजू। आ छटपटाक रहि गेल छल। खेनाय-पिनाय छोडि़कऽ जठरानलक समान भऽ गेल छल, देहक रौनक जेना समाप्ति भऽ गेल रहै। नेना मे ई शब्द बड़ मनोरंजक आ आनंददायक बुझि पड़ैत छलै। मुदा ई शब्द मे कतेक मारुक वस्तुक समावेश होइत छै, ओहि दिन बुझवा मे आयल रहै। एकर अपन सभ आन भ गेल रहै। सभक मुंह पर खुशी पसरि गेल रहै।

बाबूजीक करेज सूप सन भऽ गेल रहनि। मायक कोढ़ दरकबाक सांती सांठ राजक ओरियान दिस चलि गेल छलै। भैया आ पित्ती लोकनि एहि काजक संपादन मे जी जान सऽ जुटि जेबाक उपक्रम करय लागल छलथिन। आ संजूक देह सुन्न भऽ गेल रहै। ई गाम-घर, लोक-वेद छोड़बाक कल्पना मात्र सऽ ओकर दिमाग अकुलाय लागैत छलै। मुदा जखन ई कल्पना यथार्थ भऽ पछोड़ धेलकै तऽ एकरा किछुओ नञि फुरेलै। कनेकाल मायक मुंह के निहारलक, छोटकी दूनू बहिन आ भाई के सिनेह के टोलक, बाबूजीक दुलार के याद केलक, भाऊजक सानिध्य के टोकलक। तइयो जखन सभ दुआरि फरेबक दुआरि बुझेलै, अपन सभ चिन्हार अनचिन्हार जकाँ लगलै तऽ ओसारा पर सँ उठि गेल।

खेनाय एकदम सँ तिताइन बुझना गेलै। हांञि-हांञि मुंह धोलक। आ घर मे जा अर्राकऽ पलंग पर खसि पड़ल। पुक्की पारि कनबाक इच्छा भेलै। लेकिन कण्ठ सँ आवाज भागल बुझेलै। माय आओर भाउजक पयर छानि पुछबाक मोन भेलै, जे कोन ऐहन अपराध हमरा सऽ भऽ गेलौ भाय! जे एतेऽ निर्मम बनि बैला रहल छैं। कोन ऐहन विभेद भऽ गेल सिनेह मे भौजी! जे अहांक अमृत घोरल बोल लय हम हरिण जकां फिफिया रहल छी? भौजी! अहींक सिनेह सऽ ई गाम छोड़बाक इच्छा नञि भेल कहियो, मुदा ...। अंत मे संजूक करेज दरकि गेलै। कानैत-कानैत गेरुआ भिजा लेलक। लेकिन एकर सभ नोर दूरि गेलै। आई बेस चहल-पहल छै। बरिआती काल्हिं सांझे आबि गेल रहै। आई ई चलि जायत। जँ स्वेच्छा सऽ जेबाक गप्प होइतै तऽ ई किन्नो ने एहन इच्छा करैत। एक दिन जखन अपन अही संताप पर सोचैत बहुत दूर धरि चलि आयल छल तऽ एहि घोंकल परम्परा पर अतिशय तामस भेल रहै। एहनो कतौ उचित छै जे ककरो इच्छाक प्रतिकूल ई समाज अजगर बनल ठाढ़ रहय। भावना के बिसरि जाय! संजू चाहैत छल, बाबूजी के कहियनि जा कऽ जे बाबूजी, दिन फिरा दियौ। जहिया मौन भरि जायत हम स्वत: ककरो बिनु दु:ख देने चलि जायब।

लीक सँ हटि कऽ एते आगू अयबाक हियाब नञि भेलै। कतेको तरहक विचार मे बहैत रहल आ सभक निचोर नोरक रूप मे बहार होइत रहलै। आई भोरे सऽ संजू सभ कथूके बिसरि गेल अछि। हँ, मात्र सूर्यास्तक पश्चात एहि आँगन, एहि परिवार, एहि गाम के छोडि़ कऽ जा रहल अछि। जखनै आईं सूर्यास्त हेतै, संजू एहि जगह के परती-पराँत बना चलि जायत।
एकर दुख एखन नञि छै। ई बिसरि गेल अछि जे एखनै, आइए एकर जीवन मे कोनो नव घटना घटै बला छै। एकटा ओहन घटना, जे ककरो करेज के कनी कालक लेल दरका देतै। टोलक बुढ़-बुढ़ानुस, दाई-माइ लोकनि ऐखन एकर किरदानी पर व्यंग्य-घोरल बोल सऽ आश्चर्य व्यक्त कय रहल छथिन्ह। एकटा बुढ़ही के जखन असह्य भऽ उठलनि तऽ उठिकऽ विदा भऽ गेलीह। आइ अकर ऽ हरऽ कऽ रहलि छै ई छोडि़। ने बरिआती अयलै-तखने हाक उठोलकै, ने आइए संच-मंच भऽ बैसलै। देखह तऽ इम्हर सऽ ओम्हर घुमए अछि। एकटा हम सभ रही जे मास दिन पहिने सऽ छाती फाटैत रहए। आ घर मे गुम-सुम कानैत रही। ... लेकिन ओ बुढ़ही की जानैत छलीह, जे संजूक छाती कतेक फाटैत रहय। हरदम ओ गुम सुम भऽ मन्हुआयल रहैत छल। नहि खेबा मे मौन लगै आ नञि गप्प करबा मे।

किछु वस्तु जात के तकबाक लेल ओ भौजीक दक्षिणबरिया घर सऽ अपन उतरबरिया घर मे हुलि जाइत अछि। लोक सभ थहाथही छै। बरिआती खोयेबाक ओरियान मे सभ पुरुष बाझल छलखिन। एकरा कने संकोच भेलै आ कि किछु मोन पडि़ अयलै, चोट्टे घुमि गेल। तखने ओसारा पर बैसल कियो बाजि उठलै-संजू! कानै कहां छहिन गै? तोरा सऽ बेसी तोहर माय-बहिन कानै छौ? ... संजू के एकाएक जेना ठेस लागि गेलै। मुदा सम्हरि उठलि। भीतर सऽ हंसीक एगो तोर उठलै आ ठोर पर आबि जाम भऽ गेलै।

उत्साह मे वएह वाला वेग आबि समा गेलै। पुनि भौजीक घर दक्षिणबरिया ओसारा पर चलि गेल। कनी कालक बाद ओ भौजीक घर सऽ उठि जाइत अछि। कोनो प्रकारक विचार के मोन सऽ हटा देबाक चेष्टा करैत अछि। अपन दूनू छोटका भाई के तकबाक चेष्टा करैत अछि। आंगन मे कतओ नजरि नहि पड़ैत छै। कि तखने दलान पर ओकर बोल सुनाइ दैत छै। एकर करेज बुझु एकबेर फेरो दरकि गेल होइहि। बेजान ढलान दिस दोगैत अछि। लेकिन ड्योढ़ी लग अबैत-अबैत सभ उपक्रम लूंज भऽ जाइत छै। सभ हुलास मरि जाइत छै।

संजू फेर जेना मुरुझि जाइत अछि। बुझाइत छै, एहि ठाम चारुकात सऽ हमर सभ बाट बन्न कऽ देल गेल अछि। हमर हरेक क्रिया कलाप पर अनगिनत नजरि कें बैसा देल गेल अछि। एकरा बुझना जाइत छै, जे एखन सभक दृष्टि हमरहिं प्रत्येक हाव-भाव पर अटकल छै। हमर एहि प्रकारक किरदानी ककरो सहय नहि भऽ रहल छै। कि तखने छोटका भाय दौडि़ कऽ आबैत एकर दूनू पैर गछारि लैत छै। संजूक चेतना घुरैत छै। छोटका भाय मोनू दीदीक भावना के बिनु परेखतै बिच्चे मे बाजि उठल—'हमरा तोहर बरिआती नञि आबय दैत छलाह, जाऊ हम अहां सऽ नञि बाजब।—मोनूक बोली एकरा थप्पड़ जकां चोट केलकै। मुदा तइयो बात के त'र दैत मोनू के माथ पर हाथ फेरैत दुलार ऽ लागैत अछि। तखने कोनो कोना सँ व्यंग्य घोरल पाँती कान दिस लपकैत छै—'जे बुझाइत नञि छै जे ऐकर दुरागमन छै, कतेक बढिय़ा घुमैत अछि। आई काल्हिंक छहि, ताहिं पिया घर जयबाक खुशी छैक।

एहि बात सुनि कऽ संजूक सोझां कारी चादरि ओलरि जाइत छै। आ दिमाग मे आगि धधक' लागैत छै। सभ किछु छोडि़ उठि जाइत अछि। मौन धीरे-धीरे तिताय लागैत छै। आई भोरे सऽ सब गोटे एकतरफा भऽ गेल छथि। सभक भावना चालनि भऽ गेल छैन्हि। सभक बुद्धि लोढ़ा भऽ गेल छै। ई सब मोन मे अटियाबैत ड्योढ़ी पर सऽ उतरबरिया ओसाराक लेल डेग उसाहैत अछि। पुन: चोट्टे ठमकि जाइत अछि। नजरि कोनियां घरक मुहखर पर जाइत छै, जाहि घर मे माय खेनाय बना रहल छलखिन आओर मायक नोर टप-टप चुबैत छलै। एहि दृश्य के देखि कऽ संजूक धीरज जबाव दय देलकै, ओकर कुहेस फाटि गेलै। सीधे जा कऽ मायक कोरा मे खसि पड़लै। कानैत-कानैत अचेत भऽ गेल, ओकर नोर सऽ मायक नुआ भीज गेलैन्ह। केतबो किओ चुप करेबाक कोशिश करथिन, मुदा ओ चुप होबय वला कहां छल? अंत मे बाबूजी ऐलखिन तखन चुप करोलखिन। हृदय नोरायलै रहैत छै। सोचेत अछि सत्ते हमर सभक इच्छाक कोनो मोल नञि होइत छै। से ऐना कियैक होइत छै? आ धीरे-धीरे सभ हुलास क्षीण होइत चलल जाइत छै। एकर सभ चेष्टा मृत्यु सज्जा पर पड़ल कोनो रोगी जकां होबऽ लागैत छै। किछु करबाक उत्कट इच्छा रहितौ किछु करबा मे असमर्थताक अनुभव करैत रहलि।

आ अही घुन-धुन मे कखन चेतना घुरि अयलै, मोन नञि पडि़ रहल छै। दिन लुक झुक कऽ रहल छै। कि तखने किओ पाछां सऽ ओकर डेन धरैत छै। बड़की काकी छलखिन। काकी बड़की भौजी दिस आग्नेय दृष्टियें ताकैत बाजि उठै छथिन्ह—'अंए ऐ कनियां! कखन कहलौं सभ गहना-गुडिय़ा पहिरा दियौ? एह बाप रे! लाउ, जल्दी करु सात बजेक भीतर विदागिरी भऽ जेबाक छै। ... दलान पर सऽ बड़का कक्का सेहो जल्दी करबाक लेल कहलखिन।

बड़की काकीक बोल सुनिते संजूक बुद्धि निपता भऽ जाइत छै। आँखि सेहो अपन ज्योति चोरा लैत छै। आ बुझाइत छै जे प्राण सेहो संग छोडि़ रहल छै। आओर तकर बाद जे सम्मिलित हाकक आदान-प्रदान शुरू होइत छै, सगरो आंगन बुझु नोराय जाइत छै। संजूक कानब एकटा फराक-सनक स्वर निकालैत अछि, जे स्वर नमहर प्रश्न-चिह्न ठाढ़ करैत छै?

कथा....भैरवी

कथा....भैरवी विवाहक पाँचम बरखक बाद अनायास भैरवीसँ चन्द्रेश्वर बाबाक मन्दिरमे भेट भेल छल। नरक निवारण चर्तुदशीक व्रत केने रही। मायक जिदपर...