कालजयी

-विवेकानंद ठाकुर
हमर उमेरक
कोनो नहि थाप
कोनो नहि लेखा

जहिया धरि जिनगी
कमाइ छी
कमाइत-कमाइत
गोटेक दिन
टन द' रहि जाएब
माटिक बासन जकाँ
उमेरक बासन जकाँ

कवि- श्री विवेकानंद ठाकुर,

श्री विवेकानंद ठाकुर कें हुनक पोथी 'चानन घन गछिया' के लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटि चुकल छन्हि।



उमेरक हिसाब राखथि
बाबू-भैया
पढ़ुआ-कमौआ
जे भरि दिन रहथि छाहरि मे
हमर उमेरक कोन हिसाब?
माइ केँ पुछलिअइ
एक बेर
अपन उमेर
ओकरो नहि बूझल
माइयो कें नहि बूझल
अपन बेटाक उमेर
ओकरा एतबे मोन
जाइ बरख
घरे-बाहरे
मडुआ भेलइ
ताइ बरख
हमर जनम
एतबे मोन
भूकम्पक साल
जे पहिल-पहिल
पकड़लौँ हरक मूठि
से आइ धरि पकडऩे

एहि बीच
कतेक बाबू-भैया केँ
कतेक पढ़ुआ-कमौआ केँ
काल चिबा गेल
एकटा हम...
जे काले केँ चिबा
आइ धरि
हरक मूठि पकडऩे।

2 comments:

करण समस्तीपुरी said...

ओकरा एतबे मोन
जाइ बरख
घरे-बाहरे
मडुआ भेलइ
ताइ बरख
हमर जनम
एतबे मोन
भूकम्पक साल
जे पहिल-पहिल
पकड़लौँ हरक मूठि
से आइ धरि पकडऩे

.... अन्नदाता के समर्पित ई रचना वास्तविक अर्थ मे कालजयी अछि. उपर्युक्त पांति सँ हमर दादी याद आबि गेलीह. ओ कहैत छलीह जे भूकंप साल ओ पांच बरखक छलीह. आब विश्वास पक्का भेल जे 'कतेक रास बात' मैथिली ब्लोगक आकाश मे एक बेर पुनः लहराएत. कवि के आभार व्यक्त करैत छिऐंह आ आस अछि जे हुनक सहयोग बनल रहतैंह एहन आओर कतेक रास रचना एहि मंच पर पढबाक लेले भेंटत.

कुन्दन कुमार मल्लिक said...

सर्वहारा वर्गक प्रतिनिधित्व करैत एकटा कालजयी रचना.