नियति- (सुभाष चंद्र)

- सुभाष चंद्र
बहुत किछु देखि कय हम
आँखि मूनि लैत छी
बहुतो के पुकार केँ
अनसुना कय चलि जाइत छी
मौनक गप्प बाहर नहि निकलि जाए
अंत:करण मे दबा लैत छी
किएक
सच
देखबा, सुनबा आ कहबाक अंजाम
अखबारक पहिल पन्ना पर
कतेको दिन देखि चुकल छी
नियति सेहो किछु एहने सन भ गेल
स्वयं केँ ऑन्हर, बहिर आ बौक मानि
घर सँ बाहर निकलैत छी।

3 comments:

करण समस्तीपुरी said...

वाह... चलू बापू के तीनू बानर के आत्मसात त केने छी... निहित व्यंग्य कविता के जोरगर बना रहल अछि. धन्यवाद !

सागर शर्मा said...

better to write in own language than other language
excellent sir

vijay kumar said...

bhawpurn kavita..........bahut nik

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