-- करण समस्तीपुरी
स्वागत ! स्वागत !! स्वागत बसंत !!!
हे प्रेमपुंज ! हे आशरूप !!
ऋतुपति अहाँक सुषुमा अनंत !
स्वागत ! स्वागत !! स्वागत बसंत !!!
कानन कें कान्ति न जाए कहल !
आभूषण किसलय केर बनल !!
धरती पर पियरी शोभी रहल !!
मानू बिधि कें रचना जीवंत !!
स्वागत ! स्वागत !! स्वागत बसंत !!!
आम-मज्जरि कें महक सँ,
आर खग-कुल कें चहक सँ,
आर अलि-गण कें भनक सँ,
गुंजि रहल अछि दिक्-दिगंत !
स्वागत ! स्वागत !! स्वागत बसंत !!!
मन्मथ कें मारि बनल असह्य !
कोयली केर कूक करुण अतिशय !!
सुनि विरही उर उपजय संशय!
विरहानल के भरकावय कि,
करय आएल छी सुखद अंत !!
स्वागत ! स्वागत !! स्वागत बसंत !!!
7 टिप्पणी (Give your comments):
bahut sundar.... basantak aagman s aa kavita padhi mon basanti bhai gel....utkrist saili....
वसंत के बहुत नीक चित्रण....
आह...अतिसरस..अतिसुन्दर...
hardik subheksha,
sabd chunav prasansniy achhi
upma seho badhiya
bhav lajawab
karay aail chhi sukhad aant ke
mane main kichhu sansay lagait achhi
behatarin prayash.
prayash jari rakhab
from Trigunanand jha
वाह वाह के कहे आपके शब्दों के बारे में जीतन कहे उतन कम ही है | अति सुन्दर
बहुत बहुत धन्यवाद् आपको असी पोस्ट करने के लिए
कभी फुरसत मिले तो मेरे बलों पे आये
दिनेश पारीक
Aam ke gaachhi mon paral. Machan , par hawa khenai mon paral....DHANYAWAD.
bahut ache
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