विवाह’क तेसर सप्ताह (कहानी)

लेखक- आदि यायावर
(मूल नाम- डा. पद्मनाभ मिश्र)

[1]
राति भरि कछ-मछ करैत उर्मिला’क मोन उबिया गेल छलैन. आधा राति'क बादे हुनकर पति बेडरूम में आएल छलाह। एखन ओ एना फोंफ काटि रहल छलाह मानु जे बेटी’क विवाह एखने खतम भेल होन्हि। नौकर चाकर सब सुतल छल. आ बगल वाला फुलवारी मे झिंगूर किलोल करैत छल। चारु दिस आततायी सन्नाटा पसरल छल. हठाते बगल वाला आम गाछी पर टिह-टिहहिया आपन चिर परिचित आवाज देलक। ओहो आवाज कोनो टहँकार सँ कम नहि, सन्नाटा कें चीरैत ओ आवाज हुनकर हृदय कें बेधि देलकनि। एकर संगे टिह-टिहिया इहों सूचना देलकनि जे आब तेसरो पहर बीति गेल अछि। एक बेर ओ फेर सँ अपन पतिक मुंह देखे लागलीह. की सुन्दर दैदिव्यमान मुखमंडल छल, मानु, जेना कोनो गन्धर्व एखने पृथ्वी पर उतरल हो. एहेन सुन्दर छवि जे मात्र साहित्य में पढबा में भेटैत छैक. दैदिव्यमान मुँहे टा किएक, पछिला तीन सप्ताह'क घटना क्रम में हुनका ज्ञात भेलनि जे जतबी ओ देखबा में सुन्दर छलाह ओतबी हुनकर व्यक्तित्व सेहो नीक छनि. हुनकर पिता'क यश पुरे समाज में पसरल छलनि. विवाह सँ कतेक साल पहिने सँ एहि परिवार'क बारे में ओ सुनि चुकल छलीह. ओ लोकनि जतबी धनीक छलैथ ओतबी संस्कारी सेहो. हुनकर पति अपन पुरखा'क अर्जित धन संपत्ति में कोनो रूचि नहीं देखाबैत छलाह. ओ कहैत छलाह जे आदमी कें अपन दुनिया अपने बसेना चाही. विवाहोपराँत ई सब जानि उर्मिला कें बहुत खुशी भेल छलनि. आजुक समय में अरेंज्ड मैरेज'क बाद सब किछु एतेक बढियाँ भेटब हुनका पूर्व जन्म'क कोनो नीक काज बुझाना गेलनि. अपना आप कें ओ भाग्यशाली बुझए लागल छलीह.

मुदा पहिल सप्ताह के बादे एत्तेक किछु भऽ गेल जकर हुनका कोनो आशा नहि छलैन. आब तीने सप्ताह में सब किछु एतेक बदैल जेतैन तकरो हुनका कोनो अंदेशा नहि छलैन. विवाह'क उपरांत प्रत्येक स्त्री'क लेल सासूर एक रहस्य सँ कम नहि होएत छैक. पहिने तँ कोशिश केलथिन अडजस्ट करबाक लेल मुदा आब हुनका लागए लागलैन जे हुनकर कोनो दोष नहि. आब हुनका होइत छलैन जे हुनकर सासूर'क लोक बिलकूल अलग तरहक छैथ. विवाह'क मात्र तीन सप्ताह'क अंतराल में जतय एतेक नाटक भेल हो, ओहि बात कें ओ सामान्य कोना मानि सकैत छलीह. जखन हुनकर अपन पतिदेवे उपेक्षा करए छथि तऽ दोसरा'क कोन गप्प. पछिला तीन सप्ताह में कोनो दिन एहेन नहिं भेल छल जखन हुनकर पति एको घंटा'क लेल आबि कें हुनका सँ प्रेम सँ बात केने होइथ. हुनकर उम्र'क स्त्री लोकनि की-की सपना देखैत छथि. ओ त’ एतेक अनुशाषित जीवन जीबाक पक्ष में छलीह. लेकिन तीन सप्ताह में आब हुनका विश्वाश होमए लागलैन जे हुनकर उपेक्षा भ' रहल छन्हि. जखन हुनकर पतिए के अपन कारोबार आ पारिवारिक समस्या सँ निकलबाक लेल समय नहि छलैन तखन बेकारे विवाह केलैथ. उपेक्षा सँ विद्रोह'क भावना उत्पन्न होइत छैक, हुनका सेहो भेलैन. मुदा द्विरागमन'क समय में अपन पिता'क देल गेल वचन याद आबए लागलैन. एक प्रतिष्ठित परिवार में जन्म लेला'क बाद आ एक तथाकथित प्रतिष्ठित परिवार में विवाह भेला'क बाद विद्रोह करब हुनका ओप्शने मे नहि रहैन. ओनाहींए हुनकर सासु'क अनसन सँ सब किओ परेशान छल. हिनकर कोनो भी एक गलत स्टेप नैहरा'क प्रतिष्ठा कें हानि पहुंचा सकैत छल.

एक रहस्यमयी सासूर'क वातावरण में हुनकर कुंठित भावना अवसाद में बदलल जा रहल छल. एक बेर फेर सँ अपन पति'क दैदीप्यमान मुखमंडल के देखबाक कोशिश करए लागलीह. एहि बेर हुनका तामस नहि उठलैन. अपितु हुनका अपन पति'क ऊपर में दया आबए लागलैन. आजुक समय में, के एहेन आदमी होएत छैक जे अपन नव विवाहिता पत्नी कें छोडि अपन जेठ भाए'क कारोबार में हाथ बंटेबाक लेल गाम सँ दूर चलि जैत छैक? हुनका लग में त’ इहो ऑप्शन नहि छलनि जे ओ कहि सकैत छलीह जे हुनकर पति जे करय जा रहल छैथ, ओ मात्र बेवकूफी’क अलावा अओर किछु नहि थीक. स्त्री एक मजबूरी'क नाम सेहो थीक. कतेक दिन सँ अपन भावना कें दबा के रखने छलीह। आब मोन करैत छलैन जे ठोहि पाडि कें कानैथ. मुदा डर इहो छलैन जे पतिदेव कहीं उठि नहि जैथ आ हुनकर एखन धरि'क त्याग कहीं स्वार्थ में नहि बदली जैन्ह।

ओ उठि के बैसि गेलीह. सिरहौने मे ठेहुन मोड़ि कें अपन नाक आ मुह कें दुनू ठेहुन मे नुकौने रहलीह। किछु देर बाद नहुए नहुए केहुनी’क नीचा मे गेडुआ आएलन्हि आ नहि जानि कखन नीन्न आबि गेलनि। जखन आँखि फुजलनि त देखलैथ जे पतिदेव एखन धरि सुतल छैथ. नित्य क्रिया सँ निपटि केँ फुलवारी मे राखल आरामकुर्सी पर ई सोचि बैस रहलीह जे जखन पतिदेव उठताह तऽ हुनका ताकैत ताकैत एतय जरूर एताह. आब ओ चुप नहि रहतीह. विद्रोह नहि तऽ तर्क तऽ काइए सकैत छलीह. कम सँ कम पुछबाक तऽ चाही जे घर मे जँ एत्तेक नाटक लेल पहिने सँ तैयारी रहैन तऽ एकटा शरीफ लोकनि बेटी सँ विवाहे किएक केलनि. एक हजार प्रश्न फुरैत छलैन. मुदा स्त्री’क मोन मर्यादा’क सीमा मे बान्हल छल. तेँ मोने मोन विचारए लगलीह जे कोन कोन प्रश्न पुछबाक छैन्ह, जाहि सँ मर्यादा’क सीमा’क उलँघन नहि होमए.

विवाह’क पहिल किछु सप्ताह मे नवविवाहिता की करैत छैथ? जेना प्रत्येक बच्चा देखबा मे क्यूट होएत छैक, जेना विवाह मण्डप पर बैसल कनियाँ सुन्दर होएत छैक. इहो बात ओतबी सत्य जे प्रत्येक नवकनियाँ के ई होएत छनि जे अमुक विवाह कए ओ धन्य भऽ गेलीह. ई अग्नि’क चहु दिस सात फेरा’क ई कमाले थीक जे नवकनियाँ के हुनकर पति पुरे दुनियाँ मे सब सँ नीक लोक लागए लागैत छन्हि. नवविवाहिता के निगेटिव बात नहि फुरए छनि आ फुरबाको नहि चाही. प्रत्येक सामान्य विवाह मे कनियाँ के होएत छनि जे हुनका सपना’क राजकुमार भेटल छनि.

उर्मिला फुलवारी मे राखल लकड़ी’क आराम कुर्सी मे धँसल यैह सोच मे छलीह. अपन काल्पनिक दुनियाँ मे ओ अपन राजकुमार केँ परीकथा सदृश्य उज्जर उज्जर घोड़ा पर दूर सँ आबैत देखैत छलीह. मुदा यथार्थ हुनका झमान भऽ पटैक दैत छलनि. लोक सपना सँ तखने आन्दित भऽ सकैत छैक जखन ओहि मे किछु वास्तविकता होइछ. अन्यथा एहेन सपना लोक केँ डरा जैत छैक. उर्मिला अपन कल्पना सँ नहि डेराइत छलीह. बल्कि हुनका अपन भाग्य पर आब शक होमए लागलनि.


[2]
ओ कोन अनर्गल अपेक्षा करैत छैथ. हुनका अपन पतिक सामीप्य चाही, से की गलत? एखन धरि ओ अपन पति सँ सहज नहि भेल छलीह. विवाह’क तीने सप्ताह मे कोनो लड़की सहज कोना भऽ सकैत छैक. किछु समय तऽ चाही एक दोसर केँ जानबाक लेल. हृदय’क एक कोन मे इहो आशँका छलैन जे पतिदेव’क कोनो मजबूरी छैन जे नहि तऽ ओ बुझि सकैत छलीह आ नहिएँ हुनकर पति हुनका बुझबे चाहैत छथि. सम्भावना अपार छल आ ओ प्रत्येक सँभावना केँ अपन कल्पनाशक्ति’क हिसाब सँ विश्लेषण करैत छलीह.

फेर कनखी आँखि सँ पाछु देखलैथ. पतिदेव बेडरुम’क खिड़की सँ चहलकदमी करैत देखा पड़ैत छलैन. जल्दी सँ मोने मोन प्रश्न’क लिस्ट फेर सँ बनबे लगलीह. पहिल प्रश्न जे हुनका अपन तथाकथित कारोबारी ट्रिप मे लऽ जेबा सँ किएक हिचकिचा रहल छैथ. दोसर प्रश्न जे कोन एहेन कारण छैक जे ओ हिनका महत्व नहि दैत छथि. आ अन्तिम प्रश्न जे एना कतेक दिन चलत. प्रत्येक प्रश्न तर्कसँगत छल, उचित छल आ समयानुकूल.

एक बेर बेडरुम केँ फेर सँ देखलैथ. आब पतिदेव फुलवारी दिस आबि रहल छलाह. जल्दी सँ अपन ध्यान चिड़ै चुनमुनी दिस दऽ देलथिन. हृदय मे पसरल अन्तर्द्वन्द्व केँ अपन भीतरे रोकबाक लेल भरिसक प्रयास करय लागलीह. हुनका आभाष भऽ गेलनि जे ओ आब बिल्कूल लऽग आबि गेलाह. आगू मे अनन्त आकाश पसरल छल आ ओहि मे सूर्य’क लाल-लाल रौशनी हुनकर अवसादित मोन केँ तत्क्षण उर्जा सँ भरि रहल छल. लाल लाल आकाश’क नीचा मे शरद ऋतु’क हरीहरी पसरल छल. आ क्षितिज पर बहुते ऊँच आकाश मे नम्हर लोल वाला चिड़ै’क झुण्ड जीवन यापन लेल उड़ि क’ कतओ जा रहल छल.

जतय एक दिस प्राकृतिक सुन्दरता’क मनोरम दृश्य छल, ओतैये दोसर दिस असहजता, अकुलाहट, आ व्यथित मोन. ई बुझियो केँ जे, हुनकर पति पाछु मे ठाढ़ छथि ओ अनठा देने छलीह. ओ ई साबित करए चाहैत छलीह जे हुनको उपर मे कोनो विशेष फर्क नहि पड़ैत छैन. दुनियाँ ककरो बिना नहि रुकलै य’. आ सफल दाम्पत्य जीवन दुनू लोकनि’क बिना सम्भव नहि. पछिला तीन सप्ताह सँ ओ कोओपरेट करैत एलीह, आइ नै काल्हि एकर अन्त हेबे करतैक. मुदा एक कोन मे पति’क प्रेम’क लेल मोन तरसैत छलनि. हुनका मोन करैत छलनि जे पति पाछु सँ भरि पाँज मे पकैरि लैनि. ओ माफ कऽ देतीह. हिनकर छिरियैल मोन केँ अपन बाँहि मे समेटि केँ पति हिनका तृप्त कऽ सकैत छैन.
ओ फेर सँ डरा गेलीह. पछिला तीन सप्ताह सँ भेल नाटक हिनका फेर याद आबए लागलैन. फेर सँ वैह अन्तर्द्वन्द्व आ लोहार’क धौंकनी सदृश्य गति मे हृदय.

पाछु सँ पतिदेवक आवाज सुना’ पड़लैन, “उर्मिला !”.

ओ चौँकि जेबाक सफल प्रयास केलैथ आ मुड़ी घुमा केँ पाछु देखलैथ. पतिदेव मुस्की मारैत ठाढ़ छलाह. हिनका एना बुझना गेलैन जे एत्ते किछु भऽ गेलाक बाद किओ एत्तेक सहज कोना भऽ सकैत छैक. दू टा मे एकटा बात जरूर छैक, चाहे तऽ ओ “एक नम्बर” के नाटकबाज छैथ वा दुनियाँ’क सबसँ महान व्यक्ति. एहि दुनू मे कोन बात सत्य छल से जानबा मे ओ असमर्थ्य छलीह. उर्मिला ओतबी सहज रुपेँ उत्तर देलथिन, “जी? कहु!”.

“लागैत अछि अहाँ एखन धरि तमसाएल छी”, पतिदेव अपन बात कहलैन.

“नहि, अहाँ हमरा अन्यथा लऽ रहल छी”, पति’क सामिजिक आ व्यवसायिक दायित्व’क पूर्ति मे तन आ मन सँ सहयोग देनाय हमर कर्तव्य थीक. हम सैह निभा रहल छी.” उर्मिला’क शब्द मे रुष्ठता व्याप्त छल.
पतिदेव आराम कुर्सी’क पाछुए सँ हिनका भरि पाँजि मे पकरि लेलकनि. हिनकर दुनू हाथ हुनकर हाथ मे छल आ बिना शेव काएल दाढ़ी हुनकर कन्हा पर. पतिदेव’क बिना थकरल केश गाल मे गुदगुदी लगबैत छलैन. आ ओहि मे सँ एकटा लऽट आँखि मे जाकेँ तँग करैत छलैन. ओ अपन हाथ केँ छोड़ेबाक प्रयास करए लागलीह. मुदा मोने मोन हुनका नीक लागैत छलैन. मोन होएत छलैन जे ओ एहिना पकड़ने रहैथ. कखनहुँ कखनहुँ प्रेम केवल शरीरेटा’क भाषा बुझैत छैक. आ ओहि मे कोनो गलत बात नहि. हुनकर गर्म श्वाँस हिनकर कान मे घुसि आत्मा केँ तृप्त करैत छलैन. सृष्टि, सृजन, आ मानवीय भावना मे एक अजीब खेल भऽ रहल छल. उर्मिला केवल एक पात्र छलीह. मानवीय भावना खेल मे आगू निकलि गेल छल ओ अपन हाथ छोड़ेबाक लेल प्रयास केँ बढ़ा देलथिन.

जखन पतिदेव केँ लागलैन जे आब ओ हाथ छोड़ा लेतीह तऽ ओ हुनका कान मे कहलथिन्ह, “उर्मिला! अहाँ बहुत सुन्दर छी.”
उर्मिला अपन हाथ छोड़ा नेने छलीह. पतिदेव’क अन्तिम वाक्य सुनि हुनका आँखि मे नोर चलि एलनि. मुदा दोसरे क्षण पति’क केश के आपन आँखि लऽग सँ हँटा के एहेन प्रदर्शित केलीह जे मानू नोर पति’क बात सँ नहि, मुदा आँखि मे घोसिआएल केश सँ आएल अछि. पतिदेवो बुझैत छलाह जे नोर हुनकर केश सँ नहि आएल छल, अपितु हुनकर बात सँ आएल छल. प्रत्येक स्त्री’क मोन होएत छनि जे पति सुन्दरता’क वर्णन करैथ. मुदा आई विवाह’क तीन सप्ताह मे ओ पहिल बेर सुनि रहल छलीह. मात्र एकटा वाक्य! ओना त’ भावना केँ झकझोरि केँ राखि देलनि मुदा, ओ केवल गर्म तवा पर किछु बुनि पानि सँ बेसी नहि छल जे तीन सप्ताह’क उपेक्षा सँ लोहा सन गर्म हृदय पर छन्न सँ उड़ि गेलन्हि. गर्म तवा के सामान्य करवा लेल पानि’क किछु बुनि नहिँ अपितु लोटा’क लोटा पानि ढ़ाड़बाक जरुरत छल. पतिदेव एहि बात केँ बुझि चुकल छलाह, ओ कान मे फेर सँ कहलकनि, “एतय किओ आबि सकैत अछि. चलु ने अहाँ सँ बहुत बात केनाय अछि. चलु अपन रुम चलल जाए.”
उर्मिला चुप रहलीह. अपन बाडी लैन्गूएज सँ एखन धरि जतबैत छलीह जे हुनका आब पतिदेव’क बात कोनो विश्वास नहि छनि. बाडी लैन्गूएज मे इहो समाहित छलैन जे ओ केवल अपन पत्नि धर्म निभा रहल छलीह. पतिदेव हाथ खीचि बेडरुम मे लऽ जाएत छलैन आ ई चुपचाप चलि जा रहल छलीह. केवल विरोध मे अपन डेग’क गति कम केने छलीह.


[3]
बेडरूम पहुँचि पतिदेव धड़ाम दऽ केवाड़ बन्द कऽ देलकन्हि आ लऽग मे आबि हिनकर दुनू बाँहि के पकड़ि सीधे-सीधे आँखि मे देखैत बजलाह, “उर्मिला! अहाँ सचमुचे बहुत सुन्दर छी. अहाँक ललाट, आँखि आ ठोर भगवान बहुत फुरसत मे बनौने छथि. हम अहाँ के अपन जीवन-साथी पाबि धन्य भऽ गेलहुँ.”
एतेक बात कहि पतिदेव चुप भऽ गेलाह. प्रेमालाप आ लेक्चर मे अन्तर होएत छैक. प्रेमालाप ताली जेकाँ एक हाथ सँ नहि मुदा दुनू हाथ सँ बजैत छैक. हुनका प्रतिउत्तर मे किछु सुनबाक छलैन. उर्मिला अपन भावना केँ अपन पुरा काबु मे केने रहलीह. ओ मूर्तिवत ठाढ़ छलीह. पतिदेव के भऽ रहल छलैन जे आब गड़बड़ भऽ रहल छैक. हुनकर मजबूरी हुनकर प्रयास मे साफ प्रदर्षित भऽ रहल छलनि. हुनका मुँह सँ एक्के टा वाक्य निकललनि, “उर्मिला हम अहाँ सँ बहुत प्रेम करैत छी”.

ई कोनो साधारण वाक्य नहि छल. पछिला तीन सप्ताह मे नव सासूर मे भेल अप्रत्याशित नाटक’क बाद बहराएल एहेन वाक्य छल जकरा सुनबाक लेल मोन तरैस गेल रहैन. पतिक प्रेमालाप मे हुनकर मजबूरी सद्यः देखा पड़ि रहल छलैन जे हुनकर व्याकुलता केँ बढ़ा रहल छलैन. किछु देर दुनू व्यक्ति चुप चाप रहल. पतिदेव फेर सँ कहलकनि, “उर्मिला हम सचमुचे अहाँ सँ बहुत प्रेम करैत छी, अहाँक चुप्पी हमर हृदय केँ बेधि रहल अछि.”

उर्मिला किछु नहि बजलीह. पति’क मजबूरी केँ यथोचित सत्कार देनाए अपन पत्नी धर्म बुझलथिन. मुदा ओ चुप रहलीह. जखन भावना’क ज्वार हृदय सँ निकलि आँखि मे एलनि तऽ आँखि सँ नोर निर्बाधित रुप सँ बहए लागलनि आ पतिदेव हुनकर बामा हाथ सँ बाँहि पकड़ने दाहिना हाथ सँ नोर पोछऽ लागलनि तऽ हिनका सँ नहि रहल गेलनि. हुनकर छाती मे मुँह नुकाए हिचुकि हिचुकि केँ कानए लागलीह. हिचुकी’क बीचे मे उर्मिलोक मुँह सँ निकलए लागलैन, “हमहुँ अहाँ सँ बहुत प्रेम करैत छी. ई हमर पूर्व जन्म’क कृति अछि जे अहाँ सन पति भेटल अछि.”

पति दुनू गाल केँ अपन हाथ मे लऽ अपना दिस खीचि लेलकनि, एक बेर नोर सँ भरल लाल लाल आँखि मे देखि कहए लागलनि, “अहाँ’क आज्ञा बिना हम नहि जा सकैत छी. जाबए धरि अहाँ हँसी खुशी नहि विदा करब हमरा कोनो काज मे मोन नहि लागत. हमर यात्रा सफल नहि होयत”.

“हमर कोन गलती? हम कोनो बहुत पैघ डीमान्ड कऽ रहल छी? हमरा तऽ केवल अहाँक सामीप्य चाही. हम तऽ सिर्फ अहाँक सँग रहए चाहैत छी”, उर्मिला बिना साँस लेने एक्के दम मे सब बात कहि गेलीह.
पतिदेव जवाब देलथिन्ह, “हम फेर सँ वैह आर्गुमेन्ट देब. अहाँ अपन पिता’क घर मे सुख समृद्धि मे जीवन बीतेने छी. अहाँक कोमल शरीर आ कोमल हृदय दुनियाँक यथार्थ सँ भेँट नहि केने अछि. एक पति भेलाक कारणेँ हम कहि रहल छी जे अहाँ जुनि जाऊ. जीवन बहुत पैघ छैक आ ई समय बहुत कम. बुझियो जे हम गेलहुँ आ खट दऽ आबि गेलहुँ”.

उर्मिला’क उमड़ल भावना फेर सँ निराशा मे बदैल रहल छल. हुनका होमए लागलैन जे पतिदेव जिद्दी किस्म के इन्सान छथि. ओहो तर्क सँ अपन बात कहबाक प्रयास करए लागलनि, “भऽ सकैत अछि जे शरीर सँ हम कोमल छी आ आई धरि कोनो विशेष टेन्शन नहि झेललहुँ. मुदा मानसिक रुपेँ हम ओतबी मजगूत छी.”
पतिदेव कहलकनि, “उर्मिला! अहाँक भावना’क हम सम्मान करैत छी. मुदा हम अहाँ सँ बेसी दुनियाँ देखने छी. तेँ कहैत छी, अहाँ रुकि जाउ.”
उर्मिला जवाब देलथिन, “हम अहाँ’क बात सँ सहमत भऽ जैतहुँ. अहाँ’क पैघ भाए अहाँ माएक’क जिद्द’क लेल जाएत छथि तऽ जाथु. अहाँ छोट भऽ केँ हुनका मदद लेल जैत छी त जाउ. मुदा जहिना अहाँक भाउजी अहाँक भैया सँग लागल जैत छथि, ओहिना हमरो सँग नेने चलु.”

पतिदेव केँ उर्मिला’क एत्ते तर्क’क आशा नहि छलनि. ई बात सत्य छल जे हुनकर भाउज हुनका लोकनिक सँग जा रहल छलीह. हुनके लोकनिक सँग उर्मिला से चलि जेतीह तऽ एहि मे कोन हर्ज.

ओ आब दोसर तर्क देबए लागलाह, “उर्मिला अहाँ एखन हमरा घर मे एकटा नवकनियाँ छी. अहाँ सँ हमरा माए बाबूजी’क बहुत लालसा छन्हि. हुनकर कुटुम्ब आ समाज हुनका सँ पुछतन्हि जे पुतोहु विवाह’क तीने सप्ताह बाद कतय गेलथिन्ह, तऽ हुनका कोनो जवाब नहि भेटतन्हि. हमर माए बाबुजी हमरा लेल भगवान सँ कम नहि छथि. हम हुनका लोकनि केँ मजबूर नहि देखए चाहैत छिअन्हि”.

उर्मिला केँ मोन मे भेलनि जे कहि दैथ. हँ! एहने माए जे बेटा’क विवाहोपरान्त एत्तेक नाटक केने होइन्हि आ एहेन पिताजी जे हिनकर माता’क अनर्गल माँग पर मजबूर भऽ चुप्प छथि. मुदा हुनकर अपन शिक्षा आ सँस्कार हुनका चुप्प रहबाक लेल प्रेरित करैत रहलनि. ओ चुप्प रहलीह. जखन हिनका मुँह सँ किछु नहि निकललन्हि तऽ पतिदेव फेर सँ कहए लागलन्हि, “देखु उर्मिला! अहाँ हमरा सँ प्रेम करैत छी की नहि?”

ओ कहलीह, “हँ! हम अहाँ सँ बहुत प्रेम करैत छी”.

“प्रेम देबाक नाम थीक. हम अहाँ केँ तर्क सँ नहि बुझा सकलहुँ. तेँ किछु माँगि रहल छी. बाजू अहाँ हमर माँग पूरा करब?” पतिदेव कहलकनि.
ओ फेर सँ चुप्प रहलीह. पतिदेव किछु काल प्रतीक्षा’क बाद मे फेर सँ कहए लागलाह, “उर्मिला! तऽ की अहाँ अपन पति केँ हारैत देखए चाहैत छी. अहाँ के ई नीक लागत? जे समाज हमरा कायर बुझए.”
पतिदेव सँगमरमर’क फर्श पर ठेहुन भरे बैसि गेलाह आ हाथ मे मुँह नुकाए नहुएँ नहुएँ अपने आप सँ कहए लागलाह, “उर्मिला! हम मजबूर छी. हमर सहायता करु”.

एहि बेर उर्मिला केँ अपन पति’क बात मे सत्यता आ इमानदारी देखा पड़लनि. हुनका उपर मे हिनका दया आबए लागलनि. अपना आप सँ घृणा होमए लागलनि. अपने आप के कहए लागलीह, “उर्मिला! अपन सासु जेकाँ अपन स्वार्थ केँ सबसँ आगू जुनि करु! ”. यदि कोनो भाजेँ ई बात हुनकर नैहर चलि जैन तऽ हुनकर माए बाबूजी’क प्रतिष्ठा केँ ठेस पहुँचतनि. आगू फर्श पर पति बैसल छलनि, निराश आ आ मजबूर.

पति’क बाँहि पकड़ि ओ उठा देलथिन आ कहय लागलीह, “हे लक्षमण, हम जनक पुत्री उर्मिला अहाँक एक पत्नी’क रुप मे अहाँ के अनुमति दैत छी जे अहाँ जाउ, आ अपन भैया-भाउजी के हुनकर धार्मिक कर्तव्य’क पालन करबा मे सहयोग करु. हम बारह बरस धरि अहाँ बाट ताकब. जाउ आ अहाँ जग जीत केँ आऊ”

किछु धरि पतिदेव अवाक छलाह. उर्मिला सेहो अवाक छलीह. जखन पतिदेव प्रशँशा आ धन्यवाद’क दृष्टि सँ देखए लागलन्हि तऽ हिनका रहए नहि गेलनि. बारह बरस छोट समय नहि होइत छैक. से सोचि, एक बेर फेर सँ हुनका आँखि सँ अश्रु धारा बहए लागलनि. पति चुनौती देलकनि, “अहाँ कहैत छी जे मानसिक रुप सँ बहुत मजगूत छी, आब अहाँ किएक कानि रहल छी.”

तुरन्ते नोर पोछि उर्मिला यथावत ठाढ़ रहलीह. पति हिनकर नोर पोछि कहलकनि, “एना नहिँ! अहाँ हँसि के हमरा विदा करु.” उर्मिला’क मुस्की निकलि गेलनि. किछुए देर मे यात्रा’क तैयारी होमए लागल. उर्मिला ओहि तैयारी मे व्यस्त छलीह, एहि बात सँ अनजान जे हुनकर त्याग केँ कोनो मोल नहि भेटतन्हि वा नहि. शायद भावना के दबाए अपन पत्निधर्म निभा रहल छलीह.
ओहि यात्रा’क सँग मानवता’क इतिहास सेहो आगू बढ़ल जा रहल छल. एकबेर फेर सँ, एकटा स्त्री, एकटा पुरुष केँ हरा देने छलीह. आ उर्मिला मानवे टा नहि मानवता केँ सदा’क लेल अपन ऋणी बना देने छलीह.

इतिहास सतर्क छल. अपन एकटा महत्वहीन पन्ना मे एहि घटना केँ सावधानी सँ नुका लेबाक योजना बना रहल छल.

15 comments:

विनीत उत्पल said...

I just read first two paragraph, this is awesome.

Padmanabh (आदि यायावर) said...

विनीत जी, फुरसत में पूरा कहानी पढि टिप्पणी देब. हम बाट ताकब.

Raghav said...

namaskar
prastut katahak anand lelak baad ekar bhasha aa bhav san prerit bha ham tippani karba men apna ke asamarth bujhai chi, bahut nik lagal, asha achi j agu ahne samavesh bhetait rahat je mun ke anavarat tripti karait rahat.
dhanyabad

कतेक रास बात said...

----- कखनहुँ कखनहुँ प्रेम केवल शरीरेटा’क भाषा बुझैत छैक . आ ओहि मे कोनो गलत बात नहि. हुनकर -गर्म श्वाँस हिनकर कान मे घुसि आत्मा केँ तृप्त करैत छलैन. सृष्टि, सृजन, आ मानवीय भावना मे एक अजीब खेल भऽ रहल छल. उर्मिला केवल एक पात्र छलीह.


..... इतिहास सतर्क छल. अपन एकटा महत्वहीन पन्ना मे एहि घटना केँ सावधानी सँ नुका लेबाक योजना बना रहल छल....

These two are the best line of this story. Keep it up

रंजना said...

माता सीता और श्री राम के त्याग ने जितनी प्रसिद्धि पायी, लक्षमण और उर्मिला के त्याग को वह प्रचार नहीं मिला,जबकि देखा जाय तो इनका त्याग धैर्य और सेवा भाव अन्यतम, अतुलनीय है...

इस कथा के माध्यम से पुनः उन महान चरित्रों का ध्यान करने के लिए आपका कोटि कोटि आभार...

मन अतिशय भावुक हो गया...

करण समस्तीपुरी said...

आदि यायावरजी के ई विशेषता छैन्ह कि ओ कथाक रचना आधुनिक परिदृश्य मे करैत छथि मुदा यथासंभव कथाक अधिकांश मौलिक तत्व के समेटवाक प्रयास करैत छथि।

एहि कथा में परिवेश के चित्रण संक्षिप्त मुदा बड़ सहज आ मनोरम भेल अछि। हिनकर आओर सब कथाक अपेक्षा एहि मे ओतेक संवाद नहि छैन्ह मुदा मानवीय संबंधक मनोवैग्यानिक चित्रण कथा केर विषय-वस्तु केँ सफ़लतापूर्वक आगे बढ़ा रहल अछि।

कथानक सामन्य अछि जे आम जीवन से उठाएल गेल अछि मुदा इतिहास के धरातल पर एकर अवसान के कथाकार कथा कें अकाशक ऊँचाई देने छथि। अंतिम पंचलाइन पढ़ि एना लागल जे सचिन तेंदुलकर मैचक अंतिम गेंद पर छक्का मारि भारत केँ मैच जीतेने होइथ।

दोसर पाली के शुभ-कामना। दोसर छोड़ से हमहुँ स्ट्रायक लेबाक लेल तैय्यार छी।

सुभाष चन्द्र said...

कतेक दिन बाद कतेक रास बात पर आदि यायावर जी की कथा पढ़ी मौन गदगद भ गेल..
एही कथा में इतिहास , मौलिकता आ आधुनिकता के चिंत्रण करबा में ओ काफी हद धरि सफल भेल छैथ. पाठक के एही कथा में हुनक स्वाद के अनुसरे सब किछु भेततैन...आन कथा जकां यायावर जी मोनोविगयांक पक्ष पर पूर्ण सबल छैथ...
कथाक अंतिम पांति बहुत किछु कहबा में समर्थ अछि...
एकबेर फेर सँ, एकटा स्त्री, एकटा पुरुष केँ हरा देने छलीह. आ उर्मिला मानवे टा नहि मानवता केँ सदा’क लेल अपन ऋणी बना देने छलीह. इतिहास सतर्क छल. अपन एकटा महत्वहीन पन्ना मे एहि घटना केँ सावधानी सँ नुका लेबाक योजना बना रहल छल.

Manish said...

Padmanabh Bhaiya ahank kahani padbavk intazar rahait achhi, o pura bhel ahin san bad khush chhi.

KAHANI bad nik lagal, dosar pali k intazar achhi, bina dosar pali k aam logk samajh m e kahani nahi aayat.

Sankshipt aur sanvad san bharal katha.

Padmanabh (आदि यायावर) said...

टिप्पणी'क लेल सब लोकनि कए धन्यवाद.
एक प्रशंसक हमारा इमेल कए सूचित कयलनि जे आब कविता'क नाम पर अकविता होइत छैक आ नै जानि कथा'क नाम पर की की परोसल जैत छैक. बात में सत्यता छुपल अछि आ इ चिंता'क गप्प सेहो थीक. सब लोकनि सँ एकेटा आग्रह जे कतेक रास बात पर नियमित भ' जाऊ आ एहेन लोक कें जोड़बाक प्रयत्न करू जे वास्तव में साहित्य प्रेमी होइथ कविता आ अकविता तथा कथा आ अकथा में वास्तविक अंतर बुझैथ. कतेक रास बात नौसीखिया कें साहित्य सृजन लेल प्रेरित करबाक लेल बनैल गेल अछि. विषय वस्तुक जानकार एहि प्रयास कें सार्थक बना सकैत छथि.

Vinita Sinha said...

Vivah'k Tesar Saptah is a nice story, and a fine conversion of this Ramayana stroy in today's life of Mithila, nice potray of a newly wed's feelings

Madan Kumar Jha said...

Atyant vilakshan vishwash nahi hoit achhi je Nav sahityakar lokani ehno rachna kay sakait chhathi Hriday bhav vibhor bhay gel achhi aagu kichhu fura nahi rahal achhi aankhik sojha ohi Urmilak chitra ghumi rahal achhi jinkar tyag ke o asthan nahi bhetal jakr o adhikari chhaleeh, tahi hetu apnek rachna auro utkrisht bhay jait achhi .....asha achhi ehen rachna aguo parhbak hetu bhetat Dhanyawad...

Anonymous said...

sabd nahi aichh je vishleshan kari bad nik lagal...ahi san purv hum shri mahaveer prasad ji ke kavi ke urmila vishyak udasinta padhne chhalunh....vishwash nahi bha rahal aichh je Tulsidas ji ehan tyag ke kena visari gelah.....

sr devraj said...

simply superb admin sir... learn lot of things in ur content... keep on posting... hanuman chalisa

Nag Raj said...
This comment has been removed by the author.
Nag Raj said...

jai sriramread hanuman chalisa every one.....