हम हारि गेल छलहुँ

लेखक- आदि यायावर
(मूल नाम- डा. कुमार पद्मनाभ)


(1)
दूर्गा पूजा मे हम सपरिवार गाम आएल छलहुँ. ई योजना आइ हठाते बनि गेल छल. आइ के डेट में हमरा लेल छओ लाख टाकाक जोगाड़ करनाय कोनो पैघ गप्प नइँ छल. एहि लेल हमरा मात्र एक सप्ताहक समयक आवश्यकता छल जाहि मे बैँक हमर लोन पास क केँ हमर अकाउन्ट मे द सकैत छल. बैँक सब आइ काल्हि अनेरो कर्ज देबाक लेल तैयार रहैत छै. मुदा एतेक टाकाक लोन हमर कनियाँ सुगँधा लेल बड़ पैघ कर्ज छल. वैश्वीकरणक दुनिया मे लोन आ ई.एम.आई जीवनक अभिन्न हिस्सा होएत छै से ओ नइँ बुझि सकल छलीह. दिन भरि मे हम आन लोक सबसँ बात करए मे लागल छलहुँ. आँगन मे की होएत छल तकर हमरा कोनो टा खबरि नइँ छल. अपितु आँगनक समाचार लेबाक हमरा मौके नइँ भेटल छल. गाम मे चारु दिस गप्प पसैर रहल छल. सब किओ अपन अपन दृष्टि सँ परिस्थितिक विश्लेषण क रहल छल. गप्प पसरैत पसरैत हमर आँगन से पहुँचि गेल. गप्पे गप्प मे किछु जनानी लोकनि हमर कनियाँ सँ एहि योजनाक विवरण मागए लागलीह. सुगंधा केँ भेलैन्ह जे सब किओ मजाक क रहल छनि. किछुए मास पहिने हम पचीस लाख टाका कर्ज ल केँ फ्लैट बुक करौने छलहुँ. छओ लाख टाकाक अतिरिक्त कर्ज सेहो एकटा समाजिक काजक लेल किनको पाखण्ड लागि सकैत छल.   तेँ ओ एहि बात केँ मजाक बुझि कोनो गम्भीरता सँ नइँ लेलथिन्ह.
हम पुणे में एकटा बहुराष्ट्रीय कम्पनी मे काज करैत छलहुँ. छुट्टी कम भेटैत छल, मुदा तैयो एक बातक हम ध्यान राखैत छलहुँ, जे साल मे कम सँ कम दू सप्ताह लेल गाम जरूर आएल जाए. पछिला सात साल सँ हमर ई क्रम टुटल नइँ छल. एहि बेरक दूर्गापूजा मे सेहो हम केवल दूए सप्ताहक लेल आएल छलहुँ. एखन चारि पाँच दिनक छुट्टी आओर बाँकी छल. मुदा हमरा बहुत लोक सबसँ भेँट गाँठ करनाय छल आ ओहि पर सँ एतेक पैघ योजना. ओहि दिन हम भरि दिन व्यस्त छलहुँ. कनियाँ सँ एकोबेर गप्प करबाक कोनो मौके नइँ भेटल.  
तकनीकी समस्या, समयाभाव, आ वर्तमान नौकरी'क आपाधापी मे लिखबाक लेल योजना नहि बना पाबैत रही. आइ फेर सँ साहस केलहुँ. आशा अछि जे कनिएँ मुदा जे भी पाठक लोकनि छथि हुनका ई कथा नीक लागतन्हि. जतय एहि कथा मे सेहो नवविवाहित'क मोह हम नहि छोड़ि सकलहुँ ओतैये हम अपन कथाक गणीतीय सूत्र केँ छोड़ि रहल छी. कनि रिस्क अछि मुदा देखल जाए ऊँट कोन कर'ट लैत अछि....
                         .... पद्मनाभ

राति मे साढ़े दस बजे जखन सब किओ खा पी केँ सुतबाक लेल गेल, तखने हम अपन रुम आएल छलहुँ. सखुआक बीस साल पुरान केवाड़क काठक बिलैया लगबैत काल जोर सँ आवाज भेल छल आ सुगंधा पाछु घुमि केँ देखने छलीह आ पुनः अपन काज मे व्यस्त भ गेल छलीह. हम केवाड़े लग ठाढ़ भ देख लागलहुँ जे दुनू टा धीआ पूता बगल वाला चौकी पर दिन भरि खेल धूपि के थाकल बेसुध सुतल छल. बिजलीक भोरे सँ कोनो अता पता नइँ छल. दीवालक कोन मे काठक खूँटी मे टाँगल लालटेन, सोडियम वेपर लाइटक आभास दिआबैत छल. दोसर पलँग पर दिन भरि बच्चा सब बिछओन केँ धमगज्जर क केँ राखने छल आ सुगंधा तकरे सरिआ रहल छलीह. खिड़की खुजल छल, आ कोजगराक प्रातः कालक किछु इजोरिया खिड़की सँ सीधे-सीधी आ किछु खिड़कीक पलड़ा सँ छनि छनि केँ घर मे घुसि रहल छल. मुझफ्फरपूरक कोनो पैघ कालेज सँ एम.एस.सी धरि पढल सुगंधा जखन गाम आबैत छलीह त ओ गामेक सन भ जाइत छलीह. हुनकर यैह स्वभाव सँ हम अभीभूत छलहुँ. शहरक मेक-अप अलग आ गामक मेक-अप अलग. पैघ पैघ आँखि आ ओहि मे फुरसत सँ लागएल गेल भरि आँखि काजर, चाकर कपार आ ओहि मे दुनू भौँहक बीचो बीच साटल अपन उपस्थितिक उद्घोषणा करैत लाल रँगक सामान्य सँ पैघ टिकली, गाम एबा सँ कनिएँ पहिने ट्रीम काएल तीन-स्टेप वाला सुगढ खुजल छिरिआएल केश-- जेना ग्रामीण आ शहरी भारतक विहँगम सँगम हो. हम एखन धरि केवाड़े लग ठाढ़ सुगंधा पर मँत्रमुग्ध भ रहल छलहुँ. पुणे मे ओ धिये-पुता मे ओझड़ैल रहैत छलीह आ तेँ हुनका साइते एहेन अवसर भेटैत छलैन्ह जतय ओ एहेन तरहेँ तैयार होएत छलीह. गाम मे बच्चा सबकेँ देखनिहार कतेको लोक छल. तेँ आई किछु टाइम अपना उपर मे खर्च कनेने छलीह. ओ आत्मविश्वाशक लेल मेक-अप केने छलीह मुदा हमरा होइत छल जे ई हमरे काएल गेल छल. पुणे में हमरो कहाँ टाइम भेटैत अछि जे सुगँधा केँ एतेक निकटाता सँ देखी. बहुराष्ट्रीय कम्पनी अपन कर्मचारी सँ “पत्नी केँ निहारबाक अधिकार” खारिज केने रहैत अछि. एक कोन सँ लालटेनक प्रकाश  आ दोसर कोन सँ इजोरिया घर केँ अद्भूत रुपेँ प्रकाशित क रहल छल. खिड़की सँ सटल सागक बाडी मे हरसिगाँर अपन चरम सीमा धरि फुलाएल छल. हवाक झोँका कखनहुँ कखनहुँ ओहि सुगंध केँ समेटि केँ खिड़कीक मरफत घर मे आनैत छल.  सुगंधा चादर केँ सरिआए, तकिया केँ नीक सँ लगा केँ पाछु देखलीह. हम एखन धरि मँत्रमुग्ध भेल ठाढे छलहुँ. ओ किछु असहज भ गेल छलीह. आठ साल सँ विवाहित भेलाक बादो अपने पुरुष सँ लजा गेल छलीह. हम हुनकर लाज केँ भाँपि गेल छलहुँ. लाज केँ उचित सम्मान देबाक चाही. तेँ दू डेग आगू बढ़ि पलँग लग पहुँचि सुगंधाक दुनू बाँहि पकरि आँखि मे देखि कहलिअन्हि, “सुगंधा! अहाँ बहुत सुंदर छी”. लाज आब चरमोत्कर्ष पर छल. “हमरा जोर सँ नींद लागल अछि”, सुगंधा ई बात कहि बिछाओन पर पड़ि गेलीह.
हम सेहो लालटेन मिझा केँ से बिछओन पर आबि गेलहुँ. दुनू लोकनि अपन अपन गेडुआ पर चिताँग पड़ल छलहुँ, किछु काल धरि बिल्कूल चुप. वातावरण शाँत आ जोर जोर सँ चलैत दुनू लोकनिक साँस. हवाक एकटा आओर झोँक आएल आ हरसिँगारक महक पुरे घर मे पसैर गेल. क्षण भरि लेल हमरा भेल जे सुगंधाक नाम चरितर्थ भ रहल अछि. दुनू लोकनिक मोन मे कतेक रास बात, मुदा अगुवाई करबाक लेल किओ नइँ तैयार. जिम्मा सुगंधा लेलथिन्ह. अपन बामा केहुनि केँ गेडुआ मे रोपि, तरहत्थी मे माथ केँ टिकाकेँ हमरा देख लागलथिन्ह. किछु काल धरि किछु नइँ फुरेलनि, मुदा तत्क्षणे हुनका दिन मे भेल गप्प याद आबि गेलैन. ओ नहुएँ नहुएँ आवाज मे पुछए लागलथिन्ह, “आई किछु स्त्रीगण लोकनि आएल छलीह, हमरा किछु सुनए मे आएल, मुदा हम बात केँ टालि देलिए”.
“से की सुनए मे आएल?“
“सुनलहुँ जे अहाँ उत्तरबाड़ि वाला पोखैरक जीर्णोद्धारक जिम्मेदारी लेलहुँ?
हँ! से अहाँ सत्ते सुनलहुँ. हम अहाँ सँ एहि बारे मे बात करचाहैत छलहुँ, मुदा दिन भरि फुरसते नइँ भेटल”.
“कोनो बात नइँ, योजना बहुत नीक अछि, मुदा पुणे मे रहि केँ एतेक भारी काज अहाँ कोना क सकैत छी”, सुगंधा जोर सँ अपन साँस छोड़ैत पुछलथिन्ह.
हमहुँ जवाब देलअनि, “कार्य सम्पादनक जिम्मेदारी सुबोध आ बिरोज नेने छथि. वैह सुबोध आ बिरोज,  हमर बचपनक सँगी जिनका बारे में हम कतेको बेर गप्प कहने होएब. वैह दुनू लोकनि जिनकर उन्नतिक चर्चा हम सदिखन करैत रहैत छी”
“आ दुनू लोकनि केँ हम फुरा देलियैन्ह जे एहि मेहनतक बदला मे कम सँ कम नौ-दस हजार टाका मासिक जरूर भेटि जेतैन्ह” हम अपन बात खतम करैत कहलअन्हि.  
“से सब त ठीक छै, मुदा ओहि मे जे प्रारम्भिक खर्च लागत तकर जिम्मेदारी के लेत?  सुगंधा आशँकित होएत पुछलथिन्ह.
हमरा यैह प्रश्नक आशँका छल, बात केँ हल्का करैत हम जवाब देलिअनि, “सैह त‘, एकर जिम्मेदारी हम उठबे जा रहल छी”
“की मतलब?“, सुगंधाक आशँका बढ़ि रहल छलैन्ह. आँखि के चारु दिस घुमा केँ अपन ध्यान हमरा पर केंद्रित के देने छलीह.
“मतलब ई, जे ओहि मे छओ लाख टाकाक खर्चा होयत तकर जिम्मेदारी हम लेब, एखन हमर बैँक सँ लोनक अहर्रता एखनहुँ धरि दस लाखक आओर बचल अछि”, हम कारपोरेटी उत्तर दैत कहलअन्हि.  
सुगंधा उठि केँ बैस गेलीह. हुनका पछिला तीन सालक बात याद आबए लागलनि. हुनका याद आबए लागलनि जे कोन कोन जोगार क केँ फ्लैटक डाउन पेमेट हम केने छलहुँ. हुनका 25 लाख टाकाक होम लोन आ ओकर ई.एम.आई याद आबए लागलैन्ह. हुनका याद आबए लागलैन्ह जे कोना पछिला रीशेसन मे जखन कम्पनी सभक परफोर्मेंश खराप भ गेलाक बाद हमरा नौकरी सँ निकालि देल गेल छल तखन कोना दू लाख टाकाक फिक्स्ड डिपोजीट तोड़बा केँ घरक किराया आ खर्चा चलल रहैन्ह. आब तहमरा सब लग मे कोनो फिक्स्डो डिपोजीट नइँ छल. हम देखलिअनि जे सुगंधाक मोन मे भावनाक बिर्रोह उठि रहल छलनि. हमरा कोना जवाब देतीह, कोन बात कहतीह आ कतेक बात कहती तकर आकलन नइँ कपबि रहल छलीह. मोन तामसेँ घोर भ गेल छलनि तैयो अपन भावना केँ काबु मे राखने छलीह. 
कहल्थिन्ह, “बैँक यदि कर्जा देबाक लेल तैयारो अछि, एकर की मतलब, जे जतेक सँभव होमय ओतेक कर्जा ल लेल जाए.” आवाज मे उद्विग्नता आओर तामस व्याप्त छल. मुदा आवाजक तीव्रता पर एखन धरि नियँत्रण छलनि. सुगँधा एखन धरि बैसल छलीह. हमरा बुते रहल नहि गेल. हमहुँ आब उठि के बैसि गेल छलहुँ. हमरा आशँका छल जे तामस में सुगँधा चीकरे नहि लागैथ. अपन मुँह पर आँगुर ल के इशारा केलिअनि, जे जोर सँ नइँ बजबाक लेल. अड़ोसी पड़ोसी तीव्र आवाज सँ जागि सकैत छल. सुगंधा केँ एक सौ गप्प कहबाक छलनि मुदा तामस मे गला रुँधि गेल छलनि. कोशिश केलाक बादो ओ अवाजक तीव्रता कम नइँ क सकैत छलीह. ओ कोनो परिस्थिति में अपन आर्थिक स्थिति आओर बेसी खराप नइँ कर देब चाहैत छलीह. एहि बातक फैसला काल्हि निश्चिँत सँ होएत से निआरि केँ ओ फेर सँ पलँग पर दाहिना करट ल केँ पड़ि गेलीह. हमहुँ ओतेक राति गेल कोनो बहस नइँ चाहैत छलहुँ, अपितु हम हुनकर सामना एखन नइँ करे चाहैत छलहुँ. हमहुँ बामा करट ल पड़ि गेलहुँ. देखलहुँ ईजोरिया एखन धरि घर मे ताका-झाँकी क रहल छल. हरसिँगारक महक हम दुनू पति पत्नीक प्रणयलीला आ प्रलयलीलाक बीच अपन उचित स्थान ताकि रहल छल.  


(2)
समस्या मुँह बाबि केँ ठढ़ छल आ समाधान कोनो नइँ देखा पड़ि रहल छल. हम राति भर बिछओन पर पड़ल छलहुँ. नींद गाएब छल. यदि सुगँधा डाँटि डपटि केँ मामिला केँ एक निश्चित मोड़ द देने रहितथि त हम अपना दिस सँ निश्चिँत रहितहुँ. एतेक राति में एखन त मात्र हम समस्याक समीक्षा क सकैत छलहुँ. पड़ल पड़ल अपने बारे में सोचए लागलहुँ. हमरा लागैत छल जे हम एक साकारत्मक सोच वाला, जमीन सँ जुड़ल, उदारवादी आ निर्भीक व्यक्तित्व वाला लोक छी. हमर जीवनक पहिल सत्रह साल गामे मे बीतल छल आ ओहि समय मे ई पोखैर हमर गतिविधिक मुख्य केंद्र होइत छल. हमर योजना छल जे ओहि पोखैरक जीर्णोद्धार क किछु व्यवसायिक काज करी जाहि सँ किछु समाजिक काज भ जाए आ किछु अतिरिक्त पैसाक कमाई सेहो.
बिछाओन पर पड़ल हम दिन भरिक बातक मोने- मोन विवेचना करए लागलहुँ. एहि सब बातक शुरुआत आइ भोरे मे भेल छल जखन हम उत्तरबाड़ि कात वाला एहि पोखैर दिस घुमए गेल छलहुँ. हम महाड़ पर पहुँचि के देखलहुँ जे पंद्रह साल बाद आइयो सब किछु ओहने छल. पोखैरक महाड़ ओहिना. पूब आ दक्षिण दिस सँ अवस्थित किछु लोकक कलमबाड़ी ओहिना. पोखैरक बीच मे लागल सखुआक खीयाएल जैठ ओहिना. आ ओहि पर रहि रहि केँ बैसेत बौगला ओहिना. पश्चिम आ उत्तरक कोन मे पसरल जलकुम्ही ओहिना. हमरा ओतय बीताएल अपन बचपनक गप्प याद आबए लागल. यैह पोखैर छल जतय क्रिकेट, गुड्डी, कबड्डी आ पिल्लो ड्न्डा इत्यादि खेल खेला के हम पैघ भेल छलहुँ. हमरा याद आबए लागल ओ पुरान दोस्त महीम आ हुनका लोकनिक सँग बीताएल एक एक क्षण: पिल्लो डण्डाक दम पाड़नाय, गुड्डी उड्बैत काल सबहक पिहकारी आ क्रिकेट्क गेंद के पानि मे सँ निकालि के आननाय. आर्थिक उदारीकरण आ ग्लोबलाइजेशनक दौर मिथिला केँ सबसँ बेसी नुकसान केलक. लोक सब रोजी-रोटीक लेल शहर चलि गेल, महाड़ परक दोकान बंद भ गे, पोखैरक उपयोग कम होमय लागल, ओकर पानि दुषित भ गेल, जलकुम्ही पानि केँ क्रमशः छेकने जा रहल छल. आब ओ पोखैर कम आ पटुआ पकबे वाला कोनो गढ़हा बेसी लागय लागल. ई सब देखि हमरा बहुत दुःख होमय लागल.
देखलहुँ जे दुनू कातक कलमबाडीक आमक गाछ सब बुढ़ा गेल छल. भोरक दस बजल होयत. सूर्यक तीव्र रौशनी कलमबाड़ी सँ छनि छनि केँ पोखैरक पानि मे पड़ैत छल, चारु कात एकदम एकांतता आ नीरवता व्याप्त छल. कखनो कखनो पछबा हवा मे आमक पातक टक्कर सँ उत्पन्न भेल आवाज, बिन प्रयोजन प्रकृतिक तिलिस्म रुप प्रस्तुत करैत छल. देखलहुँ जे पूब-दक्षिण कोन वाला महाड पर लागल अनेरूआ केराक गाछक मात्र एकटा पात बिऐन सन डोलैत छल. ओह! तुरंते याद आबि गेल जे बिरोज एहेन तरहक घटनाक बारे मे कहैत छलाह जे ओहि केराक गाछ मे भूत पैसल छै. जीवन विभिन्न रुप मे  एतुका वातावरण मे उपस्थित रहैत छल. एखन पंद्रहो साल नइँ बीतल होयत. मुदा आय वैह पोखैरक महाड़ परती परांत भेल पड़ल छल. मनुखक कोनो आवरजाह नइँ, वातावरण बिल्कूल शाँत आ अवसाद सँ भरल.  
हम क्षुब्ध भेल ठाढ़ छलहुँ. पुरान बात सब एना याद आबए लागल छल जेना लागैत छल जे कोनो पुरान सँगी हमरा, कतओ, कोनो कोन सँ, सोर पाड़ि रहल छथि. नीरवता मे अद्भूत सजीवता व्याप्त छल. पोखैरक महकल हवा मे हमरा जीवनक सँगीत सुना पड़ि रहल छल. हमर भक्क तखने टुटल जखन सुबोध आ बीरोज हमरा ताकैत ताकैत पोखैर दिस आबि हमरा वास्तव मे चीकरे लागल.
ओ दुनू लोकनि हमर बचपनक सँगी छलाह आ परिवारिक आर्थिक स्थितिक कारणेँ ओ दुनू लोकनि मैट्रिकक आगू नइँ पढ़ि सकलाह. मुदा समयांतर में अपन रोजी-रोटीक व्यवस्था नीक सँ केने छलैथ. आब मिथिला मे सेहो सड़क सब बनि गेल छल आ ओ दुनू लोकनि एकर सबसँ बेसी फायदा उठेलन्हि. अपन मेहनतक बुता पर तरकारी आ मोबाइल फोनक व्यवसाय सँ अपन स्थिति बढियाँ केने छलाह. हमरा घरक आर्थिक स्थिति ओहेन खराप नहि छल हम शहर जा केँ बी.एस.सी. आ ओकर बात एम.बी.एक पढाई पढने छलहुँ.
हमर अंतिम इच्छा छल जे कोनो तरहेँ सुगँधा केँ मना लेल जाए. नीँद एखनहुँ धरि गाएब छल. ध्यान बिल्कूल दिन में भेल घटना क्रम में लागल छल. हमर आ सुबोध-बिरोज, तीनोँ लोकनिक आर्थिक-समाजिक स्थिति अलग अलग छल, मुदा विचार एके तरहक. हम तीनु लोकनि बच्चे सँ निर्भीक छलहुँ आ जोखिम वला काज कर सँ डरैत नहि छलहुँ. तीनू लोकनिक एक ठाम एलाक बाद केवल पुरान गप्प सभक होमय लागल. हम तीनू लोकनि एक्के मत में छलहुँ जे आब ओ पुरान समय कहियो नइँ वापस भ सकैत अछि. हमर एम.बी.एक शिक्षा हमरा प्रेरणा दैत छल जे प्रत्येक जगह अवसर ताकल जाए. हम सोचए पर मजबूर छलहुँ कि, जे मिथिला जे पान आ मखानक लेल जानल जाइत छल सँ आई माछ निपत्ता भ गेल छल. किएक माछक हाट मे आँध्रप्रदेशक माछक बोलबाला छल? लोक थर्माकोलक डब्बा मे बर्फ मे राखल आँध्राक माछ सँ काज किएक चलबैत छथि? किएक स्थानीय माछ भेटैत नइँ छल आ यदि भेटतो छल तएतेक महग किएक? हमरा व्यवसायिक दृष्टिएँ एकटा अवसर बुझा रहल छल. एकटा पोखैर मरल पड़ल छल आ गामक लोक आंध्रप्रदेशक माछ खाइत छल.
मोन मे आएल योजना हम सुबोध आ बीरोज केँ बुझाबए लागल छलहुँ. हमर योजना, ओहि पोखैर मे किछु टाका निवेश क के ओकरा जीर्णोपराँत ओहि मे माछ पोसि के बाजार मे माछ बेचैक छल. पोखैरक महाड़ पर तीन चारि टा कटघर बना केँ ओहि मे एकटा चाह-पान, एकटा दबाईक दोकान, आ किछु दैनिक जरूरीक समान बेचबाक योजना सेहो छल. हम अपन योजना चाव सँ सुना रहल छलहुँ आ सुबोध आ बीरोज बच्चा जकाँ बिना कोनो प्रतिरोधक सब गप्प सुनि रहल छलाह. हलाँकि किछुए दिन पहिने हम बैँक सँ कर्जल केँ एकटा फ्लैट बुक करौने छलहुँ. मुदा अपन दरमाहाक आधार पर हमरा बुझल छल जे दस लाख टाका एखनहुँ लोन भेटि सकैत अछि. तेँ पोखैर में निवेश करबाक लेल निर्भीक छलहुँ. योजनाक मुताबिक पुरा पैसा हमरे निवेश केनाय छल. सुबोध आ बीरोजक केवल मेहनतक निवेशक योजना छल. अंत मे माछक बिक्री मौजूदा दोकानेक मार्फत सँ करनाय छलैन. सब किछु जोड़ि जारि के छओ लाख टाकाक निवेशक जरूरी छल. योजनाक मुताबिक पाँच साल धरि सुबोध आ विरोज केँ प्रत्येक माहीना बारह हजारक रकम हमरा वापस करनाय छलैन्ह. हम तीनू लोकनि जोड़ि जाड़ि के निर्णय पर आएल छलहुँ जे कम सँ कम 30 हजारक माछ महीना में जरूर बीका जाएत. विवाह दानक मौका पर किछु बेसीए. पोखैरक जे असली मालिक छलाह ओ पोखैरक भविष्य ल केँ परेशान छलाह. हुनका गढ़हा में परिवर्तन भ गेल एकटा पोखैर केँ की काएल जाए तकर कोनो तरकीब नहि सुझा रहल छलनि. एहेन परिस्थिति में हुनका चारि टा दोकानक किराया भेटबाक योजना छलनि.  
बगल वाला बाड़ीक पुरनका आमक गाछ पर सँ टिहटिहिया जोर सँ आवाज देलक. हमर तँद्रा तखने भँग भेल छल. अन्यथा हम दिनका गतिविधिक सोच में ओझड़ा गेल छलहुँ. अंदाज केलहुँ जे रातिक लगभग तेसर पहर भ गेल छल. हम एखनहुँ धरि सुतल नहि छलहुँ. मोने मोन अपन विवेचनाक उपसँहार ताकए लागलहुँ. योजना मे कतओ असफलता कोनो गुँजाइश नइँ देखा पड़ि रहल छल. फेर सँ सोचए लागलहुँ--  हमर त सब टा जमा काएल टाका फ्लैट बुक करेबा में चलि गेल छल आ उपर सँ पचीस लाख टाकाक बैंक कर्ज. आर्थिक दृष्टि सँ ई एकटा धृष्ट आ साहसिक शुरुआत छल मुदा अपन मातृभूमिक लेल किछु करबाक लेल एक सँतुष्टि अवश्ये छल. आ आर्थिक रुपेँ ई कोनो खराप सौदा नइँ लागि रहल छल, पाँच साल में मूलधन वापस आ उपर सँ ओतबी मुनाफा. समाज मे प्रसिद्धि आ भविष्य मे बेसी आर्थिक लाभक सँभावना. हम उत्साहे ओत-प्रोत भेल छलहुँ.
एक दिस हम अपन साहस, सँतुष्टि आ उत्साहक सामंजस्य मे लागल छलहुँ, मुदा दोसर दिस सुबोध आ बीरोज मे केवल उत्साह छलैन्ह. हुनका लोकनिक निवेश केवल मेहनतक रुप मे छलैन्ह जाहि मे कोनो जोखिम नइँ. आ कम सँ कम नओ-दस हजार टाकाक मासिक जोगार. ई पहिल बेर भेल छल जखन किओ एम.बी.ए. पढल लोक अपन पढाईक उपयोग अपन मिथिलाक गाम मे क रहल छल.
सुबोध आ बीरोजक उत्साहक कोनो ठेकान नइँ रहि गेल छलैन्ह. सबसँ पहिने ओ दुनू लोकनि पोखैरक वास्तविक मालिक लग गेलाह. पैसा-कौड़ीक आभाव मे ओ पोखैरक जीर्णोद्धार करबाक कहियो नइँ सोचि रहल छलाह. मुदा आइ एहेन बात सुनि हुनको उत्साहक सेहो कोनो ठेकान नइँ रहि गेल छलनि. बिना कोनो मेहनत आ निवेशक हुनका चारि पाँच टा दोकानक किरायाक जोगार हुनका लेल बहुत प्रोत्साहक छल.
दिन मे नहुँए नहुँए ई गप्प  गाम मे पसरय लागल. पहिने बात पुरुष सब लग आ ओकर बाद स्त्रीगण लोकनि लग. एम.बी.एक पढाई में हम एहेन तरहक हम कतेको केस-स्टडी केने छलहुँ मुदा ई पुरा योजना गामक लोक लेल अजगुत छल, एहेन तरहक बात पहिने कहियो नइँ भेल छल. सब केँ उत्सुकता छल जे बेसी सँ बेसी जानकारी जुटाएल जाए. तीन तरहक प्रतिक्रिया आएल छल. किछु लोक एहेन छल जे हमर मेधा आ लगन मे विश्वाश करैत छल आ एहि योजना मे सफलता देखि रहल छल, मुदा किछु लोक केँ ई महज एक डीँग लागि रहल छलनि, आ बाँकी लोक मूक दर्शक बनि केवल परिणामक बाट ताकि रहल छल जे एम.बी.ए. पढलाक कोनो लाभ होएत छै आकि नइँ. प्रत्येक मानसिकता वाला लोक मे सामान रुपेँ उत्सुकता छल. खोज-बीन करैत करैत किछु स्त्रीगण आइ एहि बातक जानकारी लेल सुगंधा लग आएल छलीह. मुदा सुगँधा एहि बात सँ बिल्कूल फराक अपन छुट्टी केँ आओर नीक बनेबाक लेल प्रयासरत छलीह. कारपोरेट जगत मे काज करए वाला लोक छुट्टी केँ कोनो धार्मिक अनुष्ठान सँ कम नहि बुझैत छैक. सुगँधा एहि अनुष्ठान मे कोनो खोट नइँ चाहैत छलीह.
(3)
हम बिछाओन पर पड़ल राति भरि कच्छ-मच्छ करिते रहि गेल छलहुँ. राति भरि सुगंधा सँ बात नइँ भेल छल. हमरा इहो बुझल छल जे जाबए धरि सुगंधा मुँह नइँ खोलतीह ताबय धरि कोनो बात बने वाला नइँ. हम चाहैत छलहुँ जे हमरा जतेक मोन मे आबए सुगंधा ओतेक बात-कथा कहि दैथि मुदा ओकर बाद शाँत भ; जाइथ. ओकर बाद निश्चिंत रुपेँ हम अपन योजना केँ अँजाम देब. उम्हर सुगंधा एहि पुरा मामिला पर नीक सँ बहस करय चाहैत छलीह. हुनकर अपेक्षा छलैन्ह जे हम हुनकर चिंता केँ उचित महत्व आ पर्याप्त समय दीअनि. छओ लाख टाकाक बिना कोनो प्रयोजनक कर्ज आ ओहो कोनो समाजिक काज पर हुनका मात्र एकटा बेवकूफी लागैत छलनि. हुनका इहो बुझल छलनि जे हम हाजिर जवाबी व्यक्ति छलहुँ.  तेँ हुनकर मोन छलैन्ह जे एहेन तरकीब अपनाएल जाए जाहि सँ केवल हुनकरे गप्प केँ प्रमुखता भेटनि. हुनका हिसाब सँ हम एखन गलती केने छलहुँ, तेँ एखन हमर कोनो तर्कसँगत आ न्यायसँगत बात बेमानी छल. उम्हर हमहुँ स्थिति सँ निपटबाक लेल फाँड़ि बान्हि केँ तैयार छलहुँ. हमरा अपन एम.बी.ए.क डीग्री आ अपन वाक्पटुता पर पूर्ण विश्वास छल. हम एम.बी.ए. में पढने छलहुँ जे निवेशक केँ कोनो नव उद्यम मे मनोवैज्ञानिक रुपेँ कोना तैयार काएल जाए. भोरे भोर सुगंधा हमरा अपन पत्नी कम आ उद्यम पूँजीवादी (वेंचर कैपिटलिस्ट) बेसी लागैत छलीह. स्त्रीक हठधर्मिता आ पुरुष'क वाक्पटुता लेल मँच तैयार छल. समय छल भोरका चाह पीबाक एकाँत काल जे निर्बाध रुपेँ पछिला आठ साल सँ चलि आबि रहल छल.
जहिना सुगंधा चाह ल केँ एलीह, हम शुरु भ गेलहुँ, “हम राति भरि सोचैत छलहुँ जे अहाँके कोना बुझएल जाए”. हम पोखैर मे कर्जा ल केँ निवेशक फैसला केवल आवेग मे नइँ नेने छी. हमरा पुरा योजना अछि. इ कोनो समाजिक काज लेल कर्ज नइँ अपितु अतिरिक्त कमाईक एकटा जोगाड थीक. कनिए सोचिऔक जे पाँच साल बाद मे हमर कर्जे टा नइँ चुकता भ जाएत मुदा पाँच लाख टाकाक अतिरिक्त कमाई. एकर बाद हम दोसर पोखैर मे निवेश करब.”
“त अहाँक योजना मात्र पाँचे बर्ष धरि नइँ अछि. अहाँ के कनियोँ खयाल नइँ अछि जे घर मे दू टा धिया-पुताक भविष्य की होएत. एखन धरि त एके टा बच्चा स्कूल जा रहल अछि, तैयोँ अहाँक आर्थिक स्थिति खराप रहैत अछि, आ यदि दोसरो बच्चा स्कूलक लेल भ जाएत तखन की होयत?“ एक्के दमे सुगंधा बहुत किछु कहि देने छलीह.
हमहुँ हुनका बीचे मे बात काटैत कहलएन्हि, “से की हमर दरमाहा एतबी रहतैक. हम बहुराष्ट्रीय कम्पनी मे काज करैत छी. एतय साल मे दू बेर दरमाह बढैत अछि. जाबय धरि दोसर बच्चा स्कूलक लेल तैयार होयत ताबय मे हमर दरमाहा एखुनका कम सँ कम डेढ़हा भ जाएत”.
“पानि मे माछ अछि आ नौ कुटीक बखरा. पहिने दरमाहा बढे त दिऔक”. सुगंधा हमरा बीचे मे टोकैत कहल्थिन्ह.
हम दुनू लोकनि मे सँ किओ एखन धरि चाहक एकोटा चुस्की नइँ नेने छलहुँ. हम तर्कक द्वारा अपन बात सिद्ध कर चाहैत छलहुँ, आ सुगंधा अपना लेल किछु एहेन बात जमा क के राखने छलीह जाहि पर कोनो तर्क काज नइँ क सकैत छल. हम ध्यान दिआबैत कहलिअन्हि, “चाह सरा रहल अछि”. फेर दुनू लोकनि चाहक चुस्की लेब लागलहुँ. ओहि क्रम मे हम अपन पुरा योजना हुनका विस्तृत रुपेँ बुझेबाक प्रयास केलहुँ जे आब दुनिया बदैल रहल अछि आ केवल दरमाहा टा सँ किओ नीक जीवन-यापन नइँ क सकैत अछि. हम हुनका बुझेबाक प्रयास केलअन्हि जे समस्या केवल पहिल पोखैर टा मे अछि आ अगिला पंद्रह साल मे पुरा मिथिलाक सुखाएल पड़ल सब टा पोखैर केँ एक छत्रछाया मे आनि केँ कारापोरेटक तरहेँ विकसित करब. माछक व्यापार अभूतपूर्व फायदा देत. हम कहलिअन्हि जे एहेन तरहक निवेश सँ आई सँ पंद्रह साल बाद मे पोखैरक व्यापार सँ ओ हम एतेक पैसा कमाबे लागब जे एखुनका दरमाहा सँ दस गुना बेसी होएत”.
सुगंधा चाह खतम हेबा धरि चुप चाप सुनि रहल छलीह. ओ त पहिने सँ निआरि केँ आएल छलीह जे हमर कोनो तर्क नइँ मानतीह. तेँ हमरा जवाब देलथिन्ह, “ अहाँक पुरा योजना एहि बात पर निर्भर करैत अछि जे सुबोध आ बिरोज मेहनत क केँ तीस हजार रुपैया मासिक कमेताह आ तखने अपना अठारह हजार राखि केँ अहाँ के बारह हजार टाकाक मासिक पठेताह. मानि लिअ, जे ओ लोकनि मेहनत नइँ कर चाहैथ, तखन? मानि लिअ जे बाजार मे माछ नइँ बीक तखन? मानि लिअ दुनू लोकनि अहाँ सँ बेमानी क लैथ तखन?
हम सुबोध आ बिरोज केँ बच्चे सँ देखने छलहुँ हमरा ओहि दुनू लोकनि पर पूर्ण विश्वाश छल. हमरा लागि रहल छल जे सुगंधा केवल अपन बात प्रमाणित करबाक लेल ई सब कहि रहल छथि. जखन हमर तर्क सब फेल होमय लागल आ सुगंधा बुझबाक कनियो प्रयासनइँ क रहल छलीह त हमरो तामस उठि गेल. हम कहलिअन्हि, “अहाँ त बहुत कमे गप्प कहलहुँ. अहाँ त कहबे नइँ केलहुँ जे मानि लिअ गाम मे बाढि आबि जाए आ सब किछु बहि जाए तखन? मानि लिअ भूकम्प आबि जाए आ सब किछु उल्टा पुल्टा भ जाए तखन? आ एतबी टा किएक आ मानि लिअ हमर एक्सिडेंट भ जाए तखन?”.
सुगंधा चुप छलीह. हम आगि केँ छौर सँ पोति देने रहियैक, मुदा ओकर नीचा में सुलगि रहल आगि केँ नइँ रोकि सकल छलहुँ. कनि देर बाद हम फेर सँ कहलिअन्हि, “बात मे ओझरी हमरो लगबे आबैत अछि. देखु हम एम.बी.एक पढाई केने छी. हमरा एहने एहने योजना पर काज क केँ टाका कमेबाक लेल सीखाएल गेल अछि”.
“किएक? महीनाक अंत मे दरमाहाक चेक अहाँ के नइँ लागैत अछि? अहीँ कहैत छी ने जे दू-तीन साल मे अहाँक दरमाहा डेढगुना भ जाएत. तखन अतिरिक्त कमाई के कोन काज?
“अतिरिक्त कमाई के कोन काज मतलब? इमानदारी आ मेहनत सँ कमाएल गेल पैसा मे कोन खरापी? अहाँ मूर्ख सन बात किएक क रहल छी?
सुगंधा केँ पहिने सँ लागैत छलैन्ह जे हम हुनकर बात केँ महत्व नइँ द रहल छलिअन्हि. एहि बेर अपना बारे मे “मूर्ख” शब्द सुनि हुनका तामस लेस देलकन्हि. हुनका सँ रहय नइँ गेलैन्ह. हुनका आँखि मे नोर चलि एलैन्ह. कानिते कानिते ओ एक्के दम मे बाजए लागलीह, “एतय हमर गप्प त किओ सुननिहार नइँ. हम की अपना लेल कोनो गप्प कहि रहल छी. कोनो गहना जेवर माँगि रहल छी आ कि अपन नैहरा लेल किछु माँगि रहल छी. हम चाहैत छी जे घर मे खुशहाली बनल रहय त कोन खराप. तीनीए साल पहिने रिशेसन मे हिनका नौकरी सँ निकालि देल गेल रहैन्ह. तखन तीन-चारि महीना धरि कोन धरानी काज चलल छल. सुबोध आ बिरोज तखन किएक नइँ आएल छलाह? घरक खुशहाली हिनका नीक नइँ लागैत छन्हि त ठीक छै. आब त कोनो फिक्स्डो डीपोजिट नइँ छै जे तोड़बा केँ घरक खर्चा चलत. आ एहि परिस्थिति मे यदि हिनका अगिया बैताल बनि बैँक सँ कर्ज ल केँ पोखैरक उद्धार करनाय छैन्ह त करथु. हमरा कोन?.” मोन मे हुनका भावनाक बिर्रोह उठल छलैन्ह. हुनका शब्द कम पड़ि रहल छलैन्ह. भावना अपन रास्ता अपने बना लैत छै. सुगंधाक भावना नोर बाटे निकलि रहल छल. ओ प्रत्येक बात कहितो काल कानि रहल छलीह आ बात खतम भेलाक बादो.    
फेर कनि काल लेल हम दुनू लोकनि चुप रहलहुँ. सुगंधा नीक सँ बसाएल घर-घृहस्थी केँ अस्त-व्यस्त करय नइँ चाहैत छलीह. पोखैरक जीर्णोद्धार मे निवेश करबा मे रिस्कक आशँका मे किछु सत्य अवश्ये छल. हम ओहि रिस्कक आकलन करबा मे दक्ष छलहुँ. यैह बात सब हमरा एम.बी.ए. मे सीखाएल गेल छल. मुदा सुगंधा ई बात नइँ बुझि सकैत छलीह जे रिस्क कतेक पैघ आछि. रिस्क रहितोँ हमरा कोनो तरहक असफलताक अशँका नइँ छल. तेसर गप्प जे हम अपन बचपन गामे मे बीतौने रही. हमरा गाम सँ अजीब सन अपनत्व आ लगाव छल. अपनत्व आ लगाव रिस्कक सम्भावना केँ झाँपने छल. सुगंधा शहर मे रहि केँ पैघ भेल छलीह. गाम-घरक बात केवल सुनने टा छलीह. गामक जिनगी केँ कहियो जीने नइँ छलीह. तेँ रिस्क फाँड़ बान्हि केँ हुनकर आगू मे ठाढ छल. एकर असर एहेन भेल जे हमरा लागि रहल छल जे सुगंधा हमर गप्प बुझबाक प्रयासे नइँ क रहल छथि. हमर बात सत्य छल आ सुगंधाक अशँका सेहो जाएज छल. मुदा दुनू लोकनिक विचार मे कोनो सामंजस्य नइँ.
स्त्रीक नोर सदिखन ममता, करुणा, आ कि डरे टा मे नइँ बहैत छै, ओ कखनहुँ कखनहुँ आक्रमणकारी सेहो होएत छैक. सुगंधाक नोर आक्रमक छल आ हमर तर्क रक्षात्मक. आक्रमक नोर आ रक्षात्मक तर्क में आक्रमक शक्तिक हावी भ गेल आ जेना सदिखन होएत आएल अछि स्त्रीक नोर एक बेर फेर सँ एकटा विजय केँ पँजीकृत केलक आ हम चुप रहबाक निर्णय ल लेलहुँ, हमरा लेल कोनो दोसरो चारा नहि छल.   
स्थिति केँ समान्य करबाक लेल हम दलान दिस चलि गेलहुँ. असगरे बैसल बहुत किछु सोचय लागलहुँ. पढाई लिखाई केलाक बाद जीवन मे निश्चिँत भेलाक बाद हमर मोन छल जे किछु समाजिक काज काएल जाए जाहि सँ हमरा समाज मे स्थान भेटय. पोखैरक जीर्णोद्धार सँ हमरा समाज मे उच्च स्थाने नइँ भेटए वाला छल अपितु ओहि सँ आर्थिक लाभ सेहो छल. मुदा समाज मे एहेन स्थानकेँ सुगंधा बुझि नइँ सकैत छलीह. मोन मारि केँ हम निर्णय लेलहुँ जे एहि बात केँ छोडि देब. आ दोसर गप्प जे विवाहित जीवन मे लोक केँ किछु ने किछु समझौता कर पड़ैत छै. हमरा लेल यैह सही. हम निर्णय ल लेलहुँ जे एहि योजना केँ छोड़ि पुणे मे किछु आओर काएल जाए. आब मात्र तीने दिनक छुट्टी बचल छल. सुगंधा भयँकर रुपेँ तमसाएल छलीह. हुनका अपन अंतिम निर्णय हम एखन धरि नइँ सुनेने छलहुँ.
हम बचल छुट्टी केँ खराप होमय नइँ देब चाहैत छलहुँ. हम फेर सँ आँगन गेलहुँ. देखलहुँ जे सुगंधा घर मे एखन धरि बैसल कोनो पत्रिकाक पन्ना उलटि-पलटि रहल छलीह. हुनकर आँखि कतहु आओर छलनि आ ध्यान कतहुँ आओर. गाल पर पोछल नोरक चिह्न हमरा एखन धरि देखा पड़ि रहल छल. हम लग मे पहुँचि कहलिअन्हि, “सुनू ! हम निर्णय लेलहुँ जे एहि योजना केँ हम छोड़ि देब. अहाँ सत्ते कहैत छी. होम-लोन लेबाक बाद हमर एहेन आर्थिक स्थिति नइँ अछि जाहि मे कोनो जोखिम लेल जाए. तखन देखु जे बैँकक कर्जा सधा के ओकर बाद किछु सोचब”.
सुगंधा केँ हमर गप्प पर विश्वाश नइँ भ रहल छलैन्ह. अपन पैघ पैघ आँखि सँ हमरा अनवरत देखने जा रहल छलीह, बिना किछु बाजने. हम आओर लग आबिकेँ हुनकर कन्हा पर हाथ राखि कहलिअन्हि, “सत्ते, हम एहि योजना केँ छोड़ि रहल छी.”
नइँ जानि किएक हम देखलहुँ जे सुगंधाक आँखि जे बिना गप्प केने बहुत बात कहि दैत छल, एखन भावनाशुन्य छल. ओ जैह चाहैत छलीह वैह भेल छल, मुदा तैयो हमर बात सुनिकेँ हुनका कोनो खुशी नइँ भेल छलैन्ह, अपितु किछु कालक बाद हम देखलिअन्हि जे सुगंधा मुरझाएल सन लागि रहल छलीह.
(4)
हमरा लग मे आब एकटा समस्या छल जे गामक लोक केँ की कहल जाए आ कोना कहल जाए. बातक सामंजस्य केवल हमरा दूए लोकनि टा मे भेल छल. मुदा सुबोध आ बिरोज एहि गप्पक प्रचार प्रसार पुरे गाम मे क देने छलाह. आब बात पुरुष सब सँ बेसी स्त्रीगण मे पसैर गेल छल. गामक लोक जे हमर पढाई लिखाई सँ प्रभावित छलाह ओ लोकनि किछु बेसीए आशान्वित छलाह. जे लोक मे इर्ष्या द्वेष कनिए बेसीए छल ओ लोकनि आशँकित छलाह. आब पोखैरक योजना खत्म भ गेल छल. हमर विचार छल जे सुबोध आ बिरोज केँ जल्दी-सँ-जल्दी कहि देल जाए ताकि बात आओर बेसी नइँ पसरय. हम विचार केलहुँ जे कहि देल जाए जे बैँक कर्जा देबा सँ मना क देलक. हम सुबोधक घर दिस विदा भेलहुँ. इम्हर स्त्रीगण सब मानू हमरे जेबाक बाट ताकैत छलीह. हम देखलहुँ जे हुनका लोकनिक एकटा खेप हमर आँगन दिस चलि गेलीह.
बिरोज सुबोधक घरे पर छलाह. हमरा देखते बजलाह, “ मीता हम अहीँ के घर दिस आबि रहल छलहुँ. देखू ने अहाँक योजना पुरे गाम मे तहलका मचौने अछि. इक्का दुक्का लोक केँ छोडि सब किओ मदद करबाक लेल तैयार अछि”.
हम बात केँ बेसी घसए नइँ चाहैत छलहुँ. हम तुरंते कहलिअन्हि, “से त हम बुझते रही जे ई योजना सबकेँ नीक लागतैन्ह. मुदा कनिएँ काल पहिने हम पुणे मे बैँकक मैनेजर केँ फोन केलिअन्हि. ओ कहैत छलाह जे हम कनिए दिन पहिने होम कर्ज नेने छलहुँ, तेँ एखन तीन-चारि वर्ष धरि कोनो कर्ज नइँ भेट सकैत अछि. भाय! हम लाज सँ गड़ल जा रहल छी. किछु नइँ फुरा रहल अछि जे हम की करी. हमरा उपर मे पहिने सँ पचीस लाखक कर्जा अछि. हम एहि योजना मे आब भाग नइँ ल सकब”.
सब किओ सटकदम भ गेल. हम एहेन बात कहि देने छलिअन्हि जकर कोनो काट नइँ छल. हुनका लोकनिक लेल कोनो जवाब नइँ छलन्हि. बिरोज नीचा मे बैसल छलाह. उठि केँ हमरा कहलथिन्ह, “भाय आब त हम ई अपना तीनूँ सँगीक प्रतिष्ठाक गप्प भ गेल अछि. कोनो प्रयास करिऔक ने. हमहुँ लोकनि प्रयास करब जैह जुडत वैह ल केँ मदद करब. किछु कर्ज हमहुँ ल सकैत छी”.
हम जोर दैत कहलिअन्हि, “नइँ मीता, आब हमरा बुतय सम्भव नइँ अछि. हम माफी माँगय चाहैत छी”. एकर बाद हम अपन आँगन दिस विदा भ गेलहुँ. ओ दुनू लोकनि हमरा उपर मे दवाब बनेबाक प्रयस नइँ केल्थिन्ह.
हम अपन अँगना आबि गेल छलहुँ. हमरा आँगन मे एखन धरि स्त्रीगणक धमा-चौकरी मचल छल. घर मे हमरा आबैत देखि ओ सब लोकनि बारी बारी सँ ओतय सँ पड़ाय लागलीह. किछु कालक बाद हमरा सुगंधा कहलैथ जे गामक किछु लोक कोना पोखैरक परियोजनाक मजाक उड़बैत छल जे एहेन योजना केवल ख्याली पोलाव थीक आ वास्तविकता मे एहेन बड़का समाजिक काज केनाय शैलेषक बुताक बात नइँ. एकटा बात छल जे सब किओ एकरा समाजिक काजक रुप मे लैत छल. किओ एहि बात पर ध्यान नइँ दैत छल जे एहि मे आर्थिक लाभक नाम पर हमर स्वार्थ से नुकएल छल. हम सुगंधा केँ कहि देलिअन्हि, “हम एखने सुबोध आ बिरोजसँ भेँट क के आबि रहल छी. हम हुनका लोकनि केँ अपन स्थिति सँ अवगत करा देलिअन्हि. एखन अपन पल्ला छोड़ा लेलहुँ आ दुए दिन मे अपना लोकनि  पुणे चलि जाएब. तखन हिनका लोकनिक हास परिहास सुनबाक मौके नइँ भेटत”.
हमर बात सुनि सुगंधा फेर सँ चुप भ गेलीह. स्त्रिगणक बात सँ, हम देखलहुँ, जे सुगँधा पहिने सँ आहत छलीह. हुनका एहि बातक आनि लागल छलन्हि हुनकर पतिक एतबु हैसियत नइँ अछि जे छओ लाख टाका खर्च क सकैछ. चारु दिस सँ ओ सुनि केँ पाकि गेल छलीह. आ दोसर गप्प जे पुरा मामिला सुगंधाक हस्तक्षेपे सँ खराप भेल छल तेँ ओ आब हमरो सहयोगक अपेक्षा नइँ क सकैत छलीह. हमर स्वाभिमान से जागि गेल छल. गप्प केँ अनठेबे मे भलाई छल.
हम त सबसँ पल्ला झाड़ि नेने छलहुँ. मुदा सुबोध आ बिरोज एखन धरि किछु निर्णय नइँ नेने छलाह. ई योजना त हुनको सभक प्रतिष्ठाक बात छल. हमरा त गाम मे नइँ रहबाक छल मुदा ओ दुनू लोकनि केँ ते प्रत्येक प्रतिहास केँ अपने झेलनाय छलैन्ह. आब ई गप्प हुनका लोकनिक लेल आनिक बात भ गेल छल. दुनू लोकनि विचार विमर्श केलाह जे योजनाक कार्यान्व्यन अवश्ये होएत, अपन वर्तमान बिजिनेस मे सँ किछु पैसा निकालि केँ ओ ओहि मे लगेताह. किछु पैसा महाजन सँ कर्ज लेताह आ बाँकी किछु चंदा लगा के जमा करताह. ओ दुनू लोकनि अपन अपन पुरान दोस्त महीम लग गेलाह. सबकेँ दुनू लोकनिक कर्मठता पर विश्वाश छलैन्ह. टाका देबाक लेल लोक सब तैयार होएत गेल.
फेर सँ साँझ भ गेल आ एकटा बहुते गतिविधि वाला दिन बीति गेल. हमहुँ सुति गेलहुँ. आब हमरा गामक चिंता नइँ अपितु पुणेक चिंता भ रहल छल. राति भरि अधकचाएले नींद आएल. मुदा हम देखैत रहलहुँ जे हमर बगल मे सुतल सुगँधा राति भरि कच्छ-मच्छ करैत रहलीह. हम अपना आप केँ बुझा सुझा केँ लगभग निश्चिँत छलहुँ, मुदा भोरे भोर सुगंधा अपन सब तामस हमरा उपर मे उतारि केँ एखन राति मे असहज भ रहल छलीह. हमर चुप्पी आ बिना शर्त हारि मानि गेनाय हुनकर मोन केँ उद्विग्न केने रहैन्ह. अपन तनाव केँ दूर करबाक बदला मे ओ तनावक बीच मे फँसि गेल छलीह. कोनो तनाव भेला पर अक्सरहाँ हमरा उपर झगड़ा क केँ ओ अपन मोन शाँत करैत छलीह. मुदा आई हुनका इहो सम्भव नइँ छलैन्ह. ओ कानियोँ नइँ सकैत छलीह किएक त कानिए केँ ओ एहेन स्थिति मे आएल छलीह. ओ हमरा सँ प्रेम सँ कोनो सलाहो नइँ माँगि सकैत छलीह किएक त हम वैह काज केने छलहुँ जे ओ चाहैत छलीह. पति-पत्निक सँबँध अलगे तरहक होएत अछि. एहि मे हारि माने जीत जाएब, आ जीतब मतलब हारि जाएब. सुगँधा जीति केँ हारल छलीह आ हम हारि केँ जीतल छलहुँ.  
जखन दु टा हृदयक अंतर्द्वंद्व अपन चरमावस्था पर छल तखन दोसर दिस गाम मे हमर आशाक विपरीत किछु अलगे बात सब होएत छल. सुबोध आ बिरोजक प्रयास सार्थक भ रहल छल. पैसाक इंतजाम भ रहल छल. आ ओतैये गामक किछु इर्ष्यालु लोक सब जे अवसरक बाट ताकैत छलाह ओ हमर फैसलाक मजाक उड़ा रहल छलाह. सुबोध आ बिरोजक प्रयास महत्वहीन भ गेल छल. हमर ओहि योजना सँ हाथ निकालि लेनाय आब मुख्य मुद्दा रहि गेल छल.   
अगिला दिन हम अपना आप केँ एहि पुरा मुद्दा सँ अलग क नेने छलहुँ. बगल वाला बाडीक सुपाडी गाछक नीचा मे बैसि दिन भरि एकटा उपन्यास पढैत रहलहुँ. दुइए दिन बाद हमरा लोकनि केँ गाम सँ जेबाक छल, सैह बहाना बना केँ स्त्रीगणक कतेको खेप आँगन आएल छल. की की गप्प सब भेल होएत से हम जानैत छलहुँ. मुदा हम अनठेने बैसल छलहुँ. हम चाहैत रही जे सुगंधा गामक समाजक नीक बेजाए बुझैथ. गाम मे इर्ष्या द्वेष बेसी अबश्ये रहैत छै मुदा तैयो सामाजिक सद्भावना मे कोनो कमी नइँ. पुणे मे कोनो स्थिति खराप भेला पर किओ ककरो देखए वाला नइँ. गाम मे परिस्थिति विपरीत भेला पर किओ ने किओ मददि लेल सदिखन तैयार रहैत छै. गरीबी, अशिक्षा, इर्ष्या, द्वेषक बीच मे गाम घर मे समाजिकता शहर सँ एखनो बेसी रहैत छै. शहर मे आलोचना करय वाला कम रहैत छैक मुदा मददि करय वाला लगभग किओ नइँ. मुदा गाम मे जतबी लोक आलोचना करय वाला रहैत छै, ओतबी लोक मददि करय वाला सेहो. मिला-जुला केँ मानवता के बेसी मोल गामे घर मे छैक. हम चाहैत छलहुँ जे सुगंधा ई मोल केँ बुझि सकैथ.तेँ स्त्रीगणक बीच मे हुनका हम छोडि केँ पोखैर दिस घुमए चलि गेलहुँ.
सुगंधा हमरा उपर मे तथाकथित जीत हासिल क केँ जीतक अनुभव कनियोँ कालक लेल नइँ केने रहथिन्ह. अपितु, ओ हारल अनुभव क रहल छलीह. लाजे हमरा लग आबि नइँ रहल छलीह. स्त्रीगणक गप्पसब हुनकर स्थिति के आओर बेसी खराप क रहल छलैन्ह. अगिला दिन साँझ के पाँच बजे हमर ट्रेन छल. तीन बजे दुपहरिया मे हमरा लोकनि केँ स्टेशन लेल विदा भेनाय छल. सुबोध आ बिरोज अपन अपन काज मे लागल छल. हम असगरे पोखैरक महाड पर ठाढ़ छलहुँ. पोखैरक वैह दृश्य छल: डरावना, एकाकी आ अवसाद सँ भरल. प्रकृतिक एत्तेक निकटता पुणे मे हमरा पैसो खर्च केलाक बाद नइँ भेटय वाला छल, मुदा नइँ जानि किएक प्रकृतिक मनोरमता हमरा आइ नइँ नीक लागैत छल.
हम अपन आँगन आबि गेलहुँ. तेखलहुँ जे स्त्रीगण सब ओतय सँ चलि गेल छलीह. ओ लोकनि आइ सुगंधा केँ सुबोध आ बिरोजक योजना बतौने छलीह. ओ बतौने छलीह जे कोना कोना केँ ओ लोकनि पैसाक इंतजाम क रहल छलाह. पैसाक इंतजाम हुनका दुनू लोकनिक लेल एक सफलता छल, मुदा स्त्रीगण लेल ओ सुबोध आ बिरोजक एकटा दुस्साहस छल. हुनका हिसाबेँ एहि योजनाक सफलता हमरा भेटबाक चाही. हम देखलहुँ जे सुगँधा आब सत्ते पछता रहल छलीह. आब हुनका भ रहल छलैन्ह जे हम कोनो तरहेँ अपन फैसला वापस क ली. ओ हमरा सँ बात करय चाहैत छलीह. हम हुनका उपर मे ध्यान नइँ दैत छलिअन्हि. किछुए काल मे सुगंधा हमरा लग मे एक कप चाह ल के आएल छलीह. हमरा बुझल छल जे जखन सुगंधा केँ हमरा सँ किछु खास अपेक्षा रहैत रहैन्ह त अनेरोँ एक कप चाह ल के ओ आबि जाएत छलीह. ओ एहेन स्थिति होएत छल जखन ओ हमर प्रत्येक बातक समर्थनक मुड मे रहैत छलीह. ओ चाहक कप राखि केँ हमरा लग मे बैसि गेलीह. हमर दाहिना गाल पर बच्चा जेकाँ हाथ फेरैत कहय लागलीह, “आब किछु नइँ भ सकैत अछि?
हम- “मतलब?“
“अहाँ अपन फैसला नइँ बदैल सकैत छी?“
“कोन फैसला? हमरा तँग नइँ करु, अपन बात सीधे सीधे कहु?” हम जोर द के कहलिअन्हि.
सुगंधा डरल छलीह. ओ एक्के क्षण मे कहलीह, “हमरा माफ क दिअ. आब हमरो मोन क रहल अछि जे अहाँ बैँक सँ कर्ज ल केँ पोखैरक जीर्णोद्धार करु. सब किओ यैह कहैत छलीह जे योजना अहीँ के छल मुदा ओकर फायदा किओ आने उठाएत. आर्थिक लाभक कोनो बाते नइँ अहाँ के आब ओहि कोनो नामोँ टा नइँ बचत”.
हमर मोन तामसेँ घोर भ गेल छल. शुरु मे त हमर बात ओ बुझि नइँ रहल छलीह. आब हमरे बात हमरा बुझा रहल छलीह. मुदा हमरा इहो बुझल छल जे एहि परिस्थितिमे यदि हम हुनका जोर सँ दबाड़ि देबैन्ह त ओ किछु नइँ करतीह, खाना पीना छोडि केँ कानैत रहतीह. तेँ लाल-लाल आँखि सँ मात्र हुनका गुरैड़ केँ देख लागलिअन्हि. ओ ओतय सँ चलि गेलीह. हम दिनक खाना खा केँ बिछओन पर चलि एलहुँ. नइँ जानि कोना हमर आँखि लागि गेल छल. जखन हमर नीँन टुटल त देखलहुँ जे साँझ भ गेल अछि.
हम दिन मे फोँफ काटैत सुतल छलहुँ. मुदा सुगँधाक दिमाग सक्रिय छल. ओ अपने टा नइँ हारल अनुभव करैत छलीह. हुनका होएत छलैन्ह जे हुनके कारण हमहुँ परास्त भेल छलहुँ. दू लोकक लड़ाई झगड़ा मे कम सँ कम एक लोक जरुर जीतैत छैक. हुनका होएत छलैन्ह जे ई एहेन झगडा छल जाहि मे दुनू लोकनिक हारि भेल छल आ एहि बातक लेल ओ अपने आप केँ दोषी मानैत छलीह.
सुगँधा अपराधबोध सँ ग्रसित छलीह. हम इम्हर सुतल छलहुँ आ ओ एहि नुकसानक भरपाइक तरकीब ताकैत छलीह. पुणे मे घरक खर्चा ओ अपने चलबैत छथि. हमर काज छल जे दरमाहा भेटलापर हम दस हजार टाका हुनका हाथ मे ददेनाय. ओहि मे ओ अनाज-पानि, मर-मसाला, दूध-घी सब किछु कीनैत छलीह. आ ओहि मे सँ जे किछु पाँच सय हजार बचि जाएत छल ओ बैँक मे जमा क दैत छलीह. पछिला आठ सालक वैवाहिक जीवन मे ओ अपन एकाउंट मे सवा-लाख टाका सँ बेसी जमा क नेने छलीह. हुनका मोन छलैन्ह जे ई पैसा भयँकर आर्थिक सँकट मे खर्च काएल जाएत. दस हजार टाका मे सँ किचेनक खर्चा निकालि, एहि महग जमाना किओ पैसो बचा सकैत अछि, तकर हमरा अनुमान नइँ छल, तेँ हम ई कहियो खोज बीन नइँ करैत छलहुँ जे ओहि एकाऊंट मे कोनो पैसो अछि कि नइँ. हमरा सुतल देख सुबोध केँ ओ फोन क केँ बजा नेने छलीह. हुनका कहने छलीह जे हमर मोन नीक नइँ अछि तेँ हमरा डिस्टर्ब नइँ करबाक लेल. ओ सब तरहक गप्प केने छलीह आ सवा लाख टाकाक चेक काटि केँ सुबोध केँ दैत कहने छलीह, “अहाँक दोस्त पुरा टाकाक इंतजाम नइँ क सकलाह, इ सवा लाख टाका चंदा हिनका दिस सँ द रहल छी”.
हम तखने सुति के उठल छलहुँ जखन सूर्यास्त भ गेल छल. अगिला दिन हमर पुणेक लेल ट्रेन छल. हम दू लोकनि आ दू टा धिया-पूता, प्रत्येक लोकक समान सब. दू दिनक ट्रेनक सफर कोनो छोट मोट काज नइँ छल. मोने मोन अपना केँ तैयार करैत छलहुँ. सुबोध केँ बजा केँ, सुगंधा एतेक बड़का काज केने छलीह तकर हमरा कोनो अँदेशा नहि छल. पोखैरक मामिला आब हमरा मोन सँ निकलि गेल छलए.  
हम सुगंधा केँ बजाक अगिला दिनक लेल प्रत्येक तैयारीक निर्देश द देने रही. हमर दामपत्य जीवनक सबसँ विशेष बात ई अछि जे हमरा दुनू लोकनि मे कोनो बात बिन बहसक तय नहि भ पावैत छल. एकटा बुजूर्ग हमरा कहने छलैथ, “बहस करनाय हरदम नीक थीक, प्रत्येक बहसक अंत में दुनू लोकनिक इच्छाक सम्मान होएत छैक. किओ ककरो उपर में हावी नहि होएत छैक. दाम्पत्य जीवन मे एहि सँ पैघ गप्प आओर की भ सकैत अछि”. एखन हम हुनका एत्तेक निर्देश देने रहिअनि मुदा कोनो बहस नइँ केने छलीह. पोखैरक मामिला पहिने खतम भ गेल छल तेँ अपन पराजय क्रमशः बिसैर गेल छलहुँ. सुगंधाक बहसक अनुपस्थिति कनिएँ मनिएँ हमरा जीतक आभास दिआबैत छल.
भोर मे जखन सुति केँ उठलहुँ त सब किछु सामान्य छल. सुगंधाक चंदाक अनुभूति हमरा कोनो तरहेँ नहि भ रहल छल. नहिएँ सुगंधा हमरा कोनो तरहक सँदेश द रहल छलीह. हुनकर प्रत्येक मानैत गप्प सँ हमर विजयोल्लास बढ़ि रहल छल. विजयोल्लास कखनहुँ कखनहुँ अहँकार केँ निमत्रण दैत छैक. सुगँधा केँ हम पहिने सँ दोषी मानैत छलहुँ आब ओ हमरा तुच्छ लागैत छलीह. भोरका चाह ल केँ ओ अपने आएल छलीह. पुणे मे जा केँ की सब करबाक छलनि से लिस्ट गना रहल छलीह. हम हुनकर हँ में हँ मिला रहल छलहुँ. एखन हमरा सुगंधे टा नहि हुनकर प्रत्येक बात सेहो तुच्छ लागैत छल. हमरा लेल भोरक चाह बहुत महत्व राखैत अछि. ओना त सुगंधाक चाह सदिखन नीक होएत छै. एतेक नीक जे हमरा दोसर ठाम चाह पीबा में अशौकर्य होएत अछि. आ ओहु में एखुनका चाह त अभूतपूर्व छल. सुगंधाक प्रत्येक नीक गप्प हमर रग रग में बैसि गेल छल. हुनकर नीक गप्प सब हमर जीवनक अभिन्न अंग बनि गेल छल. हमर चेतना हुनकर खरापे गप्प टा केँ पकड़ैत छल.  आब त एहेन भ गेल छलए जे हुनकर नीक गप्प केँ हम अनुभवो नहि क पाबैत छलहुँ. हमर अवचेतन मस्तिष्क हुनकर प्रत्येक नीक काज केँ अधिकार स्वरुप ग्रहण करैत छल एहिना जेना प्रत्येक पल मे हम जीबाक लेल साँस लैत छलहुँ आ हमर मस्तिष्क हमर श्वाँश केँ अनुभव नहि करैत छल. मस्तिष्क केँ बुझि मे नहि आबैत छलैक कि यदि साँस बंद भेलाक की असर भ सकैछ. भोरका एकटा “नइँ नीक चाह” सँ पुरा दिन खराप भ सकैत अछि, से हमर मस्तिष्क अनुभव नहि क रहल छल. हमर हँ में हँ मिलेनाय तखने खत्म भेल जखन पाछु सँ सुबोधक आवाज आएल, “मीता यौ?“
हम पाछु घुमि केँ देखलहुँ जे सुबोध, बिरोजक कन्हा पर हाथ राखने हमरा उपर मे मुस्का रहल छलाह. सुगंधा हमरा लग सँ उठि, कनिएँ दूर में ठाढ़ भ गेलीह. सुबोध आबिते कहलाह, “मित्ता आब अहाँक आगूक निर्देश चाही. अहाँक सवा लाखक बदौलत आब साढे छओ लाखक इंतजाम भ गेल अछि”.
“अहाँक सवा लाख” सुनि हमरा किछु बुझि मे नहि आएल. किछु कालक लेल भेल ओ दुनू लोकनि हमर स्थितिक मजाक उड़ा रहल अछि. हम विभिन्न तरहक आशँका मे दुनू लोकनि दिस बारी बारी सँ देखए लागलहुँ. दुनू लोकनि केँ ई नइँ बुझल छलैन जे ओ टाका सुगंधा हमरा सँ नुका केँ देने छलीह. ओ लोकनि हमर अचरजता पर प्रश्नवाचक भाव बना रहल छलाह. हमर ध्यान कात में ठाढ़ सुगंधा दिस गेल. ओ अपन आँखि नीचा क लेलीह. फेर हमरा दिस देखि बाजलीह, “हम काल्हि हिनका लोकनि केँ सवा लाखक चेक काटि के द देलिअन्हि”.
आब हमर मुँह पर प्रश्नवाचक भाव चढ़ल छल. सुगंधा फेर सँ बाजलीह, “मासिक खर्चा सँ जे किछु पाँच सय हजार टाका बचैत अछि ओ हम अपन अकाउंट में जमा क दैत छलहुँ. आब ओ सवा लाख टाका भ गेल अछि. हम ओकरा जोगा केँ राखने रही जे कोनो आर्थिक सँकट एला पर अहाँ के द दैतहुँ. हमरा एहि सँ पैघ मौका आब नहि बुझि में आबि रहल अछि. अगिला पाँच साल मे सुबोधक आ बिरोजक मेहनति सँ ई दुगूना भ जाएत”.
एत्तेक बात सुनि हमर मोन एक बेर मे पचा नहि सकल. जे सुनलहुँ ओहि पर विश्वाश नहि भ रहल छल. हमरा आगू दुनियाँ घुमए लागल. अपन चेतना केँ हम भरिसक प्रयास करैत रहलहुँ जे ओ काबु में रहए. मुदा भावनाक झोँक हमर विश्वाश केँ हिला देने रहए. हमरा बुझि मे नहि आबैत छल जे हम कोना प्रतिक्रिया दी आ कोन प्रतिक्रिया दी. कनि काल लेल हम भावना शुन्य भ गेल छलहुँ. सुगंधा हतप्रभ भेल ठाढ़ छलीह. अपन छिड़िआएल विश्वाश केँ समेटए लागलहुँ. सुगंधा सवा लाख टाका बचा केँ राखने छलीह. आ हमर इज्जत राखबाक लेल ओ खर्च क देलीह. हम हारि गेल छलहुँ. मुदा आय हमरा अपने पराजय नीक लागैत छल.

1 comment:

prakash jha said...

भाई, कथा लेल बधाई । सुन्दर कथा अछि । हम कथा के विशेष जानकारी नहि रखैत छी, मुदा जे किछु जानकारी अछि ताहि हिसाबे कथा "हम हारि गेल छलहुँ" के एक बेर फेर सम्पादन के आवश्यकता अछि । कथ्य कहबा मे कनी बेसी शब्दक प्रयोग भेल अछि । भाई एक बेर फेर अहाँ के बधाई । जे अहाँ रचना लेल एत्तेक समय निकालि लैत छी ।