tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post1388975405432488390..comments2008-01-03T20:53:45.887+05:30Comments on कतेक रास बात: राजीव लालजी के अखबारक चोरी आ बदलैत समाजिक परिवेश (...कुन्दन कुमार मल्लिकhttp://www.blogger.com/profile/03699865603391260097noreply@blogger.comBlogger3125tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-69291493048481431212008-01-03T20:53:00.000+05:302008-01-03T20:53:00.000+05:30राजीवजी,अपन पत्र'क सन्दर्भ में अहाँ'क जवाब पढैत दु...राजीवजी,<BR/>अपन पत्र'क सन्दर्भ में अहाँ'क जवाब पढैत दुष्यंत कुमार'क एकटा शेर मोन परि गेल,<BR/><BR/>जिन पत्ते पर हमने तकिये रखे,<BR/>वही पत्ते हवा देने लगे!<BR/><BR/>लागैत अछि जे अपने'क हमर पत्र पर किछु विशेष ध्यान नहिं देलियैक। हमर पत्र'क उद्देश्य अहाँक रचना पर आलोचना करय सs बेसी किछु विशेष मुद्दा पर अपनेक ध्यान आकृष्ट करनाय छल। ई बात हम अपन पत्र में पहिने स्पष्ट कय देने छलहुँ। यदि अहाँ फेर सs एहि पत्र के पढि त उम्मीद अछि जे अहाँ'क बहुत रास प्रश्नक जवाब भेट जायत। हमर ई उद्देश्य कथमपि नहिं छल जे हम ओकर बचाव करी। अपन पत्र में हम एहि बात के उल्लेख कयने छी जे एखन मानव एतेक कमजोर नहिं भेल जे अपन जीवन-यापन'क लेल ओकरा एहि तरह'क रास्ता अपनाबय पड्त।<BR/><BR/>पत्र'क मूल उद्देश्य छल अहाँक अखबार'क चोरी के बहाने बदलैत मानवीय मूल्य आ समाजिक परिवेश पर किछु आत्म-मंथन कयल जाय। एहि सन्दर्भ में किछु खास विषय पर अपने'क ध्यान आकृष्ट करय के प्रयास कयने छलहुँ।<BR/><BR/>मुदा लागैत अछि जे हमर ई प्रयास फलीभूत नहिं भेल। अनुरोध अछि जे एक बेर फेर सs नव दृष्टि में एहि रचना पर ध्यान देल जाय।<BR/><BR/>अपनेक-<BR/>कुन्दन कुमार मल्लिक<BR/>बंगलोर (भारत)<BR/>सम्पर्क- +91-9740166527कुन्दन कुमार मल्लिक, जय मिथिला, जय मैथिली!http://www.blogger.com/profile/03699865603391260097noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-82976038634062099532008-01-02T17:38:00.000+05:302008-01-02T17:38:00.000+05:30कुन्दन जी,अहाँ जे अपना के नवसिखुआ कहि के बचाव करय ...कुन्दन जी,<BR/>अहाँ जे अपना के नवसिखुआ कहि के बचाव करय लेल चाहैत छी से हमरा कतओ से उचित नहि बुझा रहल अछि। हमरा कोनो प्रमाण नहि भेट रहल अछि जे अहाँ के नवसिखुआ कहि सकी। अहाँ मीनूजी केर रचना में टिप्पणी कयलहुँ जे कविता में मात्राक गणना बहुत जरूरी। जे मनुक्ख एहि बारीकी के बुझैत होय ओकरा तऽ नवसिखुआ कहनाय तऽ उचित नहि छैक। <BR/><BR/>आब आबैत छी अहाँ के समालोचना पर...<BR/><BR/>पहिने धन्यवाद जे अहाँ लेखन के एहि विधा के मैथिली के लेल प्रयोग में आनि रहल छी। ओना तऽ ई हमेशा से कहल जायत अछि जे कोनो चीजक निर्माण हमेशा कठिन आ नीक से नीक वस्तु में भांगठि तकनाय बहुत आसान थीक, लेकिन हम एहि ठाम ई कहय लेल चाहब जे हमरा सभ के आत्मचिंतन के लेल ई बहुत अनिवार्य जे हम सभ आलोचना-समालोचना के विधा के सम्मान दी। ई निश्चित रूपेन मैथिली के सम्मानजनक मानक तक पहुँचाबय के प्रयास करत।<BR/><BR/>जहिना अहाँ के आलोचना एक विधा अछि ओतय व्यंग्य सेहो एक विधा आ ओकरा हमेशा गंभीरता से लेबय के जरूरत नहि। किएक तऽ बहुतो गोटा एहन छैथ जिनका पूर्ण हास्य से मनोरंजन होयत छैक तऽ किछु छैथ जिनका गंभीर लेखन पढ़य के हिसक। हमर <A HREF="http://www.vidyapati.org/2007/08/blog-post.html" REL="nofollow">अखबारक चोरी</A> एकटा हास्य संस्मरण छल जाहि में हम खुद फँसि गेल छलहुँ जे कोना एकर अंत करी। हमर अंतर्मन में जे बात छल से लिखी आ कि जे दृष्टिगोचर भेल से। दुविधा से उबरैत हम एहि बात के लिखने छी जे हम ओ कथित चोर (जे कि चोर नहि परिस्थिति के मारल अछि अहाँ के परिप्रेक्ष्य में) के डाँटैत भगेलिएक। हमरा ओकर भगाबय के एकमात्र कारण जे हमरा ओकर दोष कम आ ओकर परिस्थितिवश जनित लोभ बेसी बुझायल। जौं हम ओकरा मारि के कहानी के अंत कयने रहितिएक तऽ शायद अहाँ के दिमाग के कहानी के दोसर पक्ष के उजागर करय के विचारो नहि अबितैक।<BR/><BR/>ओना, हमरा ई अफसोस रहत जे हम अहाँक अनुसार एकटा नीक रचना लिखैत लिखैत चूकि गेलिएक। आर एहि बात से हम प्रसन्न जे अहाँ आब हमर सभक बीच छी हमरा सभ के महान बनाबय के लेल।<BR/><BR/><B>सुस्वागतम कुन्दन जी</B>, अपन कटाक्ष हमेशा प्रकाशित कयल करब, जे हमर सभक लेखनी के धार बनल रहय।Rajeev Ranjan Lallhttp://www.blogger.com/profile/18354335177402486449noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-21005055877616569072008-01-02T09:50:00.000+05:302008-01-02T09:50:00.000+05:30कुन्दन जी;प्रयास'क लेल धन्यवाद. जे सपना हमरा लोकनि...कुन्दन जी;<BR/><BR/>प्रयास'क लेल धन्यवाद. जे सपना हमरा लोकनि २००४ मे देखलहुँ ओ आब पुरा होइत मालूम भ' रहल अछि. हमरा लोकनिक <A HREF="http://www.vidyapati.org/2005/09/blog-post.html" REL="nofollow"> पहिल रचना अपने एतय </A> देखि सकैत छी. सम्भवत: इन्टरनेट पर मैथिली भाषा'क पहिल रचना थीक. जहिया सँ राजीव जी सँ परिचय भेल एहि मे चारि चाँद लागि गेल अछि.<BR/><BR/>आब उचित समय आबि गेल अछि जखन अपना सब मिलि इन्टरनेट पर मैथिली भाषा'क पहिल पत्रिका शुरु करी. अपनेक डा. पद्मनाभ मिश्रपद्मनाभ मिश्रhttp://www.blogger.com/profile/00743001936020943683noreply@blogger.com