tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post3838110103850496109..comments2008-04-26T13:04:25.521+05:30Comments on कतेक रास बात: अतुल्य-प्रकाश उर्फ बब्लू (एक कहानी)आदि यायावरnoreply@blogger.comBlogger6125tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-89903943242646511742008-04-26T13:04:00.000+05:302008-04-26T13:04:00.000+05:30Sir,kahani ta roiyan thadh karai wala chhal,muda s...Sir,<BR/><BR/>kahani ta roiyan thadh karai wala chhal,muda sikayat karait chhi je hamra sab ke kichhu chans kona bhet taik ahi me bhag laike. Sirf devnagri verson ke abhav me hum ahan sab se sab din dure rahbai ki.Rajeshnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-44855762006588788182008-01-18T10:55:00.000+05:302008-01-18T10:55:00.000+05:30एक बेर जल्दीबाजी मे फ्रूफ रीडीँग केलहुँ. बेसिक गलत...एक बेर जल्दीबाजी मे फ्रूफ रीडीँग केलहुँ. बेसिक गलती केँ दूर केलहुँ. मुदा एक बेर प्रूफ रीडीँग फेर करय पड़त.पद्मनाभ मिश्रhttp://www.blogger.com/profile/00743001936020943683noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-10371730202594782022008-01-17T16:04:00.000+05:302008-01-17T16:04:00.000+05:30बब्लू के अतुल्य प्रकाश आ अतुल्य प्रकाश के बब्लू बन...बब्लू के अतुल्य प्रकाश आ अतुल्य प्रकाश के बब्लू बनैत देख नीक लागल। बुझायल जेना पात्र में हमहुँ कतओ ना कतओ छी आ हमर भविष्य के हम एहि कहानी में जीवंत देखि रहल छी। बहुत बढ़ियाँ।<BR/><BR/>कहानी जखन आधा खतम भेल छल तखन अहाँ पर मोन बहुत कुपित भेल छल जे अहाँ मैथिल कनियाँ के बखान एना क' अति करि रहल छी। लेकिन कहानी के अंत हमर सभटा शंका के अंत कयलक। बहुत नीक।<BR/><BR/>किछु लाइन जे हमरा खास बुझायल ओ छल:<BR/><B>हुनका आगु में शायद कम्प्यूटर इन्जीनीयरिंग के डिग्री शायद अंग्रेजीक सामना में मुरझा जायत छल।</B><BR/><BR/>आ<BR/><BR/><B>आ हुनकर कनियाँ बरसातिक दिन में अपने पति के बाय-बाय कहि ऑफिस जा चुकल छलीह। </B><BR/><BR/>कहानी बहुत भावपूर्ण छल आ एहि में हमरा बुझायल नहि जे कोना हम वास्तविक जिंदगी से कहानी के प्लॉट तक पहुँच गेल रही आ ओतहि घटना के घटैत देखैत रही। कहानी के जीवंतता के कारण कहानी खतम भेला पर अचानके बोध होयत छैक जे ई वास्तविक घटना नहि कहानी छल। नीक प्रस्तुति सरकार। एहिना जे भेटैत रहय त' महो महो भ' जेतैक। अहाँ से बहुत रास अपेक्षा आ ओकरा बरकरार राखनाय अहाँ के दयित्व अछि।<BR/><BR/><B>@कुन्दन जी: </B>अहाँ के बड्ड धन्यवाद जे प्रूफ के त्रुटि के प्रकाश में आनलौं। ई एकदम सत्य अछि जे सही वर्तनी के अभाव कहानी के स्वाभाविक प्रवाह के बाधित करैत छैक आ अहाँ वा अनेको एकर भुक्तभोगी बनलौं। किछु प्रायोगिक परेशानी हमरा सभ के भ' रहल अछि अखन जाहि में निम्न प्रमुख अछि:<BR/>1. एहि मंच के लेखकगण प्रमुखतया साहित्यिक पृष्ठभूमि के नहि भ' के शौकिया लेखक छथिन्ह।<BR/>2. समयाभाव के कारण ब्लोग लेखन के कमी, एहि में स्वाभाविक जे प्रूफ रीडिंग के लेल समय कम भ' जायत अछि।<BR/>3. मैथिली अखनो तक मानक वर्तनी के लेल संघर्ष क' रहल अछि आ मात्रा के प्रयोग बेसी काल अपन अंतर्मन से आयल सुझाव होयत अछि। एहि में हमर अखन कहब रहत जे हम कतओ से एकर तुलना हिन्दी के मानक मानि के नहि करी आ अलग-अलग प्रयोग के सेहो उदाहरण के तौर पर स्वागत करी। किछु समय बाद अपनहि मात्रा आ वर्तनी के मानक उभरि के सामने आबि जायत आ ओ हम सभ के मान्य हेतैक।<BR/><BR/>यथासंभव मात्रा के अशुद्धि दूर क' देल गेल अछि अपितु "बब्लू" के "बबलू" प्रयोग से हम सहमत नहि भ' सकलौं आ ओ मैथिली उच्चारण आ लेखक के चुनाव पर निर्भर अछि। एहिना सलाह दैत रहु आ हमरा सभ के अपन स्तर के ऊपर करय में मदत करु। आ हाँ, अहुँ बहुत दिन स' किछु नव ल' के नहि आयल छी। से ध्यान दिला रहल छी। :)<BR/><BR/>सादर,<BR/>राजीव रंजन लालRajeev Ranjan Lallhttp://www.blogger.com/profile/18354335177402486449noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-46894931335904928862008-01-16T14:59:00.000+05:302008-01-16T14:59:00.000+05:30ध्यान दियेबाक लेल धन्यवाद. हम कहानी एक सीटीँग मे ल...ध्यान दियेबाक लेल धन्यवाद. हम कहानी एक सीटीँग मे लिखैत छी. प्रूफ रीडिँग के समय नहि अछि. एकर जखन प्रिन्ट वर्जन आयत तखने प्रूफ रीडिंग करब. <BR/><BR/>भाषा'क बहुत गलती अछि से बात मानि रहल छी. हमर उपन्यास समान्तर रुप मे चलबाक कारणे उपन्यास'क पात्र'क अदला बदली एहि कहानी'क पात्र सँ भ' गेल.<BR/><BR/>आब ओकरा दुरुस्त क' देलहुँपद्मनाभ मिश्रhttp://www.blogger.com/profile/00743001936020943683noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-83225975633194194842008-01-16T14:50:00.000+05:302008-01-16T14:50:00.000+05:30अपनेक एहन उत्कृष्ट रचनाकार केँ रचना पर टिप्पणी करय...अपनेक एहन उत्कृष्ट रचनाकार केँ रचना पर टिप्पणी करय के धृष्टता कय रहल छी।<BR/><BR/>"देखा था जिसे मैंने कोई और था शायद <BR/>वो कौन है, जिससे तेरी सूरत नहीं मिलती!"<BR/> - (निदा फ़ाजली)<BR/>एहि कहानी में जे अहाँ दाम्पत्य जीवन'क उकताहट के वर्णन कयने छी ओकरा युरोप में "कॉनजुगल बोरडम" कहल जायत छैक। जे आकर्षण विवाह सs पहिने एक दोसर के प्रति आबैत अछि ओ कतेक बेर पहिरल वस्त्र के जेकाँ बाद में मद्धिम परि जायत छैक। अहिँ'क शब्द में "बब्लू केँ जे बात अपन कनियाँ'क विवाह सँ पहिने बढियाँ लागैत छलैक ओएह बात आब खराब लागैत छलैक"।<BR/><BR/>कहानी के दोसर भाग में 'संस्कार', 'परम्परा' आ तथाकथित 'आधुनिकता' के एक-दोसर पर अपन वर्चस्व प्रमाणित करय के लेल छिडल संघर्ष आ ओकर बीच में फँसल बबलू'क छटपटाहट बहुत किछु मोन पाडि गेल।<BR/>मुदा एकर अंत किछु सांत्वना देलक आ एकटा आशा'क किरण देखौलक।<BR/><BR/>एकटा बात आओर जे एहि कहानी में 'प्रुफ रीडींग'क' किछु कमी लागल।<BR/><BR/>पद्मनाभजी, अपन कलम पर किछु नियंत्रण राखू, ओकरा एतेक नहिं भटकय दिऔक। कहानी'क अंतिम पैरा में तs अहाँ 'बब्लू(बबलू)' केँ 'अमोल' बना देलियैक।<BR/><BR/>अपनेक-<BR/>कुन्दन कुमार मल्लिक,<BR/>बंगलोर (भारत)<BR/>मो.- +91-97401 66527कुन्दन कुमार मल्लिक, जय मिथिला, जय मैथिली!http://www.blogger.com/profile/03699865603391260097noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-18091005008548308142008-01-16T09:12:00.000+05:302008-01-16T09:12:00.000+05:30यह कहानी मैथिली भाषा मे लिखा है. इसको समझने के लिए...यह कहानी मैथिली भाषा मे लिखा है. इसको समझने के लिए मैथिली भाषा का knowledge आवश्यक है और पढ़ने के लिए धैर्य. पिछला टिप्पणी अशोभनीय था इसीलिए डिलिट कर रहा हूँ.<BR/><BR/>कृपया मैथिली भाषा सीखने के लिए मुझसे सम्पर्क करें.पद्मनाभ मिश्रhttp://www.blogger.com/profile/00743001936020943683noreply@blogger.com