tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post5739676815852586641..comments2008-04-09T13:38:17.470+05:30Comments on कतेक रास बात: छुतहरबा (एक कहानी) .....पद्मनाभ मिश्रआदि यायावरnoreply@blogger.comBlogger5125tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-81609969918679182392008-04-09T13:38:00.000+05:302008-04-09T13:38:00.000+05:30apnek "katek ras bat" neek lagal dhanybad.apnek "katek ras bat" neek lagal dhanybad.ashish anchinharhttp://www.blogger.com/profile/00584612326951686005noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-54578511656198644402008-04-02T12:52:00.000+05:302008-04-02T12:52:00.000+05:30पद्मनाभ जी,बड नीक ! सामाजिक कुरीति पर कुठाराघात कर...पद्मनाभ जी,<BR/>बड नीक ! सामाजिक कुरीति पर कुठाराघात करैत एकटा परिपक्व लेखक'क रचना प्रतीत भेल ! संगे संग राजनितिक आ प्रशासनिक कुव्यवस्था'क उजागर करवा'क व्यंग्मय प्रयास सेहो सराहनीये अछि ! मुदा सब से प्रशंस्नीये थिक साहित्य-निर्माण'क प्रति अपने'क सकारात्मक आ समर्पित अभिवृत्ति ! उम्मीद अछि जे भविष्यो में सामाजिक सरोकार सों सम्बद्ध एहने रचना अपने'क लेखनी सों बहरायेत रहत ! <BR/>कोटि कोटि धन्यवाद !!करण समस्तीपुरीhttp://www.blogger.com/profile/10531494789610910323noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-1974954629402044092008-04-01T12:10:00.000+05:302008-04-01T12:10:00.000+05:30करण जी'क लेल; केशव करण जी अपनेक टिप्पणी हम अपन हिन...करण जी'क लेल;<BR/> केशव करण जी अपनेक टिप्पणी हम अपन हिन्दी वाला ब्लोग मे देखलहुँ. एतय आफिस मे कोनो जुगाड़ कऽ लोगिन करैत छी आ अपनेक टिप्पणी केँ मोडेरेट नहि कऽ पाबि रहल छी. हम घर सिफ्ट कऽ क्रहल छी आ घर'क इन्टरनेट से कटि गेल अछि. कृपया अन्यथा नहि लेब.पद्मनाभ मिश्रhttp://www.blogger.com/profile/00743001936020943683noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-74188539217018276252008-04-01T11:33:00.000+05:302008-04-01T11:33:00.000+05:30कुन्दन जी;कोनो भाजेँ हम आई सफल भेलहुँ लोगिन करबाक ...कुन्दन जी;<BR/><BR/>कोनो भाजेँ हम आई सफल भेलहुँ लोगिन करबाक लेल. नहि ते आफिस मे कतेक रास बात के खोलि नहि पाबैत छी.<BR/><BR/>अत्साहवर्धन'क लेल धन्यवाद. हमरा बुझल अछि जे हमर प्रत्येक लेख मे भाषायिक गलती रहैत छैक. समयाभाव के कारणे हम साहित्य सृजन के एहि तरह'क गलती सँ बेसी प्राथमिकता दैत छी. गलतीये सही साहित्य सृजन होएबाक चाही. <BR/><BR/>जी जेना हम पहिन्हुँ कहि चुकल छी जे पेशा सँ हम इन्जीनियर छी मुदा हमरो शरीर मे एकटा हृदय अछि. आ इन्जीनियर'क पेशा सँ दूर सामान्य लोक'क तरह हमरो मोन मे भावना उत्पन्न होइत अछि. ओएह भावना केँ की-बोर्ड के थ्रू हम ब्लोग पर उतारि देबऽ चाहैत छी. <BR/><BR/>मानवीय सम्बन्ध पर हम आगुओ लिखैत रहब. अपने लोकनिक सयहोग चाही. धन्यवाद.<BR/><BR/>डा. पद्मनाभ मिश्रपद्मनाभ मिश्रhttp://www.blogger.com/profile/00743001936020943683noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-68722968075491278622008-03-31T21:22:00.000+05:302008-03-31T21:22:00.000+05:30बिना कहने बहुत किछु कहि गेलहुँ। पढि केँ मोन द्रवित...बिना कहने बहुत किछु कहि गेलहुँ। पढि केँ मोन द्रवित भs गेल। जेना हम पहिने कहने रहि जे केखनो काल के हमरा लागैत अछि जे अहाँ अभियांत्रीकि क्षेत्र सँ नहिं मुदा एकटा कुशल मनोविज्ञान विश्लेषक छी। अहाँ'क प्रत्येक रचना मानवीय सम्बन्ध आ सामाजिक परिप्रेक्ष्य में रहैत अछि।<BR/>हार्दिक शुभकामना!कुन्दन कुमार मल्लिकhttp://www.blogger.com/profile/03699865603391260097noreply@blogger.com