<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037</id><updated>2012-01-17T18:01:14.496+05:30</updated><category term='कविता'/><category term='करण समस्तीपुरी'/><category term='व्यँग'/><category term='Story'/><category term='ग़जल'/><category term='विद्यापति'/><category term='ग़जल'/><category term='चंदा झा'/><category term='अनुवाद्'/><category term='सँस्मरण'/><category term='मैथिली'/><category term='Maithili'/><category term='कुन्दन'/><category term='पद्मनाभ'/><category term='Khattar Kaka'/><category term='करण समस्तीपुरी;समीक्षा'/><category term='vidyapati'/><category term='कहानी'/><category term='केशव कर्ण'/><category term='जलकुम्भी'/><category term='मिथिला'/><title type='text'>कतेक रास बात</title><subtitle type='html'>&lt;br&gt;गाम सँ दूर, गामक बात, 
&lt;br&gt;किछु गामक लोक द्वारा, अपने बोली मे</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default?start-index=101&amp;max-results=100'/><author><name>Padmanabh (आदि यायावर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00743001936020943683</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://1.bp.blogspot.com/_4SASqC7hsM8/SrRri01HSII/AAAAAAAAAnU/gBMnXU-WKmI/s1600-R/4.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>145</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-3938372600355290359</id><published>2011-08-12T14:19:00.007+05:30</published><updated>2011-08-12T14:54:03.696+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Khattar Kaka'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्यँग'/><title type='text'>बूढ़’क अर्थशास्त्र’क भाग-२ (श्रद्धान्जली ओसामा बिन लादेन केँ)</title><content type='html'>&lt;div align="right"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;लेखक-खट्टर काका&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;मोबाइल आ इन्टरनेट ई दुनियाँ मे जे परिवर्तन आनने हो से दोसर गप्प, मुदा हम दाबी सँ कहि सकैत छी जे हमर घर मे क्रान्ति जरूर आएल अछि. आब अहाँ लोकनिक काकी’क चुल्हा-चिनवार बिल्कूल “ग्लोबल” भ’ गेल अछि. ओ पूरे दुनियाँ’क सम्पर्क मे रहैत छथि आ नहि जानि केहेन केहेन प्रश्न पुछैत रहैत छथि. पहिने तऽ बात केवल केवल प्रश्ने टा तक सीमित छल मुदा आब बात ओहि सँ आगू निकलि गेल. पुरे दुनियाँ के छकाबे वाला अहाँक खट्टर काका आब काकी सँ हारि मानैत छथि. आब हम बुझए लागलहुँ जे भाँग हम खाइत छी आ ओ किएक बोतलाएल रहैत छथि?&lt;br /&gt;आई भोरे भोर चाह पीबाक काल काल मे हमरा पुछए लागलीह, “अहाँ ओसामा बिन लादेन’क बारे मे की जानैत छी?”&lt;br /&gt;हम कहलिअन्हि, “ओसामा के बारे मे कोनो बात आब नुकाएल अछि की?”&lt;br /&gt;हुनकर जवाब छलन्हि, “ओ अरब जगत के दोसर खट्टर काका छलैथ।”&lt;br /&gt;हमरा नहि बुझल छल जे हमर प्रतिद्वन्द्वी अफगानिस्तान के कबायली इलाका मे रहैत अछि. खट्टर काका आ ओसामा बिन लादेन मे समानता ताकब सबहक मजाल नहि. मुदा जखन कल्पना अपन चरम सीमा केँ पार कऽ जैत छैक तऽ ओहि ठाम सँ कल्पना कयनिहार’क बतहपन शुरु होइत छैक. अहाँक काकी’क हऽद जानबाक लेल हम हुनका खोदनाय शुरु केलहुँ.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="BORDER-BOTTOM: #5c8a64 5px solid; TEXT-ALIGN: center; PADDING-BOTTOM: 5px; LINE-HEIGHT: 100%; MARGIN: 12px; WIDTH: 200px; FLOAT: right; BORDER-TOP: #5c8a64 5px solid; PADDING-TOP: 5px"&gt;&lt;br /&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;बूढ़’क अर्थशास्त्र’क पछुलका अँक मे पढ़लहुँ जे दू टा सरदार (मनमोहन सिँह आ अहुलवालिया) मिलि अर्थशास्त्र मे घोर गलती केने जा रहल छथि. बढैत जनसँख्या, अन्ग्रेजी बाजबाक योग्यता आ कम्प्युटर’क सामान्य जानकारी पर भारत केँ सुपर पावर बनेबाक योजना बना रहल अछि. मुदा ई दुनू टा सरदार बिसरि गेल छथि जे एखुनका ६५% यूवा जनसँख्या तीस साल बाद बुढ़ा जायत. तखन नहि तऽ आर्थिक प्रगतिए रहत आ नहि सुपर पावर बनबाक कोनो लालसा. चारु दिस बुढे-बुढ आ बुढ़ सँ जुड़ल अर्थशास्त्र.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:+0;"&gt;हम&lt;/span&gt; हुनकर पहिल प्रश्न’क जवाब दैत कहलिअन्हि, “ओसामा बिन लादेन मात्र एकटा आतँकवादी छल आ हुनकर गति ओहने भेलनि जेना कोनो सामान्य आतँकवादी’क होएत छन्हि. आतँक’क एतेक बड़का साम्राज्य कोनो काज नहि एलनि. अमेरिका हुनकर घर मे जा केँ मारि देलकनि आ किनको कानो कान खबरो नहि भेलनि”। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;“तऽ अहुँ वैह बुझैत छी जे बाँकी दुनियाँ बुझैत छैक”, अहाँ लोकनिक काकी अपन इन्टरनेट सँ ताकल जानकारी पर कनफ़िडेन्ट छलीह आ हम ई पहिने भाँपि गेल छलहुँ।&lt;br /&gt;तेँ हुनकर जानकारी केँ हम चुनौती दैत कहलिअन्हि, “इन्टरनेट सँ ताकल जानकारी ओतेक विश्वसनीय नहि होएत छैक. पूरे दुनियाँ के बुझल अछि जे ओसामा की छल।” &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;“हम कहलहुँ ने, ओसामा अरब जगत के दोसर खट्टर काका छलाह” ओ फेर सँ वैह दोहराबैत कहलीह.&lt;br /&gt;हम कहलिअन्हि, “ हँ हमरा बुझल अछि ओ हमरे सन हेहर छथि, वैह जिद्द, वैह arrogance, ओतबी बहस कयनिहार, मुदा एहि सँ किओ खट्टर काका नहि बनि जैत छैक”।&lt;br /&gt;“ओसामा एकटा कोर्पोरेट जगत के सी.ई.ओ छलाह” सोझे सोझ अपन मुद्दा पर आबैत अहाँ’क काकी हमरा कहलैथ.&lt;br /&gt;“कोन कार्पोरेशन के ओ सी.ई.ओ छल यै” हम पुछलिअनि।&lt;br /&gt;“आतँकवाद अपने आप मे एकटा कार्पोरेशन छैक. एतय वैह नियम सब लागू होएत छैक जे दोसर बहुराष्ट्रीय कम्पनी मे लागू होएत छैक. कोनो भी बहुराष्ट्रीय कम्पनी सन दुनियाँ के प्रत्येक कोन मे आतँकवाद’क आफ़िस होएत छैक. ओहिना रीक्रुटमेन्ट होएत छैक. नफ़ा-नुकसान ओहिना होएत छैक. कम्पनी’क क्वाटरली रिजल्ट ओहिना घोषित काएल जैत छैक. किछु विशेष तरह’क जनता’क ओहि मे इन्वेस्टमेन्ट रहैत छैक आ एहि कम्पनी’क पर्फ़ोरमेन्स’क आधार पर आतँकवादी रुपी कम्पनी’क शेयर’क मूल्य घटैत बढैत रहैत छैक आ ओहिना आतँकवाद’क पैसा बी.एस.ई. आ डाउ जोन्स मे लागल रहैत छैक.”&lt;br /&gt;एक सँग एतेक बात हमरा बुझि मे नहि आएल. हम कहलिअनि, “अहाँक एतेक बात हमरा अपच लागि रहल अछि”&lt;br /&gt;ओ तपाक सँ उत्तर देलैथ, “साधारण बात अछि. आई काल्हुक नवयुवक जखन कोनो कम्पनी मे भर्ती होएत छैक तऽ की देखैत छथि. कम्पनीक की पर्फ़ोरमेन्स छै? यदि तीन साल काज काएल जाए तऽ प्रोफ़ाइल मे की बढ़ोतरी हेतैक, दरमाहा कतेक भेटतैक आ पर्क कतेक भेटतैक”&lt;br /&gt;हम चुप छलहुँ आ ओ अपन तरँग मे छलीह, “ओसामा के कोरपेरेट मे भर्ती होबए सँ पहिने अफगानी, पाकिस्तानी आकि पस्तुनी यूवक यैह देखैत छथि जे हुनकर कैरियर कतय नीक रहतैक, अलकायदा मे, तालीबान मे, या जैशे मुहम्मद मे. जे अमुक यूवक केँ नीक दरमाहा आ पर्क दैत छैक ओतैये जाइत छैक.”&lt;br /&gt;“आ फेर ओ लोकनि नौकरी कोना चेन्ज करैत छैक” हम चुटकी लैत पुछलिअनि.&lt;br /&gt;हमर चुटकी पर ओ एना प्रतिक्रिया देलथिन जे मानू हमरा हुनकर बात बुझबाक योग्यते नहि अछि.&lt;br /&gt;मुदा जवाब तऽ हुनका देनाइए छलनि, ओ कहय लागलीह, “कम्पनी मे जेना लोक नौकरी चेन्ज करैत छैक, ओसामा के लड़ाका तहिना नौकरी चेन्ज करैत छैक. जे बेसी दरमाहा देत ओतय चलि जायत. दोसर बात कम्पनी’क ब्रैन्ड मूल्य ओहि मे बहुत महत्वपूर्ण स्थान राखैत छैक. अतः यदि कोनो यूवक जैशे-मोहम्मद छोड़ि कम पैसा मे अलकायदा ज्वाइन कऽ लैथ तऽ कोनो अनर्गल नहि. ओना प्रत्येक कम्पनीक भाँति आतँकवादी सँगठन सेहो चाहैत छैक जे हुनकर कम्पनी मे सबसँ बेसी प्रतिभाशाली यूवक होबए जाहि सँ सँगठन दिन दूना आ राति चौगूना बढ़ए”.&lt;br /&gt;आब हुनकर बात किछु तर्कसँगत लागि रहल छल, हम कहलिअन्हि, “से तऽ ठीक छै, मुदा ई बताउ जे प्रत्येक कार्पोरेशन के लक्ष्य होइत छै जे बेसी सँ बेसी पैसा कमाएल जाए. ओसामा के लक्ष्य तऽ एहेन नहि छल.”&lt;br /&gt;“से अहाँ के के कहलक. आतँकवादी सँगठनक लक्ष्य मात्र पैसा होएत छैक. पैसा’क अलावा आओर किछु नहि” अहाँक काकी जोर दैत कहलथिन्ह.&lt;br /&gt;हम हुनकर गप्प सँ सँतुष्ट नहि छलहुँ. “पैसा तऽ दोसरो तरीका सँ कमाएल जा सकैत छैक, एहेन रास्ता ओ लोकनि किएक चुनए छै”&lt;br /&gt;हमरा तुरन्ते उत्तर भेट गेल, “आओर नहि तऽ की? अफ़गानिस्तान के आठवाँ पास नवयूवक केँ सोफ़्टवेयर कम्पनी मे नौकरी भेटतैक.”&lt;br /&gt;“आ ओ जेहाद फेहाद...” हम पुछलिअनि.&lt;br /&gt;“मात्र एकटा देखाबा. पैसा कमेनाई मुख्ये टा नहि अपितु मात्र एकेटा लक्ष्य. जे आतँकवादी सँगठन जतेक बड़का घटना के अँजाम दैत छैक ओकर मारकेट वैल्यू ओतबी बढ़ैत छैक. इहो एकटा सर्विस इन्डस्ट्री थीक जतय आदमी के मूल्य कोनो आओर चीज सँ बेसी होएत छैक”, काकी अपन जवाब सँ हाजिर छलीह.&lt;br /&gt;आब हमरा लागय लागल छल जे काकी’क बात मे किछु दम जरुर छैक. हम कहलिअनि, “जँ अहाँक बात सत्य थीक, तऽ लागले हाथ इहो बता दिअ, जे आब आतँकवादी सँगठन के की हेतैक. ओसामा बिन लादेन तऽ मरि गेलैक.”&lt;br /&gt;हम देखलहुँ जे काकी’क मुँह मे बुरलेल शब्द आबैत आबैत रुकि गेलनि. पत्नीधर्म इन्टरनेट सँ जोगाएल जानकारी पर बेसी भारी पड़ि रहल छलनि. ओ शालीनता सँ उत्तर देलथिन, “ओसामाक मरने किछु नहि होएत. जेना कोनो पैघ कम्पनी’क सी.ई.ओ. “रिटायर हर्ट” भऽ गेलाह. कम्पनी’क परफोर्मेन्स किछु दिन’क लेल डाँवाडोल रहत. फेर सँ वैह. कोनो दोसर लोक एहि पद केँ ग्रहण करताह आ कम्पनी केँ उपर लऽ जेबाक लेल प्रयत्न करताह”.&lt;br /&gt;मोन होएत छल जे इन्टरनेट हमर जवानी मे किएक नहि आएल. अहाँ लोकनिक काकी’क बुद्धि चालीस साल पहिने खुजि जाइते. काकी’क सँ हम हारि मानि गेल छलहुँ आ हुनकर तर्क पर हम स्तब्ध भऽ चुपचाप बैसल छलहुँ. स्त्रीगण अपन पति केँ हारि मानैत नहि देखि सकैत छथि. हमरा सान्त्वना दैत कहलैथ, “ओसामा’क मरला’क बाद एखन आतँकवाद रुपी कार्पोरेट मे मन्दी अछि.”&lt;br /&gt;काकी उपसँहार मे एकटा छोट सन लेक्चर दऽ देलीह, “आतँकवाद एकटा सर्विस इन्डस्ट्री थीक जाहि मे मुख्य उद्देश्य अछि पैसा लऽ केँ दोसरा लेल किछु काज करब थीक. एहि मे आउटसोर्सिँग सेहो होएत छैक. अमेरिका अरब जगत मे कब्जा केवल तेल’क पोलिटिक्स लेल केने छल. आ अरब जगत’क व्यापारी ओसामा सन लोक केँ फण्डिँग कऽ तेल’क सत्ता अपने हाथ मे राखए चाहैत छथि. ई सब पैसाक लेल खीचातानी होइत अछि. आ तथाकथित आतँकवादी एकटा स्किल्ड सोफ्टवेयर वर्कर सँ बढ़ि के किछु नहि”.&lt;br /&gt;जखन हुनकर लेक्चर खत्म भेल तऽ हम जोर सँ श्वाँस छोड़लहुँ. ओसामा मरि चुकल छल. अहाँक काकी एहि स्थिति केँ आतँक’क मन्दी कहि रहल छलीह. आ एतय किछु दिन सँ हम अखबार मे पढ़ि रहल छलहुँ. भारत मे एकटा फेर सँ रीसेशन आबि रहल छल. काकी मँदी पर अपन वक्तव्य दऽ रहल छलीह. डर भेल कहीँ रिसेशन पर जँ हुनकर बहस शुरु भऽ जान्हि तऽ हुनका रोकब कठिन.&lt;br /&gt;हलाँकि दू टा प्रश्न एखनहुँ मस्तिष्क मे बिर्र्रोह उठेने छल—जे खट्टर काका आ ओसामा बिन लादेन मे समानता की? आ दोसर जे आतँकवादक रिसेशन मे जन सामान्य पर की असर होएत छैक. अपने लोकनिक काकी अपन उफ़ान पर छलीह. हम चुप्पे रहबा मे अपन फायदा देखलहुँ. बाद मे अवसर भेटला पर एहि दू टा विषय केँ फेर सँ खोदब. &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-3938372600355290359?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/3938372600355290359/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=3938372600355290359' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/3938372600355290359'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/3938372600355290359'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2011/08/blog-post.html' title='बूढ़’क अर्थशास्त्र’क भाग-२ (श्रद्धान्जली ओसामा बिन लादेन केँ)'/><author><name>Khattar Kaka</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16074415893834232353</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-7433050850861207428</id><published>2011-07-24T16:14:00.005+05:30</published><updated>2011-07-30T00:03:22.930+05:30</updated><title type='text'>अरिकन्चन</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large; "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 102, 0); "&gt;- अमित अभिनन्दन&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large; "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(0, 102, 0); "&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;घोघ तर सँ&lt;br /&gt;तकैत दू टा&lt;br /&gt;पैघ पैघ आँखि&lt;br /&gt;पिन्डश्याम वर्ण पर&lt;br /&gt;खूब तराशि क राखल&lt;br /&gt;ओ कटगर नाक&lt;br /&gt;खूब भरिगर खोपा&lt;br /&gt;&lt;div style="BORDER-TOP: #5c8a64 5px solid; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 5px; MARGIN: 12px; WIDTH: 200px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 5px; BORDER-BOTTOM: #5c8a64 5px solid; TEXT-ALIGN: center"&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_xd1j00Yk1I0/Sxvy-VU2cmI/AAAAAAAAABo/Qjj-qUzDzA0/s1600-h/Jhapat+Ji.jpg" onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 104px; height: 120px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_xd1j00Yk1I0/Sxvy-VU2cmI/AAAAAAAAABo/Qjj-qUzDzA0/s320/Jhapat+Ji.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5412186529906192994" /&gt;&lt;/a&gt;कवि- अमित अभिनन्दन&lt;/span&gt;,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;झंझारपुर प्रखण्डक बलियारि ग्रामक निवासी 24 वर्षीय अमितजी पेशा सँ चिकित्सा विज्ञानक छात्र छथि आ संगे-संग साहित्यानुरागी सेहो। सम्प्रति ज. ला. नेहरु चिकित्सा महाविद्यालय, भागलपुर मे अध्ययनरत। एहि मन्च पर प्रकाशित हुनक इ दोसर रचना छियन्हि। हुनक पहिल रचनाक लेल &lt;a href="http://www.vidyapati.org/2009/12/blog-post_08.html"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;एतय क्लिक करु&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;।&lt;br /&gt;सम्पर्क- +91-93865 50687&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सम्पादक, &lt;a href="http://www.vidyapati.org/"&gt;"कतेक रास बात"&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;आ खूब पातर ठोर&lt;br /&gt;गरदनि पर&lt;br /&gt;कने नीचा दबा के छलन्हि&lt;br /&gt;कारी सियाह तिल&lt;br /&gt;जेहने साफ व्यक्तित्व&lt;br /&gt;तेहने सुन्दर दिल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिथिला केर माटि मे पलल बढल&lt;br /&gt;छलथि सर्वगुण सम्पन्न&lt;br /&gt;मुदा सासुर मे रहि गेलन्हि सेहन्ता&lt;br /&gt;जे खाइतथि भरि पेट अन्न&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोन नहि अछि&lt;br /&gt;कहियो सुनने होयब&lt;br /&gt;हुनक मुँह सँ&lt;br /&gt;किछु अनुचित बात&lt;br /&gt;रक्तरन्जित पीठ रहितो&lt;br /&gt;गाल कहियो नहि सहलन्हि&lt;br /&gt;नोरक आघात&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमर हुनक सम्बन्ध यैह&lt;br /&gt;जे&lt;br /&gt;हुनक हाथक&lt;br /&gt;अरिकन्चन मे&lt;br /&gt;हमरा भेटए किछु विशेष सुआद&lt;br /&gt;से गाम गेला पर&lt;br /&gt;किछु अशौकर्य रहितो&lt;br /&gt;हुनक आवेश मे डूबल&lt;br /&gt;हुनका करबे करियन्हि याद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ई हुनक आवेशे छलन्हि&lt;br /&gt;जे सब गप बुझितो&lt;br /&gt;हमर पएर&lt;br /&gt;स्वतः हुनक आन्गन दिस&lt;br /&gt;बढि जाएत  छल&lt;br /&gt;थारि पर बैसल&lt;br /&gt;हमर जान्घ&lt;br /&gt;अनगिनत बेर भराएल होयत&lt;br /&gt;मुदा&lt;br /&gt;बीअनि होंकति हुनक हाथ&lt;br /&gt;कहियो नहि थकलन्हि&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्तिम बेर भेटल रहथि&lt;br /&gt;त कहलन्हि&lt;br /&gt;बौआ&lt;br /&gt;घर मे आयल छैक&lt;br /&gt;दू टीन मटिया तेल&lt;br /&gt;आत्मा सिहरि गेल&lt;br /&gt;मुदा किछु बाजल नहि भेल&lt;br /&gt;आगाँ ओहो नहि बजलथि&lt;br /&gt;अपन नोरे सँ जेना&lt;br /&gt;सब गप कहलथि&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहिल बेर देखलियैक&lt;br /&gt;हुनक आँखि मे नोर&lt;br /&gt;मृत्युक भय सँ कम्पित&lt;br /&gt;पोर पोर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डूबैत के तिनकाक सहारा&lt;br /&gt;भेटय वा नहि भेटय किनारा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहि गेलियैक हम&lt;br /&gt;हुनक अन्तिम यात्रा मे&lt;br /&gt;कोन मुँह सँ जैतियैक&lt;br /&gt;जकरा ओ बुझलन्हि&lt;br /&gt;सहारा केर लाठी&lt;br /&gt;ओ कोना के दैतय&lt;br /&gt;हुनका काठी&lt;br /&gt;जकरा ओ कएलन्हि&lt;br /&gt;सभ सs बेसि सिनेह&lt;br /&gt;उएह तोडलकय&lt;br /&gt;हुनकर नेह&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दू बरख बीत गेल&lt;br /&gt;सुनलहुँ जे&lt;br /&gt;हुनक प्राणनाथ&lt;br /&gt;फेर पहिरलन्हि&lt;br /&gt;ललका पाग&lt;br /&gt;फेर जगलय&lt;br /&gt;कोनो मिथिलाक&lt;br /&gt;बेटीक भाग&lt;br /&gt;फ़ेर अओतन्हि&lt;br /&gt;कतेक रास दहेज&lt;br /&gt;फेर फटतय&lt;br /&gt;ककरो करेज&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अस्तु&lt;br /&gt;कोन काज हमरा एहि सभ स&lt;br /&gt;किएक लगबियन्हि लान्छन&lt;br /&gt;जाएत छी फ़ेर उएह अन्गना&lt;br /&gt;खाएब नबकनियाक हाथक&lt;br /&gt;अरिकन्चन ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-7433050850861207428?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/7433050850861207428/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=7433050850861207428' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/7433050850861207428'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/7433050850861207428'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2011/07/blog-post_24.html' title='अरिकन्चन'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_xd1j00Yk1I0/Sxvy-VU2cmI/AAAAAAAAABo/Qjj-qUzDzA0/s72-c/Jhapat+Ji.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-1212858118402294947</id><published>2011-07-13T14:23:00.010+05:30</published><updated>2011-07-20T14:25:58.384+05:30</updated><title type='text'>विवाह’क तेसर सप्ताह (कहानी)</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;span style="color: #990000;"&gt;लेखक- &lt;strong&gt;आदि यायावर&lt;/strong&gt; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;span style="font-size: x-small;"&gt;&lt;span style="color: #990000;"&gt;(मूल नाम- डा. पद्मनाभ मिश्र)&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div align="center" class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;[1]﻿&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;राति भरि कछ-मछ करैत उर्मिला’क मोन उबिया गेल छलैन. आधा राति'क बादे हुनकर पति बेडरूम में आएल छलाह। एखन ओ एना फोंफ काटि रहल छलाह मानु जे बेटी’क विवाह एखने खतम भेल होन्हि। नौकर चाकर सब सुतल छल. आ बगल वाला फुलवारी मे झिंगूर किलोल करैत छल। चारु दिस आततायी सन्नाटा पसरल छल. हठाते बगल वाला आम गाछी पर टिह-टिहहिया आपन चिर परिचित आवाज देलक। ओहो आवाज कोनो टहँकार सँ कम नहि, सन्नाटा कें चीरैत ओ आवाज हुनकर हृदय कें बेधि देलकनि। एकर संगे टिह-टिहिया इहों सूचना देलकनि जे आब तेसरो पहर बीति गेल अछि। एक बेर ओ फेर सँ अपन पतिक मुंह देखे लागलीह. की सुन्दर दैदिव्यमान मुखमंडल छल, मानु, जेना कोनो गन्धर्व एखने पृथ्वी पर उतरल हो. एहेन सुन्दर छवि जे मात्र साहित्य में पढबा में भेटैत छैक. दैदिव्यमान मुँहे टा किएक, पछिला तीन सप्ताह'क घटना क्रम में हुनका ज्ञात भेलनि जे जतबी ओ देखबा में सुन्दर छलाह ओतबी हुनकर व्यक्तित्व सेहो नीक छनि. हुनकर पिता'क यश पुरे समाज में पसरल छलनि. विवाह सँ कतेक साल पहिने सँ एहि परिवार'क बारे में ओ सुनि चुकल छलीह. ओ लोकनि जतबी धनीक छलैथ ओतबी संस्कारी सेहो. हुनकर पति अपन पुरखा'क अर्जित धन संपत्ति में कोनो रूचि नहीं देखाबैत छलाह. ओ कहैत छलाह जे आदमी कें अपन दुनिया अपने बसेना चाही. विवाहोपराँत ई सब जानि उर्मिला कें बहुत खुशी भेल छलनि. आजुक समय में अरेंज्ड मैरेज'क बाद सब किछु एतेक बढियाँ भेटब हुनका पूर्व जन्म'क कोनो नीक काज बुझाना गेलनि. अपना आप कें ओ भाग्यशाली बुझए लागल छलीह. &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मुदा पहिल सप्ताह के बादे एत्तेक किछु भऽ गेल जकर हुनका कोनो आशा नहि छलैन. आब तीने सप्ताह में सब किछु एतेक बदैल जेतैन तकरो हुनका कोनो अंदेशा नहि छलैन. विवाह'क उपरांत प्रत्येक स्त्री'क लेल सासूर एक रहस्य सँ कम नहि होएत छैक. पहिने तँ कोशिश केलथिन अडजस्ट करबाक लेल मुदा आब हुनका लागए लागलैन जे हुनकर कोनो दोष नहि. आब हुनका होइत छलैन जे हुनकर सासूर'क लोक बिलकूल अलग तरहक छैथ. विवाह'क मात्र तीन सप्ताह'क अंतराल में जतय एतेक नाटक भेल हो, ओहि बात कें ओ सामान्य कोना मानि सकैत छलीह. जखन हुनकर अपन पतिदेवे उपेक्षा करए छथि तऽ दोसरा'क कोन गप्प. पछिला तीन सप्ताह में कोनो दिन एहेन नहिं भेल छल जखन हुनकर पति एको घंटा'क लेल आबि कें हुनका सँ प्रेम सँ बात केने होइथ. हुनकर उम्र'क स्त्री लोकनि की-की सपना देखैत छथि. ओ त’ एतेक अनुशाषित जीवन जीबाक पक्ष में छलीह. लेकिन तीन सप्ताह में आब हुनका विश्वाश होमए लागलैन जे हुनकर उपेक्षा भ' रहल छन्हि. जखन हुनकर पतिए के अपन कारोबार आ पारिवारिक समस्या सँ निकलबाक लेल समय नहि छलैन तखन बेकारे विवाह केलैथ. उपेक्षा सँ विद्रोह'क भावना उत्पन्न होइत छैक, हुनका सेहो भेलैन. मुदा द्विरागमन'क समय में अपन पिता'क देल गेल वचन याद आबए लागलैन. एक प्रतिष्ठित परिवार में जन्म लेला'क बाद आ एक तथाकथित प्रतिष्ठित परिवार में विवाह भेला'क बाद विद्रोह करब हुनका ओप्शने मे नहि रहैन. ओनाहींए हुनकर सासु'क अनसन सँ सब किओ परेशान छल. हिनकर कोनो भी एक गलत स्टेप नैहरा'क प्रतिष्ठा कें हानि पहुंचा सकैत छल. &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-hqRmwiv2dCY/TiaXMBp7AwI/AAAAAAAAAtk/0x91l7eKhCc/s1600/ill_011.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="315" src="http://2.bp.blogspot.com/-hqRmwiv2dCY/TiaXMBp7AwI/AAAAAAAAAtk/0x91l7eKhCc/s320/ill_011.jpg" t$="true" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;एक रहस्यमयी सासूर'क वातावरण में हुनकर कुंठित भावना अवसाद में बदलल जा रहल छल. एक बेर फेर सँ अपन पति'क दैदीप्यमान मुखमंडल के देखबाक कोशिश करए लागलीह. एहि बेर हुनका तामस नहि उठलैन. अपितु हुनका अपन पति'क ऊपर में दया आबए लागलैन. आजुक समय में, के एहेन आदमी होएत छैक जे अपन नव विवाहिता पत्नी कें छोडि अपन जेठ भाए'क कारोबार में हाथ बंटेबाक लेल गाम सँ दूर चलि जैत छैक? हुनका लग में त’ इहो ऑप्शन नहि छलनि जे ओ कहि सकैत छलीह जे हुनकर पति जे करय जा रहल छैथ, ओ मात्र बेवकूफी’क अलावा अओर किछु नहि थीक. स्त्री एक मजबूरी'क नाम सेहो थीक. कतेक दिन सँ अपन भावना कें दबा के रखने छलीह। आब मोन करैत छलैन जे ठोहि पाडि कें कानैथ. मुदा डर इहो छलैन जे पतिदेव कहीं उठि नहि जैथ आ हुनकर एखन धरि'क त्याग कहीं स्वार्थ में नहि बदली जैन्ह। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ओ उठि के बैसि गेलीह. सिरहौने मे ठेहुन मोड़ि कें अपन नाक आ मुह कें दुनू ठेहुन मे नुकौने रहलीह। किछु देर बाद नहुए नहुए केहुनी’क नीचा मे गेडुआ आएलन्हि आ नहि जानि कखन नीन्न आबि गेलनि। जखन आँखि फुजलनि त देखलैथ जे पतिदेव एखन धरि सुतल छैथ. नित्य क्रिया सँ निपटि केँ फुलवारी मे राखल आरामकुर्सी पर ई सोचि बैस रहलीह जे जखन पतिदेव उठताह तऽ हुनका ताकैत ताकैत एतय जरूर एताह. आब ओ चुप नहि रहतीह. विद्रोह नहि तऽ तर्क तऽ काइए सकैत छलीह. कम सँ कम पुछबाक तऽ चाही जे घर मे जँ एत्तेक नाटक लेल पहिने सँ तैयारी रहैन तऽ एकटा शरीफ लोकनि बेटी सँ विवाहे किएक केलनि. एक हजार प्रश्न फुरैत छलैन. मुदा स्त्री’क मोन मर्यादा’क सीमा मे बान्हल छल. तेँ मोने मोन विचारए लगलीह जे कोन कोन प्रश्न पुछबाक छैन्ह, जाहि सँ मर्यादा’क सीमा’क उलँघन नहि होमए. &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;विवाह’क पहिल किछु सप्ताह मे नवविवाहिता की करैत छैथ? जेना प्रत्येक बच्चा देखबा मे क्यूट होएत छैक, जेना विवाह मण्डप पर बैसल कनियाँ सुन्दर होएत छैक. इहो बात ओतबी सत्य जे प्रत्येक नवकनियाँ के ई होएत छनि जे अमुक विवाह कए ओ धन्य भऽ गेलीह. ई अग्नि’क चहु दिस सात फेरा’क ई कमाले थीक जे नवकनियाँ के हुनकर पति पुरे दुनियाँ मे सब सँ नीक लोक लागए लागैत छन्हि. नवविवाहिता के निगेटिव बात नहि फुरए छनि आ फुरबाको नहि चाही. प्रत्येक सामान्य विवाह मे कनियाँ के होएत छनि जे हुनका सपना’क राजकुमार भेटल छनि. &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;उर्मिला फुलवारी मे राखल लकड़ी’क आराम कुर्सी मे धँसल यैह सोच मे छलीह. अपन काल्पनिक दुनियाँ मे ओ अपन राजकुमार केँ परीकथा सदृश्य उज्जर उज्जर घोड़ा पर दूर सँ आबैत देखैत छलीह. मुदा यथार्थ हुनका झमान भऽ पटैक दैत छलनि. लोक सपना सँ तखने आन्दित भऽ सकैत छैक जखन ओहि मे किछु वास्तविकता होइछ. अन्यथा एहेन सपना लोक केँ डरा जैत छैक. उर्मिला अपन कल्पना सँ नहि डेराइत छलीह. बल्कि हुनका अपन भाग्य पर आब शक होमए लागलनि.&lt;br /&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;[2]﻿&lt;/div&gt;ओ कोन अनर्गल अपेक्षा करैत छैथ. हुनका अपन पतिक सामीप्य चाही, से की गलत? एखन धरि ओ अपन पति सँ सहज नहि भेल छलीह. विवाह’क तीने सप्ताह मे कोनो लड़की सहज कोना भऽ सकैत छैक. किछु समय तऽ चाही एक दोसर केँ जानबाक लेल. हृदय’क एक कोन मे इहो आशँका छलैन जे पतिदेव’क कोनो मजबूरी छैन जे नहि तऽ ओ बुझि सकैत छलीह आ नहिएँ हुनकर पति हुनका बुझबे चाहैत छथि. सम्भावना अपार छल आ ओ प्रत्येक सँभावना केँ अपन कल्पनाशक्ति’क हिसाब सँ विश्लेषण करैत छलीह. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फेर कनखी आँखि सँ पाछु देखलैथ. पतिदेव बेडरुम’क खिड़की सँ चहलकदमी करैत देखा पड़ैत छलैन. जल्दी सँ मोने मोन प्रश्न’क लिस्ट फेर सँ बनबे लगलीह. पहिल प्रश्न जे हुनका अपन तथाकथित कारोबारी ट्रिप मे लऽ जेबा सँ किएक हिचकिचा रहल छैथ. दोसर प्रश्न जे कोन एहेन कारण छैक जे ओ हिनका महत्व नहि दैत छथि. आ अन्तिम प्रश्न जे एना कतेक दिन चलत. प्रत्येक प्रश्न तर्कसँगत छल, उचित छल आ समयानुकूल.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बेर बेडरुम केँ फेर सँ देखलैथ. आब पतिदेव फुलवारी दिस आबि रहल छलाह. जल्दी सँ अपन ध्यान चिड़ै चुनमुनी दिस दऽ देलथिन. हृदय मे पसरल अन्तर्द्वन्द्व केँ अपन भीतरे रोकबाक लेल भरिसक प्रयास करय लागलीह. हुनका आभाष भऽ गेलनि जे ओ आब बिल्कूल लऽग आबि गेलाह. आगू मे अनन्त आकाश पसरल छल आ ओहि मे सूर्य’क लाल-लाल रौशनी हुनकर अवसादित मोन केँ तत्क्षण उर्जा सँ भरि रहल छल. लाल लाल आकाश’क नीचा मे शरद ऋतु’क हरीहरी पसरल छल. आ क्षितिज पर बहुते ऊँच आकाश मे नम्हर लोल वाला चिड़ै’क झुण्ड जीवन यापन लेल उड़ि क’ कतओ जा रहल छल. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जतय एक दिस प्राकृतिक सुन्दरता’क मनोरम दृश्य छल, ओतैये दोसर दिस असहजता, अकुलाहट, आ व्यथित मोन. ई बुझियो केँ जे, हुनकर पति पाछु मे ठाढ़ छथि ओ अनठा देने छलीह. ओ ई साबित करए चाहैत छलीह जे हुनको उपर मे कोनो विशेष फर्क नहि पड़ैत छैन. दुनियाँ ककरो बिना नहि रुकलै य’. आ सफल दाम्पत्य जीवन दुनू लोकनि’क बिना सम्भव नहि. पछिला तीन सप्ताह सँ ओ कोओपरेट करैत एलीह, आइ नै काल्हि एकर अन्त हेबे करतैक. मुदा एक कोन मे पति’क प्रेम’क लेल मोन तरसैत छलनि. हुनका मोन करैत छलनि जे पति पाछु सँ भरि पाँज मे पकैरि लैनि. ओ माफ कऽ देतीह. हिनकर छिरियैल मोन केँ अपन बाँहि मे समेटि केँ पति हिनका तृप्त कऽ सकैत छैन. &lt;br /&gt;ओ फेर सँ डरा गेलीह. पछिला तीन सप्ताह सँ भेल नाटक हिनका फेर याद आबए लागलैन. फेर सँ वैह अन्तर्द्वन्द्व आ लोहार’क धौंकनी सदृश्य गति मे हृदय.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पाछु सँ पतिदेवक आवाज सुना’ पड़लैन, “उर्मिला !”. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओ चौँकि जेबाक सफल प्रयास केलैथ आ मुड़ी घुमा केँ पाछु देखलैथ. पतिदेव मुस्की मारैत ठाढ़ छलाह. हिनका एना बुझना गेलैन जे एत्ते किछु भऽ गेलाक बाद किओ एत्तेक सहज कोना भऽ सकैत छैक. दू टा मे एकटा बात जरूर छैक, चाहे तऽ ओ “एक नम्बर” के नाटकबाज छैथ वा दुनियाँ’क सबसँ महान व्यक्ति. एहि दुनू मे कोन बात सत्य छल से जानबा मे ओ असमर्थ्य छलीह. उर्मिला ओतबी सहज रुपेँ उत्तर देलथिन, “जी? कहु!”.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“लागैत अछि अहाँ एखन धरि तमसाएल छी”, पतिदेव अपन बात कहलैन.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“नहि, अहाँ हमरा अन्यथा लऽ रहल छी”, पति’क सामिजिक आ व्यवसायिक दायित्व’क पूर्ति मे तन आ मन सँ सहयोग देनाय हमर कर्तव्य थीक. हम सैह निभा रहल छी.” उर्मिला’क शब्द मे रुष्ठता व्याप्त छल. &lt;br /&gt;पतिदेव आराम कुर्सी’क पाछुए सँ हिनका भरि पाँजि मे पकरि लेलकनि. हिनकर दुनू हाथ हुनकर हाथ मे छल आ बिना शेव काएल दाढ़ी हुनकर कन्हा पर. पतिदेव’क बिना थकरल केश गाल मे गुदगुदी लगबैत छलैन. आ ओहि मे सँ एकटा लऽट आँखि मे जाकेँ तँग करैत छलैन. ओ अपन हाथ केँ छोड़ेबाक प्रयास करए लागलीह. मुदा मोने मोन हुनका नीक लागैत छलैन. मोन होएत छलैन जे ओ एहिना पकड़ने रहैथ. कखनहुँ कखनहुँ प्रेम केवल शरीरेटा’क भाषा बुझैत छैक. आ ओहि मे कोनो गलत बात नहि. हुनकर गर्म श्वाँस हिनकर कान मे घुसि आत्मा केँ तृप्त करैत छलैन. सृष्टि, सृजन, आ मानवीय भावना मे एक अजीब खेल भऽ रहल छल. उर्मिला केवल एक पात्र छलीह. मानवीय भावना खेल मे आगू निकलि गेल छल ओ अपन हाथ छोड़ेबाक लेल प्रयास केँ बढ़ा देलथिन. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जखन पतिदेव केँ लागलैन जे आब ओ हाथ छोड़ा लेतीह तऽ ओ हुनका कान मे कहलथिन्ह, “उर्मिला! अहाँ बहुत सुन्दर छी.” &lt;br /&gt;उर्मिला अपन हाथ छोड़ा नेने छलीह. पतिदेव’क अन्तिम वाक्य सुनि हुनका आँखि मे नोर चलि एलनि. मुदा दोसरे क्षण पति’क केश के आपन आँखि लऽग सँ हँटा के एहेन प्रदर्शित केलीह जे मानू नोर पति’क बात सँ नहि, मुदा आँखि मे घोसिआएल केश सँ आएल अछि. पतिदेवो बुझैत छलाह जे नोर हुनकर केश सँ नहि आएल छल, अपितु हुनकर बात सँ आएल छल. प्रत्येक स्त्री’क मोन होएत छनि जे पति सुन्दरता’क वर्णन करैथ. मुदा आई विवाह’क तीन सप्ताह मे ओ पहिल बेर सुनि रहल छलीह. मात्र एकटा वाक्य! ओना त’ भावना केँ झकझोरि केँ राखि देलनि मुदा, ओ केवल गर्म तवा पर किछु बुनि पानि सँ बेसी नहि छल जे तीन सप्ताह’क उपेक्षा सँ लोहा सन गर्म हृदय पर छन्न सँ उड़ि गेलन्हि. गर्म तवा के सामान्य करवा लेल पानि’क किछु बुनि नहिँ अपितु लोटा’क लोटा पानि ढ़ाड़बाक जरुरत छल. पतिदेव एहि बात केँ बुझि चुकल छलाह, ओ कान मे फेर सँ कहलकनि, “एतय किओ आबि सकैत अछि. चलु ने अहाँ सँ बहुत बात केनाय अछि. चलु अपन रुम चलल जाए.”&lt;br /&gt;उर्मिला चुप रहलीह. अपन बाडी लैन्गूएज सँ एखन धरि जतबैत छलीह जे हुनका आब पतिदेव’क बात कोनो विश्वास नहि छनि. बाडी लैन्गूएज मे इहो समाहित छलैन जे ओ केवल अपन पत्नि धर्म निभा रहल छलीह. पतिदेव हाथ खीचि बेडरुम मे लऽ जाएत छलैन आ ई चुपचाप चलि जा रहल छलीह. केवल विरोध मे अपन डेग’क गति कम केने छलीह.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;[3]&lt;/div&gt;बेडरूम पहुँचि पतिदेव धड़ाम दऽ केवाड़ बन्द कऽ देलकन्हि आ लऽग मे आबि हिनकर दुनू बाँहि के पकड़ि सीधे-सीधे आँखि मे देखैत बजलाह, “उर्मिला! अहाँ सचमुचे बहुत सुन्दर छी. अहाँक ललाट, आँखि आ ठोर भगवान बहुत फुरसत मे बनौने छथि. हम अहाँ के अपन जीवन-साथी पाबि धन्य भऽ गेलहुँ.”&lt;br /&gt;एतेक बात कहि पतिदेव चुप भऽ गेलाह. प्रेमालाप आ लेक्चर मे अन्तर होएत छैक. प्रेमालाप ताली जेकाँ एक हाथ सँ नहि मुदा दुनू हाथ सँ बजैत छैक. हुनका प्रतिउत्तर मे किछु सुनबाक छलैन. उर्मिला अपन भावना केँ अपन पुरा काबु मे केने रहलीह. ओ मूर्तिवत ठाढ़ छलीह. पतिदेव के भऽ रहल छलैन जे आब गड़बड़ भऽ रहल छैक. हुनकर मजबूरी हुनकर प्रयास मे साफ प्रदर्षित भऽ रहल छलनि. हुनका मुँह सँ एक्के टा वाक्य निकललनि, “उर्मिला हम अहाँ सँ बहुत प्रेम करैत छी”.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ई कोनो साधारण वाक्य नहि छल. पछिला तीन सप्ताह मे नव सासूर मे भेल अप्रत्याशित नाटक’क बाद बहराएल एहेन वाक्य छल जकरा सुनबाक लेल मोन तरैस गेल रहैन. पतिक प्रेमालाप मे हुनकर मजबूरी सद्यः देखा पड़ि रहल छलैन जे हुनकर व्याकुलता केँ बढ़ा रहल छलैन. किछु देर दुनू व्यक्ति चुप चाप रहल. पतिदेव फेर सँ कहलकनि, “उर्मिला हम सचमुचे अहाँ सँ बहुत प्रेम करैत छी, अहाँक चुप्पी हमर हृदय केँ बेधि रहल अछि.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उर्मिला किछु नहि बजलीह. पति’क मजबूरी केँ यथोचित सत्कार देनाए अपन पत्नी धर्म बुझलथिन. मुदा ओ चुप रहलीह. जखन भावना’क ज्वार हृदय सँ निकलि आँखि मे एलनि तऽ आँखि सँ नोर निर्बाधित रुप सँ बहए लागलनि आ पतिदेव हुनकर बामा हाथ सँ बाँहि पकड़ने दाहिना हाथ सँ नोर पोछऽ लागलनि तऽ हिनका सँ नहि रहल गेलनि. हुनकर छाती मे मुँह नुकाए हिचुकि हिचुकि केँ कानए लागलीह. हिचुकी’क बीचे मे उर्मिलोक मुँह सँ निकलए लागलैन, “हमहुँ अहाँ सँ बहुत प्रेम करैत छी. ई हमर पूर्व जन्म’क कृति अछि जे अहाँ सन पति भेटल अछि.” &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पति दुनू गाल केँ अपन हाथ मे लऽ अपना दिस खीचि लेलकनि, एक बेर नोर सँ भरल लाल लाल आँखि मे देखि कहए लागलनि, “अहाँ’क आज्ञा बिना हम नहि जा सकैत छी. जाबए धरि अहाँ हँसी खुशी नहि विदा करब हमरा कोनो काज मे मोन नहि लागत. हमर यात्रा सफल नहि होयत”. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“हमर कोन गलती? हम कोनो बहुत पैघ डीमान्ड कऽ रहल छी? हमरा तऽ केवल अहाँक सामीप्य चाही. हम तऽ सिर्फ अहाँक सँग रहए चाहैत छी”, उर्मिला बिना साँस लेने एक्के दम मे सब बात कहि गेलीह. &lt;br /&gt;पतिदेव जवाब देलथिन्ह, “हम फेर सँ वैह आर्गुमेन्ट देब. अहाँ अपन पिता’क घर मे सुख समृद्धि मे जीवन बीतेने छी. अहाँक कोमल शरीर आ कोमल हृदय दुनियाँक यथार्थ सँ भेँट नहि केने अछि. एक पति भेलाक कारणेँ हम कहि रहल छी जे अहाँ जुनि जाऊ. जीवन बहुत पैघ छैक आ ई समय बहुत कम. बुझियो जे हम गेलहुँ आ खट दऽ आबि गेलहुँ”.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उर्मिला’क उमड़ल भावना फेर सँ निराशा मे बदैल रहल छल. हुनका होमए लागलैन जे पतिदेव जिद्दी किस्म के इन्सान छथि. ओहो तर्क सँ अपन बात कहबाक प्रयास करए लागलनि, “भऽ सकैत अछि जे शरीर सँ हम कोमल छी आ आई धरि कोनो विशेष टेन्शन नहि झेललहुँ. मुदा मानसिक रुपेँ हम ओतबी मजगूत छी.”&lt;br /&gt;पतिदेव कहलकनि, “उर्मिला! अहाँक भावना’क हम सम्मान करैत छी. मुदा हम अहाँ सँ बेसी दुनियाँ देखने छी. तेँ कहैत छी, अहाँ रुकि जाउ.”&lt;br /&gt;उर्मिला जवाब देलथिन, “हम अहाँ’क बात सँ सहमत भऽ जैतहुँ. अहाँ’क पैघ भाए अहाँ माएक’क जिद्द’क लेल जाएत छथि तऽ जाथु. अहाँ छोट भऽ केँ हुनका मदद लेल जैत छी त जाउ. मुदा जहिना अहाँक भाउजी अहाँक भैया सँग लागल जैत छथि, ओहिना हमरो सँग नेने चलु.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पतिदेव केँ उर्मिला’क एत्ते तर्क’क आशा नहि छलनि. ई बात सत्य छल जे हुनकर भाउज हुनका लोकनिक सँग जा रहल छलीह. हुनके लोकनिक सँग उर्मिला से चलि जेतीह तऽ एहि मे कोन हर्ज. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओ आब दोसर तर्क देबए लागलाह, “उर्मिला अहाँ एखन हमरा घर मे एकटा नवकनियाँ छी. अहाँ सँ हमरा माए बाबूजी’क बहुत लालसा छन्हि. हुनकर कुटुम्ब आ समाज हुनका सँ पुछतन्हि जे पुतोहु विवाह’क तीने सप्ताह बाद कतय गेलथिन्ह, तऽ हुनका कोनो जवाब नहि भेटतन्हि. हमर माए बाबुजी हमरा लेल भगवान सँ कम नहि छथि. हम हुनका लोकनि केँ मजबूर नहि देखए चाहैत छिअन्हि”.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उर्मिला केँ मोन मे भेलनि जे कहि दैथ. हँ! एहने माए जे बेटा’क विवाहोपरान्त एत्तेक नाटक केने होइन्हि आ एहेन पिताजी जे हिनकर माता’क अनर्गल माँग पर मजबूर भऽ चुप्प छथि. मुदा हुनकर अपन शिक्षा आ सँस्कार हुनका चुप्प रहबाक लेल प्रेरित करैत रहलनि. ओ चुप्प रहलीह. जखन हिनका मुँह सँ किछु नहि निकललन्हि तऽ पतिदेव फेर सँ कहए लागलन्हि, “देखु उर्मिला! अहाँ हमरा सँ प्रेम करैत छी की नहि?”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओ कहलीह, “हँ! हम अहाँ सँ बहुत प्रेम करैत छी”. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;“प्रेम देबाक नाम थीक. हम अहाँ केँ तर्क सँ नहि बुझा सकलहुँ. तेँ किछु माँगि रहल छी. बाजू अहाँ हमर माँग पूरा करब?” पतिदेव कहलकनि. &lt;br /&gt;ओ फेर सँ चुप्प रहलीह. पतिदेव किछु काल प्रतीक्षा’क बाद मे फेर सँ कहए लागलाह, “उर्मिला! तऽ की अहाँ अपन पति केँ हारैत देखए चाहैत छी. अहाँ के ई नीक लागत? जे समाज हमरा कायर बुझए.”&lt;br /&gt;पतिदेव सँगमरमर’क फर्श पर ठेहुन भरे बैसि गेलाह आ हाथ मे मुँह नुकाए नहुएँ नहुएँ अपने आप सँ कहए लागलाह, “उर्मिला! हम मजबूर छी. हमर सहायता करु”. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एहि बेर उर्मिला केँ अपन पति’क बात मे सत्यता आ इमानदारी देखा पड़लनि. हुनका उपर मे हिनका दया आबए लागलनि. अपना आप सँ घृणा होमए लागलनि. अपने आप के कहए लागलीह, “उर्मिला! अपन सासु जेकाँ अपन स्वार्थ केँ सबसँ आगू जुनि करु! ”. यदि कोनो भाजेँ ई बात हुनकर नैहर चलि जैन तऽ हुनकर माए बाबूजी’क प्रतिष्ठा केँ ठेस पहुँचतनि. आगू फर्श पर पति बैसल छलनि, निराश आ आ मजबूर. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पति’क बाँहि पकड़ि ओ उठा देलथिन आ कहय लागलीह, “हे लक्षमण, हम जनक पुत्री उर्मिला अहाँक एक पत्नी’क रुप मे अहाँ के अनुमति दैत छी जे अहाँ जाउ, आ अपन भैया-भाउजी के हुनकर धार्मिक कर्तव्य’क पालन करबा मे सहयोग करु. हम बारह बरस धरि अहाँ बाट ताकब. जाउ आ अहाँ जग जीत केँ आऊ”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किछु धरि पतिदेव अवाक छलाह. उर्मिला सेहो अवाक छलीह. जखन पतिदेव प्रशँशा आ धन्यवाद’क दृष्टि सँ देखए लागलन्हि तऽ हिनका रहए नहि गेलनि. बारह बरस छोट समय नहि होइत छैक. से सोचि, एक बेर फेर सँ हुनका आँखि सँ अश्रु धारा बहए लागलनि. पति चुनौती देलकनि, “अहाँ कहैत छी जे मानसिक रुप सँ बहुत मजगूत छी, आब अहाँ किएक कानि रहल छी.”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुरन्ते नोर पोछि उर्मिला यथावत ठाढ़ रहलीह. पति हिनकर नोर पोछि कहलकनि, “एना नहिँ! अहाँ हँसि के हमरा विदा करु.” उर्मिला’क मुस्की निकलि गेलनि. किछुए देर मे यात्रा’क तैयारी होमए लागल. उर्मिला ओहि तैयारी मे व्यस्त छलीह, एहि बात सँ अनजान जे हुनकर त्याग केँ कोनो मोल नहि भेटतन्हि वा नहि. शायद भावना के दबाए अपन पत्निधर्म निभा रहल छलीह. &lt;br /&gt;ओहि यात्रा’क सँग मानवता’क इतिहास सेहो आगू बढ़ल जा रहल छल. एकबेर फेर सँ, एकटा स्त्री, एकटा पुरुष केँ हरा देने छलीह. आ उर्मिला मानवे टा नहि मानवता केँ सदा’क लेल अपन ऋणी बना देने छलीह. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतिहास सतर्क छल. अपन एकटा महत्वहीन पन्ना मे एहि घटना केँ सावधानी सँ नुका लेबाक योजना बना रहल छल.&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-1212858118402294947?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/1212858118402294947/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=1212858118402294947' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/1212858118402294947'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/1212858118402294947'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2011/07/blog-post.html' title='विवाह’क तेसर सप्ताह (कहानी)'/><author><name>Padmanabh (आदि यायावर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00743001936020943683</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://1.bp.blogspot.com/_4SASqC7hsM8/SrRri01HSII/AAAAAAAAAnU/gBMnXU-WKmI/s1600-R/4.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-hqRmwiv2dCY/TiaXMBp7AwI/AAAAAAAAAtk/0x91l7eKhCc/s72-c/ill_011.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-1112374658969003113</id><published>2011-06-11T21:19:00.013+05:30</published><updated>2011-07-14T01:32:34.024+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>किछु त हम करब</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;u&gt;किशन कारीगर&lt;/u&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;अवस्था भेल हमर आब बेसी&lt;br /&gt;टुघैर टुघैर हम चलब&lt;br /&gt;अहाँ आगू आगू हम पाछू पाछू मुदा&lt;br /&gt;अपना माटि पानि लेल किछु त' हम करब&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नूनू बौआ अहाँ आऊ&lt;br /&gt;बुच्ची दाय अहूँ आऊ&lt;br /&gt;दुनू गोटे मिली जल्दी सँ&lt;br /&gt;मैथिली में किछु खिस्सा सुनाऊ &lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none; float: right; line-height: 100%; margin: 12px; padding-bottom: 5px; padding-top: 5px; text-align: center; width: 200px;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-bNbC4P-_09U/TfOS3wzPtaI/AAAAAAAAACU/_HxZ9EJqSp8/s1600/Kishan%2BKarigar.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; cssfloat: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img alt="" border="0" height="200" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5616994646951441826" src="http://4.bp.blogspot.com/-bNbC4P-_09U/TfOS3wzPtaI/AAAAAAAAACU/_HxZ9EJqSp8/s200/Kishan%2BKarigar.jpg" style="height: 221px; margin-top: 0px; width: 176px;" width="159" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;br /&gt;&lt;span style="font-size: 85%;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-bNbC4P-_09U/TfOS3wzPtaI/AAAAAAAAACU/_HxZ9EJqSp8/s1600/Kishan%2BKarigar.jpg" onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}"&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;strong&gt;कवि- &lt;/strong&gt;श्री किशन कारीगर&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नान्ही टा मे बजलौहं एखनो बाजू&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;मातृभाषा मे बाजू अहाँ निधोख&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;कनि अहाँ बाजू कनेक हम बाजब&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;नहि बाजब त कोना बुझहत लोक&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;परदेश जायत मात्र किछु लोक&lt;/div&gt;बिसैर जायत छैथ मातृभाषा कें&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;अहिं बिसैर जायब त आजुक नेना कोना बुझहत&lt;/div&gt;केहन मीठगर सुआद होयत अछि मातृभाषा केँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अप्पन माटि पानि अप्पन भाषा संस्कृति&lt;br /&gt;पूर्वज के दए गेल एकटा अनमोल धरोहर&lt;br /&gt;&lt;div style="border-bottom: medium none; border-left: medium none; border-right: medium none; border-top: medium none;"&gt;एही धरोहर के हम बचा के राखब&lt;/div&gt;अपना माटी पानि लेल किछु त हम करब&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोना होयत अप्पन माटिक आर्थिक विकास&lt;br /&gt;सभ मिली एकटा बैसार करू कनेक सोचू&lt;br /&gt;सभहक अछि एकटा इ दायित्व&lt;br /&gt;किछु बिचार हम कहब किछु त अहूँ कहू&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमरा अहाँक किछु कर्तब्य बनैत अछि&lt;br /&gt;एही परम कर्तब्य सँ मुँह नहि मोडू&lt;br /&gt;सिनेह राखू हृदय मे सभ के गला लगाऊ&lt;br /&gt;अपना माटी पानि सँ लोक के जोडू&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समाजक लोक अपने में फुटौवैल करैत छथि&lt;br /&gt;मनसुख देशी त धनसुख परदेशी&lt;br /&gt;एक्के समाज में रहि ऐना जुनि करू&lt;br /&gt;एकजुट हेबाक प्रयास आओर बेसी करू&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक भए एक दोसरक दुःख दर्द बुझहब&lt;br /&gt;अनको लेल किएक ने कतेको दुःख सहब&lt;br /&gt;आई एकटा एहने समाजक निर्माण करब&lt;br /&gt;जीबैत जिनगी किछु त हम करब&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाम्रो अछि एकटा सेहनता एक ठाम बैसी&lt;br /&gt;सभ लोक अपन भाषा में बाजब&lt;br /&gt;औरदा अछि आब कम मुदा जीबैत जिनगी&lt;br /&gt;अपना माटी पानि लेल किछु त हम करब ।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-1112374658969003113?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/1112374658969003113/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=1112374658969003113' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/1112374658969003113'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/1112374658969003113'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2011/06/blog-post.html' title='किछु त हम करब'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-bNbC4P-_09U/TfOS3wzPtaI/AAAAAAAAACU/_HxZ9EJqSp8/s72-c/Kishan%2BKarigar.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-4141301035641428703</id><published>2011-03-03T14:58:00.005+05:30</published><updated>2011-07-14T01:19:47.613+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='करण समस्तीपुरी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>स्वागत बसंत</title><content type='html'>&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial; line-height: 25px; "&gt;&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;-- करण समस्तीपुरी &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;स्वागत ! स्वागत !! स्वागत बसंत !!!&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;हे प्रेमपुंज ! हे आशरूप !! &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;ऋतुपति अहाँक सुषुमा अनंत !&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;स्वागत ! स्वागत !! स्वागत बसंत !!!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;कानन कें कान्ति न जाए कहल !&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;आभूषण किसलय केर बनल !!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;धरती पर पियरी शोभी रहल !!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;मानू बिधि कें रचना जीवंत !!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;स्वागत ! स्वागत !! स्वागत बसंत !!!&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;&lt;img src="http://lh6.ggpht.com/_q18Jv2Ke6F0/TXPqvZ2RTGI/AAAAAAAAAbc/W8qX7DbJ4Us/mango%20tree_thumb.png?imgmax=800" alt="mango tree" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;आम-मज्जरि कें महक सँ,&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;आर खग-कुल कें चहक सँ,&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;आर &lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="line-height: 28px; font-size: medium; "&gt;अलि&lt;/span&gt;-गण कें भनक सँ,&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;गुंजि रहल अछि दिक्-दिगंत !&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;स्वागत ! स्वागत !! स्वागत बसंत !!!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;मन्मथ कें मारि बनल असह्य !&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;कोयली केर कूक करुण अतिशय !!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;सुनि विरही उर उपजय संशय!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;विरहानल के भरकावय कि,&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;करय आएल छी सुखद अंत !!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"&gt;स्वागत ! स्वागत !! स्वागत बसंत !!!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;font-size: 14px; "&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-4141301035641428703?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/4141301035641428703/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=4141301035641428703' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/4141301035641428703'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/4141301035641428703'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2011/03/blog-post_03.html' title='स्वागत बसंत'/><author><name>करण समस्तीपुरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10531494789610910323</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-zgJY8sxmk94/TfnT23xrHYI/AAAAAAAAAfE/_WkrcWl40DY/s220/P5200936.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://lh6.ggpht.com/_q18Jv2Ke6F0/TXPqvZ2RTGI/AAAAAAAAAbc/W8qX7DbJ4Us/s72-c/mango%20tree_thumb.png?imgmax=800' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-6950657657250342958</id><published>2011-03-02T15:22:00.002+05:30</published><updated>2011-07-14T01:20:25.487+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>अंतर     (सुभाष चंद्र)</title><content type='html'>हुनका आ हमरा मे&lt;br /&gt;अंतर अछि एतबा&lt;br /&gt;ओ परहित चाहैत छथि&lt;br /&gt;हम आत्महित चाहैत छी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हुनका आ हमरा मे&lt;br /&gt;मतभेद अछि एतबा&lt;br /&gt;ओ राष्ट्रहित चाहैत छथि&lt;br /&gt;हम स्वहित चाहैत छी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड मोसकिल अछि&lt;br /&gt;दू पीढि़क मध्य&lt;br /&gt;ओ काज चाहैत छथि&lt;br /&gt;हम नाम चाहैत छी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहन कखनो निर्णय केल जाइत अछि&lt;br /&gt;देशक तकदीर&lt;br /&gt;ओ आदर पाबैत छथि&lt;br /&gt;हम कुर्सी पाबैत छी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-6950657657250342958?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/6950657657250342958/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=6950657657250342958' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/6950657657250342958'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/6950657657250342958'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2011/03/blog-post.html' title='अंतर     (सुभाष चंद्र)'/><author><name>कुन्दन कुमार मल्लिक</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03699865603391260097</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_-9ADAG7dVhY/ScCiR0H28RI/AAAAAAAAAMY/UhqVSNtVezc/S220/kkkkkkkkkk.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-1958396897269622904</id><published>2011-02-23T00:00:00.003+05:30</published><updated>2011-07-14T01:20:59.545+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>नियति-      (सुभाष चंद्र)</title><content type='html'>&lt;div align="right"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;- सुभाष चंद्र&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="left"&gt;बहुत किछु देखि कय हम&lt;br /&gt;आँखि मूनि लैत छी&lt;br /&gt;बहुतो के पुकार केँ&lt;br /&gt;अनसुना कय चलि जाइत छी&lt;br /&gt;मौनक गप्प बाहर नहि निकलि जाए&lt;br /&gt;अंत:करण मे दबा लैत छी&lt;br /&gt;किएक&lt;br /&gt;सच&lt;br /&gt;देखबा, सुनबा आ कहबाक अंजाम&lt;br /&gt;अखबारक पहिल पन्ना पर&lt;br /&gt;कतेको दिन देखि चुकल छी&lt;br /&gt;नियति सेहो किछु एहने सन भ गेल&lt;br /&gt;स्वयं केँ ऑन्हर, बहिर आ बौक मानि&lt;br /&gt;घर सँ बाहर निकलैत छी।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-1958396897269622904?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/1958396897269622904/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=1958396897269622904' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/1958396897269622904'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/1958396897269622904'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2011/02/blog-post_23.html' title='नियति-      (सुभाष चंद्र)'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-1155232089258577049</id><published>2011-02-16T00:00:00.003+05:30</published><updated>2011-07-14T01:21:28.638+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>कालजयी</title><content type='html'>&lt;div align="right"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;-&lt;u&gt;विवेकानंद ठाकुर&lt;/u&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;हमर उमेरक&lt;br /&gt;कोनो नहि थाप&lt;br /&gt;कोनो नहि लेखा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहिया धरि जिनगी&lt;br /&gt;कमाइ छी&lt;br /&gt;कमाइत-कमाइत&lt;br /&gt;गोटेक दिन&lt;br /&gt;टन द' रहि जाएब&lt;br /&gt;माटिक बासन जकाँ&lt;br /&gt;उमेरक बासन जकाँ &lt;div style="BORDER-TOP: rgb(92,138,100) 5px solid; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 5px; MARGIN: 12px; WIDTH: 200px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 5px; BORDER-BOTTOM: rgb(92,138,100) 5px solid; TEXT-ALIGN: center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;strong&gt;कवि- श्री विवेकानंद ठाकुर,&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्री विवेकानंद ठाकुर कें हुनक पोथी 'चानन घन गछिया' के लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटि चुकल छन्हि।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उमेरक हिसाब राखथि&lt;br /&gt;बाबू-भैया&lt;br /&gt;पढ़ुआ-कमौआ&lt;br /&gt;जे भरि दिन रहथि छाहरि मे&lt;br /&gt;हमर उमेरक कोन हिसाब?&lt;br /&gt;माइ केँ पुछलिअइ&lt;br /&gt;एक बेर&lt;br /&gt;अपन उमेर&lt;br /&gt;ओकरो नहि बूझल&lt;br /&gt;माइयो कें नहि बूझल&lt;br /&gt;अपन बेटाक उमेर&lt;br /&gt;ओकरा एतबे मोन&lt;br /&gt;जाइ बरख&lt;br /&gt;घरे-बाहरे&lt;br /&gt;मडुआ भेलइ&lt;br /&gt;ताइ बरख&lt;br /&gt;हमर जनम&lt;br /&gt;एतबे मोन&lt;br /&gt;भूकम्पक साल&lt;br /&gt;जे पहिल-पहिल&lt;br /&gt;पकड़लौँ हरक मूठि&lt;br /&gt;से आइ धरि पकडऩे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एहि बीच&lt;br /&gt;कतेक बाबू-भैया केँ&lt;br /&gt;कतेक पढ़ुआ-कमौआ केँ&lt;br /&gt;काल चिबा गेल&lt;br /&gt;एकटा हम...&lt;br /&gt;जे काले केँ चिबा&lt;br /&gt;आइ धरि&lt;br /&gt;हरक मूठि पकडऩे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-1155232089258577049?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/1155232089258577049/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=1155232089258577049' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/1155232089258577049'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/1155232089258577049'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2011/02/blog-post_16.html' title='कालजयी'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-5551272820220681623</id><published>2011-02-09T10:42:00.011+05:30</published><updated>2011-07-14T01:21:59.099+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कुन्दन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>कतेक रास बात</title><content type='html'>&lt;div align="right"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;- &lt;/span&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;&lt;u&gt;कुन्दन कुमार मल्लिक&lt;/u&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;अज्ञातवास सँ निकसय के प्रयास करैत&lt;br /&gt;आई इक बेर फेर लेखनी धेने छी&lt;br /&gt;आई फेर मोन पड़ैत अछि&lt;br /&gt;ओ कतेक रास बात&lt;br /&gt;मोन पड़ैत अछि ओ दिन&lt;br /&gt;जखन कतेक रास बात&lt;br /&gt;सफलताक चरम पर छल&lt;br /&gt;मोन पड़ैत अछि ओ चौकड़ी&lt;br /&gt;चौकड़ी यायावरजी, राजीवजी, करणजी आ हमर&lt;br /&gt;ओ माछ-भातक भोज आ &lt;div style="BORDER-TOP: rgb(92,138,100) 5px solid; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 5px; MARGIN: 12px; WIDTH: 200px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 5px; BORDER-BOTTOM: rgb(92,138,100) 5px solid; TEXT-ALIGN: center"&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;कतेको मास सँ सुषुप्तावस्था मे रहल एहि मंच केँ एक बेर फेर सँ जागृत करय के एकटा छोट प्रयास. अपनेक वैह सहयोग आ मार्गदर्शनक आस रहत।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;- कुन्दन कुमार मल्लिक,&lt;br /&gt;सम्पादक, &lt;a href="http://www.vidyapati.org/"&gt;"कतेक रास बात"&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;संपर्क- +९१-८६५१०-१६८१४&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;किनको ओहिठाम जा धमकनाय&lt;br /&gt;विकट पाहुन बनि&lt;br /&gt;मोन पड़ैत अछि ओ स्वप्न&lt;br /&gt;जे संगे देखने छलहुँ&lt;br /&gt;एहि मंच के आगू बढ़बय हेतु&lt;br /&gt;मोन पड़ैत अछि ओ सम्मान&lt;br /&gt;जे भेटल छल एकरे माध्यम सँ&lt;br /&gt;मुदा आब बुझायत अछि&lt;br /&gt;छुटि चुकल, जीवनक भागा-दौड़ी मे&lt;br /&gt;स्वप्न, सम्मान सभ किछु&lt;br /&gt;बिसरि चुकलहुँ ओ लक्ष्य&lt;br /&gt;जे निर्धारित केने छलहुँ&lt;br /&gt;सभ केओ मिलि केँ&lt;br /&gt;मुदा&lt;br /&gt;आई इक बेर फेर उपस्थित छी&lt;br /&gt;अपनेक सभहक समक्ष&lt;br /&gt;फेर वैह स्वप्नक संग आ&lt;br /&gt;वैह लक्ष्य नेने&lt;br /&gt;अपन एहि नव कृतिक संग&lt;br /&gt;आस अछि फेर भेटत&lt;br /&gt;अपनेक वैह सिनेह&lt;br /&gt;वैह सहयोग, वैह मार्गदर्शन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आस अछि फेर सँ एताह&lt;br /&gt;'सुभाषजी' आ 'विवेकानंदजी'&lt;br /&gt;अपन-अपन अनुपम कृति लय&lt;br /&gt;आ एताह 'आदि यायावारजी'&lt;br /&gt;अपन तीक्ष्ण टिप्पणीक संग&lt;br /&gt;फेर एताह 'करणजी'&lt;br /&gt;अपन अनुपम विवेचनाक संग&lt;br /&gt;आ 'राजीवजी' देखौताह&lt;br /&gt;अपन वैह 'बेगरता'&lt;br /&gt;हम त' रहबे करब&lt;br /&gt;अपनेक सभहक सिनेहक आस मे&lt;br /&gt;आ सभ केओ मिलि&lt;br /&gt;फेर सँ करब, वैह&lt;br /&gt;"कतेक रास बात"।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-5551272820220681623?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/5551272820220681623/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=5551272820220681623' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/5551272820220681623'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/5551272820220681623'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2011/02/blog-post.html' title='कतेक रास बात'/><author><name>कुन्दन कुमार मल्लिक</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03699865603391260097</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_-9ADAG7dVhY/ScCiR0H28RI/AAAAAAAAAMY/UhqVSNtVezc/S220/kkkkkkkkkk.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-7587023328352464987</id><published>2010-04-02T22:07:00.002+05:30</published><updated>2010-04-02T22:29:05.425+05:30</updated><title type='text'>स्टेशन पर’क हरियर दुबि आ लाल गुलमोहर</title><content type='html'>&lt;div align="right"&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#006600;"&gt;लेखक-आदि यायावर&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;(१)&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;रेखा केँ नइँ जानि किएक मोन भऽ गेलनि जे स्टेशन पर जा केँ कनि काल’क लेल बैसल जाए. किछुए दिन’क गप्प अछि फेर तेँ ओ एहि स्टेशन केँ छोड़ि के चलि जेतीह, आ तकर बाद फेर सँ एतय एबाक कोनो प्रयोजन नहिँ. पछिला तीन साल ओ कोन तरहेँ काटने छलीह से वैह टा जानैत छथि. सरकारी क्वाटर सँ स्टेशन पहुँचबा मे मात्र तीन मिनट’क समय लागैत छलनि. घरे पर बैसि ओ की कऽ सकैत छलीह. बहुत सँ बहुत टी.वी. आन कऽ केँ ओ कोनो सिरीयल’क रीपीट टेलीकास्ट देखि सकैत छलीह. टीवीयो देखबा मे आब कोनो मोन नइँ लागैत छलनि. जल्दी सँ एहि नरक सँ छुटकारा भेटनि तऽ जा केँ गंगा नहा लेतीह.&lt;br /&gt;नरायनपूर-मुरली स्टेशन. बहुत दिन पहिने सरकार नरायनपूर आ मुरली दुनू गाम केँ खुश करबाक क्रम मे एकर नाम नरायनपूर मुरली स्टेशन राखि देने छल. एहि स्टेशन पर एक दिस सँ मात्र तीन टा ट्रेन आबैत छल, तेँ कुल मिला केँ दिन भरि मे मात्र छओ टा ट्रेन’क आवाजाही छल. सलवार सूट केँ फेरि साड़ी पहिर बिना कोनो मेक-अप केने ओ स्टेशन पहुँचि गेलीह. &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;div style="BORDER-TOP: #5c8a64 5px solid; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 5px; MARGIN: 12px; WIDTH: 200px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 5px; BORDER-BOTTOM: #5c8a64 5px solid; TEXT-ALIGN: center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;रेलवे स्टेशन हमर हृदय’क करीब रहल अछि. बचपन मे लागैत छल जे छोटा बाबु दुनियाँ सबसँ पैघ आफिसर होइत छैक. बचपन मे इच्छा छल जे पैघ भऽ केँ ट्रेन’क गार्ड बनब, जिनकर ईशारा सँ हजारो टन वाला ट्रेन अपने चलि दैत छैक. कतेको बेर हम सुपौल जिला’क अन्तर्गत सरायगढ़ रेलवे स्टेशन पर गुलमोहर’क गाछ निहारि चुकल छी. प्रस्तुत कथा, बचपन मे स्टेशन पर पसरल प्राकृतिक छटा सँ उत्पन्न प्रेम’क प्रतिक्रिया मात्र थीक. आशा अछि २०१० मे लिखल पहिल कथा केँ दर्शक लेखक पसन्द करताह.&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;स्टेशन ओहि लगपास’क सब सँ सुन्दर स्थान छल. रेखा केँ दूरहि सँ स्टेशन’क बाउन्ड्री’क कतार मे गुलमोहर’क गाछ देखा पड़लनि. लाल लाल फूल सँ आच्छादित पचासो टा गाछ एहि वीरान स्टेशन केँ आवश्यकता सँ बेसी मनोरम बना रहल छल. लग एला पर कोयली आ कौआ दुनू’क अवाज सुना पड़लनि. साँझ होमय वाला छल आ दोसर चिड़ै चुनमुनी जे ओहि सबटा गुलमोहर’क गाछ मे अपन खोता लगने छल अपन अपन खोता मे वापस आबि रहल छल. चिड़ै चुनमुनी’क कोलाहल सँ लागि रहल छल जे ओ अपन-अपन खोता केँ बिसरि गेल अछि आ "ई हमर" तऽ "ओ हमर" कहबाक क्रम मे वाद विवाद कऽ रहल अछि. बीच बीच मे कोयली’क कूक बाँकी कोलाहल केँ दबा दैत छल. लगभग तीस फीट चाकर प्लेटफार्म’क आधा भाग सीमेन्ट’क आ दोसर आधा दस फीट हरियर हरियर दुबि सँ भरल छल. दुबि वाला भाग मे किछु किछु दुरि हँटि हँटि केँ लकड़ी’क बेन्च छल. ट्रेन एबा मे एखन एक घँटा छल आ सबटा बेन्च बिल्कूल वीरान छल. मुख्य स्टेशन परिसर’क लऽग मे एकटा चाह’क आ दू टा पान’क दोकान छल. चाह’क दोकानदार अपन कोयला वाला चुल्हा केँ दोकान’क आगू मे राखि आगि पजारि रहल छल. एहि सँ निकलल धुआँ स्टेशन परिसर’क प्राकृतिक सुन्दरता’क लेल उपयुक्त नइँ छल. मुदा एक छोर पर ठाढ़ भेल रेखा जखन अपन नजरि एक किलोमीटर नम्हर प्लेटफार्म पर देलथिन्ह तँ मुँह सँ हठाते निकलि गेलनि, "अद्भूत, विहँगम, अतिसुन्दर". रेखा बी.ए. पास केने रहथि आ साहित्य मे आनर्स. साहित्य आ कला’क प्रेमी रहैथ. अद्भूत आ विहँगम शब्द हुनकर साहित्य प्रेम केँ उजागर करैत छलनि. साहित्य प्रेमी केँ प्राकृतिक सुन्दरता सँ बेसी आओर की चाही.&lt;br /&gt;प्लेटफार्म पार कऽ केँ ओ प्रतीक्षा कक्ष गेलथि. ओतय मात्र तीन टा यात्री बाट ताकि रहल छल. दोसर दिस टिकट काउन्टर छल जाहि पर लिखल छल, "यह खिड़की ट्रेन आने के एक घँटा पहले खुलती है और पाँच मिनट पहले बन्द हो जाती है". बहुत देर धरि ओ सोचैत रहलीह जे ट्रेन एबा सँ पाँच मिनट पहिने टिकट खिड़की किएक बन्द भऽ जैत छैक. पुनः याद एलनि जे स्टेशन पर मात्र चारि टा कर्मचारी नियमित रुप सँ कार्य करैत छैक. स्टेशन मास्टर यानी बड़ा बाबु जक्शन पर रहैत छैक आ सप्ताह मे मात्र दुइ दिनक लेल एहि स्टेशन पर आबैत छैक. रेखा’क पतिदेव रमेश जे असिस्टेन्ट स्टेशन मास्टर’क (मतलब छोटा बाबु) पद पर तैनात छलाह नियमित रुप सँ क्न्ट्रोल रुम, बुकिन्ग काउन्टर, आ सिगनल’क जिम्मेदारी सम्हारैत रहैत छलाह. आ बाँकी एकटा खलासी आ एकटा चपरासी. छोटा बाबु’क जिम्मेदारी बहुते महत्वपूर्ण छल. दोसर कर्मचारी नइँ रहबाक कारणेँ ट्रेन एबा सँ पाँच मिनट पहिने खिड़की बन्द कऽ केँ ओ सिगनल डाउन करबाक लेल चलि जैत छलाह.&lt;br /&gt;रेखा’क पति रमेश बहुत दिन सँ कहैत छलनि जे भोर साँझ केँ स्टेशन पर आबि जेबाक लेल. एतेक सुन्दर आ मनोरम स्थान दोसर ठाम नइँ भेट सकैत छलनि. स्थान ठीके बहुत मनोरम छल. भोर आ साँझ केँ प्राकृतिक सुन्दरता कनि आओर बेसी बढ़ि जैत छल. नइँयोँ जानि बुझि के, मुदा दिमागक एक कोनटी मे हुनका ई गप्प बैसल छलनि जे स्टेशन सन दिब्य स्थान पूरे ईलाका मे नइँ. टिकट काउन्टर फुजि गेल छल. वेटिँग रुम’क एक छोर सँ रेखा केँ खिड़की’क दोसर कात अपन पति’क व्यस्त मुँह देखा पड़ि रहल छलनि. किछुए काल मे लोक’क आवाजाही बढ़ि गेल. टिकट काउन्टर पर लाइन लागि गेल. रेखा वेटिँग रुम’क सार्वजनिक बेन्च पर बैसि अपन अतीत’क बारे मे सोचय लागलीह. &lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;br /&gt;(२) &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;रेखा एक मध्यमवर्गीय मुदा प्रगतिशील परिवार सँ छलीह. हुनकर बाबुजी एक साधारण किरानी’क नौकरी सँ अपन मेहनत आ अपन मेधा’क बुता सँ आई केन्द्रीय सँस्थान मे आफिसर पद पर तैनात छलाह. बहुत कमे होइत छैक जे परिवारिक जीवन यापन करैत लोक अपन पढ़ाई लिखाई आगु जारी राखैत छैक. मुदा ओ डीग्री लैत गेलाह आ आई किरानी सँ आफिसर बनि गेलाह. दू टा बेटी छलनि आ एकटा बेटा. अपने गाम’क सरकारी स्कूल मे पढ़ने छलाह मुदा धिया पूता केँ कोनवेन्ट स्कूल मे अन्ग्रेजी मीडियम सँ पढेलाह. बेटी सब बेटा सँ बेसीए तेज छलनि.&lt;br /&gt;समय बीतला पर जखन रेखा ग्रैजुएशन कऽ लेलीह तऽ हुनका रेखा’क विवाह’क चिन्ता सतबे लागलनि. रेखा सुन्दर, सुशील, गृह कार्य मे दक्ष, आ कान्वेन्ट एजुकेटेड छलीह. आधुनिक समाज मे एक योग्य कन्या’क सबटा गुण नेने. रेखा अपन विवाह’क पुरा जिम्मेदारी अपन बाबुजी पर सौँपि देने छलीह. हुनका विश्वाश छलनि जे ओ जे करताह से नीके.&lt;br /&gt;रेखा केँ अपन बाबुजी’क केवल एकेटा चीज पसन्द नइँ छलनि. हुनकर बाबुजी चहैत छलथिन जे वर सरकारी नौकरी करए वाला होमय. रेखा’क मोन छलनि जे लड़का प्राइवेट नौकरी करए वाला आ मेट्रोपोलिटन सिटी मे स्थापित होएबाक चाही. जतय हुनकर बाबुजी सरकारी नौकरी केँ स्थाई, पेन्शन देमए वाला, मेडिकल आ अन्य अनगिनत सुविधा देबय वाला आ बिना कोनो छुट्टी’क समस्या वाला बुझैत रहथिन, प्राईवेट नौकरी केँ ओ अस्थाई, आवश्यकता सँ बेसी मेहनत’क डिमान्ड वाला, दरमाहा’क अतिरिक्त कोनो अन्य सुविधा नइँ देबय वाला, कखनहुँ निकालि देबय वाला, आ सबसँ बेसी अप्रतिष्ठित लागैत छलनि.&lt;br /&gt;एक दिन रेखा आ हुनकर बाबुजी मे सरकारी आ प्राईवेट नौकरी मुद्दा पर बहस भऽ गेल छलनि. रेखा कहने छलथिन, "प्राइवेट नौकरी मेहनत करए वाला’क लेल अछि, सरकारी नौकरी कामचोर’क लेल. प्राइवेट नौकरी मेधावी लोक के दिन दुना राति चौगूना हिसाब सँ आगू बढ़बैत छैक. अन्त मे प्राईवेट कम्पनी मे काज करए वाला लोक स्मार्ट आ सरकारी नौकरी करए वाला अन-स्मार्ट होइत छैक".&lt;br /&gt;हुनकर बाबुजी’क जवाब छलनि, "सरकारी नौकरी बिना सँघर्ष केने नइँ भेटैत छैक. बहुत मेहनत आ लगन चाही. जे लोक मेहनत नइँ करय चाहैत छथि ओ प्राइवेट दिस चलि जैत छथि. तेँ असल कामचोर तऽ प्राइवेटे वाला होइत छैक..."&lt;br /&gt;रेखा’क जवाब छलनि, "सरकारी नौकरी करए वाला एगारह बजे आफिस आबैत छैक, ठीक पाँच बजे फेर वापस. भगवान मनुष्य केँ काज करबाक लेल बनौने छैक. काज करबाक मतलब होइत छैक चलैत रहब. रुकि गेनाइ बुझु मृत्युक प्रतीक. नीको लोक सरकारी नौकरी मे एलाक बाद ओहने भऽ जाइत छैक. एहेन लोक आलसी आ समाज आ देश’क प्रगति मे बाधक होइत छैक. आ एखन धरि हम सरकारी नौकरी मे अनैतिक काज भ्रष्टाचार’क गप्प नइँ केने छलहुँ."&lt;br /&gt;दुनू लोकनि अपन अपन जगह ठीक. आम आ लताम मे कोन नीक आ कोन खराप से व्यक्ति विशेष पर निर्भर करैत छैक. आमक अपन महत्व मुदा एकर मतलब कथमपि नइँ जे लताम खराप फल छैक. दोसर गप्प जे रेखा’क बाबुजी, "रेखा’क गप्प" सँ सहमति छलाह. मुदा समाजे एहेन छल जे सरकारी नौकरी केँ बेसी महत्व दैत छल. रेखा’क गप्प हुनका नीक लागनि मुदा ओ कहियो मोन नइँ बना सकलाह जे रेखा’क विवाह एक प्राईवेट नौकरी करए वाला व्यक्ति सँ कऽ देल जाए.&lt;br /&gt;रेखा पढ़ल लिखल आधूनिक कन्या छलीह. ओ एहेन समाज मे रहैत छलीह जतय लड़की’क जीवन सँगी हरदमे हुनकर माँ बाप’क पसन्द सँ होइत छलैक. ओ अपन बाबुजी केँ आदर्श मानैत छलीह आ हुनका सँ बहुत प्रेम करैत छलीह. प्रेम एक मजबुरी’क नाम सेहो थीक. ओ अपन बाबुजी सँ एतेक प्रेम करैत छलीह जे अपन जीवन सँगी केहेन हो तकर फैसला अपना पर नहि मुदा अपन बाबुजी पर छोड़ि देने छलीह.&lt;br /&gt;किछु समय’क बाद रेखा’क विवाह हाजीपूर मे पदस्थापित, एम.एस.सी. फर्स्ट क्लास मे पास, रेलवे मे असिस्टेन्ट स्टेशनमास्टर पद पर कार्यरत रमेश सँ भऽ गेलनि.&lt;br /&gt;विवाहोपरान्त, रमेश’क क्वालिफिकेशन हुनका नीक लागलनि. व्यक्त्वि सँ प्रभावित से छलीह. सब किछु नीक लागलनि, मुदा एकटा गप्प हरदम खटकैत रहलनि. हुनका सरकारी नौकरी पसन्द नइँ छलनि. दोसर गप्प जे रमेश’क मेधावी कैरियर देखि, आ मेहनत करबाक ऊहि देखि, हुनका होइत छलनि जे यदि ओ कोनो सोफ्टवेयर कम्पनी मे नौकरी करतथि तऽ हुनकर तरक्की खुब भेल रहतनि. कोनो भाजेँ मोन मारि केँ ओ जीवन यापन करैत छलीह. मुदा तखन तऽ हद भऽ गेलनि जखन रमेश’क ट्रान्सफर एकटा गाम घरक छोटका स्टेशन नरयणपूर-मुरली मे भऽ गेलनि.&lt;br /&gt;रेखा’क सँगी लोकनिक विवाह बँगलोर’क सोफ्टवेयर इन्जीनियर, तऽ पुणे’क बहुराष्ट्रीय कम्पनी मे काज करय वाला लड़का सँ भेल छल. हाजीपूर धरि ठीक छल, मुदा नारायणपूर मुरली मे "छोटा बाबुक" पद हुनकर कोनो दुखःद स्वपनो मे नइँ आयल छलनि. &lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;br /&gt;(३)&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;नरायणपूर आ मुरली दू अलग अलग गाम छल. दुनू गाम’क अलग पँचायत, अलग मुखिया आ अलगे व्यवस्था, मुदा एकेटा रेलवे स्टेशन. दुनू गाम मे मिडिल स्कूल केँ छोड़ि बाँकी कोनो सरकारी आफिस नइँ. दुनू गाम मे रमेश जे एम.एस.सी. प्रथम श्रेणी सँ पास छलाह, हुनका सँ बेसी किओ पढ़ल लिखल नइँ. कोनो भी लोक’क तीन दृष्टि सँ सम्मान भेटैत छैक. पहिल जे ओ लोक केहेन छथि, हुनकर व्यक्तित्व केहेन छनि. दोसर ओ कतेक पढ़ल लिखल व्यक्ति छथि. तेसर जे ओ कोन पद पर काज करैत छथि. दुनू गाम मिला केँ रमेश सँ बेसी नइँ तऽ किओ पढ़ले लिखल छल, नइँयेँ हुनका सन किनको व्यक्तित्वे छलनि आ दुनू गाम’क एक मात्र सरकारी आफिस (रेलवे स्टेशन) मे ओ सर्वोच्च पद पर कार्य कऽ रहल छलाह. तेँ दुनू गाम’क लोक हुनकर एत्तेक सम्मान करैत छलनि जे दोसर ठाम रमेश सोचियो नइँ सकैत छलाह. गाम मे कोनो भोज’क आयोजन हो, रमेश केँ पहिल निमन्त्रण पड़ैत रहनि. भगवानो’क पूजा’क मुख्य अतिथि वैह रहैत छलाह. गाम घर मे कोनो परिवारिक झगड़ा भऽ गेल हो तऽ रमेश’क फैसला सर्वमान्य रहैत छल. किनको अपन धिया-पूता’क कैरियर सम्बन्धी सलाह मशविरा’क लेबाक हो रमेश लऽग लोक हाजिर भऽ जैत छलनि.&lt;br /&gt;रमेश एत्तेक सम्मान’क उम्मीद नइँ करैत छलाह. गाम’क लोक मे आपस मे इर्ष्या द्वेष बहुत सामान्य गप्प छल. मुदा रमेश’क के देल गेल ओ एहेन सम्मान छल जे दबाव मे नइँ मुदा प्राकृतिक रुप सँ लोक’क बिल्कुल हृदय सँ निकलल सम्मान छल. इर्ष्या इर्ष्या केँ जन्म दैत छैक, द्वेष सँ द्वेष बढ़ैत छैक, आ एक प्रेम, दोसर प्रेम केँ बढ़बैत छैक. गाम’क लोक सँ भेटल प्रेम सँ रमेश भाव विह्वल भऽ जाइत छलाह. ओ वैह उत्साह सँ जवाब दैत छलथिन. जहिना लोक हिनका सँ प्रेम करैत छलनि, इहो दोसर लोक सँ ओहिना प्रेम करय लागलथिन. किछु परिवार’क तऽ अभिन्न अँग बनि गेल छलाह. कखनो कखनो सोचैत छलाह जे लोक पाइ किएक कमाबैत छैक? अपन आ अपन परिवार’क लालन पालन लेल, अपन मोन’क सँतुष्टि’क लेल. एहि सरकारी नौकरी मे हुनका एत्तेक दरमाहा भेट जैत छलनि जाहि सँ ओ अपन परिवार’क जिम्मेदारी आ अपन भविष्य केँ सुरक्षित कऽ सकैत छलाह. नरायनपुर मुरली मे खर्चे की होएत छैक. खेबा पीबा’क बाद मे सबटा पैसा बचिए जैत छैक. तरकारी तीमन तऽ गाम’क लोक एत्तेक दऽ दैत छलनि जे आई धरि कहियो कीनबाक काजे नइँ पड़लनि. दुध दही एत्तेक सस्ता आ शुद्ध. एक लोक’क काज पड़ला पर दस लोक बिना कहने उपस्थित भऽ जैत छलनि. मोन मे होइत छलनि जे ओ धन्य छथि जे हुनकर ट्रान्सफर एहि गाम’क रेलवे स्टेशन पर भऽ गेलनि.&lt;br /&gt;मुदा हुनकर पत्नी रेखा’क अलगे सोच छलनि. हुनकर सँगी सहेली सब पैघ शहर मे स्थापित छल. कहियो कहियो हुनका लोकनि’क फोन आबैत छलनि. बँगलोर आ पुणे’क गप्प सुनि केँ ओ हतोत्साहित भऽ जैत छलथिन. सोचैत छलथिन, हुनकर उम्रे कतेक भेल छनि. पचीस वर्ष मे तीन महिना कमे. ओ सोचैत रहथिन, जे ई यैह उम्र थीक जाहि मे लोक शौपिँग माल घुमैयऽ, जाहि मे लोक मल्टिप्लेक्स मे सिनेमा देखैय’, साँझ मे हाथ मे हाथ दऽ सड़क पर घुमैय’, रेस्टौरेन्ट मे खाना खैय’, कोनो काफी’क दोकान पर बैसि, एक कौफी केँ डेढ़ घँटा मे पीबैय’. जाहि उम्र मे लोक नवविवाहित जीवन’क उत्साह’क चरमोत्कर्ष पर रहैत छैक ओहि मे गाम’क झगड़ा’क निपटारा मैँयाँ जेकाँ करैत छैथ. एहेन उम्र जाहि मे प्रति-पल बदलैत महानगर’क मायावी बदलाव’क गवाह बनैत छथि, ओहि उम्र मे ओ गाम’क गोहाली सँ निकलल धुआँ सँ तृप्त होइत छथि. ओ अपना आप केँ जहिया कहियो अपन सखी-सहेली लोकनि सँ तुलना करैत छलथिन मोन अवसादित भऽ जैत छलनि. &lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;br /&gt;(४) &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;रमेश केँ देखबा मे आएल जे सदिखन उत्साहित रहय वाली रेखा क्रमशः उदास रहय लागलीह. पहिने तऽ ओ रमेश केँ अपन ट्रान्स्फर’क लेल चरियाबैत रहैत छलीह, मुदा बाद मे ओ कहनायो छोड़ि देलथिन. रमेश केँ गाम’क लोक सँ बहुत प्रेम भेटलनि, मुदा जाहि प्रेम’क आशा नइँ अपितु जरुरत रहनि ओ प्रेम दिनानुदिन कम होइत गेलनि. जखन बाँकी कोनो समाधान नइँ भेटलनि तऽ ओ एक दिन रेखा केँ आश्वासन देलथिन जे ट्रान्सफर करबाक लेल यथासम्भव प्रयास करताह.&lt;br /&gt;दुनियाँ मे कोनो एहेन चीज नइँ, जे प्रयत्न केला सँ सम्भव नइँ हो. कनि भाग-दौड़ आ किछु पैसा खर्चा भेलाक बाद रमेश’क ट्रान्सफर’क आर्डर आबि गेलनि. हुनकर नव पोस्टिँग कलकत्ता मे भेलनि. रेखा’क हेराएल खुशी पुनः वापस आबि गेलनि. रेखा के भेलनि जे नइँ बँगलोर आ पुणे तऽ कम सँ कम कलकत्ता तऽ एहि नरायनपूर-मुरली सँ नीके होएत. कलकत्ता’क नाम तऽ महानगरे मे आबैत छैक. बल्कि किछु प्रसँग मे कलकत्ता बँगलोर सँ नीके. जतय महानगर’क प्रत्येक अवयव कलकत्ता मे उपस्थित छैक ओ बँगलोर सन महग नइँ छैक. वैह शौपिँग माल, वैह मल्टिप्लेक्स, मेट्रो ट्रेन, विक्टिरिया पैलेस, एसप्लैनेड’क मारकेट आ चौबीस घँटा चहल पहल. ट्रान्सफर’क आर्डर सुनि हुनकर मोन रोमान्चित भऽ गेलनि.&lt;br /&gt;रेखा आब सामन्य रहय लागलीह. रमेश’क देख-भाल नीक सँ करय लागलीह. हुनका कखनहुँ कखनहुँ मोन मे कचोट होएत छलनि जे हुनके खातिर रमेश केँ एतेक फेरा लागि गेल छनि. नइँ तऽ ओ कतेक बढ़ियाँ सँ एडजस्ट भऽ गेल छलैथ. मोने मोन ओ रमेश केँ आओर बेसी प्रेम करए लागलीह. रमेश’क कोनो बात काटैक हुनका हिम्मत नइँ होएत छलनि.&lt;br /&gt;एहि प्रत्येक बदलाव केँ रमेश मोने मोन अनुभव कऽ रहल छलाह. हुनको नीक लागैत छलनि. मुदा महानगर’क बात सोचि ओ डरा जैत छलाह. एतय एक लोक’क जरुरत भेला पर एक दर्जन लोक उपस्थित रहैत छल. कलकत्ता मे दिन भरि रेखा एकसरि बैसल रहतीह. किओ अप्पन लोक बात करबाक लेल नइँ भेटतनि. तबीयत केहनो रहनि काज करैये पड़तनि. एहि गाम मे छोटा बाबु सन क्लर्कियल नौकरी कैरतो हुनकर एत्तेक इज्जत रहैत छलनि जे कलकत्ता मे पैघ सँ पैघ आफिसर केँ नइँ भेट सकैत छल. एतय प्रत्येक पावनि त्योहार केँ रेखा आ रमेश बहुत नीक सँ मनबैत छलैथ. गाम पर किनको घर मे भगवानो’क पुजा बिना हिनका लोकनि’क उपस्थिति’क सम्पन्न नइँ होएत छलनि. ओतय करोड़ो लोकक बीच मे ओ लोकनि बिल्कुल हेराएल रहताह. रमेश जतेक सोचैत छलथिन हुनका ओतेक डर लागैत छलनि. हुनका एक्के टा चीज मोन केँ प्रसन्न करैत छलनि, रेखा’क अति उत्साहित सुन्दर आ दिव्य मुखमण्डल. विवाहित जीवन एक अघोषित समझौता’क नाम थीक, हुनका आब नीक सँ बुझि मे आबि रहल छलनि. &lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;br /&gt;(५)&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;रेखा वेटिँग रूम’क कोनटी वाला बेन्च पर बैसल ई सब गप्प सोचि रहल छलीह. गाड़ी आबए मे मात्र पाँच मिनट छल. रेखा केँ देखा पड़लनि जे रमेश टिकट वाला खिड़की केँ बन्द कऽ चुकल छलाह. रेखा’क ध्यान फेर सँ ओहि खिड़की’क उपर मे लिखल लाईन पर चलि गेलनि, "यह खिड़की गाड़ी आने के एक घँटे पहले खुलती है और गाड़ी आने के पाँच मिनट पहले बन्द हो जाती है". ओ देखि रहल छलीह जे सिगनल’क चाभी लऽ रमेश स्टेशन परिसर सँ निकलि चुकल छलाह. यात्रीगण सब प्लेटफार्म पर ट्रेन’क बाट ताकि रहल छल. सबक किओ रमेश दिस आशा’क नजरि सँ देखि रहल छल, मानु रमेश’क हाथ मे सिगनल देबा’क चाभी नइँ, अपितु समुचा ट्रेन’क चाभी हो, जेना ट्रेन रमेश’क ईशारा पर चलैत हो.&lt;br /&gt;किछुए देर मे रमेश सिगनल दऽ केँ लाल-हरियर रँग’क लालटेन लऽ केँ ठाढ़ छलाह. छोट स्टेशन’क इएह नीक गप्प. छोटा बाबु सर्वे सर्वा. टिकट काटबा’क हुनके जिम्मेदारी, सिगनल डाउन करबाक हुनके जिम्मेदारी, आ लाल हरियर झँडा आ लालटेन देखेबाक हुनके जिम्मेदारी. बेसी जिम्मेदारी निर्वाह केला सँ बेसी सम्मान भेटैत छैक. यैह कारण छल जे मुरली-नारायणपूर दुनू गाम’क लोक अपन स्टेशन पर’क छोटा बाबु केँ बहुत सम्मान करैत छलनि.&lt;br /&gt;ट्रेन आबि चुकल छल. पान वाला’क दोकान’क आगू मे राखल कोयला’क चुल्हा सँ धुआँ निकलनाई बन्द भऽ गेल छल. ओहि चुल्हा सँ आगि दह-दह कऽ केँ जरि रहल छल. चाय बेचय वाला छोटू जोर जोर सँ चीकरि रहल छल, चाय, चाय, चाय. झाल मुरही वाला ट्रेन सँ निकलि प्लेटफार्म पर आवाज लगा रहल छल, "बारह मासाला तेरह स्वाद, झाल मुरही की है अनोखी बात". रेखा देखलनि ट्रेन सीटी दऽ रहल छल आ स्टेशन सँ नहुँए नहुएँ ससरि रहल छल. जे यात्री उतरि चुकल छल ओ बारी बारी सँ रमेश केँ "प्रणाम छोटा बाबु!" कहि क्रमशः बाहर जा रहल छल. ओहि मे सँ एकटा आदमी रमेश सँ बात करय लागल. हुनका देखि किछु आओर लोक रुकि गेल. किछुए देर’क बाद ओतय दस बारह लोक’क जमघट लागि गेल. सब किओ मिलि रमेश केँ गोला बना केँ घेरि नेने छल. रेखा दुरहिँ सँ लोक सभ’क बात सुनबाक कोशिश कऽ रहल छलीह.&lt;br /&gt;ओहि मे सँ एक आदमी बाजि रहल छल, "ई कोना भऽ सकैत छैक, लागैत अछि किओ अहाँ के "किछु" कहि देलक अछि, हमरा एक बेर नाम बताऊ, अहाँ के अनुचित कहए वाला केँ थूक फेकि केँ चाटय पड़तनि". दोसर लोक कहैत छलनि, "जे यदि हमरा सँ कोनो गलती भऽ गेल होमय तऽ कहु". तेसर लोक कहैत छलनि जे "मेम साहेब केँ कोनो दिक्कत भेल हो त कहल जाए, हम सब मिलि केँ समस्या’क समाधान कऽ देबनि". रमेश’क सब लोकनि केँ एक्केटा जवाब छल, "एतय रेखा’क तबीयत नीक नइँ रहि रहल छलनि तेँ हम ट्रान्स्फर करा रहल छी. &lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;br /&gt;(६) &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;ई पहिल बेर छल जखन रमेश अपन ट्रान्सफर’क गप्प गाम’क लोक केँ कहने छलथिन. रेखा बाँकी लोक केँ रमेश सँ बात करैत देखि चुकल छलीह. ओ प्रत्येक लोक हुनकर ट्रान्सफर सँ आश्चर्यचकित छल. हुनका लोकनिक प्रतिक्रिया मे आग्रह कम आ अधिकार बेसी छल. रेखा केँ भेलनि जे ओ लोक एहेन मुँह बनौने छल जे रमेश हुनका लोकनि केँ पुछने बिना अपन ट्रान्सफर किएक करा लेलैथ. रेखा केँ खराप लागलनि. अपन जिद्द केँ सर्वथा उचित ठहराबे लागलथिन. मोन मे भेलनि जे देहात’क लोक असभ्य होइत छैक. कोनो भी दोसर लोक’क व्यक्तिगत जीवन मे टाँग अड़ेबाक आदत रहैत छैक.&lt;br /&gt;रमेश रेखा’क मुड केँ निहारि चुकल छलाह. जखन बाँकी लोक सब चलि गेल, तखन रेखा’क मोन बहलेबाक’क लेल कहलथिन, "देखु ने गुलमोहर’क गाछ केहेन लागि रहल छैक, एक्को टा पात नइँ देखा रहल छैक, सगरे फुले-फुल, मुदा किछुए दिन’क बाद एहि मे पतझड़ आबि जायत. नइँ पाते रहत आ नइँए फुले".&lt;br /&gt;"हाँ से ईहो गुलमोहर’क गाछ हमरे लोकनिक ट्रान्सफर बाट ताकि रहल छैक, अन्यथा आब तऽ पतझड़’क टाइम आबि गेल छैक", रेखा’क जवाब छलनि.&lt;br /&gt;तपाक सँ रमेश कहल्थिन, "अहाँ मुड बहुत रोमान्टिक लागि रहल अछि".&lt;br /&gt;"नइँ एहेन कोनो बात नइँ छैक. हम पछिला एक घँटा सँ प्लेटफार्म केँ निहारि रहल छलहुँ. प्लेटफार्म पर आधा भाग मे हरियर हरियर दुबि आ कात लागल अनगिनत गुलमोहर’क गाछ. ई हरियर आ लाल’क समावेश निष्ठूर-सँ-निष्ठूर लोक केँ कवि बना दऽ सकैयऽ", रेखा अपन बात केँ कतेको तरीका सँ साबित करबाक चेष्टा केलथिन.&lt;br /&gt;रमेश’क हाजिर जवाब छल, "ई किलोमीटर धरि पसरल हरियर दुबि आ कात लागल गुलमोहर’क गाछ, आई कतेको दिन सँ छल, मुदा आई पहिल बेर अहाँ अनुभव केलहुँ, तेँ हम कहैत छी, आई अहाँ बहुते रोमान्टिक मुड मे छी"&lt;br /&gt;रमेश देखलथिन जे रेखा लजा गेल छलथिन. गप्प एतहि नइँ रुकि जाए ताहि लेल कहलथिन, "रोमान्टिक’क मतलबे प्रकृति-प्रेम सेहो होइत छैक, अहाँक प्रकृति प्रेम हमरा नीक लागल" &lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;br /&gt;(७) &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;गप्प करैत करैत रेखा आ रमेश घर गेलैथ. गाम’क लोक अपन अपन गाम. मुदा साँझे मे रमेश’क ट्रन्स्फर’क चर्चा आगि जेकाँ पसरि गेल. जे सुनए ओ दस लोक केँ आओर सुनाबैथ. सब किओ एक्के बात कहैत छलथिन "बहुतो छोटा बाबु एलैथ आ गेलैथ मुदा रमेश बाबु सन किओक नइँ. एहेन मिलनसार लोक भेटनाई मुश्किल. गाम मे एना रीति गेलैथ जेना एहि गाम’क लोक होइथि." सब किओ ई जरुर कहैथ जे "हुनका जरुर किओ किछु अनुचित कहि देलकनि वा किछु अनुचित कऽ देलकनि".&lt;br /&gt;रमेश कोन कारण सँ ट्रान्सफर करा लेलैथ से भोर भेने धरि समुचा गाम मे चर्चा’क विषय बनि गेल. आरोप प्रत्यारोप’क अनगिनत दौर चलल. कोनो एहेन लोक नइँ बचल छल जिनका उपर मे आरोप नइँ लागल हो. पैघ परिवार मे एक दोसर केँ दोषी साबित करय लागल, पुरान दुश्मनी वाला दू परिवार एहि मौका केँ भजेबाक कोशिश करए लागल आ दुनू गाम’क छुटभैया नेता लोक दोसर गाम केँ दोषी बताबे लागल. स्त्रीगण लोकनि, "मेम साहेब केँ के की कहने छल" तकर लेखा जोखा लगाबय लागलीह. सब किओ अपन स्तर पर काज करैत छल, आ रमेश केँ एहि बात’क पूरा समाचार भेटि रहल छलनि.&lt;br /&gt;गाम’क पढ़ल लिखल आ प्रगतिवादी नवयूवक आपस मे तय केलथिन जे रमेश सँ गाम’क दिस सँ माफी माँगि लेल जाए. लगभग एक दर्जन एहेन यूवक’क टोली स्टेशन पर जाकेँ रमेश सँ अधिकारिक रुप सँ माफी माँगलकनि. मुदा नवयूवक’क एहि टोली सँ पहिने सैकड़ो लोक माफी माँगि चुकल छल. दोसर किओ आओर रहितैक तऽ कोनो आओर बात, गाम मे पढ़ल लिखल यूवक’क बहुत मूल्य होइत छैक आ रमेश ओहि मूल्य केँ नीक जेकाँ चीन्हैत रहैथ. तेँ हठाते ओहि टोली केँ निराश करए नइँ चाहैत छलाह. बिना मामला केँ तुल देने कहि देलैथ जे ओ ट्रान्सफर रोकबाक दर्खाश्त दऽ देताह. ई बात सेहो दुनू गाम मे पसरि गेल. गाम’क सब लोक एहि बात पर हठाते विश्वास नइँ केलनि. समाज दू मत मे विभाजित भऽ गेल. किछु लोक’क मत छलनि जे रमेश कोनो बात सँ आहत छलाह तेँ ट्रान्सफर करा लेलैथ. दोसर लोकनिक मत छलनि जे रमेश आई धरि कहियो फुसि नइँ बाजल छथि, तेँ ट्रान्सफर रोकेबाक गप्प सत्य थीक.&lt;br /&gt;विश्वास-अविश्वास, उम्मीद-निराशा, कचोट-उत्साह’क आपाधापी मे ओ दिन आबि गेल जहिया रमेश केँ हमेशा’क लेल ई दू-गाम’क बीच वाला स्टेशन छोड़ि केँ जेबाक छलनि. एगारह बजे’क गाड़ी सँ ओ पूरे समान आ पत्नी सँग विदा होएबाक लेल तैयार छलाह. गाम’क लोक एखनो दू मत मे विभाजित छल. किछु लोक एखनो धरि सोचैत छलाह जे रमेश रुकि जायत. ट्रान्सफर नइँ भेल छनि. एहेन सोच जाहि मे कल्पना’क उड़ान बेसी आ यथार्थक धरातल कम. कल्पना’क बाते अलग, कोनो बात’क कल्पना करबा मे मालगुजारी नइँ लागैत छैक..&lt;br /&gt;कल्पना’क उड़ान जतेक नीक लागैत छैक ओतबी कष्टदायक यथार्थ’क धरातल होइत छैक. एखन यथार्थ ई छल जे एगारह बजे’क ट्रेन प्लेटफार्म पर आबि चुकल छल. रमेश आ राधा ट्रेन मे बैसि चुकल छलैथ. गाम’क एहेन लोक जे यथार्थता’ केँ पहिने स्वीकार कऽ नेने छलैथ, रमेश’क लेल किछु ने किछु आनने छल. जे बेसी काल धरि कल्पना सवारी करैत छलाह ओ दौड़ि के गाम गेलाह आ रमेश’क लेल किछु ने किछु उपहार आनि नेने छलाह. हरियर दुबि पर ठाढ़ गार्ड सीटी बजा देने छल. ट्रेन अपन सीटे बजेलक आ नहुएँ नहुएँ ससरे लागल. लोक सब एखनि धरि रमेश केँ पोटरी थम्हा रहल छलाह. रमेश चाहियो केँ किनको मना नइँ कऽ पाबैत छलाह. किओ अदौरी, किओ कुम्हरौरी, किओ अम्मट, किओ पौती किओ मौनी. जेहेन लोक तेहेन उपहार. दूर ठाढ़ किछु स्त्रीगण लोकनि आधा छिधा घोघ तऽर सँ नोर पोछैत छलथिन. रमेश’क आँखि डबडबा गेलनि. बगल मे बैसल रेखा हुनकर भीजल पीपनी देखि नेने छलीह. अपन दाहिना हाथ सँ हुनकर बामा मुट्ठी पकड़ि नेने छलीह.&lt;br /&gt;रमेश देखलैथ जे रेखा’क मुँह पर आशा’क अनन्त किरण पसरल छल. हुनकर ललाट आई सबसँ बेसी दैदीप्यमान लागैत छल. मोन मे एक सँतुष्टि भेलनि जे अपना लेल नइँ तऽ कम सँ कम रेखा’क लेल खुश रहबाक चाही. आखिर ट्रान्सफरो तऽ हुनके लेल करौने छलथिन. ओ खुश भऽ गेलैथ, मुदा क्षणिक देर’क लेल. गाम’क हजार लोक’क देखभाल वाला जिन्दगी छोड़ि ओ कलकत्ता’क काटि खा जेबा वाला एकाकी जिन्दगी रमेश केँ पहिल बेर असुरक्षित लागय लागलनि. हरियर दुबि आ लाल गुलमोहर’क छटा पाछु छुटि चुकल छल. रेखा’क हाथ एखनो धरि हुनकर हाथ पर छलनि. प्रत्येक स्पर्श एक सँदेश नुकाएल रहैत छैक. रेखा’क स्पर्श मे आश्वासन आ कृतज्ञता’क सँदेश छल. ट्रेन नरायणपूर-मुरली’क सीमा सँ बाहर निकलि चुकल छल. रमेश एक बेर फेर सँ रेखा’क ललाट पर सँतुष्टिक भाव पढ़बाक भरिसक प्रयत्न करय लागलाह. &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-7587023328352464987?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/7587023328352464987/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=7587023328352464987' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/7587023328352464987'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/7587023328352464987'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2010/04/blog-post.html' title='स्टेशन पर’क हरियर दुबि आ लाल गुलमोहर'/><author><name>Padmanabh (आदि यायावर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00743001936020943683</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://1.bp.blogspot.com/_4SASqC7hsM8/SrRri01HSII/AAAAAAAAAnU/gBMnXU-WKmI/s1600-R/4.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-1511816524395688236</id><published>2010-03-09T18:38:00.001+05:30</published><updated>2010-03-09T18:42:29.766+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>छोट लोक - सुभाष चंद्र</title><content type='html'>&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial, sans-serif; font-size: 13px; border-collapse: collapse; "&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;छोट लोक धरती पर जन्मैत छैथ&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;दूबि जकाँ बढ़ैत छथि&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;पयर सँ दबाओल जाइत छैथ&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;आ कोनो चर्च के मारल जाइत छैथ !&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;पैघ लोक आकाश मे जन्मैत छैथ&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;आकाशे मे रहैत छैथ&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;जमीन की होइछ&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;ओ नहि जनैत छैथ !&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;बाचल, मध्यम&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;जे नहि कर्ता आ नहि पाचक&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;दूनू अधिकार सँ तिरोहित&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;ओ उगैत छैथ,&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;बढ़ैत छैथ लत्ती जकाँ &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;आओर, &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;सतह पर रहैत छैथ अचेतन मे&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;सपना देखैत संग &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;जूझैत छैथ स्वयं सँ &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;अंतरिक्ष सँ आगाँ नहि जा पबैत छैथ !&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;त्रिशंकु जकाँ बनि&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;ईच्छाक संग&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;स्वयं अपन स्वप्न कें&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;केंद्र बिंदु बनैत छैथ !!&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-1511816524395688236?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/1511816524395688236/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=1511816524395688236' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/1511816524395688236'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/1511816524395688236'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2010/03/blog-post.html' title='छोट लोक - सुभाष चंद्र'/><author><name>करण समस्तीपुरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10531494789610910323</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-zgJY8sxmk94/TfnT23xrHYI/AAAAAAAAAfE/_WkrcWl40DY/s220/P5200936.JPG'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-904435485251253481</id><published>2010-02-01T16:44:00.009+05:30</published><updated>2010-02-17T15:50:18.235+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='करण समस्तीपुरी;समीक्षा'/><title type='text'>नव पोथी : भोथर पेन्सिल सँ लिखल</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;-- &lt;span class="Apple-style-span"  style="LINE-HEIGHT: 25px;font-family:arial;"&gt;करण समस्तीपुरी &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#993300;"&gt;"बारह गोट कथाक सँग्रह, जे आधुनिक मैथिलक जीवन सँघर्ष केँ प्रदर्षित करैत अछि. प्रत्येक कथा शहरक भागम-भाग सँ निकलैत अछि आ गामक कोनो कोनटी मे जा केँ खत्म होइत अछि। वा नहिँ तऽ गाम’क कोनो घर’क ड्योढ़ी सँ निकलि आधूनिक भारत’क कोनो मेट्रोपोलिटन शहर मे खत्म होइत अछि......।"&lt;/span&gt;&lt;/em&gt; ---- ई कहब छैन्ह आदि यायावर केँ। वीरान होएत मैथिलीक साहित्यिक क्षितिज पर एकटा नव हस्ताक्षर उभरि रहल छथि, आदि यायावर हुनके नाम छिऐन्ह । एक्किसम सदी केँ चकाचौंध मे यायावरजी ल'के आयल छथि &lt;a href="http://www.bhothar-pencil.co.cc/"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;"भोथर पेन्सिल सँ लिखल"&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt; अपन पहिल कथा संग्रह। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;मात्र दर्ज़न भरि कथाक संकलन मे शिक्षा आ व्यवसाय से वैज्ञानिक यायावरजीक लेखकीय प्रतीभाक परिचय भेंट रहल अछि। हम एहि कथा द्वादाशीक सभ टा कथा प्रकाशनपूर्व आ प्रकाशनोपरांत पढने छी। अधिकतर कथा लेखकक सामाजिक फंटासीक परिणति अछि जाहि मे ओ रहस्य-रोमांचक पराकाष्ठाक स्पर्श केने छथि।&lt;br /&gt;खिसकैत-दरकैत सामजिक मूल्यक प्रति आस्थावान लेखक ग्रामीण जीवनक सुघर आंचलिक चित्रण आ' आजुक जीवनशैली सँ ओकर तारतम्यता स्थापित करबाक कोशिश में छथि। रूढी पर प्रहार यायावारजीक कथाक प्रमुख स्वर छैन्ह। भौगोलिक चित्रण कथावस्तु के जीवंत बनाबैत अछि मुदा कतहु-कतहु आंचलिकताक निर्वाह मे लेखक पुनरावृति के शिकार सेहो भेलथि है। अपन कल्पनाक उड़ान मे लेखक पाठकक भावना सँ खूब उठा-पटक करैत छथि........ किछु आदर्श पाठक केँ अतिशयोक्तिक अनुभूति भ' सकैत अछि। शीर्षक कथा &lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_q18Jv2Ke6F0/S2a5GLxwVFI/AAAAAAAAAQA/bBcGkWBPkPo/s1600-h/bhothar+pencil.JPG"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5433233516360914002" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 188px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_q18Jv2Ke6F0/S2a5GLxwVFI/AAAAAAAAAQA/bBcGkWBPkPo/s320/bhothar+pencil.JPG" border="0" /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;'भोथर पेन्सिल सँ लिखल'&lt;/span&gt; मे एक्कहि टा सिक्काक दू टा पहलू केँ भावनाक धरातल पर रोमांचक चित्रण अछि। &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;'&lt;span class=""&gt;ई &lt;/span&gt;केहन प्रेम'&lt;/span&gt; &lt;span class=""&gt;कें &lt;/span&gt;बाल-मनोविज्ञान पाठकक माथा नोचे पर मजूर कए सकैत अछि। &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;'&lt;span class=""&gt;पढ़ल-&lt;/span&gt;लिखल&lt;/span&gt; &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;लोक' &lt;/span&gt;आधुनिक जीवन-शैली मे शिक्षाक महत्व प्राकशित कए रहल अछि &lt;span class=""&gt;ओतहि &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;'&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;छुतहरबा'&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;सामाजिक व्यवस्था मे व्याप्त विद्रूप कुरीति पर व्यंग्याघात &lt;span class=""&gt;अछि। &lt;/span&gt;मुदा एहि संग्रहक &lt;span class=""&gt;सभसँ &lt;/span&gt;अनमोल रत्न अछि, नारीक समर्पण आ पुरुषक स्वामिवादी सशंक प्रवृति&lt;span class=""&gt;क &lt;/span&gt;मर्मभेदी कथा &lt;span style="color:#ff0000;"&gt;'&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: arial; font-size: 14px; line-height: 25px; "&gt;तैइस &lt;/span&gt;सालक &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;मेहनति'&lt;/span&gt;।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;यायावारजीक शैली सरल छैन्ह जेकरा ओ व्याकरण मे बंधबाक कोनो प्रयास नहि केने &lt;span class=""&gt;छथि। &lt;/span&gt;आंचलिक उपमा गद्य के आओर सरस बना रहल अछि। शब्द-विशेष पर बलाघात &lt;span class=""&gt;सँ &lt;/span&gt;भावनाक मनोवांछित व्यंजना मे लेखक सफल छथि। रहस्य-रोमांचक सृजन &lt;span class=""&gt;मे &lt;/span&gt;हिनक लेखनी सिद्ध छैन्ह मुदा कतहु-&lt;span class=""&gt;कतहु &lt;/span&gt;लेखकक ई &lt;span class=""&gt;प्रवृति &lt;/span&gt;पाठकक भावना मे विरोधाभास सेहो उत्पन्न करा सकैत अछि। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;मैथिलीक प्रतिष्ठित प्रतिष्ठान दिल्ली कें 'अंतिका प्रकाशन' सँ &lt;span class=""&gt;बहराएल &lt;/span&gt;एहि &lt;span class=""&gt;पुस्तकक &lt;/span&gt;मनमोहक आवरण पृष्ठ विषयानुकूल प्रतीत होएत अछि। यायावारजीक संकल्प आ हमर अनुमोदन मे कतेक सत्यता अछि ई जान्चय हेतु अपनेक मात्र एक सय साठि टाका खरचै &lt;span class=""&gt;पड़त। &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;पुस्तक प्राप्ति आ विशेष विवरण हेतु &lt;a href="http://www.bhothar-pencil.co.cc/"&gt;http://www.bhothar-pencil.co.cc/&lt;/a&gt; पर क्लिक करू अथवा mishrapadmanabh @yahoo.co.in पर यायावरजी सँ संपर्क करू !!&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-904435485251253481?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/904435485251253481/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=904435485251253481' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/904435485251253481'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/904435485251253481'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2010/02/blog-post.html' title='नव पोथी : भोथर पेन्सिल सँ लिखल'/><author><name>करण समस्तीपुरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10531494789610910323</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/-zgJY8sxmk94/TfnT23xrHYI/AAAAAAAAAfE/_WkrcWl40DY/s220/P5200936.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_q18Jv2Ke6F0/S2a5GLxwVFI/AAAAAAAAAQA/bBcGkWBPkPo/s72-c/bhothar+pencil.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-4011023191063214186</id><published>2010-01-26T00:00:00.004+05:30</published><updated>2011-07-14T01:23:58.491+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>बदलत कोना?      -रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'</title><content type='html'>लोक मरैत रहत सदैव, आतंकवादीक गोली सँ।&lt;br /&gt;जनता ठकाइत रहत सदैव, क्रूर राजनेताक बोली सँ।&lt;br /&gt;गरीब तंग रहत सदैव, पेटक किलकिलाइत भूख सँ।&lt;div style="BORDER-TOP: #5c8a64 5px solid; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 5px; MARGIN: 12px; WIDTH: 200px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 5px; BORDER-BOTTOM: #5c8a64 5px solid; TEXT-ALIGN: center"&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_xd1j00Yk1I0/S1SUtaGiezI/AAAAAAAAAB4/l3ha1ha8q6s/s1600-h/TEOTH.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 60px; height: 80px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_xd1j00Yk1I0/S1SUtaGiezI/AAAAAAAAAB4/l3ha1ha8q6s/s320/TEOTH.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5428126958710061874" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;br /&gt;कवि- श्री रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'&lt;/span&gt;,&lt;/span&gt;&lt;/p&gt; सम्पर्क- +91-9239415921&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;स्त्री दबायल रहत सदैव, पुरुखक चमचमाइत बूट सँ।&lt;br /&gt;सवर्ण डेराइत रहत सदैव, डोमक थूक सँ।&lt;br /&gt;मिथिला दहाइत रहत सदैव, बेंगक मूत सँ।&lt;br /&gt;बेटा बिकाइत रहत सदैव, मोटगर दहेज़ सँ।&lt;br /&gt;बेटी जरइत रहत सदैव, आगिक लपेट सँ।&lt;br /&gt;राशन घटल रहत सदैव, नहि होयत किछु भाषण सँ।&lt;br /&gt;लोकतंत्र मे मारामारी रहत सदैव, हटय चाहत ने क्यो सिंघासन सँ।&lt;br /&gt;देश सहमल रहत सदैव, कलियुगी रावण ओ कंस सँ।&lt;br /&gt;किछु लोक चाहैत रहत सदैव, बचय समाज विध्वंस सँ।&lt;br /&gt;अपने मे सब लड़ैत रहत सदैव, नहि होयत किछु झगरला सँ।&lt;br /&gt;ई थेथर समाज एहने रहत सदैव, नहि बदलत बात छकरला सँ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-4011023191063214186?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/4011023191063214186/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=4011023191063214186' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/4011023191063214186'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/4011023191063214186'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2010/01/blog-post_26.html' title='बदलत कोना?      -रूपेश कुमार झा &apos;त्योंथ&apos;'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_xd1j00Yk1I0/S1SUtaGiezI/AAAAAAAAAB4/l3ha1ha8q6s/s72-c/TEOTH.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-7822661933605469873</id><published>2010-01-19T00:00:00.001+05:30</published><updated>2010-01-19T00:00:00.804+05:30</updated><title type='text'>बुद्धि नहिए- संतोष कुमार मिश्र</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#009900;"&gt;- श्री संतोष कुमार मिश्र&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;एक बेर यादब लोभ लालच मे&lt;br /&gt;करबौलक बजेट निकासा&lt;br /&gt;अपन जेबी नीक सँ भरलक&lt;br /&gt;तोरलक मैथिलक आशा&lt;br /&gt;कहै हम मैथिल छी।&lt;div style="BORDER-TOP: #5c8a64 5px solid; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 5px; MARGIN: 12px; WIDTH: 200px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 5px; BORDER-BOTTOM: #5c8a64 5px solid; TEXT-ALIGN: center"&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;img alt="Santosh Kumar Mishra" src="http://maithili.editor.googlepages.com/SantoshMishra.jpg" width="90" align="right" /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कवि- श्री संतोष कुमार मिश्र&lt;/span&gt;। जनकपुर (नेपाल) निवासी श्री संतोष कुमार मिश्र जी काठमाण्डू (नेपाल) मे एकटा बहुराष्ट्रीय कम्पनी मे अधिकारी छथि। मैथिली साहित्य सँ विशेष लगाव आ मैथिली मे एखन धरि &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;“पोसपूत" आ "उदास मोन” (कथा संग्रह), "एना" (आईना) (सम्पादित कविता संग्रह) आ "एना किए"(कविता संग्रह)&lt;/span&gt; प्रकाशित। सम्पर्क- 00977-98510-11940 (मोबाइल) &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चारि विदेशी छह गोटे देसी सँ&lt;br /&gt;खतम कएलक सम्मेलन&lt;br /&gt;ककरो चुरा दही, ककरो भात&lt;br /&gt;खतम कएलक अन्वेषण&lt;br /&gt;कहै हम मैथिल छी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बैनर सेहो गलतीए लिखल&lt;br /&gt;कहै हम छी ठीकदार&lt;br /&gt;लिख लौढा, पढि पाथ र  सबहे&lt;br /&gt;बुझै अपना के बुधियार&lt;br /&gt;कहै हम मैथिल छी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिना योजना के ओ सम्मेलन&lt;br /&gt;रहि गेल ओ हरमुनिया  के धुनि मे&lt;br /&gt;फूटि गेल ढोलक के आवाज संगे ओ&lt;br /&gt;चलि गेल ओ आयोजक के भूर मे&lt;br /&gt;कहै हम मैथिल छी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रवीनमा गंगेशवा जे किछु कएलक&lt;br /&gt;चलि गेल सबहक पेट मे&lt;br /&gt;भाषा पर खोज करौलक&lt;br /&gt;चलि गेल नदी कातक खेत मे&lt;br /&gt;कहै हम मैथिल छी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहि त' अपन बापके भेलै&lt;br /&gt;नहि भेलै ओ बेटा के&lt;br /&gt;मात्र किछु बजेटक खातिर&lt;br /&gt;मिथिला परली चपेटा मे&lt;br /&gt;कहै हम मैथिल छी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहि त' धोती पहिरौने मैथिल होएब&lt;br /&gt;नहि पाग ककरो पहिराकs&lt;br /&gt;अपनेमे सभ के फोरिक राखत&lt;br /&gt;ल' जाएत सबहे ओ सझियाक'&lt;br /&gt;बुद्धि नहिए, कहै हम मैथिल छी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-7822661933605469873?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/7822661933605469873/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=7822661933605469873' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/7822661933605469873'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/7822661933605469873'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2010/01/blog-post_19.html' title='बुद्धि नहिए- संतोष कुमार मिश्र'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-8224805117387965760</id><published>2010-01-12T00:00:00.001+05:30</published><updated>2010-01-12T00:00:00.681+05:30</updated><title type='text'>ई चिठ्ठी हुनकर नाम</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;प्रिय संजू!&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आइ नञि जानि किएक, अहाँ के चिठ्ठी लिखबाक मोन भऽ रहल अछि। ओना तऽ एहि सँ पहिनेहो कतोक चिठ्ठी लिखने छलहु, मुदा ई चिठ्ठी आन सब चिठ्ठी सँ भिन्न अछि। एहि चिठ्ठी के जखन अहां पढ़ैत रहब, तावेत धरि हम दूर ... बहुत दूर, क्षितिजक ओहि पार जा चुकल रहब। एही लेल जएबासँ पहिने हमर आंतरिक इच्छा छल जे अहाँ सँ भेट करी ... मुदा अपन सोचने थोड़बे होइत छैक ... होबाक तऽ वैह होइत छैक जे भाग्य विधाताक इच्छा रहैत छनि। आइ जेलक चाइर दीवारी में कैद भऽ कऽ ई चिठ्ठी लिखि रहल छी, सब कैदी निन्नमे छथि। अपन वार्ड मे मात्र हमहीं टा एकसरिए जागल छी। संजू ... जेलक जिनगियो बड़ अजीब होइत छैक ...। आंखिक आगू सबटा लहाशे नजरि अबैत अछि। एहिठामक सब आदमीयो एक जीवैत लहाश होइत छैक। कखनो-कखनो तऽ हमरा अपन शरीरो एक जीवैत लहाश बुझना जाइत अछि, साड़ी मे लेपटाएल, छटपाटइत लहाश ...। हम सपनो मे नञि सोचि सकैत छलहु जे एहन दिन देखऽ पड़त। एखनहुं तक बुझाइत अछि जे हम कोनो सपना तऽ नञि देखि रहल छी ...? डराएल सपना ...! मुदा यैह सत्य छैक-एक कटु सत्य!&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="border-top: 5px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 5px solid rgb(92, 138, 100); margin: 12px; float: right; padding-bottom: 5px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 5px; text-align: center;"&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;img alt="Satish Chandra Jha" src="http://maithili.editor.googlepages.com/satishchandrajha.jpg" align="right" width="90" /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;लेखक- श्री सतीश चन्द्र झा&lt;/span&gt;,&lt;br /&gt;म.न. 119, क्रॉस रोड, संत नगर&lt;br /&gt;बुराड़ी, दिल्ली- 110084&lt;br /&gt;सम्पर्क- 9810231588&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;संजू ...! आइ हमरा अहांक स्मरण बड़ आबि रहल अछि। अहां सदिखन कहैत छलहुं ने ... अनुभा अहां बड़ सुन्नरि छी ...! सृष्टि मे अहां सँ बेसी सुन्नरि त कियो छैके नहि ... आ हम लजाइत कहैत छलहुं-धत ... अहां के हरदम एतबे ... मुदा सत्ये कहैत छी-संजू ... यैह सब बात अतीतक स्मरण बनि कऽ रहि गेल अछि। आइ हमरा बीतल बात अनायास चलचित्रक भांति स्मरण होमए लागल अछि...&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हमर डैडी द्वारा अहांक अपमान। अहां तऽ जनैत छलियै जे हमर डैडी एक परंपरावादी व्यक्ति छलथिन्ह, समाज नामक कोढि़ के ओ अपन शरीर पर आक्रमण करबाक पूर्ण स्वतंत्रता दऽ देने छलथिन्ह, तखने तऽ ओ हमरा अहांक संग विवाह करबाक अनुमति नहि देले छलथिन्ह, फेर अहां गरीबक बेटा आ हमर डैडी लखपति... केहन विडंबना छल...?&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आखिर कहिया धरि परीक्षा होइत रहत गरीबी आ अमीरीक बीच पिसाइत प्रेम के? हमरा मन मे हरदम एहने प्रश्न उठैत रहल छल। फेर एक दिन अहूँ हमरा सँ संबंध तोडि़ चलि गेल छलहु, हम शिकारीक बाण सँ आहत भेल हिरणी जकां छटपटाइत रहि गेल छलहुं। हम राति-राति भरि कनैत रहैत छलहुं अहांक लेल मुदा लाचार छलहुं जे विद्रोह नहि कऽ पाबि सकलहुं। आइयो नारी कतेक बेबस अछि ई बात कियो हमरा सँ पूछए। एहि बातक उत्तर आखिर हमरा सँ बेसी बढिय़ा के दऽ सकतै अछि।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;डैडी हमर विवाह एक लखपतिक बेटा जयदीप सँ कऽ देलनि मुदा जयदीप आ हमर कुण्डली हरदम एक दोसराक विपरीते रहल। तइयो हम समय सँ समझौता करैत रहलहुं। जयदीप क्रूर स्वभावक व्यक्ति छल तखनो हम हुनक पूरा-पूरा खियाल रखैत छलियैन मुदा भाग्य के हुनक ई पूर्णता मंजूर नहि छलनि। संभवत: रुपयैवला व्यक्ति रुपैयाक सबसँ बेसी भुखाएल रहैत अछि से हमरा ओही समय ज्ञात भेल छल। सासुरक रहन-सहन सबसँ भिन्न छल। घरक सब सदस्य रुपैया प्राप्त करबा लेल किछुओ करबा पर तैयार रहैत छलाह, तखने तऽ हमरा अपन डैडी के घर सँ लाख-डेढ़ लाख रुपैया मंगबाक लेल पठाओल जाए लागल आ हम अपन डैडीक समक्ष निघोरत भऽ कऽ सब बातक बखान कऽ दैत छलियन्हि, किएक तऽ डैडी जहिया सँ अहां के अपमानित कएने रहथि तहिया सँ हमर हुनका पर सँ विश्वासे उठि गेल छल। डैडी हमर बात के चुपचाप सुनि हमर हाथ पर लाख-डेढ़ लाख रुपैया गट्ïटी दऽ दैत छलाह। ... मुदा ... डैडी के जेना जयदीप सँ धीरे-धीरे घृणा होमए लागल छलन्हि। कारण जयदीप बिना मतलबे हमरा मारहु लागल छल। पराकाष्ठा पर तखन भऽ गेल, जखन डैडी अपन सबटा जमीन-जाल, घर-घराड़ी अपन भगिनाक नामे लिखि देने रहथिन आ एहि संसार के अंतिम प्रणाम कऽ गेल रहथिन्ह। चूंकि हमर कोनो भाई नहि छल एहि दुआरे हमर पति आ हुनक परिवारक अन्य सदस्यगण हमरा सँ लाखोंक सम्पत्ति के आस लगओने रहथि, मुदा एहन नहि होबाक कारणे ओ लोकनि उग्र रूप धारण कऽ लेलनि।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;संजू ...! हम अपन कान सँ सुनने छलियै जे ओ सब हमरा मारबाक योजना बना रहल छल। फेर घर मे आबि कऽ हम खूब कानऽ लागल छलहुं मुदा हमर नार पोछनिहार कियो कहां छल ...? एहन मे हमरा अहां बड़ याद अएलहुं संजू ... बड़ याद अएलहुं। मन तऽ होइत छल जे भागि कऽ अहां लग चलि आबि मुदा आगिक समक्ष लेल गेल सात फेराक सप्पत रोकि देने छल।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ओहि राति जखन हम थाकल ढेहिभाएल सुति रहल छलहुं कि जयदीप हमरा देह पर मटिया तेलक डिब्बे उझइल देने छल, हम हरबड़ाकऽ उठि गेल रहि आ लाइटर जरबैत पति के देखि ओहिठाम सँ भागबाक प्रयास करऽ लागल छलहुं, एहि भागम-भागक स्थिति मे सासु हमर साड़ीक खूट के खूब जोर सँ पकडि़ लेने रहथि। हम हुनको धक्का दइत केबार खोलि सड़क पर आबि गेल छलहुं। लेकिन ओतहु हम रुकलहुं नञि, दौड़ैत चलि गेलहुं ... नञि जानि कखन तक दौड़ैत रहलहुं ... तखने हमरा लागल जे हम स्टेशन पर आबि गेलहुं अछि आ बिना बुझने-सुझने सीटी मारैत एकटा गाड़ी पर चढि़ गेल छलहुं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अंतहीन यात्रा दिस हमर डेग बढि़ गेल छल। गाड़ी रुकल ... खुजल ... रुकल, मुदा हम ओहि मे सँ तखने उतरहुं जत्तए ओहि गाड़ी के अंतिम पड़ाव छलैक। चूंकि हमरा लग टिकट नहि छल ताहि दुआरे हम पकडि़ कऽ जेल पठा देल गेलहुं ...&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;जेल मे हमरा एकटा महिलासँ परिचय भेल, जे हमरा नारी कल्याण नामक एकटा संस्थाक नाम कहने छल। जखन हम जेल सँ छोड़ल गेलहुं तऽ सीधे ओही नारी कल्याण संस्था गेल रहि, अपन कल्याणक हेतु, मुदा तखन हम ई नञि बुझि सकल छलहुं जे हम एक नर्क से दोसर नर्क मे पहुंचि गेलहुं अछि।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;संजू ... जाहि ठोर आ आंखिक प्रशंसा करैत अहां अघाइत नहि छलहुं से आइ वैह ठोर आ आंखि हमर जानक दुश्मन बनि गेल अछि। नारी कल्याणक सचिव हमरा हरदम अपन शरीर केँ बेचबाक हेतु विवश करैत रहैत छल। एक राति तऽ ओ हमरा सामने एकटा हठ्ठा-कठ्ठा खूंखार आदमी के हमर अस्मत लूटबाक लेल कहने छलैक! आ हम कोनो तरहे ओहि ठाम सँ जान बचाकऽ भागल छलहुं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;एहि अंतराल धरि हम भीतरि सँ टूटि गेल छलहुं। मन आजीज-आजीदन भऽ गेल छल, कोनो रस्ता शेष नहि रहि गेल छल तखन हम सीधे थाना पहुंचलहुं आ ओहिठाम अपन व्यथा कथा सुनेलहुं। नारी कल्याणक विरुद्ध रिपोर्टों लिखबएने छलहुं। इंसपेक्टर अवनि सं जखन हम सबटा बात कहलियनि तऽ ओ तुरंते एस.पी. महोदय सँ फोन पर संपर्क केलनि। इंसपेक्टर हमरा संध्या सात बजे एस.पी. महोदयक निवास पर जएबाक बात कहलन्हि। निवासक बात सुनितहि तऽ हमर मन फेर डराऽ गेल छल आ भरिदेह पसेनाक बुन्न छोडि़ देने छल, मुदा ... दोसर रस्तो तऽ नहि छल ... सात बजे एस.पी.क निवास पर पहुंचलहुं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;एस.पी. महोदय बड़ स्नेह सँ भीतरि बजेलन्हि आ बैसबाक इशारा देलन्हि। जाहि स्नेह आ अपनत्वक प्रदर्शन ओ कएने रहथि, ओकरा देखि कऽ तऽ हम एकदम निश्चिन्त भऽ गेल रही, आ पूर्ण सुरक्षित सेहो बुझऽ लागल छलहुं। एस.पी. साहेब सबटा बात के ध्यान सँ सुनने छलाह, मुदा... मुदा किछुए कालक बाद गिरगिट जकाँ रंग बदलऽ लागल छलाह ... आ हमरा लगमे आबि कऽ बैसि गेल छलाह। एकाएक हमरा भरि पाँज ...! हम कसमसाए लागल छलहुं ... ओ धमकी दैत हमरा आत्मसमर्पण करबा लेल बाध्य कऽ रहल छलाह ...। हमर सुतल नारीत्व जागि उठल छल आ हम टेबुल पर राखल तरकारी काटऽवला चक्कू उठा कऽ एस.पी. के डराबए लागल छलहुं ... मुदा हवसक भुखाएल ... मानऽबला कहां छल, ओ हमरा लग अबैत गेल... कि तखने हम पूरा जोर सँ चक्कू ओकर पेट मे घोंपि देने छलियैक ...। नञि जानि कोन दैवीक प्रेरणा हमरा एहन करबा लेल विवश कऽ देने छल। चेतना जखन वापस आएल तऽ हम चिचिआ उठलहुं आ भागबाक प्रयास करऽ लगलहुं, मुदा कतऽ मांगि सकैत छलहुं ...? हम पकडि़ लेल गेलहुं आ हमरा पर मुकदमा दायर कऽ देल गेल, अदालत फांसीक सजा सुनेलक अछि। काल्हिए हमरा फांसी पड़बवला अछि। ऐहन विकट स्थिति मे अहां बहुत याद आबि रहल छी। मधुर स्मृति तऽ सौ वर्षक बादो ओहिना टटका बनल रहैत छैक ने ...?&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;संजू ... हमरा ज्ञात भेल अछि जे अहां एखन धरि विवाह नहि कएलहुं अछि। की! अहां हमर एकटा बात मानब ...?&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;विवाह अवश्य कऽ लेब ... आब तऽ अहां के प्रमोशन सेहो भऽ गेल हैत! संजू ... जाधरि अहां विवाह नहि करब ताधरि हमर आत्मा के शांति नहि भेटि पाएत! एक वचन अहां सँ हम आओर लेबऽ चाहैत छी, बाजू पूरा करब ने ...?&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अहां अपन पत्नीके खूब पे्रम करबनि। हमरो हिस्साक प्रेम अहां हुनकहि देबनि, जाहि सँ हमर आत्मा सेहो अपन हिस्साक प्रेम पाबि कऽ हरदम अहांक लगेने रहत ... हरदम अहांक लगेने रहत ...।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अहींक अनुभा, सेंट्रल जेल।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-8224805117387965760?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/8224805117387965760/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=8224805117387965760' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/8224805117387965760'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/8224805117387965760'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2010/01/blog-post_12.html' title='ई चिठ्ठी हुनकर नाम'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-7917453815763620552</id><published>2010-01-05T00:00:00.000+05:30</published><updated>2010-01-05T00:00:00.476+05:30</updated><title type='text'>अनचिन्हार सन अपन (कथा)- सुभाष चन्द्र</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आई संजूक दुरागमन छैक। आईसऽ करीब एक बरिसक पूर्वक गप्प अछि। पोड़का साल बैसाख मे ओकर वियाह भेल रहैक। वियाह मे कतै खुशी रहै, संजूक मोन खुशी सऽ आह्लादित रहैक। विवाह सँ पहिनहि ओ अपन मन-मंदिर मे कतेक सुन्नर वरक कल्पना कयने छल? वियाहक नाम सुनितै ओकर मन रोमांचित भऽ जाइत छलै। वियाह सऽ किछु दिन पहिनहि ओ अपन मामाक डेरा पर दरभंगा मे रहि कय बी.ए. प्रथम वर्षक परीक्षा दय रहल छल आ ओहि क्रम मे ओकर-वियाह ठीक भेलै। वियाह ठीक होबाक प्रत्येक चरण सऽ ओ पूर्णरूपेण अवगत छल। वियाहक दिन सऽ मात्र एक सप्ताह पहिनहि ओ अपन गाम पहुंचल। गाम मे जखन उतरबरिया ओसारा पर ओकर वियाहक गप्प होइत छलै तऽ ओ ओहि बीच सऽ उठि कऽ अपन घर चलि जाइत छल। एवम्ï प्रकारे विघ्न-बाधा के पार करैत ओकर वियाह सम्पन्न भेलै।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt; &lt;div style="BORDER-TOP: #5c8a64 5px solid; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 5px; MARGIN: 12px; WIDTH: 200px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 5px; BORDER-BOTTOM: #5c8a64 5px solid; TEXT-ALIGN: center"&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;img alt="Subhash Chandra" src="http://maithili.editor.googlepages.com/subhash.jpg" width="90" align="right" /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;लेखक- श्री सुभाष चन्द्र&lt;/span&gt;,&lt;br /&gt;युवा पत्रकार सुभाष जी पत्रकारिताक संग हिन्दी आ मैथिली दुहू साहित्य मे सक्रिय, एखन धरि दू गोट हिन्दी पुस्तक प्रकाशित आ &lt;a href="http://www.vidyapati.org/"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;"कतेक रास बात"&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;क लेल नियमित रुप सँ लेखन आ वर्तमान मे एकर सम्पादक सदस्य सेहो। संगे एकगोट नव मैथिली पत्रिका निकालबा लेल सेहो प्रयासरत। सम्प्रति "प्रथम इम्पैक्ट" नामक पाक्षिक पत्रिका मे कार्यरत आ दिल्ली मे निवास।&lt;br /&gt;सम्पर्क-+91-98718 46705&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;- सम्पादक।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;वियाहक बाद संजू पहिले सऽ बेसी सुंदर जानि पड़ैत छल, ओकर ललाट श्रीयुक्त बुझना जाइत छलै। अपन वर सऽ वैह बेसी सुन्नर व आकर्षक छल। मुदा ओकरा लेल तऽ ओकर पति परमेश्वर छलखिन, ब्रह्मा के लेखा-जोखा मानि कऽ ओ अपन वर के सहर्ष स्वीकार केलक। एखन अपन विवाह सऽ ओकरा कोनो तरहक शिकायत नहि छलै। भऽ सकैछ, मन मे कोनो तरहक बात होबो करैऽ तइयो ओकरा ककरो आगू व्यक्त नहि करैत छल। विवाहक पंद्रह दिनक बाद संजूक वर जीविकोपार्जनक लेल परदेश चलि गेलखिन, जतय ओ काज करैत छलाह। आब तऽ मात्र चिठ्ठी पतरीक सम्पर्क शेष रहि गेल छलै। समय-समय पर पावनि-तिहार मे ओकर वर गाम अबैत छलखिन।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;गामक कण-कण सऽ परिचित बीत-बीत जगह सऽ मित्रता ओ अपन मामा आ बाबूजीक दुलारि संजू-के ई गाम घर छोड़ऽ पडि़ रहल छलैक। जहिया ई 'दुरागमन' शब्द ओकर कान मे सन्हिआयल रहै, छटपटा गेल छल संजू। आ छटपटाक रहि गेल छल। खेनाय-पिनाय छोडि़कऽ जठरानलक समान भऽ गेल छल, देहक रौनक जेना समाप्ति भऽ गेल रहै। नेना मे ई शब्द बड़ मनोरंजक आ आनंददायक बुझि पड़ैत छलै। मुदा ई शब्द मे कतेक मारुक वस्तुक समावेश होइत छै, ओहि दिन बुझवा मे आयल रहै। एकर अपन सभ आन भ गेल रहै। सभक मुंह पर खुशी पसरि गेल रहै।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बाबूजीक करेज सूप सन भऽ गेल रहनि। मायक कोढ़ दरकबाक सांती सांठ राजक ओरियान दिस चलि गेल छलै। भैया आ पित्ती लोकनि एहि काजक संपादन मे जी जान सऽ जुटि जेबाक उपक्रम करय लागल छलथिन। आ संजूक देह सुन्न भऽ गेल रहै। ई गाम-घर, लोक-वेद छोड़बाक कल्पना मात्र सऽ ओकर दिमाग अकुलाय लागैत छलै। मुदा जखन ई कल्पना यथार्थ भऽ पछोड़ धेलकै तऽ एकरा किछुओ नञि फुरेलै। कनेकाल मायक मुंह के निहारलक, छोटकी दूनू बहिन आ भाई के सिनेह के टोलक, बाबूजीक दुलार के याद केलक, भाऊजक सानिध्य के टोकलक। तइयो जखन सभ दुआरि फरेबक दुआरि बुझेलै, अपन सभ चिन्हार अनचिन्हार जकाँ लगलै तऽ ओसारा पर सँ उठि गेल।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;खेनाय एकदम सँ तिताइन बुझना गेलै। हांञि-हांञि मुंह धोलक। आ घर मे जा अर्राकऽ पलंग पर खसि पड़ल। पुक्की पारि कनबाक इच्छा भेलै। लेकिन कण्ठ सँ आवाज भागल बुझेलै। माय आओर भाउजक पयर छानि पुछबाक मोन भेलै, जे कोन ऐहन अपराध हमरा सऽ भऽ गेलौ भाय! जे एतेऽ निर्मम बनि बैला रहल छैं। कोन ऐहन विभेद भऽ गेल सिनेह मे भौजी! जे अहांक अमृत घोरल बोल लय हम हरिण जकां फिफिया रहल छी? भौजी! अहींक सिनेह सऽ ई गाम छोड़बाक इच्छा नञि भेल कहियो, मुदा ...। अंत मे संजूक करेज दरकि गेलै। कानैत-कानैत गेरुआ भिजा लेलक। लेकिन एकर सभ नोर दूरि गेलै। आई बेस चहल-पहल छै। बरिआती काल्हिं सांझे आबि गेल रहै। आई ई चलि जायत। जँ स्वेच्छा सऽ जेबाक गप्प होइतै तऽ ई किन्नो ने एहन इच्छा करैत। एक दिन जखन अपन अही संताप पर सोचैत बहुत दूर धरि चलि आयल छल तऽ एहि घोंकल परम्परा पर अतिशय तामस भेल रहै। एहनो कतौ उचित छै जे ककरो इच्छाक प्रतिकूल ई समाज अजगर बनल ठाढ़ रहय। भावना के बिसरि जाय! संजू चाहैत छल, बाबूजी के कहियनि जा कऽ जे बाबूजी, दिन फिरा दियौ। जहिया मौन भरि जायत हम स्वत: ककरो बिनु दु:ख देने चलि जायब।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;लीक सँ हटि कऽ एते आगू अयबाक हियाब नञि भेलै। कतेको तरहक विचार मे बहैत रहल आ सभक निचोर नोरक रूप मे बहार होइत रहलै। आई भोरे सऽ संजू सभ कथूके बिसरि गेल अछि। हँ, मात्र सूर्यास्तक पश्चात एहि आँगन, एहि परिवार, एहि गाम के छोडि़ कऽ जा रहल अछि। जखनै आईं सूर्यास्त हेतै, संजू एहि जगह के परती-पराँत बना चलि जायत।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;एकर दुख एखन नञि छै। ई बिसरि गेल अछि जे एखनै, आइए एकर जीवन मे कोनो नव घटना घटै बला छै। एकटा ओहन घटना, जे ककरो करेज के कनी कालक लेल दरका देतै। टोलक बुढ़-बुढ़ानुस, दाई-माइ लोकनि ऐखन एकर किरदानी पर व्यंग्य-घोरल बोल सऽ आश्चर्य व्यक्त कय रहल छथिन्ह। एकटा बुढ़ही के जखन असह्य भऽ उठलनि तऽ उठिकऽ विदा भऽ गेलीह। आइ अकर ऽ हरऽ कऽ रहलि छै ई छोडि़। ने बरिआती अयलै-तखने हाक उठोलकै, ने आइए संच-मंच भऽ बैसलै। देखह तऽ इम्हर सऽ ओम्हर घुमए अछि। एकटा हम सभ रही जे मास दिन पहिने सऽ छाती फाटैत रहए। आ घर मे गुम-सुम कानैत रही। ... लेकिन ओ बुढ़ही की जानैत छलीह, जे संजूक छाती कतेक फाटैत रहय। हरदम ओ गुम सुम भऽ मन्हुआयल रहैत छल। नहि खेबा मे मौन लगै आ नञि गप्प करबा मे।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;किछु वस्तु जात के तकबाक लेल ओ भौजीक दक्षिणबरिया घर सऽ अपन उतरबरिया घर मे हुलि जाइत अछि। लोक सभ थहाथही छै। बरिआती खोयेबाक ओरियान मे सभ पुरुष बाझल छलखिन। एकरा कने संकोच भेलै आ कि किछु मोन पडि़ अयलै, चोट्टे घुमि गेल। तखने ओसारा पर बैसल कियो बाजि उठलै-संजू! कानै कहां छहिन गै? तोरा सऽ बेसी तोहर माय-बहिन कानै छौ? ... संजू के एकाएक जेना ठेस लागि गेलै। मुदा सम्हरि उठलि। भीतर सऽ हंसीक एगो तोर उठलै आ ठोर पर आबि जाम भऽ गेलै।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;उत्साह मे वएह वाला वेग आबि समा गेलै। पुनि भौजीक घर दक्षिणबरिया ओसारा पर चलि गेल। कनी कालक बाद ओ भौजीक घर सऽ उठि जाइत अछि। कोनो प्रकारक विचार के मोन सऽ हटा देबाक चेष्टा करैत अछि। अपन दूनू छोटका भाई के तकबाक चेष्टा करैत अछि। आंगन मे कतओ नजरि नहि पड़ैत छै। कि तखने दलान पर ओकर बोल सुनाइ दैत छै। एकर करेज बुझु एकबेर फेरो दरकि गेल होइहि। बेजान ढलान दिस दोगैत अछि। लेकिन ड्योढ़ी लग अबैत-अबैत सभ उपक्रम लूंज भऽ जाइत छै। सभ हुलास मरि जाइत छै।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;संजू फेर जेना मुरुझि जाइत अछि। बुझाइत छै, एहि ठाम चारुकात सऽ हमर सभ बाट बन्न कऽ देल गेल अछि। हमर हरेक क्रिया कलाप पर अनगिनत नजरि कें बैसा देल गेल अछि। एकरा बुझना जाइत छै, जे एखन सभक दृष्टि हमरहिं प्रत्येक हाव-भाव पर अटकल छै। हमर एहि प्रकारक किरदानी ककरो सहय नहि भऽ रहल छै। कि तखने छोटका भाय दौडि़ कऽ आबैत एकर दूनू पैर गछारि लैत छै। संजूक चेतना घुरैत छै। छोटका भाय मोनू दीदीक भावना के बिनु परेखतै बिच्चे मे बाजि उठल—'हमरा तोहर बरिआती नञि आबय दैत छलाह, जाऊ हम अहां सऽ नञि बाजब।—मोनूक बोली एकरा थप्पड़ जकां चोट केलकै। मुदा तइयो बात के त'र दैत मोनू के माथ पर हाथ फेरैत दुलार ऽ लागैत अछि। तखने कोनो कोना सँ व्यंग्य घोरल पाँती कान दिस लपकैत छै—'जे बुझाइत नञि छै जे ऐकर दुरागमन छै, कतेक बढिय़ा घुमैत अछि। आई काल्हिंक छहि, ताहिं पिया घर जयबाक खुशी छैक।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;एहि बात सुनि कऽ संजूक सोझां कारी चादरि ओलरि जाइत छै। आ दिमाग मे आगि धधक' लागैत छै। सभ किछु छोडि़ उठि जाइत अछि। मौन धीरे-धीरे तिताय लागैत छै। आई भोरे सऽ सब गोटे एकतरफा भऽ गेल छथि। सभक भावना चालनि भऽ गेल छैन्हि। सभक बुद्धि लोढ़ा भऽ गेल छै। ई सब मोन मे अटियाबैत ड्योढ़ी पर सऽ उतरबरिया ओसाराक लेल डेग उसाहैत अछि। पुन: चोट्टे ठमकि जाइत अछि। नजरि कोनियां घरक मुहखर पर जाइत छै, जाहि घर मे माय खेनाय बना रहल छलखिन आओर मायक नोर टप-टप चुबैत छलै। एहि दृश्य के देखि कऽ संजूक धीरज जबाव दय देलकै, ओकर कुहेस फाटि गेलै। सीधे जा कऽ मायक कोरा मे खसि पड़लै। कानैत-कानैत अचेत भऽ गेल, ओकर नोर सऽ मायक नुआ भीज गेलैन्ह। केतबो किओ चुप करेबाक कोशिश करथिन, मुदा ओ चुप होबय वला कहां छल? अंत मे बाबूजी ऐलखिन तखन चुप करोलखिन। हृदय नोरायलै रहैत छै। सोचेत अछि सत्ते हमर सभक इच्छाक कोनो मोल नञि होइत छै। से ऐना कियैक होइत छै? आ धीरे-धीरे सभ हुलास क्षीण होइत चलल जाइत छै। एकर सभ चेष्टा मृत्यु सज्जा पर पड़ल कोनो रोगी जकां होबऽ लागैत छै। किछु करबाक उत्कट इच्छा रहितौ किछु करबा मे असमर्थताक अनुभव करैत रहलि।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आ अही घुन-धुन मे कखन चेतना घुरि अयलै, मोन नञि पडि़ रहल छै। दिन लुक झुक कऽ रहल छै। कि तखने किओ पाछां सऽ ओकर डेन धरैत छै। बड़की काकी छलखिन। काकी बड़की भौजी दिस आग्नेय दृष्टियें ताकैत बाजि उठै छथिन्ह—'अंए ऐ कनियां! कखन कहलौं सभ गहना-गुडिय़ा पहिरा दियौ? एह बाप रे! लाउ, जल्दी करु सात बजेक भीतर विदागिरी भऽ जेबाक छै। ... दलान पर सऽ बड़का कक्का सेहो जल्दी करबाक लेल कहलखिन।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बड़की काकीक बोल सुनिते संजूक बुद्धि निपता भऽ जाइत छै। आँखि सेहो अपन ज्योति चोरा लैत छै। आ बुझाइत छै जे प्राण सेहो संग छोडि़ रहल छै। आओर तकर बाद जे सम्मिलित हाकक आदान-प्रदान शुरू होइत छै, सगरो आंगन बुझु नोराय जाइत छै। संजूक कानब एकटा फराक-सनक स्वर निकालैत अछि, जे स्वर नमहर प्रश्न-चिह्न ठाढ़ करैत छै?&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-7917453815763620552?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/7917453815763620552/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=7917453815763620552' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/7917453815763620552'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/7917453815763620552'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2010/01/blog-post.html' title='अनचिन्हार सन अपन (कथा)- सुभाष चन्द्र'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-7188505290160074072</id><published>2009-12-29T00:00:00.001+05:30</published><updated>2009-12-29T11:45:08.660+05:30</updated><title type='text'>रस्ता</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(102, 0, 0); font-weight: bold;"&gt;- श्री सतीश चन्द्र झा&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;आदमी&lt;br /&gt;विचार सँ पैघ होइत छै&lt;br /&gt;वैभव आ अभिमान सँ नहि&lt;br /&gt;जनैत छी&lt;br /&gt;विचारक फुनगी पर&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div style="border-top: 5px solid rgb(92, 138, 100); border-bottom: 5px solid rgb(92, 138, 100); margin: 12px; float: right; padding-bottom: 5px; width: 200px; line-height: 100%; padding-top: 5px; text-align: center;"&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;img alt="Satish Chandra Jha" src="http://maithili.editor.googlepages.com/satishchandrajha.jpg" align="right" width="90" /&gt;&lt;span style="font-weight: bold;"&gt;कवि- श्री सतीश चन्द्र झा&lt;/span&gt;,&lt;br /&gt;म.न. 119, क्रॉस रोड, संत नगर&lt;br /&gt;बुराड़ी, दिल्ली- 110084&lt;br /&gt;सम्पर्क- 9810231588&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;आदमीक प्रवृति टाँगल रहैत अछि&lt;br /&gt;आ ओकर प्रारब्ध&lt;br /&gt;कर्मक गति तकैत अछि&lt;br /&gt;तत्पश्चात&lt;br /&gt;आदमी, आदमी बनैत अछि।&lt;br /&gt;हम अहाँक उपदेशक नहि&lt;br /&gt;हम त मानधन छी&lt;br /&gt;हमर औकात तऽ&lt;br /&gt;एकटा चुट्टी सन अछि&lt;br /&gt;जकर मालगुजारी&lt;br /&gt;हम अपन शब्दक रूप मे अभिव्यक्त करैत छी।&lt;br /&gt;हमर बात मानब त सुनू&lt;br /&gt;अहाँ अपन मनोवृति के बदलु&lt;br /&gt;एहिठाम अहाँ के सभ किछु भेटत&lt;br /&gt;जकरा अहाँ प्राप्त कए सकी&lt;br /&gt;मुदा भाई लोकनि&lt;br /&gt;रस्ता दूटा अछि&lt;br /&gt;पहिने आश्वस्त भए जाउ&lt;br /&gt;जे कोन रस्ता कतए जाइत अछि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;—सतीश चंद्र झा&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-7188505290160074072?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/7188505290160074072/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=7188505290160074072' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/7188505290160074072'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/7188505290160074072'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2009/12/blog-post_29.html' title='रस्ता'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-92435441250206817</id><published>2009-12-22T00:00:00.000+05:30</published><updated>2009-12-22T00:00:00.442+05:30</updated><title type='text'>मध्य वर्गक सपना</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#003300;"&gt;- श्री सतीश चन्द्र झा&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;भीजि क’ आयल छलहुँ हम&lt;br /&gt;आँखि मे किछु स्वप्न धेने।&lt;br /&gt;मोन के पौती मे भरि क’&lt;br /&gt;स्नेह के  संदेश  रखने।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किछु कहब हम बात अप्पन&lt;br /&gt;किछु अहाँ सँ आइ पूछब।&lt;br /&gt;फेर हम निष्प्राण भ’ क’&lt;br /&gt;बाँहि मे विश्राम खोजब।&lt;br /&gt;&lt;div style="BORDER-TOP: #5c8a64 5px solid; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 5px; MARGIN: 12px; WIDTH: 200px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 5px; BORDER-BOTTOM: #5c8a64 5px solid; TEXT-ALIGN: center"&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कवि- श्री सतीश चन्द्र झा&lt;/span&gt;,&lt;br /&gt;व्याख्याता, दर्शन शास्त्र,&lt;br /&gt;मिथिला जनता इंटर कॉलेज, मधुबनी,&lt;br /&gt;सम्पर्क- +91-97087 15530&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;पी लितहुँ हम नोर आँखिक&lt;br /&gt;ठोर पर उतरल अहाँ के।&lt;br /&gt;नेह सँ परितृप्त करितहुँ&lt;br /&gt;साटि छाती मे अहाँ के।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ल’ लितहुँ चुम्बन हृदय सँ&lt;br /&gt;गाढ़ रक्तिम ठोर पर हम।&lt;br /&gt;की करै छी ? लोक देखत,&lt;br /&gt;अहाँ कहितहुँ , हँसि दितहुँ हम।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भागि चलितहुँ फेर सँ हम&lt;br /&gt;संग ल’ सुन्दर विगत मे।&lt;br /&gt;कल्पना के पाँखि ल’ क’&lt;br /&gt;उड़ि जयतहुँ उन्मुक्त नभ मे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;होइत जौं ई सत्य सपना&lt;br /&gt;देवता के जल चढ़बितहुँ।&lt;br /&gt;हे प्रिये ! होइतै केहन जौं&lt;br /&gt;किछु समय के रोकि सकितहुँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भेंट होइते सभ बिसरलहुँ&lt;br /&gt;हम केना क’ बात मोनक।&lt;br /&gt;छै कहाँ रहि गेल वश मे&lt;br /&gt;स्वप्न देखब मध्यवर्गक।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अछि जतेक सामथ्र्य अप्पन&lt;br /&gt;क’ रहल छी कर्म सभटा।&lt;br /&gt;मोन मे अछि सोच कहुना&lt;br /&gt;किछु रहय बाँचल प्रतिष्ठा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अर्थ दुर्लभ वस्तु जग केँ&lt;br /&gt;अछि एकर भरि मास खगता।&lt;br /&gt;खर्च बढ़िते जा रहल अछि&lt;br /&gt;बढ़ि रहल दानव बेगरता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कात मे मुनियाँ कनै अछि&lt;br /&gt;किछु नया परिधान कीनत।&lt;br /&gt;नीक ब्राँडक जींस, जैकेट&lt;br /&gt;पुत्रा बड़का आइ आनत।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माँग छल पायल अहूँ के&lt;br /&gt;मोन मे अछि दू बरख सँ।&lt;br /&gt;नीक कुर्ता लेब हमहूँ&lt;br /&gt;जीब की हम आब सुख सँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साग - सब्जीक दाम पुछि क’&lt;br /&gt;होइत अछि परिपूर्ण इच्छा।&lt;br /&gt;जा रहल छी पाँव पैदल,&lt;br /&gt;भाग्य अछि रेलक प्रतिक्षा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देत के सहयोग अपनो&lt;br /&gt;क’ रहल अछि लोक शोषण।&lt;br /&gt;चीज शौखक अछि सेहन्ता&lt;br /&gt;क’ रहल छी मात्रा भोजन।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नाम सँ के आब चिन्हत&lt;br /&gt;अर्थ केँ सम्मान होइ छै।&lt;br /&gt;झूठ के सम्बन्ध सगरो&lt;br /&gt;के कतय किछु प्राण दै छै।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कामना भगवान सँ अछि&lt;br /&gt;जन्म दोसरो, संग भेटय।&lt;br /&gt;उच्च नहि त’ दीन .. निर्धन&lt;br /&gt;वंश कुल मे जन्म भेटय।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माँटि पर बैसल अहाँ संग&lt;br /&gt;खेल करितहुँ, स्नेह सदिखन।&lt;br /&gt;काल्हि के नहि आइ चिन्ता&lt;br /&gt;छुच्छ जीवन, तुष्ट जीवन।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-92435441250206817?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/92435441250206817/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=92435441250206817' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/92435441250206817'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/92435441250206817'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2009/12/blog-post_22.html' title='मध्य वर्गक सपना'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-4105802577780144560</id><published>2009-12-15T00:00:00.004+05:30</published><updated>2009-12-15T00:00:00.481+05:30</updated><title type='text'>नांगट जमाय</title><content type='html'>&lt;div style="TEXT-ALIGN: right"&gt;&lt;span style="COLOR: rgb(102,0,0); FONT-WEIGHT: bold" class="Apple-style-span"&gt;- श्रीमती कामिनी कामायनी&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;हकासल पियासल लाल काकी दौडल अयलहि। भट-भट आँखि सँ नोर खसैत, "यै बहिन... कनि चलथुन्ह है... ओझा मौहक नहि करैत छथिन्ह", नूआक खूट सँ आँखि पोछैत बजलीह। त' बहिन आने की पुरैनिया वाली काकी तुरते पएर मे चप्पल पहिर संग धेलिह।&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;काजक आंगन... भरि आंगन लोक पसरल। सबहक मुँह पर परेशानी... नेना-भुटका के छोडि कय... ओ सब मिलि कय कलोल करय मे लागल छल।&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;"यै बडकी काकी... कनि अहीं देखियौक... ऊह एहने पर...। कियौ बजने छल...। बडकी काकी माने पुरैनिया वाली काकी... सीधा वर लग कोहबर मे पहुँचली... अन्हार घर मे कोठी लग परहक बिछौन... पटिया पर सतरंजी आ' एक गोट नव चादरि बिछैल... कोहबर मे पुडहैर मे जरैत दीपक मद्धिम सन ईजोत... वर दूहु हाथ सँ गेरुआ केँ करेज सँ दबौने कनी-कनी झूलैत पटिया पर बैसल छलाह। घरक दोसर कोन मे चंगेरा, डाला, पातिल सब राखल। ओसारा पर विधकरि माटिक चूल्हि पर खीर पका क' दूनू थारी मे निकालि नेने छलीह, पितियौत सारि ओहि सँ कनेक फराक ठाम करि क' पिठार आ' सिनूर सँ अरिपन बना कम्बल बिछबैत छल ।&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="BORDER-BOTTOM: #5c8a64 5px solid; TEXT-ALIGN: center; PADDING-BOTTOM: 5px; LINE-HEIGHT: 100%; MARGIN: 12px; WIDTH: 200px; FLOAT: right; BORDER-TOP: #5c8a64 5px solid; PADDING-TOP: 5px"&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="FONT-WEIGHT: bold"&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_xd1j00Yk1I0/SyP8dZFGGFI/AAAAAAAAABw/iKN1pa62Q9o/s1600-h/kamini.JPG"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 202px; FLOAT: right; HEIGHT: 179px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5414448758908131410" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_xd1j00Yk1I0/SyP8dZFGGFI/AAAAAAAAABw/iKN1pa62Q9o/s320/kamini.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;लेखिका- कामिनी कामायनी,&lt;br /&gt;मैथिली, हिन्दी आ अंग्रेजी मे नियमित आलेख आ कविता लेखन,&lt;br /&gt;सम्पर्क- jk_kamayani@yahoo.in&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;दुनू थारी दुनू दिस राखल जा चुकल छल। गितहारि गीत गाबय लेल झुण्ड मे बैसल बेकल भए गोसाउनिक गीत शुरु कय देने छलीह 'अहिं के पूजन हम अयलहुँ भवानी.......'।&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;घरक चौखटि पर बैसल बडकी काकी एक नजरि सँ ओसारा आ आंगन दिस देखलन्हि.... आ दोसर नजर सँ वरक दिस। वर लग बैसल दू-तीन टा धिया-पूता केँ भगबैत बजलीह, "जो तू सभ बाहरि खेलि ग, कनि हमहूँ ओझा सँ गप करैत छी"। आ ससरि क' वरक पटिया लग आबि गेलिह।&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;"ओझा अहाँ कियैक एना घिनौने छी... कतेक बदनामी भए रहल अछि ।" बडकी काकी जे देखय सँ मातबर लागय छलीह, सोनक गहना पहिरने रंग-रूप सँ सेहो। वर कनेक हडबडेलाह... "नै काकी... हमरा ठकल गेल... लडकी बदलि देल गेल... हम त'... हम त'... ।&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;"की हम त'.. हम त' लगौने छी... आ' लडकी बदलि देल गे से शंका कोना... अहि टोल मे विवाहक जोगरि एक गोट यैएह टा कन्या छल... ओहो अहाँ सँ हजार कच्छ नीक छैक...।" काकी कनेक तमसा गेलीह... "परिछनो काल राति मे अहाँ अहिना घिनौने रही... पूरा समाज देखलक... कियो टीक नोचि लेलकै... कियो बरद कहि देलकै... विवाह करय लोक जायत अछि त' वर के बड बात-कथा सूनय पडैत छै... ई सभ शोभा-सुंदर होयत छै। मुदा अहाँ त' सभ गप पर मारि-पीट करय लेल फाँड बान्हि लैत छी... । अहाँ केँ माय किछु नहि सिखौलन्हि की... उठू.. मौहक करू... बेर शीतल जाय छैक...।&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;पता नहि की भेलय, जादू वा भूख लागल रहै, वर सत्ते मौहक करय पहुँचि गेलाह... आंगन मे स्त्रीगण सब जोर सँ ठहक्का लगौलक। मुदा वर मुँह नीचा गारने खीर खाइत रहलाह ' खीर खाइयो नै लजाईयो ओझा...' आ हँसी-ठठ्ठाक बीच मौहक भेल।&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;ई अजगुत वरक खिस्सा गरमी क' दुपहरिया मे खाली समय मे घरे-घर लागल... आ की कुमारि की बियाहल... सब एक-दोसर के कहनाय शुरु केलक ' हे गे अराधना... हे गे सपना, ममता चलबै ओहि टोल... पूनमी के वर देखय...। आ जे कहियो हुनक अंगना मे नहि आएल छल... सेहो सब आयल एहि अजगुत वर के देखए लेल...।&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;"सभा सँ भेल की घर कथा सँ... " मेहथ बाली जे बडका बेटा लग सँ काल्हिए आएल छलीह पुछलखिन्ह तए लाल काकी बड दुखी भ' बजलथि, "बहिन... घर कथे छै... पिण्डारुछ बला ओझा त' करबेलखिन्ह... लडका नौकरीहारा दिल्ली मे मनेजर छै... लाख टका मे... बेटी रानी बनि क' रहत... कियो मोडि नै दियै... ताहि लेल चुप्पे छलहुँ..."। कनिया के मायक आँखि सँ भट-भट नोर खसय लगलन्हि... त' अपन नवका नूआक खूट सँ आँखि पोछि लेलीह। मेहथ वाली धीरज धरैलन्हि "कथी लेल कानैत छी... आब धिया के जे कपार... जे विधि रचने होयथि... आब हिनके आसीरबाद दियौन्ह... सोना चाँदी त' फेरलो जाए छै मुदा सिन्दूर फेरलो नै जाए... ।"&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;मेहथ वाली काकी अपन घर आबि गेलीह मुदा मोन मे प्रश्न घुमैत रहलन्हि 'एक लाख मे एहने वर... एक त' कारी धुत्थूर... बडका टीक... नाक प तामस... बाजय के सबूर नहि... कोन मनेजर हेतैक। मोने मोन ओ तर्क वितर्क मे लागल छलीह। कतहुँ सँ बेसी पढल-लिखल नहि लागैत छल। बरातियो मे कोनो जान नै... जे गहना आ वस्त्र कनिया लेल आयल छै सेहो थर्ड किलास...। ओ अपन बहिन धी के फोन लगौलखिन्ह... पिण्डारुछ के छथि जमाय... दिल्ली मे पुलिसक बडका अफसर। अपने उठौलन्हि फोन। "कोन पिण्डारुछ बला के एहि गाम मे विवाह करौलियन्हि ओझा जी... कत्त' मनेजर छै.... । आ सब टा खिस्सा सुनि ओ गुम सुम रहि गेलीह।&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;दोसर दिन भेने फेर लाल काकी दौडल अयलीह... मुँह सुखैल... हकासल पियासल, "बहिन यै... कहै छैथ ओझा... बिन दुरागमने ल' जायब कनिया के... कनि चलथुन्ह... बडका नाटक शुरु केने छैथ फेर... अंगरेजी मे कीदन कीदन बाजैत छैथ।&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;लाल काकी के जखन कोनो मोसीबत पडैन्ह तए अपन एहि दुनु पडोसिया के घर जा क' मिनती करय लागथि। लाल कका कमाए लेल कलकत्ता जाए लगलाह त' अपन परिवार के एहि दुनु परिवारक भरोसे छोडने गेलाह। बडकी बेटी के विवाह मे जे कर्ज भेल छलैन्ह से आय पाँच बरखक उपरांत सेहो नै सधल छल। आ ओकरा बाद छोटकी बेटीक विवाहक कर्ज। ओतय हुनक माडवारी मालिक राति दिन खून चूसि चूसि ऋण सधबैन्ह। छोटकी के कन्यादानक पराते जखन बडका कका के दलान पर बरियाती पसरलै छल हुनका कलकता क' गाडी पकरबाक लेल मधुबनी टीसन दिस कएक मोनक पएर नेने प्रस्थान करय पडल छलैन्ह। बेटा सेहो ओहि ठाम काज करैत छल। ओकरा त' बहिनक विवाहक लेल छुट्टी सेहो नहि देलकैक।&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;मेहथ वाली काकीक बहिनधी सुगन्धाक विवाह पिण्डारुछे भेल छल। ससुर गामक मुखिया छलखिन्ह। चतुर्थीक परात मेहथ बाली काकी जे डील-डौल सँ बेस लमगर आ कनि भारी भरकम छलीह, माथ पर नुआ राखि पान खाइत दुपहरिया मे लाल काकी के आंगन पहुँचल छलीह। असगर घर मे वरक समक्ष बैसि बड महीन स्वर मे पुछलखिन्ह, "ओझा... मधुकर बाबू के चिन्हय छियैक..."।&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;"हँ काकी, कियैक नहि ओ त' हमर सबहक दियादे छथि। हमर परदादा पाँच भाय आ ओहि मे एकटा ओ सब छथि ।"&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;"हमर सबहक बड पुरान कुटुम छथि, कनकपुर विवाह छन्हि हमर बहिनक बेटी सँ। मुदा ओहि खानदान मे त' कियो नहि सासुर मे जा क एना उधम मचौने छल। बड भलमानुष लोक सब छथि।" वर एकदम चुप। 'आय धरि कियो वर एहि गाम सँ कोनो बेटी के जबरदस्ती बिन दुरागमन के नहि ल' गेलैए... अहाँ कोना ल' जेबए, उचित लगतैक... । एक सँ एक जमाय अयलाह एहि गाम मे।'&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;'उचित वा अनुचित की... ।' वर अपन औकात पर उतरि कुतर्क करय लागल 'हमरा संग... ।' "ओझा अहाँ केँ शिक्षा नहि भेटल अछि की बुजुर्ग सँ कोना व्यवहार करबाक चाही... । कनिया के पिता परदेस मे छथि... अडोसिया-पडोसिया संग द' रहल छैन्ह... आ' हुनक माता के अहाँ एना परेसान केने छी... ।"&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;धड आ माथ झुकौने वर पलथा मारने गुमसुम बैसल छल। वर के पस्त देखैत काकी के मनोबल बढलैन्ह। ओ अपन माथ पर सँ ससरैत नुआ के संभारैत बजलीह, "सब खिस्सा करैत अछि जे वर भंगतडाह छै... कखनो ठक बक चिन्हबा काल मे बकझक... कखनो पान सँ नाक पकरबेबा मे इंकार... ई लच्छन दिल्ली मे मनेजर लडका के लगैत छै। हमरा त' लगैत अछि लडकी बला नीक जेंका ठका गेलाह... कोन कम्पनी मे अहाँ मनेजर छी। की अहाँ के एक लाख दहेज लेबाक चाही।&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;वर के माथा ठनकलै। ओ माथा उठौलक, 'की हम मनेजर नहि छी...।' लाल टरेस आँखि सँ हुनका घुरैत कनि कडगर आवाज मे बाजल।&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;"अहाँ मनेजर नहि छी, छोटका-मोटका सेठक फैक्टरी मे चौकीदार छी। हमरा मधुकर बाबू... बहिन जमाए... सबटा कहलन्हि जे अहाँ के नौकरी लगौने छथि... आईये फेल कतओ मनेजर होयत छैक....।" काकी एक-एक शब्द पर अटकैत बजलीह।&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;आब तए ओकर सिट्टी-पीट्टी गुम। वर टुनटुन बाबू घिघियाय लगलाह, 'काकी गोर लागैत छियैन्ह... हिनक पएर छूबि सप्पत खाय छी... जेना इ कहथिन्ह सैह हेतैक'&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;मेहथ वाली काकी सहृदय स्त्री छलीह। हुनका व्यर्थ खिस्सा, परनिन्दा करय के आदत नहि छलन्हि। आब वर सरकसक जानवरक जेकां हुनक आदेश पर नाचय लेल तैयार छल। हुनका बड प्रसन्नता भेलन्हि। चलू केकरो कन्या के जीवन सुखी करबा मे किछु त' सहायक भेलहुँ।&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;"ठीक छै, विवाहक साल भरिक भीतर दुरागमन करब, ता धरि हमरो गाम पर पक्का मकान बनि जायत आ बाबूजी सेहो गामे मे रहताह। बड नीक जेकाँ बोल भरोस दए क' वर टुनटुन बाबू सौसक पएर छुबि विवाहक पन्दरहम दिनक बाद दिल्लीक लेल प्रस्थान करए सँ पहिने अपन गाम जा रहल छलाह।&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;लाल काकी निश्चिंत आ बेटी सुनन्दा बड प्रसन्न लागि रहल छलीह। सुनन्दा बड सुन्नर त' नहि मुदा अधलाह सेहो नहि छलीह... नव उमरि... नव-नव सिन्नूर माथ पर एकटा विशेष आभा देने छलैन्ह। कनिया सँ विदा होमय काल वरक मुँह पर सेहो विह्वलताक भाव छलैन्ह। कनिया कोठीक पाछां जाकय कानय लागल छलीह।&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;सौंसे टोल मे की पूरे गाम मे एकटा मेहथ वाली काकी के घर मे फोन छलैन्ह। परदेसिया बेटा सब लगा देने छल। आ' सब किओ अपन फोन सुनए लेल आबैत छल, खास करि क' टोलबईया। वरक पहिल फोनक खबरि सुनि सुनन्दा बिहाडि जेकां दौडल आयल छलीह। मेहथ वाली काकी ओहि कोठरी सँ हटि जाए छलीह... जखन-जखन फोन आबय। बड काल धरि गप्प चलै। किछु चिठ्ठीयो आबय लगलै... एहिना कए दिन बीतैत रहलै। काकी के सब धिया-पूता परदेसिये छलन्हि। बेटी सब अडोस-पडोसक गाम मे नीक घर मे बियाहल गेल छलीह। मुदा सब किओ आब कलकत्ता, बम्बई रहनिहार भ' गेल छलीह। काकी कने व्यापक लोक छलीह। कका जे सदिखन बेरामे रहैत छलाह... हुनक सेवा-सुश्रुषा करैत दिन बड नीक जेकां बीतैत छल। उमिर सेहो पचपन-छप्पन सँ बेसी नहि छलैन्ह। मुदा विधि के विधान की कहल जाए। एक राति सुतलीह त' सुतले रहि गेलीह। भोरे सोर होमय लगलै। बेटा-बेटी हवाई जहाज सँ पटना पहुँचि जेना-तेना जल्दी-जल्दी गाम पहँचलाह। समय पर सबटा काज बड्ड नीक जेकां सम्पन्न भए गेलए। &lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;एम्हर सुनन्दाक विवाहक साल भरि होएबा मे डेढ मास रहि गेल रहै। चिठ्ठी पर चिठ्ठी पठाओल गेल तए सुनन्दाक सासुर सँ दिन सेहो आबि गेल। फगुआ सँ दस दिन पहिने के।&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;वर टुनटुन बाबू दिल्ली सँ अपन गाम आ गाम सँ दोसरे दिन सासुर। ससुर आ सार सेहो कलकत्ता सँ आबि गेल छलाह। घर मे खूब चुहचुही छलैक। भनसा घर मे तरुआ-तिलकोर छना रहल छल। टुनटुन बाबू के जहिना खबर भेटलन्हि मेहथ वाली काकी गत भ' गेलीह ओ गँहीर स्वांस लैत एकदम्मे चुप भ' गेलाह। कनिया बुझलखिन्ह दुखी भए गेल छथि। काकी छेबो केलखिन्ह बड नीक... केकर नै मददि केने होयतीह... हुनका लग जे अपन परेशानी लए क' जाय... जौं हुनका वश मे होइन्हि तए अवस्से दूर करए के कोशिश करतथि। आ सुनन्दा के त' कतेक बेर अपना ओतए सँ फोन सेहो करए देने छलखिन्ह। कनि काल मे वर घर सँ उठि क' बाहर चलि गेलाह। &lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;कनि देर दलान पर बुलैत-टहलैत टुनटुन बाबू अंगना एलाह। तए सौस के बजा के कहलखिन्ह "विवाह मे तए ई सब ठकबे केलथि... की दुरागमन मे सेहो ठकती...। रंगीन टीवी.. मिक्सी.. स्कूटर.. फर्नीचर.. कत्तो देखाए नहि पडि रहल अछि। दुरागमन मे तए ई सब चीज अवस्से हेबाक चाही नै। बिना एहि वस्तु के दुरागमन केहेन।&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;लाल काकी अकबकाएल सन रहि गेलीह। दस दिन मे एतेक चीजक जोगाड कोना भ' सकैत अछि। अखने लाल कका कहुना क' किछु पैसा एडभांस लए के कलकत्ता सँ दुरागमन के लेल आएल छलाह। ई साठि-सत्तर हजारक आओर पैंच उधार के देत।&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;काकी चुपचाप धड खसौने लाल कका लग अपन छोटका दलान पर आबि बैसि रहलीह। कका के ई सब सुनि जेना हाथक तोता उडि गेलन्हि। बड फज्जति करि क' हुनक मालिक पच्चीस हजार अगेवार देने छलैन्ह। अथाह चिंता मे डूबल... जेहो... दू-तीन बीघा खेत छलैक... पहिने सँ भरना छलैक। आब लोक केबाला सेहो करबा नेने छल। बचल घडारी, पैंतालीस धूर.. ईहो बन्धकी लेनिहार एतए के। जौं लईयो लैत अछि तए एतेक पाय कत्त सँ देत। कका कतेक काल धरि दलान पर राखल चौकी पर बैसल रहि गेलाह। बेटा मधुबनी गेल छलैन्ह चीज वोस्त सब बैसाहय। बेर खसैत देखि काकी भानस बनबय लेल आंगन जाय लगलीह तए देखैत छथि... बाडी मे ठाढ बड बेकल भ' मुँह पर नुआ राखि सुनन्दा कानि रहल छलीह। मोन पहिने सँ दुखी... आओर घबरा गेलन्हि। बड्ड सप्पत्त दय पुछलखिन्ह त' बजलीह 'ओ अपन गाम चलि गेलाह, कहलथि जे जा धरि हमरा सबटा सामान नहि भेटत ता' हम दुरागमन नहि करब।' &lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;ओहि राति मे घर मे भानस नहि बनलै। पानिए पीबि कए सब लोक सूति रहल छलाह। एकर बाद कतेक परात भेलए... कतेक दुपहरिया आ राति भेलए...। अनका केकरो सँ एक दिन खबरि भेटलै... टुनटुन बाबू रुसिकए दिल्ली चलि गेलाह। आब नै कोनो चिठ्ठी.. नै फोन...। सुनन्दाक आँखि कनैत-कनैत सदिखन लाल टरेस भेल रहैत छै। मुँह पर जे हरीयरी आयल छलैक सेहो उडि गेलए... मुरझायल सन।&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;आ बड्ड सोचि विचारि क ' बेटी के दुख देखबा मे असमर्थ बाप एक दिन फेर कलकत्ता दिस पएर बढा चुकल छलाह। सोचने छलथि आब गामे मे रहब। बेटा मुरली सएह ऋण सधौत... मुदा विधिक विधान... टाकाक इंतजाम मे बीमारी आ बुढापा मे हुनका फेर चाकरी करय लेल परदेस जाय पडि रहल छल।&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: right"&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: right"&gt;- श्रीमती कामिनी कामायनी&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: right"&gt;12 अप्रैल, 2009&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-4105802577780144560?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/4105802577780144560/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=4105802577780144560' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/4105802577780144560'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/4105802577780144560'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2009/12/blog-post_15.html' title='नांगट जमाय'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_xd1j00Yk1I0/SyP8dZFGGFI/AAAAAAAAABw/iKN1pa62Q9o/s72-c/kamini.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-6132751861141906996</id><published>2009-12-08T00:00:00.003+05:30</published><updated>2009-12-08T18:53:53.136+05:30</updated><title type='text'>शरद ऋतु- अमित अभिनन्दन</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-size:large;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#006600;"&gt;- अमित अभिनन्दन&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;शरद ऋतु अछि आयल&lt;br /&gt;सुन्दर गाछक शाख&lt;br /&gt;रंग बिरंगक फूल खिलल अछि&lt;br /&gt;पोखरिक काते कात&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खूब लाल अछि फूल बैजयंती&lt;br /&gt;पीयर अछि कनेल&lt;br /&gt;बेला जूही चंपा सभ सं&lt;br /&gt;राह आच्छादित भेल&lt;br /&gt;&lt;div style="BORDER-TOP: #5c8a64 5px solid; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 5px; MARGIN: 12px; WIDTH: 200px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 5px; BORDER-BOTTOM: #5c8a64 5px solid; TEXT-ALIGN: center"&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_xd1j00Yk1I0/Sxvy-VU2cmI/AAAAAAAAABo/Qjj-qUzDzA0/s1600-h/Jhapat+Ji.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 104px; height: 120px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_xd1j00Yk1I0/Sxvy-VU2cmI/AAAAAAAAABo/Qjj-qUzDzA0/s320/Jhapat+Ji.jpg" border="0" alt="" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5412186529906192994" /&gt;&lt;/a&gt;कवि- अमित अभिनन्दन&lt;/span&gt;,&lt;br /&gt;झंझारपुर प्रखण्डक बलियारि ग्रामक निवासी 24 वर्षीय अमितजी पेशा सँ चिकित्सा विज्ञानक छात्र छथि आ संगे-संग साहित्यानुरागी सेहो छथि। सम्प्रति ज. ला. नेहरु चिकित्सा महाविद्यालय, भागलपुर मे अध्ययनरत। कतहु प्रकाशित हुनक इ पहिल रचना छियन्हि।&lt;br /&gt;सम्पर्क- +91-93865 50687&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सम्पादक, &lt;a href="http://www.vidyapati.org/"&gt;"कतेक रास बात"&lt;/a&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;गाछ सिंघारक खूब फुलायल&lt;br /&gt;सून मुदा अछि आम&lt;br /&gt;आमक डारि पर सजमनि लत्ती&lt;br /&gt;कतेक नीक एही ठाम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूर दूर तक धानक कोला&lt;br /&gt;हरियर हरियर खेत&lt;br /&gt;बड़का डकहर घूमि रहल अछि&lt;br /&gt;काँकोर लेने पेट&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समय सोहावन अति प्रीतिकर&lt;br /&gt;तुंरत धूप फेर छाँव&lt;br /&gt;बीच मेघ में बहुत ऊँच पर&lt;br /&gt;सूर्य जमौने पाँव&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीच पानि में बत्तख दौड़य&lt;br /&gt;काते काते माछ&lt;br /&gt;कमल फूल पर भौंरा उडि उडि&lt;br /&gt;खूब देखाबय नाच&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रकृति केर ई अनुपम बेला&lt;br /&gt;पंछी गाबय गीत&lt;br /&gt;पीपर तर सं सूरज झांके&lt;br /&gt;धरा लगाबय प्रीत।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-6132751861141906996?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/6132751861141906996/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=6132751861141906996' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/6132751861141906996'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/6132751861141906996'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2009/12/blog-post_08.html' title='शरद ऋतु- अमित अभिनन्दन'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_xd1j00Yk1I0/Sxvy-VU2cmI/AAAAAAAAABo/Qjj-qUzDzA0/s72-c/Jhapat+Ji.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-2197787755311695339</id><published>2009-12-01T20:22:00.002+05:30</published><updated>2009-12-01T20:42:55.208+05:30</updated><title type='text'>अबोध सपना-  श्री सतीश चन्द्र झा</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#009900;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;- &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Arial; white-space: pre; "&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#009900;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;श्री सतीश चन्द्र झा&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;जीवन केर विस्तृत नील पटल&lt;br /&gt;बादल बनि किछु हमहूँ लिखितौं।&lt;br /&gt;उगितै जौं चान अमावसक&lt;br /&gt;अपने अँगना हमहूँ नचितौं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छल उमर अबोधक कतेक नीक ,&lt;br /&gt;संघर्ष कतहु, नहि कतहु द्वेष&lt;br /&gt;सागर सन सौंसे पथ विशाल&lt;br /&gt;जा सकी जतय, नहि कतहु शेष।&lt;br /&gt;&lt;div style="BORDER-TOP: #5c8a64 5px solid; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 5px; MARGIN: 12px; WIDTH: 200px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 5px; BORDER-BOTTOM: #5c8a64 5px solid; TEXT-ALIGN: center"&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कवि- श्री सतीश चन्द्र झा&lt;/span&gt;,&lt;br /&gt;व्याख्याता, दर्शन शास्त्र,&lt;br /&gt;मिथिला जनता इंटर कॉलेज, मधुबनी,&lt;br /&gt;सम्पर्क- +91-97087 15530&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;झम-झम बर्खा पडि रहल बून्द&lt;br /&gt;अंगना-दलान भरि गेल पानि ।&lt;br /&gt;कापी-किताब सँ बना-बना&lt;br /&gt;छी बहा रहल हम नाव आनि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलितै जे नाव सरोवर ओ&lt;br /&gt;किछु दूर कतहु हमहूँ बहितौं।&lt;br /&gt;उगितै जौं चान अमावसक&lt;br /&gt;अपने अँगना हमहूँ नचितौं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छल कतेक नीक गाछक झूला&lt;br /&gt;उडि जायत छलहुँ मोनक अकाश ।&lt;br /&gt;अमृत-विष, सुख-दुख, किछु भय नहि&lt;br /&gt;चलि जाइत शून्यक आस-पास।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छी आइ कतेक निष्प्राण भेल&lt;br /&gt;फँसि महासिन्धु केँ भँवर जाल ।&lt;br /&gt;आशा-तृष्णा के मध्य कतौ&lt;br /&gt;अछि झूला रहल इ समय काल।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रहितै जे गाछ कतौ ओहने&lt;br /&gt;हम फेर आइ झूला झुलितौं।&lt;br /&gt;उगितै जौं चान अमावसक&lt;br /&gt;अपने अँगना हमहूँ नचितौं ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छल कतेक नीक टुकलीक पाछाँ&lt;br /&gt;उठि दौड लगाबी मस्त भेल ।&lt;br /&gt;चलि रहल पएर पथ, नदी, धार&lt;br /&gt;जा धरि नहि दिनकर अस्त भेल।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलि पाबि रहल छी कहाँ आइ&lt;br /&gt;अछि जतय सहटि क' भीड चलल।&lt;br /&gt;दौडब जीवन के पकडि लेब&lt;br /&gt;अछि कहाँ आब शक्ति बचल ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलितै जौं संग कियो हमरो&lt;br /&gt;किछु सुखद लक्ष्य हमहूँ पबितहुँ।&lt;br /&gt;उगितै जौं चान अमावसक&lt;br /&gt;अपने अँगना हमहूँ नचितौं ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-2197787755311695339?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/2197787755311695339/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=2197787755311695339' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/2197787755311695339'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/2197787755311695339'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2009/12/blog-post.html' title='अबोध सपना-  श्री सतीश चन्द्र झा'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-1438217770064092739</id><published>2009-11-20T21:09:00.001+05:30</published><updated>2009-11-20T21:14:02.075+05:30</updated><title type='text'>ब्रह्माक  चिंता</title><content type='html'>&lt;div align="right"&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;&lt;strong&gt;- रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;color:#006600;"&gt;ब्रह्माक  चिंता&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्रह्मा कयलनि  अनुपम  श्रृष्टि,&lt;br /&gt;श्रम सं ओ  रचलनि  इंसान।&lt;br /&gt;बुद्धि संग द'  बल-विवेक,&lt;br /&gt;फुंकलनि  ओहि  मे ओ स्वर्णिम जान।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तइयो  हुनका  नहि  भेटलनि  तृप्ति,&lt;br /&gt;द'  देलनि  मनुज  कें  असीमित ज्ञान।&lt;br /&gt;भेजलनि  जखन  धरती पर ओकरा,&lt;br /&gt;छल ने  जीव  कोनो  ओहि  समान।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूझ -बूझ  कें  बले  मानव,&lt;br /&gt;कयलक तीव्र  गतिये  उत्थान।&lt;br /&gt;पेट पोसबाक  जोगर  कय,&lt;br /&gt;भेल ओ  भौतिक सुख हेतु हरान।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विकासक  सीढ़ी   चढैत  अपन,&lt;br /&gt;सूझे  अनलक  उपयोगी विज्ञानं।&lt;br /&gt;आह  विज्ञानं जे ओ छुलक,&lt;br /&gt;दूर  मेघक  चमकैत  चान।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वाह मनुक्ख ! तू  करबए  किए ने,&lt;br /&gt;अपन बुधि  पर  कने गुमान।&lt;br /&gt;एही क्रमे बनल सेहो ओ,&lt;br /&gt;पराक्रमी अस्त्र-शस्त्रवान।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उधेशय  लागल  आब  मनुक्ख,&lt;br /&gt;देवक बगिया कें बनि  हैवान।&lt;br /&gt;हाहाकार  अछि पसरल  सगरो,&lt;br /&gt;दुष्ट  ने बुझय  अप्पन-आन।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मारय-काटय  एक दोसर कें,&lt;br /&gt;बैसल  कुहरय लोक  लहूलुहान।&lt;br /&gt;त्राहि-त्राहि केर सुनि  टाहि,&lt;br /&gt;टूटलनि  ब्रह्मा केर  योग-ध्यान।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखि अचंभित  भेल छथि,&lt;br /&gt;धरती  परक  सांझ-विहान।&lt;br /&gt;चिंता  मे  छथि  लागल  ब्रह्मा,&lt;br /&gt;भेटत कोना मनुक्ख  सं  त्राण।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-1438217770064092739?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/1438217770064092739/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=1438217770064092739' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/1438217770064092739'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/1438217770064092739'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2009/11/blog-post.html' title='ब्रह्माक  चिंता'/><author><name>Padmanabh (आदि यायावर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00743001936020943683</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://1.bp.blogspot.com/_4SASqC7hsM8/SrRri01HSII/AAAAAAAAAnU/gBMnXU-WKmI/s1600-R/4.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-1966603265354051813</id><published>2009-10-25T19:46:00.002+05:30</published><updated>2009-10-31T08:39:44.043+05:30</updated><title type='text'>फुरसत- सुभाष चन्द्र</title><content type='html'>मकरा जाल बुनैत अछि फुरसत मे&lt;br /&gt;ओ करैत अछि निढाल फुरसत मे&lt;br /&gt;कथी लेल पूछैत छथि वो हमरा सँ&lt;br /&gt;एहन-ओहन सवाल फुरसत मे &lt;div style="BORDER-BOTTOM: #5c8a64 5px solid; TEXT-ALIGN: center; PADDING-BOTTOM: 5px; LINE-HEIGHT: 100%; MARGIN: 12px; WIDTH: 200px; FLOAT: right; BORDER-TOP: #5c8a64 5px solid; PADDING-TOP: 5px"&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;कवि- सुभाष चन्द्र.&lt;br /&gt;सम्पादक, "&lt;a href="http://www.vidyapati.org/"&gt;कतेक रास बात&lt;/a&gt;"&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;span style="FONT-WEIGHT: bold"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;लोक नीक जकां देख लिअ हमरा&lt;br /&gt;अपना कें घर सँ निकालि फुरसत मे&lt;br /&gt;लूटि लिअए हमर परछाईं हमरा&lt;br /&gt;नहि त रहि जायत कचोट फुरसत मे&lt;br /&gt;जिनक ठोर पर मुस्की छैन्हि&lt;br /&gt;पूछिओन हुनक हाल फुरसत मे&lt;br /&gt;फेर ककरो सम्हारब नहि&lt;br /&gt;पहिने अपना कें सम्हारी फुरसत मे&lt;br /&gt;धारक कात मे बैसि कय अहां&lt;br /&gt;एना नहिं पानि उछेहु फुरसत मे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-1966603265354051813?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/1966603265354051813/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=1966603265354051813' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/1966603265354051813'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/1966603265354051813'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2009/10/blog-post_21.html' title='फुरसत- सुभाष चन्द्र'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-6471006873251386360</id><published>2009-10-20T15:49:00.007+05:30</published><updated>2009-10-20T17:49:18.219+05:30</updated><title type='text'>बुढ़’क अर्थशास्त्र  (खट्टर काका)</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_o0wpGvovfxc/St2m_zmVyLI/AAAAAAAAAAU/C-oRTCy__sw/s1600-h/khattar.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 114px; FLOAT: right; HEIGHT: 160px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5394651543772711090" border="0" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_o0wpGvovfxc/St2m_zmVyLI/AAAAAAAAAAU/C-oRTCy__sw/s320/khattar.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;strong&gt;लेखक: खट्टर काका&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;भातिज लोकनि; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;हमरा बुझल अछि जे हमर फोटो देखि अहाँ लोकनि अपन आँखि भौँह सरियाबे लागल होयब. अधिकाँश लोकनि’क मुँह सँ बिनु प्रयासे के मुस्की छुटि रहल होयत. मुदा हम अपने लोकनिक मुस्की’क कारण जानए चाहैत छी. आई धरि कहियो एहेन भेल अछि जे हम अहाँ लोकनि केँ कोनो अनरगल गप्प कहने रही. हमर प्रत्येक गप्प गम्भीर होइत छैक. खट्टर काका कोनो व्यक्तित्व नहि एक सँस्कृति’क नाम थीक.  &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;ओह अहाँ लोकनि तँ सत्ते गम्भीर भऽ गेलहुँ. गम्भीर भेला सँ कोनो खरापी नहि, मुदा अति सर्वत्र वर्जयेत. आई हम फेर सँ अपन तरँग मे छी आ बेसी गम्भीर भेला सँ असल विषय वस्तु पाछु छुटि जायत. तेँ अपने लोकनि सँ आग्रह जे हमर फोटो दिस एक बेर फेर सँ आँखि दऽ दियौक. ओह! आब भेल नऽ... आब अपने लोकनि तैयार छी हमर तरँग मे डुबकी लगेबा’क लेल.&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;चलु बिना कोनो लाग लपेट’क हम सीधे सीधे विषय वस्तु पर आबैत छी. आजुक विषय अछि: "बुढ़क आकाल". अहाँ लोकनि पुछब जे भारत मे बुढ ई अजीब सन विषय किएक चुनलहुँ अछि.&lt;br /&gt;अरे! बुझल नहि अछि जे भारत मे बुढ़’क आकाल पड़ि गेल छैक. आई भोरे भोर रेडियो मे सुनलहुँ. सँयूक्त राष्ट्रसँघ मे एकटा सँस्था छै जकर नाम छैक ESCAP (Economic and Social Commision for Asia Pasific) जे एकटा आँकड़ा प्रकाशित केने अछि. एहि आँकड़ा मे लिखल गेल अछि जे २००१ के जनसँख्या’क आधार पर, भारत मे मात्र छओ प्रतिशत (६%) बुढ़ बचि गेल अछि. ३५% नेना भुटका अछि (१५ साल सँ कम उम्र’क) आ ६५% लोक’क उम्र तीस वर्ष सँ कम अछि. (विशेषजानकारी लेल &lt;a href="http://www.unescap.org/esid/psis/population/database/poplaws/law_india/indiaappend3.htm"&gt;एतय क्लिक करु &lt;/a&gt;)। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;रेडियो सुनलाक बाद सब सँ पहिने अहाँ लोकनिक काकी सँ विवेचना करय पहुँचलहुँ. जे भारत मे बुढ़’क आकाल पड़ि गेल छैक. पुरे टोल भरि मे हमहीँ दू एहेन प्राणी बचलहुँ जे बुढ़ छी. काकी केँ इहो बुझा देलिअन्हि जे भारतवर्ष मे जे तथाकथित आर्थिक विकास’क दर ९% अनेरोँ नहि छैक. बुढ़’क आकाल भऽ गेल छैक. हर जगह छौड़ा-माँढड़ि छैक. स्त्री लोकनि बहुराष्ट्रीय कम्पनी मे काज करैत छथि. साबिक के गप्प याद नहि अछि, जिनका जतेक समाँग हुनका ओतेक धन. आइ भारत मे समाँग बेसी भऽ गेल छैक. तेँ विकास दर बेसी छैक. अमेरिका मे सत्तर प्रतिशत लोक ५० सँ बेसी उम्र के छैक तेँ सबटा काज भारत मे आउटसोर्स कऽ केँ अपन अर्थव्यवस्था मे (२-३%) वृद्धियो नहि कऽ पाबैत छैक. &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;हम काकी केँ कहैत गेलिअन्हि, "देखू न जतय निकलु छौड़ा सभ’क जमघट रहैत छैक. छौड़ी सब केँ देखि आँखि मुनय पड़ैत अछि.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमर एतेक बात सुनि अहाँ लोकनिक काकी बजलीह, "अहाँ बुढ़ भऽ गेलहुँ मुदा एखन धरि नाक लागले अछि. हमरा लागैत अछि जे अहाँ भसिया रहल छी, अरे महाराज जे आइ बच्चा छैक, जवान छैक ओ कहियो ने कहियो तऽ बुढ़ हेतैक. सब किओ खट्टरे काका नहि होइत छैक जे दस साल मे एकसठ बरस सँ बासठ बरस पार करैत छैक. बाँकी बुढ़’क उम्र तँ साले साल बढ़ैत छैक. आई छौड़ी सब सँ रोड सड़क रँगीन लागैत छैक बिल्कूल चका-चक. रोड दिस निकलि जाउ ते मार सेन्ट- डिओ सँ रोड गमकैत रहैत छैक. छौड़ा सब क्रिकेट खेलैत छैक, सिगरेट दारु पीबैत छैक. भारत के मौसमे रँगीन भऽ गेलैक. मुदा कहियो नऽ कहियो तऽ ओ सब बुढ़ हेतैक. तखन की हेतैक. "&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;हम अहाँ लोकनिक काकी’क प्रतिभा सँ हतप्रभ भऽ गेलहुँ. कहले गेल छैक जे सँगति सँ गुण होत है सँगति सँ गुण जात. काकी केँ हमर चालीस साल’क वैवाहिक जीवन’क सँगति भेटल छन्हि. किछु ने किछु तरँग तऽ ओ निकालबे करतीह. हम चुप चाप सुनैत गेलहुँ. &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;ओ बाजि रहल छलीह, “ भारत मे मात्र ६% बुढ़ छैक ई नीक गप्प नहि. अर्थशास्त्री किछो कहैथ. मुदा सत्य तऽ इहो छैक जे, जे आई तीस के छथि ओ तीस साल बाद बुढ़ भऽ जायत. एखन ने अहाँ रोड पर छौड़ा-छौड़ी केँ देखि, हुनका लोकनि’क डिओ-सेन्ट सुँघि प्रसन्न भऽ जाइत छी, मुदा तीस साल बाद यैह लोकनि बेँत लऽ केँ सड़क पर चलत. तखन छौड़ा छौड़ी’क डिओ नहि गमकत बुढ़बा बुढ़िया’क उकासी आ बुढ़ैन बुढ़ैन महँक सँ भारत वर्ष तृप्त भऽ जायत.”&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;हम आश्चर्यचकित भऽ सुनि रहल छलहुँ. &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;काकी’क व्याख्यान बदस्तुर प्रवाह मे छल. कहैत गेलीह, “एखन देखियौक, माल’क जमाना छैक. पैघ शहर कोन, छोट छोट शहर मे शापिँग माल खुलि गेल छैक. आ ओहि माल मे जाइत के छैक, वैह छौड़ा छौड़ी सब. तीस साल बाद सापिँग माल मे के जायत. किओ नहि. सबटा बन्न भऽ जायत. फेर खुजत मेडिकल माल. बहुत टा’क कम्प्लेक्स. ओहि मे तरह तरह के बीमारी ठीक करबाक व्यवस्था. शापिँग माल मे मेडिकल सेन्टर खुलत. इस्केलेटर पर आइ काल्हुक जेकाँ छौड़ा छौड़ी’क भीड़ नहि, बेँत धेने बुढ़बा बुढिया’क बोलबाला रहत. &lt;strong&gt;आ जे किओ छौड़ा माँढ़डि बचि गेल होयत ओ बुढ़बा बुढिया’क आतँक सँ शापिँग माल मे नहि जायत.&lt;/strong&gt; कतय सँ आयत ९% के वार्षिक वृद्धि दर. आई काल्हि जेना टीवी. वीसीडी मे चलैत अश्लील कार्यक्रम सँ बुढ़ पुरान प्रायश्चित करैत छथि, तखन बुढ़’क सँख्याँ बेसी रहत. टीवी पर सँस्कार आ योगासन’क कार्यक्रम सँ बचल खुचल बच्चा जवान लोक यैह कहताह जे की जमाना आबि गेल अछि.” &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;हम बीच मे जोर सँ साँस लेलहुँ तऽ काकी कहए लगलीह, “ ई जे सरदार प्रधानमँत्री अछि आ सरदारे योजना आयोग’क उपाध्यक्ष (हुनकर इशारा क्रमशः मनमोहन सिँह आ अहुवालिया दिस छलन्हि) से झुट्ठे किएक चीचिआ रहल छथि जे ९%- ९% वृद्धि. जहिना जवान लोकक समय जायत आ बुढ़क समय आयत, तहिना ९% सँ २% पर विकास दर आबि जायत.” &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;तऽ हम पुछि देलिअन्हि, “ तऽ एकर मतलब ई जे भारत कहियो सुपर पावर नहि बनि सकत”.&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;काकी झटाक दऽ उत्तर देलथिन्ह, “ हेयो, भारत’क लोक खाए पीबए वाला नागरिक अछि. एक्के सँग ६५% लोक तीस साल सँ कम उम्र’क भऽ गेल अछि. परिवार नियोजन के एखन धरि प्रचार चलि रहल अछि. पहिने हम दू हमर दू’क नारा छल, आब हम दू हमर एक’क नारा अछि. जखन बच्चे नहि जनम लेत तऽ जवान कोना हेताह. मुदा जवान आदमी तऽ बुढ़ अवश्य हेताह. ई बात सरदार प्रधानमँत्री केँ नहि घुसि रहल छैक. जे बिना मतलब भारत केँ सुपर पावर बनेबाक ठानि नेने छैक. सुपर पावर बुढ़ लोक सँ नहि बनैत छैक, किएक तऽ प्रत्येक बुढ़ खट्टर काका नहि होइत छैक.” &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;“नहि जानि ई सरदार प्रधानमँत्री केँ आक्स्फोर्ड विश्वविद्यालय सँ डाक्टरेट के उपाधि कोना भेटलन्हि” काकी जखन अन्तिम वाक्य कहल्थिन्ह तऽ हमरा मोने मोन भेल जेँ आक्स्फोर्ड विश्वविद्यालय केँ अहाँ लोकनिक काकीए केँ मानक पीचडी देबाक चाही, बुढ़’क अर्थशास्त्र विषय पर.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;काकी’क उपर मे हमर सँगत’क असर होयत से पहिने सँ बुझल छल. मुदा एत्तेक भारी असर से हमरा नहि बुझल छल. मुदा काकी’क तऽ हमर अर्धाँगनी थिकीह. से जानि आत्मसँतुष्टि भेल. भाँग पीसबाक आदेश दऽ हम लोटा लऽ केँ बाँस दिस चलि गेलहुँ. एतेक बात भेल तऽ अपच ते भेनाइए छल. &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="right"&gt;---खट्टर काका&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;(सम्पादक लोकनि: पोस्ट करबाक काल मे देखबा मे आएल जे सुभाचन्द्र जी’क कविता&lt;br /&gt;सेड्यूल अछि २१ तारीख केँ. कनि हुनकर डेट आगू भऽ जायत तऽ नीक रहत. काका होएबाक कारणे एतेक अधिकार तऽ बनबे करैत छैक)&lt;br /&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-6471006873251386360?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/6471006873251386360/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=6471006873251386360' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/6471006873251386360'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/6471006873251386360'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2009/10/blog-post_20.html' title='बुढ़’क अर्थशास्त्र  (खट्टर काका)'/><author><name>Khattar Kaka</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16074415893834232353</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_o0wpGvovfxc/St2m_zmVyLI/AAAAAAAAAAU/C-oRTCy__sw/s72-c/khattar.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-5219070033126881987</id><published>2009-10-14T17:24:00.006+05:30</published><updated>2009-10-15T12:25:57.810+05:30</updated><title type='text'>दुनीति केरि पथ मे अछि भाग्य केर गाडी़</title><content type='html'>&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-size:large;"&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;कवि- श्री हरिश्चन्द्र झा&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_lP6dmw21fCY/StXCaNbSjMI/AAAAAAAADXA/l7l5vi7G0S8/s1600-h/murari_father.PNG"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-&lt;br /&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;div style="BORDER-TOP: #5c8a64 5px solid; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 5px; MARGIN: 12px; WIDTH: 200px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 5px; BORDER-BOTTOM: #5c8a64 5px solid; TEXT-ALIGN: center"&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;श्री हरिश्चन्द्र झा ’हरि’&lt;img style="WIDTH: 120px; HEIGHT: 105px" alt="श्री हरिश्चन्द्र झा ’हरि’ " src="http://mishrapadmanabh.googlepages.com/murari_father.PNG" width="90" align="right" /&gt;. दरभँगा जिला’क रहनिहार शिक्षक, सन १९९४ सँ सेवानिवृत भऽ गामे मे रहि रहल छथि. प्राचीन समय मे मिथिला मिहिर’क नियमित लेखक छलथिन्ह.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;कतेक रास बात परिवार दिस सँ हिनकर स्वागत छन्हि.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="left"&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;                                          --आदि यायावर&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनीति केरि पथ मे अछि भाग्य केर गाड़ी,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पारे कोना उतरतै चिन्तें शरीर कारी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धारा विलोकि विह्वल सुत वृन्द मातृ नोरक&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वलिदान केरि वेदी, चढ़िगेल पुत्र कोरक।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रलयोक ज्वाल सहि कए दए गेल रत्न भारी,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनीति केरि पथ मे अछि भाग्य केर गाड़ी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परतरि सभ कहईए हमही विशिष्ट चालक,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रासे धरैत दीरी कि ओ बनैछ घातक।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिगभ्रान्ति जाल डारए रिपु चालि रुप धारी,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनीति केर पथ मे अछि भाग्य केर गाड़ी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गीता उठाय बाजए निर्माण नव करब हम,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पथ छोड़ि भऽ कए विचरल करइअए हरदम&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रक्षक कहाय भक्षक बनबैत अए बिखारी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनीति केरि पथ मे अछि भाग्य केर गाड़ी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तन केर चर्म-मान्सो सब खा गेल अछि विदेशी,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बचि गेल अस्थिपँजर चुड़ैत अए स्वदेशी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नहि जानि की करत गति स्वार्थ'क बनल पुजारी,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुर्नीति केरि पथ मे अछि भाग्य केर गाड़ी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नायक बनल कहइए बढ़ि केँ सजाऊ उपवन,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विष वृक्ष केँ उखारु रोपु अशोक चन्दन।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विरर्रो उठा अशान्तिक शान्तिक'क कटैछ झाड़ी,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनीति केर पथ मे अछि भाग्य केर गाड़ी ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दए क्रान्ति केर शिक्षा पथ मे रखइ अए,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुख शान्ति ज्ञानहुक गृह धू-धू शतत जरै अए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जनु दूत भऽ विदेशी'क बनबए भविष्य कारी,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनीति केरि पथ मे अछि भाग्य केर गाड़ी ॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हे माएक सपुते पुनि दान मा मँगै छथि,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दसकँध आओर कँसक बलिदान मा मँगे छथि ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बनु चन्डिका बहिन सब घरि बन्धु मुन्ड्धारी,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनीति केर पक्ष मे अछि भाग्य केर गाड़ी ॥&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-5219070033126881987?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/5219070033126881987/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=5219070033126881987' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/5219070033126881987'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/5219070033126881987'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2009/10/blog-post_14.html' title='दुनीति केरि पथ मे अछि भाग्य केर गाडी़'/><author><name>Padmanabh (आदि यायावर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00743001936020943683</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://1.bp.blogspot.com/_4SASqC7hsM8/SrRri01HSII/AAAAAAAAAnU/gBMnXU-WKmI/s1600-R/4.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-2649125684332849117</id><published>2009-10-02T11:44:00.003+05:30</published><updated>2009-10-02T12:06:06.231+05:30</updated><title type='text'>गरिमा आ पलास (भाग-४)</title><content type='html'>कथा, भाग-4: लेखक:- आदि यायावर, मोडेरेटर: केशव कर्ण (समस्तीपूरी)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote&gt;एखन धरि पढ़लौंह, "बचपन से तरुनाई धरि संग चलनिहार गरिमा आ पलासक सतत प्रेम, तमाम वर्चस्व आ विषमताक कात करैत जीवन पथ मे दुन्नु लोकनिक संग आनि देल्कैन्ह! फेर अहम् आ स्वाभिमानक द्वंद, दाम्पत्य जीवन मे करवाहट आ एक छत कें नीचा एकाकी जीवैत दू प्राणी जे, जिनगी भरि संघ चलबाक शपथ नेने छथि. गरिमा’क माए बाबुजी केँ पहिने सँ एहि प्रेम विवाह मँजूर नहि छलैनि. फेर गरिमा-पलास’क सँवादविहीन जीवन, गरिमा’क बीमारी... आब आगा पढ़ल जाऊ, आदि यायावर जीक शब्द मे... !!&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;फोन राखि, गरिमा सीधे अपन बेडरुम मे गेलीह आ पलास किचेन मे. गरिमा’क माए बाबुजी सब किछु देखि रहल छलैथि. सासु ससुर भेला’क कारणेँ हुनका लोकनि केँ पलास’क किचेन जेनाय नीक नहि लागि रहल छलनि. मुदा हुनका दुनू लोकनिक सँवादहीनता’क स्थिति मे पलास’क किचेन मे घुसनाय, एक सुखद आश्चर्य लागैत छलन्हि. नहि जानि दुनू व्यक्ति’क मुड केहेन छलनि, तेँ पलास केँ एना करबा सँ रोकि नहि सकलैथ. जाबए धरि मे गरिमा बेडरुम सँ बाथरुम जाए फ्रेश भऽ केँ बहरेलीह, ताबय मे पलास चारि कप गरमागरम काफी बना केँ तैयार छलाह. एकटा ट्रे मे लऽ केँ पहिने अपन ससूर, सासु, फेर गरिमा केँ दऽ केँ बाँकी बचल एक अपन आ लेल राखि, सोफा पर पसरि गेलाह. सब किओ चाय पीबि रहल छल, मुदा बाजि किओ नहि रहल छल. एक घर मे चारि लोक एकेठाम बैसल मुदा घर मे शाँति, नीरवता, आ आँशका सँ धड़कैत दू जोड़ी हृदय. सब लोकनि केँ एक दोसर सँ बहुत किछु कहनाय छलनि, मुदा बाजैत किओ नहि. पलास स्थिति केँ सामान्य करबा’क लेल टीवी आन कऽ केँ न्यूज लगा देलथिन्ह. &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;पलास’क किचेन मे गेनाय, काफी बना केँ आननाय, आ फेर पहिने टीवी खोलनाय आ गरिमा’क एको बेर नहि मना करनाय एक बात केँ प्रदर्षित करैत छल, जे हुनका दुनू लोकनि मे कटुता अवश्ये कम भऽ गेल छन्हि. अन्यथा, गरिमा पलास केँ काफी बनबे नहि देने होयत. अक्सर होइत छैक, जे दू पति-पत्नी मे यदि प्रेम अछि तऽ कोनो काज केँ एक दोसरा’क उपर मे टालि देबाक कोशिश काएल जाइत छैक. आ दुनू’क बीच मे लड़ाई झगड़ा भेला’क बाद स्थिति एहेन होइत छैक, हम काज करब तऽ हम. पति पत्नी दोसर’क हिस्सा वाला काज काए, अपन जीवन सँगी’क उपर मे दबाव बनेबाक कोशिश करैत छैक. एखन गरिमा पलास केँ एको बेर किचेन मे जाय सँ मना नहि केने छलन्थिन्ह. ई बात गरिमा’क माए बाबूजी केँ बहुत नीक लागि रहल छलनि. &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;कनि देर न्यूज चलैत रहल, फेर गरिमा के बाबूजी चुप्पी तोड़ि माहौल केँ सहज करबाक कोशिश केलथिन्ह. ओ पलास सँ पुछलथिन्ह, "गरिमा केँ डाक्टर की कहलकन्हि?"&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;"से गरिमा सँ पुछि लिऔक ने?", गरिमा’क दिस कनखी आँखि सँ देखैत पलास बाजल. &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;"मुदा हम तँ अहीँ सँ सुनय चाहैत छी" गरिमा’क बाबुजी जोर दैत पुछलथिन्ह.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;पलास एक बेर गरिमा’क दिस ताकैत बाजए लागल, "बाबुजी! अहाँक बेटी केँ भूख’क बीमारी छनि. डाक्टर अपन भाषा मे कहलकन्हि, जे हिनका एनिरेक्सिया-सिन्ड्रोम छन्हि"&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;एकर मतलब ई, अपन सखी सहेली केँ देखाबैक लेल अहाँक बेटी हरदम दुबर पातर रहय चाहैत छथि. तेँ खेनाय पीनाय छोड़ि ओ डायटिँग’क पाछु लागि गेलैथ. बेसी डायटिँग केला सँ एनिरेक्सिया-सिन्ड्रोम भऽ जैत छन्हि. आब हिनका खेबा पीबाक आदति छुटि गेलनि. भूख बिल्कूल नहि लागैत छन्हि. डाक्टर अपन भाषा मे एकरा एनिरेक्सिया-सिन्ड्रोम कहैत छैक. आ दबाई मे कहलकन्हि ये जे चारु टाइम ठुसि के खेबाक लेल. ओना मोन बहलेबाक लेल एक पुष्टाय से देने छन्हि. कहलकन्हि ये एक-एक मुन्ना तीन बेर पीबाक लेल". पलास अपन बात खतम करैत सासु दिस देखय लागल्थिन्ह. आ गरिमा मुड़ी झुकाय, लजाएल एक कोन मे बैसल छलीह. &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;"बाप रे बाप केहेन दुनियाँ आबि गेल छैक. गरीब लोक भूखल मरैत छैक आ जकरा लग सब किछु छैक हुनका ओ भूखल रहि भूख केँ मारि दैत छैल." एक दम्म मे गरिमा’क माय हुनकर बाबुजी केँ कहि देलथिन्ह. गरिमा’क माए हुनकर बाबुजी केँ बहुत देर देखि रहल छलीह आ बिना मुँह खोलने आँखि सँ कहि रहल छलीह जे हम कहैत छलहुँ ने, "जे बेसी गलती अपने बेटी’क अछि". आ हुनकर बाबुजी चुपचाप बात मानि गेल छलाह.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;गरिमा आ पलास बहुत दिन सँ एक दोसर सँ अलग रहि खुश नहि छलैथ. गरिमा केँ होइत छलनि जे हुनकर कोन गलती. आई कोनो पुरुष घर पर रहए वाली अपन स्त्री केँ यदि डाँटैत छथि, हरदम अपन नौकरी करबा’क दम्भ दैथ छथि तऽ बड्ड नीक, मुदा आइ हम दिन भरि खटि के जँ आबैत छी, आ साँझ केँ अपन पति सँ किछु नीक बेजाय कहैत छिअनि तऽ बड्ड खराप?&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;पलास केँ से बहुत दिन सँ किछु नीक नहि लागैत छलनि. अपन सबसँ प्रिय वस्तु सँ अलग भऽ ओ खुश नहि छलाह. बहुत दिन सँ आत्म मँथन करैत छलाह. आ निर्णय पर पहुँचलाह जे हुनकर पत्नी’क कोनो दोष नहि. हँ हुनकर बाजए के तरीका नीक नहि छन्हि. तेँ डाक्टर लग गेला सँ पहिने, अपन मोन’क बात गरिमा सँ कहि देलथिन्ह. &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;अपन गलती केँ स्वीकार करबा’क कारनेँ पलास’क गप्प, गरिमा केँ नीक लागलन्हि. बल्कि पलास’क झुकबाक देरी छल. गरिमा अपने झुकि गेलीह. ओकर बाद डाक्टर लग जेबा सँ पहिने आ ओकर बाद अपन पछुलका जीवन’क उल्लासमयी प्रेम प्रसँग याद कऽ ओ फेर सँ एक दोसर दिस समर्पित होएबाक कोशिश करए लागलथिन्ह.&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;एकटा समाधान दोसरो समस्या केँ हल कऽ दैत छैक. तेँ गरिमा’क मुँह सँ जँ हठाते निकललन्हि, "अहाँ बिजिनेस किएक नहि करैत छी. हम लोन लऽ अहाँक लेल किछु पूँजी’क व्यवस्था कऽ दैत छी" तँ पलास एक्के बेर मे मानि गेलाह. वस्तुतः बिजिनेस’क बात सुनि हुनका लोकनि’क प्रत्येक समस्या’क समाधान भेट गेल छलनि. &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;फेर सँ घर मे स्तब्धता पसरि गेल. मुदा पछिला किछु देर सँ पलास’क कटाक्ष सुनि गरिमा’क माए बाबुजी केँ बहुत किछु पुछबाक मोन केलकन्हि. मुदा नहि जानि किएक हुनका पलास’क कटाक्ष नीक लागलनि. आ गरिमा’क चुप मुँह आ लजाएल आँखि हुनका पूर्ण रुप सँ निश्चिँत कऽ देने छलन्हि. एखन पलास एहि बात’क बाट ताकि रहल छलाह जे गरिमा कखन किचेन मे जाए खाना’क व्यवस्था करैथ. कहीँ आई काफी’क सँग खाना बनबे नहि पड़ि जान्हि, से सोचि ओ आतुर होइत छलाह. ओ फेर सँ गरिमा दिस ताकि रहल छलाह. आ गरिमा जानि बुझि केँ अनठेने छलीह. आँखिए सँ कहि रहल छलीह, "एक दिन खाना बना देब तऽ कोनो पहाड़ नहि उनटि जायत". नहि जानि किएक गरिमा’क लाज कतय पड़ा गेल छलन्हि. &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="right"&gt;समाप्त&lt;/div&gt;&lt;div align="right"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center"&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;p&gt;एहि कथा’क समाप्त भेला सँ तथाकथित इतिहास बनि गेल. आब बाट ताकि रहल छी ओहि दिन’क जखन दोसर मैथिली ब्लोगर अपन ब्लोग मे इएह इतिहास रचि, ब्लोग’क तारीख चेन्ज कऽ केँ क्लेम करैथि जे साबुदायिक कथा लिखय वाला ओ पहिल व्यक्ति छथि.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/p&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;अगिला कथा’क शुरुआत करबाक लेल लेखक गण आमन्त्रित छथि&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-2649125684332849117?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/2649125684332849117/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=2649125684332849117' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/2649125684332849117'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/2649125684332849117'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2009/10/blog-post.html' title='गरिमा आ पलास (भाग-४)'/><author><name>Padmanabh (आदि यायावर)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00743001936020943683</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='31' src='http://1.bp.blogspot.com/_4SASqC7hsM8/SrRri01HSII/AAAAAAAAAnU/gBMnXU-WKmI/s1600-R/4.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-7114219712564004961</id><published>2009-09-25T16:31:00.002+05:30</published><updated>2009-09-25T17:10:24.334+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='करण समस्तीपुरी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सँस्मरण'/><title type='text'>घिढारी के मंत्र</title><content type='html'>&lt;blockquote&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;आदरणीय पाठक गण,&lt;br /&gt;किछु सामयिक व्यस्तता आ किछु तकनिकी अव्यवास्थाक कारण&lt;br /&gt;हम अहाँ लोकनिक "गरिमा आ पलास" कें अगिला भाग ससमय नहि उपलब्ध करएबा हेतु&lt;br /&gt;क्षमा-प्रार्थी छी. हम शीघ्रे कथाक अगिला भाग सँ अपने लोकनिक रु-बा-रु करएबाक वचन&lt;br /&gt;के साथ विजय दशमी पर अपने लोकनिक मनोरंजन हेतु लए क' आएल छी एक&lt;br /&gt;गोट पुरान गप्प. पढू आ प्रतिक्रया दए उत्साह-वर्धन करू !&lt;br /&gt;दुर्गा पूजाक शुभ कामनाक साथ,&lt;br /&gt;-  करण समस्तीपुरी&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;हंसियों&lt;/span&gt;&lt;br /&gt; मजाक मे सीखल बात कखनो-कखनो कतेक मर्मान्तक उपयोगी भ' जाएत छैक, एहि बातक प्रतीति हमारा स्नातकक अन्तेवासी छात्र जीवन मे भेल. स्कूल मे पंडीज्जी माट साब जेखन शब्द-रूप यादि कराबैथ तहन मोने मोन कतेक अपशब्द कहिऐन्ह ! 'लट-लकार' महा-बेकार आ 'लंग लकार' भंग डकार बुझाए ! मुदा 'हर' धातु के क्रिया-रूप ख़ास कए प्रथम पुरुष मे - "हरामि हरावः हरामः'' खूब मोन से पढ़ब करिऐक ! स्वाइत अगिला पांति के जोरगर आवाज बुझि मास्टर साहेब के भेलैन्ह जे संस्कृत मे चटिया सबहक खूब अनुरक्ति अछि. आ हमहु सभ गुरूजी के ई आभाष नाहि होमए दिऐक जे ई "हरामि हरावः हरामः''  के अखंड जाप संस्कृत मे अभिरुचि छी कि महज एक स्वांग ! खैर, गुरूजी गेला कहि, आ चेला गेल बहि ! मुदा बहैतो-बोहाएत किछु विद्या त' रहिये गेल. ओना साहित्य से व्यक्तिगत रूपे हमारा तखनो लगाव छल. तैं "येनांग विकार तृतीया" भन्ने नहि बुझिऐक मुदा "राजद्वारे श्मशानेच यः तिष्ठति सः बान्धवाः" वाला फकरा आ "कार्येषु दासी कर्मेषु मंत्री ! भोजेषु माता शयनेषु रम्भा" वाला श्लोक ने यादि करए मे कोनो आलस आ नहि ओकर अर्थे बुझाए मे कोनो खोंखी !! करत-करत अभ्यास ते संस्कृत के किछु श्लोक ता एना रटा गेल जेना गामक झगरा मे जनि जाति गारि पढैत अछि! एहि तरहे स्कुलिया शिक्षाक मेट्रिक घाट पर कात लगा कालेज मे विज्ञान संकाय मे दाखिल भेलौंह ! फेर त' दू-तीन साल धरि संस्कृत से नहि कुनो भेंट आ नहि कुनो बात ! मुदा साहित्यक मोह स्नातक मे फेर अपना दिस झीक लेलक ! तदुपरांत त' एकर रसास्वादन करैते छी !!&lt;br /&gt;तखन हम स्नातकोत्तर प्रथम वर्ष मे छी आ झा जी स्नातक अंतिम वर्ष मे ! दुन्नु लोकनि साहित्य के छात्र ! साहित्य, साहित्यकार, पत्रकार, सामाजिक सरोकार आदि विषयक नित्य सांझ मे होए वाला परिचर्चा से मैत्री प्रगाढ़ होएत गेल. हाँ ! दुन्नु आदमी मे एक गोट और समानता अछि - आर्थिक रूप से कमजोर पारिवारिक पृष्ठ-भूमि ! ओहि ठाम झा जीक किछु पूर्ण-कालिक आ किछु सामयिक यजमान सेहो छथि जतए से पूजा-पाठ, विधि-व्यवहार, संस्कार आदि से आबए वाला दक्षिणा झा जी लेल त पैघ सहारा छैन्हे बरमहल हमरो सभ के सिंघारा-लिट्टी के जोगार अछि!  लगनक समय मे झा जीक व्यस्तता किछु विशेष बढि जाएत छैन्ह !  वर्तालापक क्रम मे हम्मर संस्कृत उच्चारण से प्रभावित ओ पूजा-पाठ मे हमर सहायता सेहो लैत छथि! हमरो विनोदी मोन के ई काज एक टा अद्वितीय मनोरंजन बुझाएत अछि !&lt;br /&gt;ऐंह .... अजुका लगन त बड़ जोरगर छैक ! भिनसरे अन्गैठी लैत झा जी कहि रहल छथि... दिन मे मगरदही मे एक गोट जनेऊ करेबाक अछि, फेर थानेश्वर थान मे एक-गोट व्याह आ राति मे फेर काशीपुर मे विवाह !!! कहै छैक नहि, ‘भगवान दैत छथिन्ह त' छप्पर फारि के....’ से झा जीक मुँहक बात खतमो नहि भेलैन्ह कि एक गोट आओर यजमान पहुंचि के अनुनय विनय कए रहल अछि ! पंडी जी, काल्हि हम्मर बेटी के लगन छैक आ आई पूजा ! मुदा पूजा कराएत के ? आई त झा जी पहिनहि ब्लैक मे बुक छथि ! झा जी हमारा पुछैत छथि ! हमहूँ हंसिये मजाक मे राजी भ' जाएत छी ! सांझ मे फेर यजमान बजाबए  लेल आबैत अछि ! आई हम्मर संस्कृत ज्ञानक 'अग्नि-परीक्षा' अछि ! तें किछु घबराहट त' अछि मोन मे मुदा प्रकट नहि करैत छी ! हाँ, झा जीक डेलबाह सेवकराम के सभ किछु बुझल छैक ! ओ हमारा साथे अछि ! से किछु भरसाहा अछि !&lt;br /&gt;एम्हर जा धरि हम हाथ पैर धोवैत छी, ओम्हर सेवक सभ जोगार केने तैयार अछि ! हमहूँ झट याजमानक चुरू मे पानि दए, "अपवित्रः पवित्रो वा... पढ़ाबैत पान सुपारी कलश-गणेश कए फट से "एकदा मुनयः सर्वे.... से होएत 'लीलावती-कलावती कन्या...' के कथा कहैत "ॐ जय जगदीश हरे...." करवा दैत छी ! एम्हर हम अप्पन पोथी पतरा समेट रहल छी कि एक झुंड जनि जाति आबि के पंडी जी ओम्हर चलियऊ ! आब ओम्हर चलियऊ के शोर करब शुरू कए दैत अछि ! हम पुछैत छी, "आब ओम्हर कि छैक ? पूजा त' भ' गेल... छुटैते महिला मंडल के मुखिया उपहासपूर्ण स्वर मे कहैत छथि,  यौ पंडी जी ! त' घिढारी नहि करेबैक ? ले बलैय्या के... आब त' फँसि गेलौंह... ओ त’ सत्य-नारायण कथाक पोथी छल त' पढि देलियैक... आ अब घिढारी की होएत छैक ? एक बात त' बुझैत छियैक ने, लगन मे उमताएल मिथिलानी के सभ से चोटगर निशान पंडीये  जी पर पड़ैत छैक ! से हमरा मौन देख ओ सभ रसगर व्यंग्य-बाण छोड़ी रहल छथि ! हमरा मोने मोन झा जी पर तामस उठि रहल अछि, 'ओ हमारा कहलथि ने किए जे एतय घिढारियो छैक...' !! मुदा एखन त' सभ से महत्वपूर्ण अछि ई यजमानीक जाल से निकलनाय ! खैर जल्दबाजी के अभिनय करैत हम कहैत छी " जल्दी घिढारी के तैय्यारी करू नहि त हमारा छोडू... दोसरो ठाम काज अछि!" कहि त देल मुदा आब की ? हमरा त एहि विषय मे किछु बुझि नहि ! फेर ध्यान आएल, जे कतेक रास लगन व्याहक खेलल सेवक त' हमरा संघे अछि, तहन एकरे से मंत्रणा कएल जाए ! सेवक हमारा घिढारी के विध बता कहैत अछि जे जाऊ ने किछु पढि देबैक... के बुझैत छैक... !! मुदा हमारा लग यक्ष प्रश्न छल कि पढ़ल कि जाए ! इएह उहा-पोह मे ओम्हर सभ तैय्यारी कए जनि-जाति गीत-गारि गाबैत पंडी जी के शोर क' रहल छथि !  हमरा ई चारि डेग चारि कोस लागि रहल अछि ! खैर ... ओतहुका सिचुएशन पर आधारित चट-पट एक टा मंत्र गढैत छी! कन्या आ कन्याक माता-पिता घी लेने ठाढ़ छथि आ आब गोबर के बनल गोसाईं पर ढारता ! ओम्हर विधि चालू होएत अछि आ एम्हर हम्मर मंत्र,&lt;br /&gt;"माता सहित पिता पुत्री ! घृत धारम खरा-खरी !!"&lt;br /&gt;यजमान हमरा साथे-साथ पॉँच बेर इएह मंत्र के दोहराबैत छथि.  हतप्रभ गीत-गाईन सभ प्रशंसाक दृष्टि से देखैत छथि, स्वाइत पहिल बेर हुनका लोकनिक गिढारीक मंत्र बुझि मे आबि रहल छैन्ह... सभ किछु सकुशल, सानंद संपन्न ! हमहू यथेष्ट दक्षिणा आ सम्मानक संग बिदा होएत छी ! त' आब कहियौ, सत्ये ने... "हंसियों मजाक मे सीखल बात कखनो-कखनो बड़ उपयोगी भ' जाएत छैक !"&lt;br /&gt;- करण समस्तीपुरी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-7114219712564004961?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/7114219712564004961/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=7114219712564004961' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/7114219712564004961'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/7114219712564004961'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2009/09/blog-post_25.html' title='घिढारी के मंत्र'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-6199643974406494544</id><published>2009-09-18T10:16:00.005+05:30</published><updated>2009-09-18T16:43:15.193+05:30</updated><title type='text'>गरिमा आओर पलास</title><content type='html'>कथा, भाग-3: लेखक:- सुभाष चन्द्र, मोडेरेटर: केशव कर्ण (समस्तीपूरी)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;blockquote style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="color:#990000;"&gt;&lt;u&gt;एखन धरि पढ़लौंह, "बचपन से तरुनाई धरि संग चलनिहार गरिमा आ पलासक सतत प्रेम, तमाम वर्चस्व आ विषमताक कात करैत जीवन पथ मे दुन्नु लोकनिक संग आनि देल्कैन्ह! फेर अहम् आ स्वाभिमानक द्वंद, दाम्पत्य जीवन मे करवाहट आ एक छत कें नीचा एकाकी जीवैत दू प्राणी जे, जिनगी भरि संघ चलबाक शपथ नेने छथि... आब आगा पढ़ल जाऊ, सुभाष जीक शब्द मे... !!&lt;/u&gt;&lt;/span&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;घर मे बीमार पत्नी आ हुनकर सेवा-सुश्रुषाक लेल आयल सास-ससुर, पलासक लेल दूनू पटुआक साग जेकाँ। शरीरक लेल जहिना पटुआक साग शीतलता प्रदान करैछ ओहिना सासुरक माहौल नीक लगैत अछि, मुदा ई साग कनी अधखाइन (तीत) लगैत अछि। एखनुका समय मे पलासक लेल गरिमा आ हुनक माय-बाप सेहो ओहिना लगैत छलखिन्ह। जाधरि सास-ससुर नहि छलाह, कम सँ कम गरिमा के ऑफिस गेलाक बाद पलास घर मे एकसरि बैसि अपन संताप त' मिटाबैत छलाह। मुदा आब... कतय जेताह? कोनो ठेकान कहां छैन्हि? घर मे भरि दिन रहताह त भरि दिन गरिमा हुनक सामने रहथीन्ह। आ सास-ससुर के कि जबाव देताह? एहि गुन-धुन मे पलास भोरे नियत समय पर घर सँ विदा भ जाइत छलाह आ साँझ भेला पर घुरैत छलाह।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दिन पर दिन बीति रहल छल। मनुष्य के स्वभाविक गुण होइत छै जे जाहि सुख के ओ एक बेर प्राप्त कय लैत अछि, ओकर पुनरावृत्ति बेर-बेर चाहैत अछि। संगहि समाजक ताना-बाना एहि प्रकारक अछि जे पुरूष सहजहिं महिला कें अपना सँ आगां बढैत नहि देखि सकैत अछि। पलासक संग सेहो इएह कारण छल। पुरूष होबाक दंभ मे ओ गरिमा के कतेको नीक-बेजाय कहि देलखिन। गरिमा सेहो भावावेश मे उच्छट बात सुना देलखिन्ह। गरिमा के स्वास्थ्य ठीक नहि भ रहल छल। शारीरिक सँ बेसी मनक संताप घर कय चुकल छल। संगहि गरिमा-पलासक बीच गप्प सेहो कम होइत छल। हुनक माय एकरा भाँपि चुकल छलखिन्ह। जहन नहि रहल भेलैन्ह त गरिमा सँ पूछि बैसलिखन्ह, 'तोरा दूनू मे किछु खटपट भेल छौ कि?'नहि त'&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;'तहन दूनू के बीच एतेक संवादहीनता कियैक? पहिने त तौं हमरा भरि-भरि दिन पलासक बारे मे चर्च करैत छलैंह। मुदा जहिया सँ हम सब इलाहाबाद अयलौं, कोनो चर्च नहि। कि हमर सभक एतय ऐनाय पलास के पसिन्न नहि ?&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;'नहि... नहि... एहन कोनो गप्प नहि छैक। पलास भरि दिन काज पर झमारल रहैत छथि आ घर मे हमर जहिया सँ मौन खराब भेल, हुनक परेशानी बढि़ गेल छैन्ह ने।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;माय, बेटीक गप्प के सुनि चुप्प त भ गेलीह, मुदा हुनक आत्मा एहि गप्प कें स्वीकार नहि कय रहल छल। दोसर दिस गरिमा के मौन सेहो ठीक नहि भ रहल छल। माय-बाप चिंतित होमय लगलाह। मुदा, पलासक लेल धनि सन। अपन दिनचर्या कें अलावे ओकरा जेना किछु आओस सँ सरोकार नहि होइहि...। गरिमाक हालत देखि पिता सेहो दुखी भ रहल छलाह। संगहि गरिमाक माय सँ भेल गप्पक सार बुझलाक बाद हुनक मौन कोनादन होमय लागल रहन्हि। निश्चित केलाह जे आई साँझि मे पलास सँ सोझां-सोझी गप्प करब। कियैक गरिमा कें मौन नहि ठीक भ रहल छै? डॉक्टर कि कहि रहल छै? जदि इलाहाबादक डॉक्टरक बूता मे नहि छै त लखनऊ दूरे कतेक छै? लोक त जरूरति परला पर दिल्ली धरि ल पड़ाईत अछि। कहि पाय-कौड़ीक दिक्कत त नहि... एहने कतेको रास सवाल हुनक दिमाग मे घुमि रहल छल। तखने पलास अयलाह। एकटा बाप के सब्रक बांध जेना टूटि गेल होई। तुरत पूछि बैसलाह, 'गरिमा 'एतेक दिन सँ बीमार ओछाओन पर पड़ल अछि। हिनका त जेना कोनो मतलब नहि होइन्हि। आखिर डॉक्टर कि कहैत छै? कोनो गप्प के दिक्कत अछि त बताऊ, ओकर व्यवस्था कयल जेतै?Ó&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;एक्केबार एहि तरहक सवाल कें अंदाजा पलास के नहि छल। आई नियत समय सं पहिने घर घुरला पर ससुरक सवालक बौछार अप्रत्याशित छल। ससुर के कि कहतैथ? वियाहक एक्को बरख नहि बीतल आ हमरा दूनूक बीच मनमुटाव भ गेल। गरिमा मनक संताप सँ ओछाओन ध लेलीह। हम नौकरी नहि करैत छी। जदि नौकरी नहि करैत छी त भरि दिन कतय बौआइत छी? एहने बहुतो रास सवाल जन्म ल सकैत छल, जकर उचित जबाव पलास लग नहि छल। से, ससुर के मात्र एतबै कहलाह, ' नहि.. कोनो घबराय वला गप्प नहि छै। गरिमा कें नीक डॉक्टर सँ देखेबाक लेल आई जल्दी अयलौं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ठीक गदहबेरे मे ... लुकझुक करैत छलैक दिन आ' संध्या ओकरा पछुअओने अबैत छलैक ...। तहने पलास गरिमा के ल क डॉक्टर ओतय बिदा भेलाह। जहिना पलास गरिमा के चलय लेल कहलखिन्ह, बिना कोनो राग-लपेट, उलाहना के गरिमा बिदा भ गेल छलीह। घर मे हुनक माय-बाप। किछुए समय आर बीतल हेतैक ता' रातिक आगमन भऽ गेल रहैक ... अन्हरिया राति रहैक ... घुप्प अन्हरिया ... जाड़क राति ... हार कँपाबऽ वला राति ... आ' सेहो अमावसक ... हाथ-हाथ नहि सुझैत ...। सब अपन-अपन काज मे लागल छल। ... दिन भरि काज मे व्यस्त ... हाट-बाजार ... खेती पथारी ... पौनी पसारी ... नौकरी चाकरी ... मर-मोकदमा ... अस्पताल ओ थानाक चक्कर ... खैरातक खातिर अंचल-प्रखंडक दौड़ आ' कि आस्तिक भक्त-वृंदक मंदिरे-मंदिर भगवत् दर्शन-पूजन आदि ... भिन्न-भिन्न कार्य-व्यवसाय मे लागल ... एमहर-ओमहर जाइत-अबैत ... सर्वत्र चहल-पहल ... वातावरण मे शब्दक टोप-टहंकार जनता-जनार्दन श्रीमुख सँ निकलि चलैत-फिरैत लोको केँ आ' कि जाड़ सँ कठुआइत घर मे दुबकलो केँ ध्यान-भंग करैत ...।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;गरिमा आ पलास एखनधरि घर नहि पहुंचलाह। माय-बाप के अंदेशा भ रहल छलैन्ह। घरक बरामदा सँ उतरि सड़क पर बाट जोहैत छलाह। तहने एकटा पड़ोसी हाल-चाल पूछलखिन्ह। मौन अफस्यांत देखि पड़ोसी कहलखिन्ह, 'जुनि चिन्ता करू। संभव जे डॉक्टर ओतय बेस भीड़-भरक्का होइहि। नहि त ट्रैफिक जाम मे सेहो फंसल भ सकैत छथि।' मोन बहलेबाक लेल पड़ोसीक गप्प ठीक छल। कि तखने घरमे फोनक घंटी बाजल।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ट्रिन...ट्रिन...ट्रिन...ट्रिन...&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;'हेलौ...'&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;'गरिमा घर पर है क्या?'&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;'नहीं, डॉक्टर के पास गई है। इम्हर सँ हुनक माय जबाव देलखिन्ह। 'आप कौन?'&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;'मैं गरिमा की सहेली बोल रही हूँ, उसके साथ ऑफिस में काम करती हूँ।'&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;गप्प होइते छल कि घरक मेन गेट खुजल आ गरिमा-पलास अयलाह। गरिमा माय सँ फोन थामैत बाजि उठलीह, 'मैं तुम से कल बात करती हूँ। अभी घर में सारे लोग हैं। अच्छा... तुमने माँ से पलास के बारे में कुछ बताया तो नहीं?'&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ओम्हर सँ की जबाव देल गेलै, से त माय नहि सुनलखिन्ह, मुदा एतय जरूर बुझलखिन्ह जे गरिमा-पलासक बीच किछु गड़बड़ छै।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: right;"&gt;(क्रमशः..............)&lt;/div&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;कहानी’क अगिला भाग लिखबाक लेल टिप्पणी द्वारा सूचित करु. पहिने आऊ पहिने पाऊ सिद्धान्त लागू...&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-6199643974406494544?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/6199643974406494544/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=6199643974406494544' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/6199643974406494544'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/6199643974406494544'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2009/09/blog-post_18.html' title='गरिमा आओर पलास'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-6267740145626743428</id><published>2009-09-11T16:38:00.008+05:30</published><updated>2009-09-11T22:56:45.700+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Story'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='vidyapati'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Maithili'/><title type='text'>गरिमा आओर पलास</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: right;"&gt;कथा, भाग-2: लेखक:- राजीव रंजन लाल, मोडेरेटर: केशव कर्ण (समस्तीपूरी)&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;p style="text-align: justify;"&gt;करण समस्तीपुरी द्वारा लिखल पहिल भाग मे पढ़लौंह, "बचपन से तरुनाई धरि संग चलनिहार गरिमा आ पलासक सतत प्रेम, तमाम वर्चस्व आ विषमताक कात करैत जीवन पथ मे दुन्नु लोकनिक संग आनि देल्कैन्ह. मुदा भावनात्मक द्वन्दक नहि रोकि सकल !" एक पुरुषक अहम् आ नारिक स्वाभिमानक टकराव कोना होएत छैक...., राजीव रंजन लाल जी द्वारा लिखल कथाक एहि भाग मे पढू !!&lt;/p&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पलास के गरिमा के प्रति प्रेम अगाध छल आ ओ गरिमा के कष्ट बुझय छलखिन। से ओ जहिया जरूरत होय, गरिमा के मदद करय छलखिन्ह। विवाहोपरांत पलास निश्चय केलैथ जे ओ अपन आलस्य के छोड़ि किछ काज धंधा के अपना के लगौता। गाम में बैस गेला से किछ अकर्मण्यता सेहो आबि गेल छल पलासक जीवन शैली में मुदा ओ कृतसंकल्प भ’ एकटा प्राइवेट नौकरी ज्वॉइन क लेलैथ। ओ एकटा फर्टिलाइजर बनाबय बला फैक्टरी में सुपरवाइजर पोस्ट पर नियुक्त भेलाह। किछ दिन त’ सभ किछ ठीक चलल मुदा एहि काज में दिन राति के ठिकाना नहि छल आ बहुत माथापच्ची बुझेलैन पलास के। हुनका अंदर से लागैत छल जे हुनका भेटल काजक स्तर हुनक योग्यता से बहुत कम छैक। गाम बला बाबूशाही सेहो खतम छल। कोनो मैनेजर आबि के दु बात कहि देय आ पलास के खून के घूंट पीबय पड़य। डेरा पर अयला पर फैक्टरी के तामस कपार पर रहय छलैन्ह। गरिमा सेहो एहि बात के बुझैत रहथिन्ह आ पलास के बहुत हिसाब से शांत राखय के कोशिश करय छलखिन्ह। गरिमा पलास के नीक बेजाय के ख्याल राखय के कोशिश करय छलैथ आ एहि से पलास के धधकैत दिमाग के किछ शांति भेटैन्ह। क्रमश: पलास पर ऑफिस के बात बेसी हावी होयत गेलय आ गरिमा के समझाबै के असर क्षीण। आब पलास के लागैत छल जे गरिमा के हुनक स्वाभिमान के कोनो चिंता नहि छैन्ह। पलास के गरिमाक तुलना में आधो से कम तनख्वाह भेटैत छल। हुनक दिमाग पता नहि कोना, एहि बात के तुलना करय लागल। पलास के इहो लागय लागल जे शायद गरिमा हुनका एहि कारणे कम योग्य बुझैत छथिन्ह आ एहेन तुच्छ नौकरी के तरफदारी करैत छथिन्ह। मानव मन के बुझनाय बहुत कठिन होयत अछि आ ओ कखन कोन बात पर विचलि जेतै सेहो अनुमान लगेनाय कठिन। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;सात–आठ दिन पहिने कोनो बात पर पलास मैनेजर से मुँहा-मुँही भ’ गेल आ ओ नौकरी के लात मारि आबि गेलखिन्ह। दुपहरिये में घर पहुँच गेलैथ। दिमाग में दस तरह के बात घुरिया रहल छल। कखनो अफसोस होय जे बेकारे नौकरी छोड़ि देलिये आ कखनो हुनकर मोन  कहय जे भ’ गेलै सैह उचित छल। घर अचानक से खाली लागय लागल। हुनका कहियो एतैक खालीपन महसूस नहि  भेल छल। गरिमा साँझ में ऑफिस सँ आबैत रहथिन्ह। पलास के अचानक महसूस भेल खालीपन में गरिमा के कमी खलल। पलास के वैचारिक मतभेद हुनका गरिमा से बहुत दूर क देने छल। गरिमा के सेहो एहि बात के अनुमान लागि गेल छल आ एम्हर किछ दिन से ओ पलास के नौकरीक विषय में किछ नहि पूछय छलखिन्ह। पलास के मन में कतओ दुविधा आ अंतर्द्वंद चलि रहल छल। गरिमा नीक आ कि पलास नीक। पलास के लेल दुनु दु विचारधारा के प्रतीक छल आ कतओ से हुनक मोन बारंबार हुनका से कहि रहल छल कि गरिमा के विचार हुनक अपन विचार से नीक छल। किछ देर आउर बीतला पर ई विचार एतैक हावी भ’ गेल पलास के दिमाग में जे ओ प्राय: स्वीकार क’ लेने छलैथ जे एहि प्रकरण में ओ गलत छैथ। दिमाग किछ शांत भेल आ ओ गरिमा के इंतजार करय लागलाह। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;सांझ भेला पर गरिमा अपन समय से आबि गेलखिन्ह। घर में पहिने से पलास के देखि हुनका मोन में शंका भेलनि मुदा मुसका के पुछलखिन “कि बात, आय पहिने आबि गेलियै”।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;“अहाँ के बेजाय लागल कि, हमर घर पहिने एनाय?” पता नहि पलास कोना अचानक से उखड़ि के जवाब देलखिन।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;“नहि-नहि, से किया कहैत छी? ओनाही पुछलौं, जे मोन ठीक अछि कि नहि।” गरिमा के जवाब छल। ”आय मैनेजर से बाता-बाती भ’ गेल छलै। नौकरी छोड़ि के आबि गेलियअ। पता नहि अपना के कि बुझय जायत छैक। जेना लागय छै ओकर बाप के कर्जा धारणे छियै।” पलास अपन बात गरिमा से कहलखिन। हुनका मोन में छलैन जे गरिमा हुनक विचार के ऊपर राखैत हुनक समर्थन में बाजथिन। मुदा गरिमा के जवाब छल “आय काल्हि कतेक मुश्किल से नौकरी भेटय छै आ सौंसे ई परेशानी त’ रहबे करैत छै। अहाँ के नौकरी नहि छोड़बा के चाही छल।”&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;एतबा सुनैत पलास के स्वाभिमान जागि उठल आ ओ गरिमा के कठुआयल बात कहय लागलखिन्ह। कहैत काल हुनका विचार नहि रहि गेलैन जे गरिमा हुनका सँ वियाह करय ल’ तखन तैयार भेल रहथिन्ह जखन पलास गाम में बैसल रहैथ। गरिमा के माँ-बाबूजी के कनेक आपत्ति सेहो छल, मुदा गरिमा के खुशी के कारणे एहि प्रस्ताव के स्वीकार केने छलखिन। “अहाँ के ई चिंता नहि अछि जे हमरा के गारि बात कहैत अछि, मुदा अहाँ के एहि बात के बड्ड अफसोस अछि जे घर में पैसा एनाय कम भ’ जेतय। बाहर त’ मजदूर जकाँ पेड़ैबे करय छी, अहुँ के लेल हम एकटा पैसा छापय बला मशीन भ’ गेल छी। अहाँ के की भेटय यै आ की नै भेटय यै से हम कहियो हिसाब किताब नहि करय गेलौं। आय अहाँ कमबै छी त’ हमरा गुलाम नहि बुझु आ कनेक हिसाबे से बाजू, नहि त’ ठीक नहि होयत।”&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;गरिमा स्तब्ध छलीह। एहेन प्रत्युत्तर के परिकल्पना गरिमा के नहि छल। हुनको स्वाभिमान जागि गेल छल आ सब किछ बुझैतो ओ अपना के काबू में नहि राखि सकलखिन आ ठोकले जवाब देलखिन। “हमहीं छलहुँ जे माँ-बाबूजी के नहियो पसंद भेला पर अहाँ संग वियाह केलौं। तखन अहाँ कोन कमबै छलियै आ हमरा कोन पैसा के मोह छल। ना हम अहाँ के नौकरी करय ल’ कहलौं ना छोड़य ल’। हम किया अहाँ के पैसा छापय के मशीन बुझब। हमरा कोन खगती अछि पैसा के। अहीं झखै छी पैसा के लेल आ नौकरी के लेल। आब हमरा बुझा रहल अछि जे अहाँ के हमरा से नहि, हमर नौकरी से प्यार अछि। अहाँ के नौकरी नहि, लाटसाहबी चाही, से त’ कतओ भेटय बला नहि अछि। कनिये के पाय पर गुलछर्रा उड़ाबय चाहैत छी त उड़ाउ। हम त कहियो नहि रोकलौं अहाँ के।”&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;“हम कि शराब, सिगरेट में पैसा फेकैत छी। अखन एको दिन नौकरी छोड़ला नहि भेल हमर आ अहाँ अपन पैसा दिखा रहल छी। हम अहाँ के भरोसे जिनगी नहि काटि रहल छी। एहेन एहेन बहुत पाय बला देखने छी हम। पाय कमाबै छी त’ अहाँ नाँगड़ि बला नहि भ गेलौं से नाचि रहल छी।” पलास के बाजय में सम्हार नहि छल।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बात बिगड़ैत गेल आ गरिमा कानय लागलखिन्ह। पलास के अचानक बोध भेलनि जे ओ बहुत किछ अनर्गल कहि देलखिन्ह जेकर जरूरत नहि छलय। ओ चाहैत रहथिन्ह जे गरिमा के जा के सम्हार लैथ मुदा स्वाभिमानवश ओ उठि नहि सकलाह। फूसि अहंकार के अधीन भ’ गेल छलैथ पलास। अचानक सँ युगल जोड़ी के केकरो नजरि लागि गेल छलय। एक छत के नीचा रहितो अनजान भ’ गेलैथ गरिमा आ पलास।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;गरिमा के हृदय के आघात पहुँचल छल आ ओ अंदरे-अंदर घुलय लागलखिन। शरीर क्षीण होयत गेलैन आ ओ अखन बीमार छलीह। पलास के लेल ई विकट अवस्था आबि गेल। ओ कि करौथ। अपन प्यार के देखौथ की स्वाभिमान के। ताहि पर आय सांझ में गरिमा के माँ-बाबूजी शादी के बाद पहिल बेर इलाहाबाद आबि रहल छथिन्ह। हुनका सभ के किछियो भनक नहि छैन्ह एहि सप्ताह बीतल बात सभक। गरिमा सेहो नहि चाहय छलखिन्ह जे अखन हुनक माँ-बाबूजी इलाहाबाद आबैथ। ओ हुनका सभ के दुखी नहि देखय चाहैत रहथिन। एक-दु बेर त’ मना केलखिन, लेकिन गरिमा के माँ नहि मानलखिन जे पाहुन सेहो ऑफिस चलि जायत छथिन्ह त’ तोहर सेवा-सुश्रुषा के करतौ। पलास केना ई सभ के मैनैज करथिन्ह से कठिन प्रश्न छल हुनका लेल।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: right;"&gt;(क्रमशः..............)&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style=" color: rgb(255, 0, 0); font-weight: bold; font-family:arial;"&gt;कहानी’क अगिला भाग लिखबाक लेल टिप्पणी द्वारा सूचित करु. पहिने आऊ पहिने पाऊ सिद्धान्त लागू रहत.&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-6267740145626743428?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/6267740145626743428/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=6267740145626743428' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/6267740145626743428'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/6267740145626743428'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2009/09/blog-post_11.html' title='गरिमा आओर पलास'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-8982542142792570948</id><published>2009-09-04T07:26:00.005+05:30</published><updated>2009-09-04T20:45:00.523+05:30</updated><title type='text'>गरिमा आओर पलास</title><content type='html'>&lt;p style="TEXT-ALIGN: right" align="justify"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="COLOR: rgb(0,102,0);font-family:arial;" &gt;कथा, भाग-१: लेखक एवम मोडेरेटर: केशव कर्ण (समस्तीपूरी)&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;गरिमा एखन ऑफिस सँ अएले छलीह. चाह’क केतली गैस पर चढा क' वर्षा मे भीजल केश के सुखाबए लागलीह. फेर चाह आ रेडियो ल'क' बालकनी मे आबि गेली. आल इंडिया रेडियो पर &lt;b&gt;'बरखा बहार आयी रस की फुहार आयी&lt;/b&gt;' बाजि रहल छल. सामने फिल्ड मे पलासक फूलक उज्जर धप-धप चद्दर बिछल छल. गरिमा सोचए लागलीह, हुनको पलास त' हुनक हर ख़ुशी ले अहिना आंखि बिछेने रहैत छल. एक बेर गरिमा कहने छली जे हुनका आमक अंचार बड़ पसंद छैन्ह आ पलास अगले क्षण ताख पर राखल शीशा वाला बोइयामक एक हिस्स एक्के बेर मे पार क' देने रहथि. भन्ने एहि फेर मे बोइयाम खसि क' टूटल, हुनक हाथ कटल आ माताजी के डांट सेहो सुनाए पड़ल. गरिमा’क कैमरा वाला मोबाइल फ़ोनक बड़ शौक छलैन्ह. सांझे मे हुनका एक गोट सरप्राइज गिफ्ट भेंट गेलन्हि. डिब्बाक भीतर एक सोनी एरिक्सन मोबाइल फ़ोन’क अलावे एक गोट पुर्जी जहि पर पिंक स्केच पेन से लिखल छल "इट्स माय प्लीजर" - पलास! फेर त' विद्यार्थी जीवन मे मासक बाँचल दिन कोना गेल से त' पलासे के मोन छैन्ह कि हुनका सँ एक बेर "आज कल तुम शेव क्यूँ नहि करते ?" पुछए वाली गरिमा कें. &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div style="BORDER-TOP: #5c8a64 5px solid; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 5px; MARGIN: 12px; WIDTH: 200px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 5px; BORDER-BOTTOM: #5c8a64 5px solid; TEXT-ALIGN: center"&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: justify"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-size:13;"&gt;&lt;span style="font-family:arial;font-size:85%;"&gt;एहि &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:arial;font-size:85%;"&gt;कहानी’क पहिल भाग सँ मैथिली साहित्य’क इतिहास मे एक अध्याय आओर जुड़ि गेल. एहि सँ पहिने कहियो एहेन नहि भेल छल जे एक कथा केँ कएक लेखक मिलि जुलि केँ लिखने हो. प्रत्येक लेखक केर अलग भावना. कथा’क पहिल भाग लिखताह किओ एक लेखक, दोसर भाग मे उठा पटक करताह केओ दोसर लोक, उत्कर्ष पर चढेताह किओ तेसर आ नहि जानि अन्तिम लोक अपन सोच सँ कहानी केँ बिल्कूल अलगे अन्त दऽ दैथि. सब मिला केँ प्रत्येक लेखक के अपन भावना’क हिसाब सँ कहानी मोड़ लेत आ पाठक केँ एक रुचिगर कथा पढ़बाक लेल भेटतन्हि.हमरा बुझने आन दोसरो वेबसाइट पर एहेन प्रयोग’क सुरुआत काएल जायत मुदा केशव जी’क लिखक एहि कथा-क मैथिल साहित्य’क इतिहास मे सम्मान’क सँग विद्यमान रहत.&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="TEXT-ALIGN: right"&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="FONT-WEIGHT: bold"&gt;आदि यायावर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-family:arial;font-size:85%;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;&lt;span style="font-size:100%;"&gt;पलास आ गरिमा बचपने सँ संगी छलथि. स्कूल, कॉलेज, प्रतियोगिता परीक्षाक तैय्यारी आ फेर इंटरव्यू. बचपन से तरुनाई धरि जिनगीक सफ़र मे हर कदम पर पलास गरिमा के साथे छलथि. मुदा एतहि से दुन्नु लोकनिक रास्ता अलग भ' गेल्लैन्ह! गरिमा सफल भए सी. पी. डबल्यू. डी. मे नौकरी करए ईलाहाबाद चलि गेलीह आ पलास असफल भए अप्पन गाम ! किछु दिन धरि त' फ़ोन, एस.एम.एस. मेल आ चैट के दौर सकुशल चलैत रहल. मुदा ई दूरी दुन्नु लोकनिक आओर करीब आनि देल्कैन्ह. साल बितैत-बितैत पारिवारिक सहमति सँ दुन्नु लोकनि परिणय सूत्र मे बंधि गेलथि. पलास अल्लाहाबाद आबि गेलथि. गरिमाक जिनगी कें त' मानु जे खुशी के पाँखि लागि गेल होए. मुदा फेर शुरू भ' गेल टकराव, एक पुरुषक अहम् आ एक नारीक स्वाभिमान’क !&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;p&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;&lt;strong&gt;जे कहानी’क अगिला भाग लिखबाक लेल टिप्पणी द्वारा सूचित करु. पहिने आऊ पहिने पाऊ सिद्धान्त लागू रहत.&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-8982542142792570948?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/8982542142792570948/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=8982542142792570948' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/8982542142792570948'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/8982542142792570948'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2009/09/blog-post.html' title='गरिमा आओर पलास'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-8813353166136369859</id><published>2009-08-18T12:05:00.002+05:30</published><updated>2009-08-18T12:19:45.049+05:30</updated><title type='text'>एना कते दिन (कथा) -   सतीश चन्द्र झा</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#660000;"&gt;- श्री सतीश चन्द्र झा&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;स्वच्छ आ निर्मल आँखिमे जेना नोर झिलमिलाए लगैत छैक अथवा ओसक बुन्न फूल पर चमकऽ लगैत छै, तहिना ओकर ठोरो पर मुस्की नुका नञि सकैत छलैक। कखनहु कोनो बात हो कोनो प्रसंग हो ओकर मुस्की सुहागिनक लाल-लाल सिन्दुर सँभरल सोउँथ जकाँ हरदम चमकैत रहैत छलैक। सैकड़ो युवतीक छटाक तुलना मे ओकर आकर्षक व्यक्तित्वक मुस्कीक कोनहु विकल्प नहि छलैक। किओ देखै वा नञि, हमर आँखि ई सुखक लेल सदैव उत्सुक रहैत छल।कक्षामे ओ हमरे पाँजरवला बेन्च पर बेसैत छल, दिनमे कइएक बेर ओकर आ हमर आमना-सामना होइत छल, जखन देखु प्रसन्न जखन गप्प करु वैह चंचलता सँ परिपूर्ण, अपन छटा केँ आवश्यकतासँ बेसी आकर्षक बनेबामे प्रयत्नरत, अनुभा हमरा लेल प्ररेणा छल। ओकर मुस्की हमरा एतेक प्रभावित केने छल जे हम एक दिन पुछिए देने छलियैक-&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="BORDER-TOP: #5c8a64 5px solid; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 5px; MARGIN: 12px; WIDTH: 200px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 5px; BORDER-BOTTOM: #5c8a64 5px solid; TEXT-ALIGN: center"&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;img alt="Satish Chandra Jha" src="http://maithili.editor.googlepages.com/satishchandrajha.jpg" width="90" align="right" /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;लेखक- श्री सतीश चन्द्र झा&lt;/span&gt;,&lt;br /&gt;म.न. 119, क्रॉस रोड, संत नगर&lt;br /&gt;बुराड़ी, दिल्ली- 110084&lt;br /&gt;सम्पर्क- 9810231588&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अनुभा! एतेक मनमोहक मुस्की अहाँकेँ कतऽ सँ भेटल?&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ओ हमरा दिस ताकि गंभीर भऽ गेल छल आ पुन: एकटा वैह आकर्षक छटावला मुस्की दऽ देने छल, बुझु जे ओ हमर उतर दऽ देने छल।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मुदा ओहिसँ हमरा संतोष कतऽ? हम तऽ ओकर चान एहन मुखमंडल सँ सुनऽ चाहैत छलहुँ। हमर बड़ जिद्द पर ओ कनेकालक वास्ते गुम्म भऽ गेल फेर कहलक-ई तऽ हमर स्वभाविक गुण अछि, ई नैसर्गिक अछि, कोना कहु जे कतऽ सँ भेटल।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बातो सत्ये छलैक, किञो कोना कहि सकैत अछि जे हँसब बाजब, कानव कखन ककरा कतऽ सँ भेटलै, हमहु केहन बातऽ करऽ लागल छलहुँ।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हमरा ओहिना स्मरण अछि जे परीक्षाक व्यस्त दिन छल, ओहि समय कखन साँझ होइत छल, कखन खेबाक बेर होइत छल, किछु पतो नहि रहैत छल, किताबक पन्ना आँखिमे, नचैत रहैत छल, नील रोसन इ सँ लिखल 'नोटक' वाक्य ओहिना दिमाग पर आच्छादित रहैत छल, एहने व्यस्तता सँ भरल दिनमे एक दिन एकाएक भेट भेल छल अनुभा सँ, कने ध्यान दऽ देखताहुँ तऽ उदास भऽ गेल छलहुँ-जगरना सन आँखि, ठोर पर पपड़ी जमल आ ओ मनमोहक मुस्की नहि जानि कतऽ हरा गेल छलैक, पूरा हालत अस्त-व्यस्त। ओकर एहन हालत देखि नहि जानि मनमे केहन-केहन बात आबि रहल छल, छातीक धड़कन अपन दैनिक गतिसँ तेज भऽ गेल छल-हम घवड़ायले भावे पुछलियैक-कि भेल अनुभा?&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ओ चुप्प छल।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ओकरा चुप्प देखि हमरा रहल नहि भेल, ओकर दुनु कान्ह के डोलबैत पुछलियै-आखिर बात की अछि अनुभा? किएक ने बजैत छी? कहुने जे कि भेल?&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ओ मुस्कीक व्यर्थ प्रयास करैत कहलक-संजू! हमर परीक्षा खराब भऽ गेल अछि, हम ठीक सँ लिखि नहि सकलहुँ अछि, एहि वर्ष पासो होयब असंभव बुझाइत अछि, आ ओकर आँखि सँ नोर खदसि पड़ल छलैक।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;सान्त्वना दैत हम कहलियै-केहन बात करैत छी अनुभा, ई कोनो एहन बात तऽ नहि जाहि लेल अपन जीवने बदलि देल जाए, आदमी अपन स्वभाविक स्वभाव बिसरि खंडहर बनि जाए। अहाँ बताहि तऽ नहि भऽ गेलहुँ अछि अनुभा? देखु तऽ अपन हालत कि सँ की भऽ गेलहुँ अछि। देखु अनुभा, मेहनति करब हमर कर्तव्य थीक, सफलता, असफलता ई तऽ हमर हाथमे नहि अछि, तखन एतेक चिन्तित हैब व्यर्थ थीक। ई तऽ सर्वविदित छैकने, जे महाभारतक युद्ध मे श्री कृष्ण जनैत छलथिन्ह जे अभिमन्यु जे युवावस्थाकेँ प्राप्ते केने छल, चक्रव्यूहमे मारल जायत, यद्यपि ओ बचा सकैत छलथिन्ह तथापि ई कहि जे होबाक छैक से भइए कऽ रहैत छैक आ अभिमन्यु अपन कर्तव्यकेँ खूब नीक जकाँ निमाहलक। हुनक आँगा तऽ हम अहाँ...।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अनुभा बाजल-नहि संजू! अहाँ नहि जनैत छी, एहि वर्ष पास होयब हमरा लेल बड़ आवश्यक अछि, बेर-बेर असफलता सँ हमर स्थिति केहन भऽ गेल अछि से अहाँ जनैत छी?&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हम उदास भऽ कहलियै-कि करबै अनुभा, जे होबाक रहैत छैक से तऽ भइएकऽ रहैत छैक।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;प्रयास करितो ओ मनमोहक मुस्की अनुभाक मुख पर नहि आबि सकल छलै आ ओ विदा भऽ गेल छली।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;किछुक दिन बाद ओ आयल छली, वैह हालति, ओहिना खिन्न, वैह उदासीक रुप।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हम पुछलियै-अहाँक भूत एखनधरि नहि उतरल अछि कि?&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ओ मन्हुआयले मोन सँ कहलक-उतरि जायत। जे होबाक छल से तऽ भऽ गेल, आब कथिक लेल कानब आ कथीक भूत। ई किताब अनालहुँ अछि से लऽ लिअ।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हम आश्चर्य भऽ पुछलियैक-की अहाँ आगू नहि पढ़व? पढ़ाई-लिखाइ तऽ भागयक खेल अछि-किछु दिनक बाद हमर विवाह भऽ रहल अछि फेर केहन पढ़ब लिखब ओकर उत्तर छल। मुदा?&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मुदा कि संजू? जँ किछ, कहबाक हो तऽ कहि दिअ, नञि जानि फेर भेट हैत कि नहि। हम तऽ अपन मनक गप्प कहबा लेल छलहुँ कि बीचहि मे...जै अहाँके किछु कहबाक हो तऽ कहि दिअ....लेकिन हमहु किछु कहि नहि सकल छलियैक।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हमरा लागल जेना ओ विवश छली आ विदा भऽ गेल छली मुदा एक तुफान सन बिहाडि़ छोडि़ गेल छली जाहिसँ हमर अन्त: करण आन्दोलित भऽ गेल छल, जे आइयो शांत नहि भऽ सकल छल आ कतेको प्रश्र हमर मनमे अउनाइत रहल हम किछु कऽ नहि सकलहुँ।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आब हमहुँ बैकक नौकरी करऽ लागल छलहुँ, एहि वर्ष गृहस्थी जीवन मे प्रवेश केने छलहुँ। आफिस जयबाकाल पत्नी कहने रहथि-हे सुनै छी, आइ कने जल्दी चलिआयब आइ साँझमे अस्पताल जयबाक अछि। से किएक? कि अपस्तालक.... &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;धूर जाऊ-अहाँके तऽ हरदम हँसीए मजाक बुझाइत अछि, हमर गामक जे फुचाइ बाबू छथिन ने, तिनके बेटी अनुभा अस्पतालमे भर्ती छैक, कने जिज्ञासा कऽ लेनाइ जरूरी ने छैक-हँ...हँ अवश्य, यैह सब तऽ समाज में, परिवारमे नाम रहि जाइत छैक, मुदा अनुभाक नाम सुनितहि हमर मन डरा गेल छल, मनमे एक अजीब सन भयक संचार होमऽ लागल छल, मुदा मन के सम्हारैत ऑफिस विदा भऽ गेलहुँ।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;साँझ मे अस्पतालक वास्ते विदा भेलहुँ, मुदा रिक्सा पर मन घ बड़ा रहल छल आ रहि-रहि कऽ एक्के बातक डर भऽ रहल छल जे बैह अनुभा तऽ नहि अछि। एहि बात सँ भरि देहमे पसेनाक बुन्न छोडि़ देने छल, जेबी सँ रूमाल बहार कऽ हम पोछ लागल छलहुँ। जाड़ोमे पसेना छुटि गेल, कि अस्पतालक डर होइत अछि? नहि...नहि एहन बात नहि छैक, ऑफिस सँ अएलाक बाद तुरन्ते विदा भऽ गेलहुँ अछि ताहि कारण मन कने थाकल बुझाइत अछि-हम पत्नीक बातकेँ अनठियबैत कहने रहियैन्ह।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अस्पताल पहुंचलहु तऽ ओहिठाम हड़बिरड़ो उठल छल, डाक्टर, नर्स आ कम्पाउण्डर सब किञो इम्हर सँ ओम्हर दौड़-बरहा कऽ रहल छल। ऑपरेशन घरक एक कोनमे बैसल शोक संतप्त परिवार दिस हमर पत्नी चलि गलीह आ गप्प केलाक बाद ओहो उदास भऽ गेल छलीह, एहि सबटा घटनाक हम मूक दर्शक बनल रहलहुँ जेना एही वास्ते आयल रहि।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ओहिठाम कातमे बैसल एकटा अति शोक संतप्त युवक दिस हम बढि़ गेल छलहुँ, हुनकहि सँ ज्ञात भेल जे हुनकहि पत्नीक आपरेशन भऽ रहल छनि, संगहि इहो कहलनि जे जहिया सँ हुनक विवाह भेलनि अछि तहिया सँ पत्नी अस्वस्थे रहैत छथिन आ ताहिमे दोसर बेर माँ बनि रहल छथि। डाक्टर लोकनिक कहब छनि जे बच्चा तऽ बाँचि जायत मुदा...&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;नहि...नहि...एहन बात नहि बाजू सभक रक्षा भगवान करैत छथिन, ऐना जँ अहिँ करब तऽ फेर....&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;एहि बीच कन्नारोहट उठि गेल छलै, ओहो युवक आम्हरे दौड़ गेल छलाह मुदा पत्नी सदाक लेल संग छोडि़ गेल छलथिन। हमरो आँखि सँ नोर टघरऽ लागल छल आ धीरे-धीरे हमहु ओम्हरे डेरा बढ़ा देने छलियैक।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अनुभा...! एकाएक ओकर शव देखि हमर बढ़ल डेग रूकि गेल छल। हमरा जकर अनुमान भेल छल ओ साक्षात सामने छल, वैह अनुभा जे कहियो हमर प्रेरणा छल। हम तऽ कल्पना मे नहि सोचने रहि जे अनुभा सँ फेर भेट हैत मुदा बिडम्बना देखु जे भेट भेवो कयल तऽ लाशक रुप मे। ओकरा संग बीतल युवावस्थाक दिन हमिरा ओहिना स्मरण आबऽ लागल छल, देह थरथराए लागल छल, कहुनाकऽ अपनाकेँ सम्हारैत कहुना कऽ डेग आगू बढ़ेने छलहुँ। डाक्टर लोकनि सँ ज्ञात भेल जे एकर मुख्य कारण जल्दीए दोसर बेर माँ बनब अछि कारण एक बच्चाक बाद शारीरिक रुपँ ओ ततेक ने कमजोर भऽ गेल रहथि जे दोसर बेरक हेतु ओ एखन तीन-चारि वर्ष धरि माँ नहि बनि सकैत छलीह, मुदा से नहि भऽ सकल छलनि...। बादमे हमरा दुखो भऽ रहल छल जे ओहि युवक केँ हम बहुत बातो कहि देने रहियैन जे पढि़-लिखि गेलाक बादो अहाँलोकनि भावुकताक प्रवाह मे ऐना ने बहि जाइत छी जे भविष्यक कोनो चिन्ते नहि। जँ आइ उचित परिवार नियोजनक कार्य प्रणाली पालन केने रहितहु तऽ आइ एहन परिस्थिति नहि अबैत, हमर बात पर ओ कानऽ लागल छलाह आ हमरो आँखि सँ नोर खसि पड़ल छल।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-8813353166136369859?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/8813353166136369859/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=8813353166136369859' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/8813353166136369859'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/8813353166136369859'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2009/08/blog-post_18.html' title='एना कते दिन (कथा) -   सतीश चन्द्र झा'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-7109801661610296356</id><published>2009-08-04T01:46:00.005+05:30</published><updated>2009-08-04T02:16:49.924+05:30</updated><title type='text'>कतेक रास बात !!</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="  white-space: pre-wrap; font-family:-webkit-monospace;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-size:medium;"&gt;बहुत दिन स हम अहि ब्लॉगक एक गोट निश्क्रिय सदस्य बन गेल छलहू | कारण एक ता समयक अभाव छल, दोसर किछू नव लिखबाक इच्छा हर बेर कलम थमा जाई छल| आई बहुत दिनक बाद कीछ समय भेटल ता अपने सभक समक्ष एक गोट प्रेम गीत प्रस्तुत कॅ रहल छी|  &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-family:-webkit-monospace;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="white-space: pre-wrap;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="  white-space: pre-wrap; font-family:-webkit-monospace;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-size:medium;"&gt;"&lt;/span&gt;&lt;i&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-size:medium;"&gt;इज़ोरिया राति में चंद्रमाक साथ,&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="  white-space: pre-wrap; font-family:-webkit-monospace;"&gt;&lt;i&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-size:medium;"&gt;पोखरिक भीड़ पर हाथ धेने हाथ;&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="  white-space: pre-wrap; font-family:-webkit-monospace;"&gt;&lt;i&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-size:medium;"&gt;किछू कहबाक मोन, मुदा बौक भेला 'बाल'; &lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-family:-webkit-monospace;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="white-space: pre-wrap;"&gt;&lt;i&gt;प्रेयसीक संग &lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium; "&gt;जेना&lt;/span&gt; व्यूह, &lt;span class="Apple-style-span" style="font-style: normal; "&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium; "&gt;कोनो&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; जाल|&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-family:-webkit-monospace;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="white-space: pre-wrap;"&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="  white-space: pre-wrap; font-family:-webkit-monospace;"&gt;&lt;i&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-size:medium;"&gt;कतेक जन्म आहांक हम तकलहू अछी बाट,&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="  white-space: pre-wrap; font-family:-webkit-monospace;"&gt;&lt;i&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-size:medium;"&gt;संग आजू भेल सखी युगो-युगक बाद|  &lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-family:-webkit-monospace;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="white-space: pre-wrap;"&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="  white-space: pre-wrap; font-family:-webkit-monospace;"&gt;&lt;i&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-size:medium;"&gt;बिसारी दिय आई लोक-वेद आ समाज&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;i&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-size:medium;"&gt;,&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-family:-webkit-monospace;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style=" white-space: pre-wrap;"&gt;&lt;i&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-size:medium;"&gt;मिलाउ हमर प्रार्थना स आहा केर नमाज़|&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-family:-webkit-monospace;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style=" white-space: pre-wrap;"&gt;&lt;i&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-size:medium;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-size:medium;"&gt;प्रेम केर गीत सखी, प्रेम केर साज़,&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-family:-webkit-monospace;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style=" white-space: pre-wrap;"&gt;&lt;i&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-size:medium;"&gt;प्रेमहि थिक धराक एही रंग केर राज़|&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-family:-webkit-monospace;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="white-space: pre-wrap;"&gt;&lt;i&gt;&lt;br /&gt;&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-family:-webkit-monospace;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style=" white-space: pre-wrap;"&gt;&lt;i&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-size:medium;"&gt;कतेक रास बात एहेन कतेक रास बात,&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-family:-webkit-monospace;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style=" white-space: pre-wrap;"&gt;&lt;i&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-size:medium;"&gt;कहैत आ सुनैत भेल जाई अछि देखु प्रात||"&lt;/span&gt;&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-7109801661610296356?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/7109801661610296356/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=7109801661610296356' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/7109801661610296356'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/7109801661610296356'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2009/08/blog-post.html' title='कतेक रास बात !!'/><author><name>बालचन</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02251990692130934656</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://photos1.blogger.com/blogger/6971/3344/1600/11.0.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-4679661309222229786</id><published>2009-07-24T19:25:00.003+05:30</published><updated>2009-07-24T19:38:07.631+05:30</updated><title type='text'>खस्सी आ चिकबा (लघुकथा) - सुभाष चंद्र</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;एकटा छागर छल, जकरा शुरूए सँ चिकबा पोसि रहल छल। खूब नीक जेकां रहैत छल छागर। चिकबा खूब ध्यान दैत छलै ओहि छागर पर। चिंतित रहैत छल छागरक प्रति। छागर कतओ इम्हर-ओम्हर नहि चलि जाय , कतओ रस्ता नहि बिसारि जाय, कतओ भुलता नहि जाय। हरियर-हरियर घास, कटहरक हरियर पात, रोटी ... सभ किछु खाय लेल दैत छलै छागर कें। कहुना स्वस्थ रहय, इएह मंशा रहैत छलैक।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="BORDER-TOP: #5c8a64 5px solid; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 5px; MARGIN: 12px; WIDTH: 200px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 5px; BORDER-BOTTOM: #5c8a64 5px solid; TEXT-ALIGN: center"&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;img alt="Subhash Chandra" src="http://maithili.editor.googlepages.com/subhash.jpg" width="90" align="right" /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;लेखक- श्री सुभाष चन्द्र&lt;/span&gt;,&lt;br /&gt;युवा पत्रकार सुभाष जी पत्रकारिताक संग हिन्दी आ मैथिली दुहू साहित्य मे सक्रिय आ &lt;a href="http://www.vidyapati.org/"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;"कतेक रास बात"&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;क लेल नियमित रुप सँ लेखन। संगे एकगोट नव मैथिली पत्रिका निकालबा लेल सेहो प्रयासरत छथि। सम्प्रति "प्रथम इम्पैक्ट" नामक पाक्षिक पत्रिका मे कार्यरत आ दिल्ली मे निवास।&lt;br /&gt;सम्पर्क-+91-98718 46705&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;- सम्पादक।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बीतैत समयक संग छागर खस्सीक रूप धारण कय रहल छल। समय बीतैत गेलै। आओर एकदिन चिकबा खस्सी कें लय क बाहर गेल। खस्सी अपना कें सभतरहें सुरिक्षत मानि रहल छल। कारण, संग मे रखबार छल चिकबा। खस्सी के एहि बातक अवगति नहि छलय जे आबय वाला पल केहन प्रलंयकारी हेतैक। ओ त सामने चिकबा कें देखैत छल आ निश्चिंत छल।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;चिकबा, जे छागर के पालि-पोसि खस्सी बनोलक, खस्सी के अपनापन के एहसास करौलक। बच्चा सँ वयस्क बनयधरि सदिखन ओकरा सुरक्षा देलक। आब खस्सीक प्रति चिकबाक एतेक सिनेह कियैक रहय, ई त स्वयं चिकबे जाने।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;ओ समय लगीच आबि गेलै जखन चिकबा स्वयं आ खस्सीक मध्य अन्तर स्पष्ट करैत अछि। चिकबा खस्सी के बाजार मे बेचि दैत छैक। ओ खस्सी के पुचकारैत बड दुलार सँ अपना लग बजाबैत अछि। खस्सी आबि जाइत छैक, कारण ओ चिकबा लग अपना कें पूर्ण सुरक्षित महसूस करैत अछि। लगीच अयला पर खस्सी के पकरैत अछि। खस्सी शांत, बिलकुल शांत। निस्तब्ध अछि। एकरा ओ सिनेहक एकटा रूप मानैत अछि। चिकबाक हाथ ओकरा पर धीरे-धीरे कसिया रहल छल, आ ....। कनी काल बाद ओ अपना कें बाँन्हल पबैत अछि। एकटा खँटा मे खूँटेसल। लाचार अछि, बेबस, अचंभित। खस्सी किछुओ बुझि नहि पाबि रहल छै। आखिर कियैक ओकरा संग एहन व्यवहार, सेहो चिकबाक हाथे। कारण सोच सँ परे। एकसरि ठाढ़ अछि, असमंजस मे।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;किछु पल आओर बितला पर चिकबा अबैत अछि। हाथ मे कत्ता लेने। धरिगर आ भरिगर। खस्सी के साइत आब अनुमान लागि रहल छैक। कानि रहल छै। ओतय चिकबा शांत। बिलकुल शांत। जेना किछुओ नव घटना होमय वाला नहि होय। चिकबा के ज्ञात छैक, आबय वाला समय मे कि होमय जा रहल छै। कियैक भ रहल छै? एकर उत्तरदायी ककरा पर? तइयो शांत अछि। कोनो तिलमिलाहट नहि।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आब, खस्सीक पछिलुका दुनू पैर खींचल जा रहल छै। धड़ सीधा। कराहि रहल अछि खस्सी। शरापि रहल अछि चिकबा केँ। कनैत नहि अछि। कारण ओकर दम घूटि रहल छै। साँस लेबा मे तकलीफ भ रहल छै। एना मे कानल कोना जेतै? चिकबा आब निचैन भ कत्ता उठा कय ओकर गरिदन पर बजारि दैत छैक। गरिदन धड़ सँ विलग। एकदम सँ अलग। चहुँदिश शोणितक छींटा उड़ैत अछि। तइयो चिकबा शांत। एकदम शांत। जेना किछुओ भेलै नहि होइहि।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-4679661309222229786?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/4679661309222229786/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=4679661309222229786' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/4679661309222229786'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/4679661309222229786'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2009/07/blog-post_24.html' title='खस्सी आ चिकबा (लघुकथा) - सुभाष चंद्र'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-9165305635682744181</id><published>2009-07-17T16:16:00.002+05:30</published><updated>2009-07-17T16:44:23.106+05:30</updated><title type='text'>एहि शहर मे- सुभाष चन्द्र</title><content type='html'>एहि शहर मे&lt;br /&gt;इजोरिया राति मे&lt;br /&gt;एकसरि बैसला पर&lt;br /&gt;मोन पड़ैत अछि अपन गाम&lt;br /&gt;आन गामक चभच्चा पोखरि&lt;br /&gt;प्राय: हमर नेनपनक कोनो संगी&lt;br /&gt;एहि इजोरिया मे नाओ पर घूमैत होयत&lt;br /&gt;&lt;div style="BORDER-TOP: #5c8a64 5px solid; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 5px; MARGIN: 12px; WIDTH: 200px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 5px; BORDER-BOTTOM: #5c8a64 5px solid; TEXT-ALIGN: center"&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;img alt="Subhash Chandra" src="http://maithili.editor.googlepages.com/subhash.jpg" width="90" align="right" /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कवि- श्री सुभाष चन्द्र&lt;/span&gt;,&lt;br /&gt;युवा पत्रकार सुभाष जी पत्रकारिताक संग हिन्दी आ मैथिली दुहू साहित्य मे सक्रिय छथि। संगे एकगोट नव मैथिली पत्रिका निकालबा लेल सेहो प्रयासरत छथि। सम्प्रति "प्रथम इम्पैक्ट" नामक पाक्षिक पत्रिका मे कार्यरत आ दिल्ली मे निवास।&lt;br /&gt;सम्पर्क-+91-98718 46705&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;- सम्पादक।&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;गबैत होयत कोनो फिल्मी प्रेमगीत&lt;br /&gt;आ,&lt;br /&gt;बसबिट्टी सँ उड़ल होयत कोनो चिड़ै&lt;br /&gt;उडि़ क' गेल होयत आमक गाछी दिस&lt;br /&gt;एहि शहरक धारक कात&lt;br /&gt;हम एकसरि बैसल छी&lt;div&gt;आ&lt;br /&gt;मौन पड़ैत अछि बेर-बेर अपन गाम&lt;br /&gt;एहि शहर मे दस वर्ष रहलो पर हम&lt;br /&gt;एहि शहर मे नहि छी&lt;br /&gt;मोहल्ला मे छी मात्र एक 'किराएदार'&lt;br /&gt;किराएदारक कोनो अस्तित्व नहि होइत अछि&lt;br /&gt;कोनो शहर मे&lt;br /&gt;चिड़ैए जकां किराएदार&lt;br /&gt;एहि मोहल्ला सँ ओहि मोहल्ला मे चलि जाइत अछि&lt;br /&gt;अथवा&lt;br /&gt;चलि जयबाक लेल बाध्य कय देल जाइत अछि&lt;br /&gt;हम छी, नहि छी&lt;br /&gt;कोनो अस्तित्व नहि रखैत अछि एहि शहर मे&lt;br /&gt;मुदा,&lt;br /&gt;शहर मे रहब लाचारी अछि हमरा लेल&lt;br /&gt;चिड़ैए जकां चाहे बसबिट्टी मे रही&lt;br /&gt;अथवा आमक गाछी मे&lt;br /&gt;हमरे जेकाँ शहर मे रहितो एकसरि अछि&lt;br /&gt;यमुना&lt;br /&gt;आओर, धीरे-धीरे जा रहल अछि&lt;br /&gt;थाकल, ठेहिआयल, हमरे जकाँ।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-9165305635682744181?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/9165305635682744181/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=9165305635682744181' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/9165305635682744181'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/9165305635682744181'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2009/07/blog-post_17.html' title='एहि शहर मे- सुभाष चन्द्र'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-4168199020938036628</id><published>2009-07-08T10:14:00.004+05:30</published><updated>2009-07-08T10:38:27.273+05:30</updated><title type='text'>उठू मैथिल भेलै भोर- विनित ठाकुर</title><content type='html'>जय जय मैथिल जय मिथिला&lt;br /&gt;हर–हर गङ्गे जय कमला&lt;br /&gt;&lt;div style="BORDER-TOP: #5c8a64 5px solid; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 5px; MARGIN: 12px; WIDTH: 200px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 5px; BORDER-BOTTOM: #5c8a64 5px solid; TEXT-ALIGN: center"&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;img alt="Binit Thakur" src="http://maithili.editor.googlepages.com/binit.jpg" width="90" align="right" /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कवि- श्री विनित ठाकुर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जन्म- 01 मार्च, 1976 ई.&lt;br /&gt;शिक्षा: बी. एड.&lt;br /&gt;प्रकाशित कृति: बाँकी अछि हमर दूधक कर्ज&lt;br /&gt;सम्प्रति: शिक्षक (प्रगति आदर्श ई. स्कूल, लगनखेल, ललितपूर, नेपाल)&lt;br /&gt;स्थायी पता: मिथिलेश्वर मौवाही–६, धनुषा, नेपाल&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;उठू  यौ   मैथिल  भेलै  भोर&lt;br /&gt;चुनमुन  चिरैया  करैय  शोर&lt;br /&gt;कोशी कमला अमृत जल धारा&lt;br /&gt;आलस छोरु कहे भुरुकवा तारा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माटि पानिके लगाक छाती&lt;br /&gt;बुढिया  दादी   गावे   पराती&lt;br /&gt;गाई महिष खोललक चरवाहा&lt;br /&gt;हर  लऽ  विदाह  भेल हरवाहा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन्दिर मस्जिद मिथिलाक शान&lt;br /&gt;रुप   अनेक  एकऽही   भगवान&lt;br /&gt;जनक  सलहेशक  ई कर्मभूमि&lt;br /&gt;स्वर्ग  समान बनाऊ मातृभूमि&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-4168199020938036628?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/4168199020938036628/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=4168199020938036628' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/4168199020938036628'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/4168199020938036628'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2009/07/blog-post_08.html' title='उठू मैथिल भेलै भोर- विनित ठाकुर'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-1506528574324908374</id><published>2009-07-02T13:17:00.003+05:30</published><updated>2009-07-03T10:53:37.467+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ग़जल'/><title type='text'>जिनगी कोना भेंटत ?</title><content type='html'>&lt;span class="Apple-style-span"  style=" ;font-family:'Times New Roman';"&gt;&lt;div style="border-top-width: 0px; border-right-width: 0px; border-bottom-width: 0px; border-left-width: 0px; border-style: initial; border-color: initial; margin-top: 0px; margin-right: 0px; margin-bottom: 0px; margin-left: 0px; padding-top: 3px; padding-right: 3px; padding-bottom: 3px; padding-left: 3px; width: auto; font: normal normal normal 100%/normal Georgia, serif; text-align: left; "&gt;&lt;span class="Apple-style-span"   style="  line-height: 25px; font-family:arial;font-size:14px;"&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;दुख:क ठोर पर हंसी कोना भेंटत ?&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;जेकरा भाग्ये में अछि दुःख,&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;ओकरा ख़ुशी कोना भेंटत ??&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;जे नहि बेचलक अप्पन आत्मा कें,&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;ओकरा नौकरी कोना भेंटत ??&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;गामो कए रहल अछि शहरक देकसी,&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;आब कतहु सादगी कोना भेंटत ?&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;चान पर बढि रहल अछि प्रदुषण,&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;भला कहू ! चांदनी कोना भेंटत ??&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;ओना त' मोन सबहक होएत छैक,&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;मुदा सबहक "परी" कोना भेंटत ?&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;हाट पसरल अछि मौअतिक सभ तर ,&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;एहि में जिनगी कोना भेंटत ??&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;दुख:क ठोर पर हंसी कोना भेंटत ??&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;- करण समस्तीपुरी    &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-1506528574324908374?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/1506528574324908374/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=1506528574324908374' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/1506528574324908374'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/1506528574324908374'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2009/07/blog-post.html' title='जिनगी कोना भेंटत ?'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-5075577053346459838</id><published>2009-06-23T12:25:00.006+05:30</published><updated>2009-06-23T13:34:50.624+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कुन्दन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>नव बरखक बहाने-  कुन्दन कुमार मल्लिक</title><content type='html'>इ की भेल,&lt;br /&gt;अनचोँकहि मे नीन टूटल&lt;br /&gt;बाहर पट्टखाक शोर छल&lt;br /&gt;करैत लोक अनघोल छल&lt;br /&gt;तखन बुझना मे आयल&lt;br /&gt;इ त’ स्वागत करैत&lt;br /&gt;नव बरखक बोल छल&lt;br /&gt;केओ नव वसन मे चमकैत&lt;br /&gt;केओ मदिरा सँ बहकैत&lt;br /&gt;त’ केओ सुन्दरी संग नाचैत&lt;br /&gt;ओहि मोहल्ला मे एकटा घर एहनो छल&lt;br /&gt;जतहि ने कोनो शोर छल&lt;br /&gt;नहि कोनो अनघोल छ्ल&lt;br /&gt;आइयो ओकर चूल्हि छल मिझायल&lt;br /&gt;पेट जेना पीठ मे धँसल&lt;br /&gt;छलहुँ हम अपना सँ पुछि रहल&lt;br /&gt;की ओकरा लेल नव बरखक कोनो मोल छल?&lt;div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="color:#330000;"&gt;-कुन्दन कुमार मल्लिक,  बेंगलुरु (कर्नाटक), सम्पर्क- +91-97390 04970&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-5075577053346459838?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/5075577053346459838/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=5075577053346459838' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/5075577053346459838'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/5075577053346459838'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2009/06/blog-post_23.html' title='नव बरखक बहाने-  कुन्दन कुमार मल्लिक'/><author><name>कुन्दन कुमार मल्लिक</name><uri>http://www.blogger.com/profile/03699865603391260097</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_-9ADAG7dVhY/ScCiR0H28RI/AAAAAAAAAMY/UhqVSNtVezc/S220/kkkkkkkkkk.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-911489984880118066</id><published>2009-06-16T10:09:00.001+05:30</published><updated>2009-06-16T10:14:01.097+05:30</updated><title type='text'>गोली-बन्दूक थोडे बुझैत छैक</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(153, 0, 0);"&gt;- करण समस्तीपुरी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;"छौंरी पतरकी गे........  गोरिया खेतबा के आरी.... काहे मारे गजब पिहकारी....  !!" गोर दक-दक भरल-पुरल शरीर, माथ पर जटा, हाथ मे डिबिया लेने आ तोतर आवाज मे इएह गीत के तान छोडैत घर से बथान पर जाएत जटा झा के प्रति पता नहि कोना हमरा मोन मे लगाव उत्पन्न भए गेल. जटा झा के वयस हमरा से इएह कोनो सात-आठ साल बेसी रहल होयतन्हि आ हुनक घर से बथानक बाट मे हम्मर घर एखनहु अवस्थित अछि. ओना त’ जटा झा के ई विशेषता छैन्ह जे ओ कखनो अप्पन मुंह बंद कए नहि चलैत छथि. भन्ने आवाज मे तोतर लागौक मुदा गीत के तान नहि मद्धिम होअ' देता. नित्य सांझ के दूर से आबैत जटा झा के छौंरी पतरकी.... के अलाप सुनैते हम अप्पन दलान पर चलि आबि आ आँखि से ओझर भेला उपरांतो हुनक सुर-लहरी ओही ठाम ठार भए सुनय के प्रयास करैत रहैत छलहुँ. धीरे धीरे समय बदलैत गेल, गीत बदलैत गेल मुदा जटा झा के अंदाज नहि बदलल. हाँ, हुनक माथक जटाक जगह कटिनगर केश लए लेलक, डिबियाक जगह हाथ मे लालटेन आबि गेल, गोरकी पतरकी के जगह गोरी है कलाइयाँ आ छत पे सोया था बहनोई आबि गेल मुदा जटा झाक ठेठी मे कोनो परिवर्तन नहि ! कालांतर मे वर्ग-प्रोन्नति परीक्षा मे बराबर फेल होएत-होएत जटा झा सतमा क्लास मे हम्मर सहपाठी बनि गेलथि.  फेर त’ नियम सँ प्रातः दस बजे स्कूल जाए लेल बजाबो खातिर नित्य प्रति हमरा ओही ठाम आबि जाथि आ तेकर बाद दुन्नु गोटे साथे स्कूल जाई आ आबि ! स्कूलक परीक्षा मे जटा झा केँ हम्मर कॉपी देखि क’ लिखय के पूर्ण छूट छलन्हिये, अप्पन प्रश्न-पत्र के निपटा हम स्वयं अप्पन हाथ सँ सेहो हुनक कॉपी मे लिखी दियैक. तैं जटा झा सतमा सँ ल’ क’ नवमा क्लास धरि बेरोक-टोक पास होएत चलि गेलाह. शिक्षक-वृन्द सेहो जटा झाक सफलताक रहस्य सँ अनभिज्ञ नहि छलाह ! खैर पढाई लिखाई के गोली मारू आ सुनु एक गोट मजेदार गप्प !&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बात अछि जखन हम सभ नवमा क्लास मे छलहुँ ! दशहरा मे गाम मे नाटकक आयोजन भेल छल. जटा झा ओरे सौं गीत-नाटक के अंध प्रेमी छलाह ! साओनक झूला मे मंदिर पर होमय वाला नाटक मे तेरहों राति जाइथ. राजा भरथरी स’ ल’ के सुल्ताना डाकू धरि कतेको नाटक के संवाद हुनका मुंह-जवानी रटल छलन्हि. आ जखन अप्पन तोतराह बोली मे ओ संवाद के भाव आ अभिनय के साथ बाजब शुरू भए जाथि त’ केहन सँ केहन गंभीर व्यक्ति के हंसी छुटी जाइक ! तखन दशमी मे नाटक के बात सुनि जटा झाक ख़ुशीक ठेकान नहि रहल. चट पता केलथि जे नाटकक आयोजक आ निर्देशक के छथि आ फट अप्पन अभिनय क्षमता के परिचय दए नाटक मे पाट प्राप्त करय के जोगार मे भीर गेलाह. निर्देशक महोदय सेहो सोचलाह कि जटा झा त' स्वयं जीवंत कॉमेडी छथि त' किए नहि कुनो सीन मे हिनक स्टेज पर चढा के दर्शक के गुदगुदैल जाय ! मुदा जटा झा के कहब जे बिना लिखल संवाद भेंटने हम अभिनय कोना करब ? से हुनका एक गोट कागज़ पर चारि लाइन लिख के देल गेल जे इएह थीक अहांक संवाद ! फेर जटा झा ओकरा मोन लगा के रटय लगलथि ! आ रोज राति मे ओकर रिहर्सल करए लेल ससमय निश्चित स्थान पर पहुँचि जाइथ. एहि तरहे नाटकक राति सेहो आबि गेल. आई जटा झाक जनम भरि सँ संचित अभिलाषा पूरय बला छलैन्ह. बेचारे सांझ मे भगवती के प्रणाम क’ अप्पन सफलता के कामना कय नाटक स्थल पर पहुँचि गेलाह ! झट द' एस्नो पावडर पोतवा के तैय्यारो भ' गेल्लाह. आब इंतिजार छलैन्ह त ओहि दृश्य के जाहि मे स्टेज पर हुनक एंट्री छलैन्ह. ओना जटा झा अप्पन प्रदर्शन के प्रति पूर्ण आश्वस्त छलाह. देखैत देखैत ओ दृश्य सेहो आबि गेल. डाकू सुरजन सिंह ओहि मार्ग स’ जाए बला सभ लोक के लुटी रहल छल. जे दिअ' मे आना-कानी कराए तेकरा खूब कए मारि रहल छल. टखने जटा झाक जोरदार एंट्री भेल.&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;डाकू सुरजन सिंह : अरे कौन है ? मालुम नहीं इस रास्ते से जो भी जाता है वो पहले सुरजन सिंह को चढाबा चढाता है !&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;जटा झा : अरे ! मारुम त' है ! मगर आपको मारुम नहीं कि हम त गरीब ब्रह्मण हूँ ! पूजता हूँ त' खाता हूँ नै त भुखरे सो जाता हूँ !!&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;डाकू : अरे बदजात ! सुरजन सिंह से जवान चलाता है ! चल जो भी है रख इधर !&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;जटा झा : भए हमरा पास त' एहे एगो पोथी आ एगो रोतकी (लोटकी) है. लो, अगर एहे र’ के आपका पेट भर जाए त' ख़ुशी से रे रो ! रेकिन याद रखो एगो गरीब बाभन का करपाना तुमको पड़ेगा !!&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;डाकू : अरे मुर्ख ! तुम्हारी आह तो मुझे बाद मे लगेगी ! ले पहले मेरी बन्दूक की आह संभाल !&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;एते कहि सुरजन सिंह अप्पन डाँर मे खोसल बन्दूक खींचि जटा झा पर तानि देलक.&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बेचारे जटा झा लागलथि चिचिआबय. आ ले लूत्ती ! आब देखाला ना ताब फटाक स’ स्टेज सँ कुदि पडलथि.  बेचारेक पैर माइक के तार मे ओझारयल आ झाजी अगिला पांतिक दर्शक सभक बीच मे धराम स’ खसलथि ! लोक सभ त’ हँसैत हँसैत पेट पकडि लेलक आ एम्हर जटा झा लोर-झोरे भरल लगलथि आयोजक आ निर्देशक कें गरियाबे ! लोक पुछलकन्हि जे एना किए केलियैक त' बेचारे कनैत-कनैत कहलाह जे देखलियैक नहि ओ बुरि डकुबा के केना फट द' बन्दूक तानि देरकै से .... ! ई त' जानि के हमरा अहाँ सभ फांसी पर चढेलहुँ ! एखन जौं स्टेज स’ कुदि के जान नहि बचाबितौंह त' सार गोरिये ने मारि देत रहे..... लोक सभ कहलकन्हि जे जाऊ पंडी जी, ई त ड्रामा ने छैक. मुदा जटा झाक तर्क सेहो कुनो कमजोर नहि छल. कहलाह जे ई त हम अहाँ ने बुझई छि़यैक जे ई ड्रामा छैक. जौं ओ सार डाकुबो ई बात बुझितैक तहन बन्दूक थोड़े निकालितई... आ कनेक देर ले मानि लेल जाऊ जे ओहो बुझि जेत्तैक जे ड्रामा छैक मुदा गोली बन्दूक बुझई छैक जे ई ड्रामा छैक ?? एखन जौं गोली छूटि जैतै तहन त' हम्मर प्राण गेल्ले छल....&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हा..... हा....... हा ....... हा........... हा.........&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;जटा झा के ई जवाब पर तेहन ठहक्का बजरल जे नाटक मे मशगूल पात्र आ दर्शक सभ चौंक उठलाह ! लोक सभ हँसैत हँसैत कहे लागल कि जटा झा भारी बुरि छथि. मुदा हम आई सोचै छी जे गामक बुरिबक जटा झा के सेहो ई गप्प बुझल छलैन्ह जे गोली बन्दूक नाटक आ खेल नहि बुझैत छैक... काश ई बात आई देश, प्रान्त, भाषा जाति आ धरमक नाम पर खूनक होरी खेलय बला आतंकवादी आ अत्याचारी सेहो बुझैत जे गोली बन्दूक अप्पन पराया नहि बुझैत छैक तहन फेर बाते कि... काश ई बात जौं ई व्याभिचार के प्रश्रय दिअ' बला धर्म आ समाजक ठेकेदार तथाकथित नेता लोकनि बुझि जैतैथ तहन त' धरतीये स्वर्ग भए जाएत...  मुदा ई सभ जटा झा जेकाँ बुरिबक थोड़े छैथ कि हिनका पता रहतन्हि जे गोली बन्दूक किछु नहि बुझैत छैक.......... आ पाठक लोकनि ! एक बात सुनि लिअ' ! ई गप्प पढ़ी अहाँ सभ हमरा पर गोली बन्दूक नहि तानब... किए त हम अहाँ बुझई छिईक मजाक मुदा गोली बन्दूक थोड़े बुझैत छैक !!&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-911489984880118066?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/911489984880118066/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=911489984880118066' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/911489984880118066'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/911489984880118066'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2009/06/blog-post.html' title='गोली-बन्दूक थोडे बुझैत छैक'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-2234822294177526005</id><published>2009-05-30T13:19:00.004+05:30</published><updated>2009-05-30T13:43:09.764+05:30</updated><title type='text'>दू गोट मलयालम कविता</title><content type='html'>&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(153, 0, 0);"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style=""&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-weight: bold; "&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style=" ;font-size:large;"&gt;1. &lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="text-decoration: underline; font-size:large;"&gt;हम लिखि रहल छी&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाट पर खसल मोरक ओस पर&lt;br /&gt;हम लिखि रहल छी, तोहर नाम&lt;br /&gt;&lt;div style="BORDER-TOP: #5c8a64 5px solid; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 5px; MARGIN: 12px; WIDTH: 200px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 5px; BORDER-BOTTOM: #5c8a64 5px solid; TEXT-ALIGN: center"&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;मूल कवि- श्री के. सच्चिदानन्दन,&lt;br /&gt;मैथिली अनुवाद- श्री सुभाष चन्द्र &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;जेना, पहिनहुँ कोनो कवि&lt;br /&gt;लिखने छल नाम- स्वतंत्रता केँ&lt;br /&gt;हरेक वस्तु पर।&lt;br /&gt;तोहर नाम लिखय लागी त'&lt;br /&gt;मिटेनाय कठिन भ' जेतय&lt;br /&gt;धरती आ आकाश पर&lt;br /&gt;क्रान्तिक संग&lt;br /&gt;प्रेमक लेल सेहो स्थान छै&lt;br /&gt;&lt;div style="BORDER-TOP: #5c8a64 5px solid; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 5px; MARGIN: 12px; WIDTH: 200px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 5px; BORDER-BOTTOM: #5c8a64 5px solid; TEXT-ALIGN: center"&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="font-weight:;"&gt;मलयालम कें प्रख्यात कवि के.सच्चिदानंदनक कविता कें पंजाबी में अनुवाद डा. बनीता कएलीह,जे ‘‘पीले पत्ता का सपना’’शीर्षक सँ पुस्तक रूप में साहित्य आकादमी, दिल्ली द्वारा वर्ष 2003 में प्रकाशित भेल। ई कविता एहि पंजाबी कविता संग्रह सँ लेल गेल अछि, जकर पंजाबी सँ हिन्दी अनुवाद "सुभाष नीरव" कएलाह। मैथिली में कविताक अनुवाद हिन्दी सँ कएल गेल। श्री. सच्चिदानंदन साहित्य अकादमी कें सचिव रहि चुकल छथि आ हिनक बहुत रास कविताक अनुवाद भारत आ विश्वक कतेको भाषा में भ' चुकल अछि।&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;तोहर नामक सजौट पर&lt;br /&gt;सूति रहल ही हम&lt;br /&gt;तोहर नामक चहचहाटक संग&lt;br /&gt;जागैत छी हम&lt;br /&gt;जतय-जतय हम स्पर्श करैत छी-&lt;br /&gt;उभरैत अछि तोहर नाम&lt;br /&gt;झटैत पात कें घसमैल रंग पर&lt;br /&gt;पुरान गुफाक स्याह दीवार पर&lt;br /&gt;कसाईक दोकान कें केवाड़ पर&lt;br /&gt;भीजल रंग पर&lt;br /&gt;नबका स् पर&lt;br /&gt;चांदनी के फड़फाइत पाँखि पर&lt;br /&gt;कॉफी आ नून पर&lt;br /&gt;घोड़ाक नाल पर&lt;br /&gt;नर्तकी केँ मुद्रा पर&lt;br /&gt;मधु औ विष पर&lt;br /&gt;नींद पर, रेत पर, जड़ि पर&lt;br /&gt;फाँसीक तखत पर&lt;br /&gt;मुर्दाघर के सर्द जमीन पर&lt;br /&gt;“मसान-शिला के चिक्कैन पीढ पर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(102, 0, 0);"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-size:large;"&gt;2. &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="text-decoration: underline;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-weight: bold;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: rgb(102, 0, 0);"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-size:large;"&gt;हमरा कि बूझ&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम दूनू बच्चा छीं&lt;br /&gt;जे माय-बापक खेल बेल रहल छी-&lt;br /&gt;जानैत नहि छी- आलिंगनक अर्थ&lt;br /&gt;हमरा कि बूझल चुम्माक विद्युतमयी प्रवाह&lt;br /&gt;बस, एहिना स्पर्श कय लैत छी&lt;br /&gt;किछु पात...&lt;br /&gt;किछु फूल...&lt;br /&gt;किछु फल...&lt;br /&gt;बड्ड ममतांक संग निहारैत अछि प्रकृति हमरा&lt;br /&gt;जिनगी में ठसाठस मरल&lt;br /&gt;वं”ा- तृ’णा कें&lt;br /&gt;मद्धिम लौ कें&lt;br /&gt;अमर होबाक एहि&lt;br /&gt;अर्थहीन इच्छा में&lt;br /&gt;सुनू....&lt;br /&gt;राति आँगन में दौडै़त चलि जा रहल अछि।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-2234822294177526005?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/2234822294177526005/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=2234822294177526005' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/2234822294177526005'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/2234822294177526005'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2009/05/blog-post_30.html' title='दू गोट मलयालम कविता'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-5056706859180548526</id><published>2009-05-21T21:14:00.002+05:30</published><updated>2009-05-21T21:18:23.828+05:30</updated><title type='text'>बाढि पर एक कवि-   डॉ. गंगेश गुंजन</title><content type='html'>"दु:खे टा चारु कात छै आ जी रहल- ए लोक&lt;br /&gt;ताकैत आसरा कोनो दुःख पी रहल- ए लोक !&lt;br /&gt;घर-द्वारि दहि गेलैक सब बच्चा टा छै बांचल&lt;br /&gt;रेलवेक कात, बाट-घाट जी रहल- ए लोक !&lt;br /&gt;सांझो भरिक खोराक ने छैक अगिला फसलि धरि&lt;br /&gt;जीबा लए ई लाचार कोना जी रहल- ए लोक !&lt;br /&gt;&lt;div style="BORDER-TOP: #5c8a64 5px solid; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 5px; MARGIN: 12px; WIDTH: 200px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 5px; BORDER-BOTTOM: #5c8a64 5px solid; TEXT-ALIGN: center"&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कवि- डॉ. गंगेश गुंजन,&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;74- डी, कंचनजंघा अपार्टमेंट,&lt;br /&gt;सेक्टर- 53, नोएडा- 201 301&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;सबटा गमा क' जान बचा आबि त' गेलय&lt;br /&gt;आब फेकल छुतहर जेकाँ हद जी रहल- ए लोक !&lt;br /&gt;जले पहिरना, बिछाओन जले छैक ओढना&lt;br /&gt;जबकल गन्हाइत पानि-ए खा पी रहल - ए लोक !&lt;br /&gt;सब बर्ष जकां एहि बाढि मे कारप्रदार&lt;br /&gt;रिलीफ नामें अपन झोरी सी रहल किछु लोक !&lt;br /&gt;चलि तँ पडल- ए जीप- ट्रक - नावक से तामझाम&lt;br /&gt;आब ताही आसरा मे बस जी रहल- ए लोक !&lt;br /&gt;कहि तं गेलाह- ए परसू- ए दस टन बंटत अन्न&lt;br /&gt;एखबार- रेडियो भरोसी जी रहल- ए लोक !&lt;br /&gt;घोखै तँ छथि देश मे पर्याप्त अछि अनाज&lt;br /&gt;सडओ गोदाम मे, उपास जी रहल- ए लोक !&lt;br /&gt;उमेद मे जे आब आओत एन जी ओ कतोक&lt;br /&gt;द' जायत बासी रोटी, वस्त्र, जी रहल- ए लोक !&lt;br /&gt;अछि कठिन केहन समय ई राक्षस जकाँ अन्हार&lt;br /&gt;किछु भ' रहल अछि तय , तेँ त' जी रहल- ए लोक !&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-5056706859180548526?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/5056706859180548526/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=5056706859180548526' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/5056706859180548526'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/5056706859180548526'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2009/05/blog-post_21.html' title='बाढि पर एक कवि-   डॉ. गंगेश गुंजन'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-6306545162212716988</id><published>2009-05-13T20:31:00.002+05:30</published><updated>2009-05-13T20:35:52.072+05:30</updated><title type='text'>दर्पण- श्री सतीश चन्द्र झा</title><content type='html'>अछि दर्पण टांगल देबाल पर&lt;br /&gt;देखि लेब किछु क्षणिक ठहरि क'।&lt;br /&gt;करब कर्म जे अपन दिन भरि&lt;br /&gt;आयत मुख पर भाव उतरि क' ।&lt;br /&gt;बनतै नहि प्रतिबिम्ब झूठ के&lt;br /&gt;उचित कर्म सँ छिटकत आभा।&lt;br /&gt;&lt;div style="BORDER-TOP: #5c8a64 5px solid; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 5px; MARGIN: 12px; WIDTH: 200px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 5px; BORDER-BOTTOM: #5c8a64 5px solid; TEXT-ALIGN: center"&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कवि- श्री सतीश चन्द्र झा&lt;/span&gt;, व्याख्याता, दर्शन शास्त्र, मिथिला जनता इंटर कॉलेज, मधुबनी&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;अनुचित करब मोन किछु टोकत&lt;br /&gt;विकृत बनत मुँहक शोभा ।&lt;br /&gt;जहिया बैसब असगर कहियो&lt;br /&gt;करब जीवनक लेखा-जोखा।&lt;br /&gt;झहरत बूँद आँखि सँ ढप-ढप&lt;br /&gt;रंगहीन लागत जग धोखा ।&lt;br /&gt;छै बताह इ अहं मोन के&lt;br /&gt;जौं जागत नहि सूतत कहियो।&lt;br /&gt;बाँधि लिअ सामर्थ्य हुअए त'&lt;br /&gt;भरि मुठ्ठी बालू के कहियो।&lt;br /&gt;करब अपार अर्थ धन संचय&lt;br /&gt;संस्कार नहि उपजत धन सँ ।&lt;br /&gt;बिलहि देत संतानक भविष्य&lt;br /&gt;दुख-सुख सबटा भोगब तन सँ।&lt;br /&gt;चलू ताकि क' आबू कखनो&lt;br /&gt;अछि धरती जे पैरक नीचाँ।&lt;br /&gt;देखियौ सुन्दर कतेक लागै छै&lt;br /&gt;ओस दूभि पर जेना गलैचाँ ।&lt;br /&gt;आसमान अछि दूर एतय सँ&lt;br /&gt;नहि देखू अछि मात्र कल्पना ।&lt;br /&gt;लागत चोट पैर मे कहियो&lt;br /&gt;जीबू जे अछि ल' क' अपना।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-6306545162212716988?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/6306545162212716988/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=6306545162212716988' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/6306545162212716988'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/6306545162212716988'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2009/05/blog-post_13.html' title='दर्पण- श्री सतीश चन्द्र झा'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-4320727415707371816</id><published>2009-05-07T20:53:00.001+05:30</published><updated>2009-07-08T10:47:51.497+05:30</updated><title type='text'>दुविधा- श्री संतोष कुमार मिश्र</title><content type='html'>असगर मे बैसिक'&lt;br /&gt;अपनापर बिचारै छलहुँ&lt;br /&gt;अप्पन भावना के हेराक'&lt;br /&gt;अनुभव के डुबाक'&lt;br /&gt;हम बड सोचलहुँ&lt;br /&gt;&lt;div style="BORDER-TOP: #5c8a64 5px solid; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 5px; MARGIN: 12px; WIDTH: 200px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 5px; BORDER-BOTTOM: #5c8a64 5px solid; TEXT-ALIGN: center"&gt; &lt;p&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;img alt="Santosh Kumar Mishra" src="http://maithili.editor.googlepages.com/SantoshMishra.jpg" width="90" align="right" /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कवि- श्री संतोष कुमार मिश्र&lt;/span&gt;। जनकपुर (नेपाल) निवासी श्री संतोष कुमार मिश्र जी काठमाण्डू (नेपाल) मे एकटा बहुराष्ट्रीय कम्पनी मे अधिकारी छथि। मैथिली साहित्य सँ विशेष लगाव आ मैथिली मे एखन धरि &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;“पोसपूत" आ "उदास मोन” (कथा संग्रह), एना (आईना) (सम्पादित कविता संग्रह) प्रकाशित आ एखन एकटा कविता संग्रह "एना किए"&lt;/span&gt; प्रकाशनाधीन छन्हि। सम्पर्क- 00977-98510-11940 (मोबाइल) &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;जे हमरा मे तीव्रता के कमी अछि&lt;br /&gt;हमरा निश्चय भ' गेल&lt;br /&gt;जे हम बड सोचलहुँ&lt;br /&gt;जे हम अहाँक प्रेमक लागक नहि छी&lt;br /&gt;मुदा ई भइयो नहि सकैए की&lt;br /&gt;अहाँके पहिल बेर देखिक'&lt;br /&gt;हमरा मोन मे व्याकुलता आएल&lt;br /&gt;जाहिके हम वर्णन नहि क' सकैत छी&lt;br /&gt;दोसर बेर भेट होइते&lt;br /&gt;हम अहाँ सँ परिचित भेलहुँ&lt;br /&gt;ताहिके बाद अहाँ लग रहबाक&lt;br /&gt;इच्छा हमरा मे जागल&lt;br /&gt;अहाँक संग जे हमर&lt;br /&gt;भावनात्मक सम्बन्ध रहय&lt;br /&gt;से बड उपद्रवी रहय&lt;br /&gt;ते हम बीतल भरि राति&lt;br /&gt;भगवान सँ प्रार्थना करैत&lt;br /&gt;हम बड सोचलहुँ&lt;br /&gt;जाहि सँ हम सभ्य भ' गेलहुँ&lt;br /&gt;ई बात हमरा बुझ' मे चलि आयल छल&lt;br /&gt;जे हम नियंत्रण मे नहि छी&lt;br /&gt;आ अपन नियंत्रण गुमा रहल छी&lt;br /&gt;हम समय के पकड' चाहलहुँ&lt;br /&gt;मुदा हमर भावना समय के छोडि देलक&lt;br /&gt;पहिने हम प्रेम मे परलहुँ&lt;br /&gt;आ बाद मे बुझलहुँ&lt;br /&gt;ई एक सामाजिक अपराध छैक ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-4320727415707371816?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/4320727415707371816/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=4320727415707371816' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/4320727415707371816'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/4320727415707371816'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2009/05/blog-post_07.html' title='दुविधा- श्री संतोष कुमार मिश्र'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-3392792736937804252</id><published>2009-05-03T20:44:00.002+05:30</published><updated>2009-05-03T20:52:18.503+05:30</updated><title type='text'>कोशीक ताण्डव- डॉ. (प्रो.) अशोक सिंह तोमर</title><content type='html'>&lt;p&gt;यौ भाय! कहाँ छै न्याय हमरा लेल?&lt;br /&gt;कहाँ छै देवी आ देवता?&lt;br /&gt;निबर आ दुबर केँ देखनिहार&lt;br /&gt;ओकर दुःख आ व्यथा सुननिहार&lt;br /&gt;कियो नहि अछि।&lt;br /&gt;पचास बरखक बाद&lt;br /&gt;कोशीमाय अपन पुरना मार्ग सँ&lt;br /&gt;उठैत-बजरैत&lt;br /&gt;जल प्रलयक महाताण्डव सँ&lt;br /&gt;गामक-गाम  विलीन कs देलकैत।&lt;br /&gt;कियो नहि बचि सकलैक&lt;br /&gt;जे कियो बचलहुँ&lt;br /&gt;तकरा भोजनक कोन गप्प&lt;br /&gt;पानी नसीब नहि भ’ सकल।&lt;br /&gt;एहि राष्ट्रीय आपदा मे&lt;br /&gt;सभ दिस सँ&lt;br /&gt;सरकारी- गैर सरकारी संस्था&lt;br /&gt;मदति कर’ लागल&lt;br /&gt;मुदा नेताक चमचा आ&lt;br /&gt;कलिकालक उद्दण्ड लोक सँ&lt;br /&gt;नहि बचि सकलहुँ&lt;br /&gt;प्राकृतिक प्रलयंकारी लीला मे&lt;br /&gt;ओकरा सभ केँ&lt;br /&gt;कनियो टा दरेक नहि रहलैक&lt;br /&gt;वस्त्र आ राशन-पानीक कोन गप्प&lt;br /&gt;जुआनी देह केँ नहि बकसलकैक।&lt;br /&gt;ककरा कहबै&lt;br /&gt;के सुनतैय बाढि पीडीतक एहि पीडा केँ।&lt;br /&gt;नोर सँ कथ्य-कथा ओर सँ&lt;br /&gt;व्यक्त व्यथा&lt;br /&gt;हम शब्दहि मे कहि सकैत छी।&lt;br /&gt;एहि सँ नीक तँ&lt;br /&gt;ओ सभ छल&lt;br /&gt;जकरा कोशीमाय&lt;br /&gt;अपना मे समा लेलकैक।&lt;/p&gt;&lt;p&gt; &lt;/p&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;p&gt;नाम    : डॉ. (प्रो.) अशोक कुमार सिंह&lt;br /&gt;साहित्यिक&lt;br /&gt;नाम   : डॉ. (प्रो.) अशोक सिंह&lt;br /&gt;‘तोमर’&lt;br /&gt;जन्म    : 05 जनवरी, 1959&lt;br /&gt;ई.&lt;br /&gt;जन्मस्थान   : बारा (मधेपुरा जिला), बिहार&lt;br /&gt;स्थायी&lt;br /&gt;पता   : ग्राम+पो.- खुटहा, भाया- मेरीगंज, थाना-&lt;br /&gt;भरगामा,&lt;br /&gt;                 &lt;br /&gt;जिला- अररिया (बिहार)&lt;br /&gt;वर्त्तमान एवं पत्राचार पता : भैरव भवन, तोमर निवास,&lt;br /&gt;विद्यापति नगर,&lt;br /&gt;सहरसा (बिहार), पिन- 852 201,&lt;br /&gt;दूरभाष : 06478-&lt;br /&gt;226533 एवं 098354 63061&lt;br /&gt;सम्प्रति कार्यरत : व्याख्याता, मैथिली विभाग,&lt;br /&gt;सर्व ना. सिंह राम कुमार सिंह&lt;br /&gt;महाविद्यालय, सहरसा।&lt;br /&gt;शिक्षा :&lt;br /&gt;मैट्रीक 1977, आई.ए. 1979, बी.ए. प्रतिष्ठा (मैथिली) 1981,&lt;br /&gt;एम.ए. 1983&lt;br /&gt;(57.50%), पी-एच.डी.- 15 फरवरी, 1992&lt;br /&gt;लेखन भाषा : मैथिली एवं&lt;br /&gt;हिन्दी&lt;br /&gt;लेखन विधा : कविता, कथा, एकांकी, उपन्यास, निबन्ध,&lt;br /&gt;आलोचना।&lt;br /&gt;मैथिली मे प्रकाशित पोथी : ‘कोशी परिसर मे साहित्य साधना (मार्च&lt;br /&gt;2003, अनुसन्धान एवं आलोचना), कविता- ‘पाँखि काटल पडवा’- वैदेही पत्रिका (अप्रैल,&lt;br /&gt;1991), ‘सत्ताक स्वार्थ मे देशक हाल’- वैदेही (जून, 1996) ‘उजडल जिन्दगी’-&lt;br /&gt;मिथि-मालिनी, भागलपुरक 2004 अंक।&lt;br /&gt;आलोचना : ‘सहरसा जिलाक मैथिली साहित्य ओ&lt;br /&gt;साहित्यकार’&lt;br /&gt;वैदेही, दरभंगा सँ जुलाई 1992 अंक, अखिल भारतीय साहित्य परिषद्,&lt;br /&gt;स्मारिका (रेत के रसगीत में विभिन्न कविता प्रकाशित), ‘कोशीक साहित्यिक संस्कृति’-&lt;br /&gt;‘सूत्रधार’ पत्रिका-2002 मे प्रकाशित।&lt;br /&gt;हिन्दी मे प्रकाशित कविता : ‘बिन सत&lt;br /&gt;गुरु नहीं दिव्य-दृष्टि’- साहित्य सृजन (दिसम्बर, 2004), ‘मेरा परिचय’- ‘शुभकामना’&lt;br /&gt;पत्रिका 2003 मे प्रकाशित, ‘असली गाँधी’- रेत के रसगीत स्मारिका- 2002&lt;br /&gt;अंक।&lt;br /&gt;प्रकाशन के प्रतीक्षा मे : प्रस्तुत पुस्तक ‘कोशी परिसर में साहित्य&lt;br /&gt;साधना'क दोसर भाग।&lt;br /&gt;कथा संग्रह : ‘नोरक भाषा’&lt;br /&gt;उपन्यास : ‘प्रेम&lt;br /&gt;परीक्षा’, ‘प्रत्यक्षम् किम प्रमाणम्’&lt;br /&gt;पुनश्चर्या में दू बेर भाग लेलथि&lt;br /&gt;(दरभंगा)&lt;br /&gt;1. 28 फरवरी, 1997 से 20 मार्च 1997 तक&lt;br /&gt;2. 05 जनवरी, 1999 से 25&lt;br /&gt;जनवरी 1999 तक।&lt;br /&gt;सम्मान : अखिल भारतीय साहित्य परिषद् द्वारा ‘भारतीय&lt;br /&gt;साहित्य सम्मान’- 2004, ‘महादेवी वर्मा’ साहित्य सम्मान सँ सम्मानित।&lt;/p&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-3392792736937804252?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/3392792736937804252/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=3392792736937804252' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/3392792736937804252'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/3392792736937804252'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2009/05/blog-post.html' title='कोशीक ताण्डव- डॉ. (प्रो.) अशोक सिंह तोमर'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-8252432669440380608</id><published>2009-04-30T13:07:00.003+05:30</published><updated>2009-04-30T13:07:00.359+05:30</updated><title type='text'>विस्थापित</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_xd1j00Yk1I0/SeGd_lm1D-I/AAAAAAAAABg/xfcsiT_wnr8/s1600-h/kamini.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5323709950280929250" style="margin: 0px 0px 10px 10px; float: right; width: 202px; height: 179px;" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_xd1j00Yk1I0/SeGd_lm1D-I/AAAAAAAAABg/xfcsiT_wnr8/s320/kamini.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;कवियत्री- सुश्री कामिनी कमायनी&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;बड्ड दिन भेलए&lt;br /&gt;देस कोस सँ दूर,&lt;br /&gt;मोन जेना भसिआएल बूढ़ सन&lt;br /&gt;हेराए गेलए,&lt;br /&gt;किओ ककरो कल्लोल कए&lt;br /&gt;कि गाम मोन पड़ल,&lt;br /&gt;मुदा कोन गाम&lt;br /&gt;ठाम की,&lt;br /&gt;कतेको गाम आ शहरि मे भटकैत दिन,&lt;br /&gt;एक दिन उदास पुछैत चित सँ,&lt;br /&gt;जन सँ कि वित्त सँ,&lt;br /&gt;पूर्ण भेल रिक्त की&lt;br /&gt;लज्जा विहीन मोन&lt;br /&gt;शँकित तमसाएल,&lt;br /&gt;पदार्थ, दर्शन व&lt;br /&gt;उतरल ओझराएल मोन,&lt;br /&gt;आँखि सँ फुटैत अछि शोणित के धार,&lt;br /&gt;जुग जुग के विस्थापित हम&lt;br /&gt;फिरैत छी बोने बोन&lt;br /&gt;मनुक्ख’क बोन वा कि तृष्णा’क बोन॥&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-8252432669440380608?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/8252432669440380608/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=8252432669440380608' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/8252432669440380608'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/8252432669440380608'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2009/04/blog-post_30.html' title='विस्थापित'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_xd1j00Yk1I0/SeGd_lm1D-I/AAAAAAAAABg/xfcsiT_wnr8/s72-c/kamini.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-1008890717297216005</id><published>2009-04-28T21:01:00.002+05:30</published><updated>2009-04-28T21:15:54.027+05:30</updated><title type='text'>मिथिला दर्शन</title><content type='html'>&lt;span class="Apple-style-span"  style="border-collapse: collapse;  font-family:arial;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span"  style="font-size:medium;"&gt;&lt;div style="text-align: right;"&gt;कवि- शिवेश झा "शिव"&lt;/div&gt;हकासल छी पियासल छी &lt;br /&gt;मिथिला दर्शन के आशल छी!&lt;br /&gt;मदारी छी भिखारी छी &lt;br /&gt;मिथिला दर्शन लेल पागल छी!!&lt;br /&gt;&lt;div style="BORDER-TOP: #5c8a64 5px solid; FLOAT: right; PADDING-BOTTOM: 5px; MARGIN: 12px; WIDTH: 200px; LINE-HEIGHT: 100%; PADDING-TOP: 5px; BORDER-BOTTOM: #5c8a64 5px solid; TEXT-ALIGN: center"&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span style="font-size:85%;"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;कवि- शिवेश झा "शिव"&lt;/span&gt;.&lt;br /&gt;मधुबनी जिलाक राघोपुर बलाट गामक निवासी श्री भोला झाक सुपुत्र 21 वर्षीय शिवेश जी दिल्ली सँ मल्टीमीडीयाक अध्ययनक संग मैथिली साहित्य मे सेहो प्रयासरत छथि। एहि अल्पवयस मे हुनक लिखल किछु नाटकक मंचन सेहो भ' चुकल अछि. एहि मंच पर इ हुनक पहिल प्रस्तुति अछि.&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखब पावन सीता केर धाम&lt;br /&gt;तहन जायब विद्यापति गाम&lt;br /&gt;चरण रखबा स पहिनहि हम &lt;br /&gt;माथ माटी में साटब &lt;br /&gt;जतय आयल छला शंकर &lt;br /&gt;बनय विद्यापति के चाकर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किछु दूर और जायब हम&lt;br /&gt;जायब उच्चैठ देवी हम &lt;br /&gt;जतय कालीदास के देवी &lt;br /&gt;वरदान दय विलीन भेली &lt;br /&gt;पूजब हुनकर ओही प्रतिमा के &lt;br /&gt;करब सुमिरन ओही महिमा के &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखब वाचस्पति नगरी के&lt;br /&gt;करब गुणगान पगरी के &lt;br /&gt;जतय के रीति अछि सबदीन &lt;br /&gt;"साग खाई बरु जीबन काटब &lt;br /&gt;नई झुक देब पगरी के&lt;br /&gt;अतिथि देवो भव हम सबदीन&lt;br /&gt;जपिते रहब अई कथनी के"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हकार कोजगरा के पूरब &lt;br /&gt;पान मखान लए क घुरब&lt;br /&gt;सामा चकेबा चौठी चंदा &lt;br /&gt;ब्रत करब हम छैठ के&lt;br /&gt;सप्ता बिप्ताक कथा सुनि क &lt;br /&gt;ध्यान करब गुरुदेब के &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जायब राघोपुर एक बेर हम &lt;br /&gt;करब दर्शन ओहि धरती के&lt;br /&gt;जतय विद्याधर जनम लेला&lt;br /&gt;जिनक कामेश्वर सिंह छला चेला &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखब मिथिला केर पेंटिंग &lt;br /&gt;जकर गुणगान चाहू दिश&lt;br /&gt;जखन घुरी आबय लगाब हम &lt;br /&gt;एक टुक माटिक लायब संग&lt;br /&gt;नित उठी माथ स साटब&lt;br /&gt;करब सुमिरण ओहि मिथिला के &lt;br /&gt;विसरब ने मिथिला दर्शन के&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;-
-
जौं अहाँ एहि ब्लॉग पर लिखय के इच्छुक छी त' editor@vidyapati.org पर मेल लिखु।&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/15885037-1008890717297216005?l=www.vidyapati.org' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://www.vidyapati.org/feeds/1008890717297216005/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=15885037&amp;postID=1008890717297216005' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/1008890717297216005'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/15885037/posts/default/1008890717297216005'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://www.vidyapati.org/2009/04/blog-post_28.html' title='मिथिला दर्शन'/><author><name>सम्पादक: कतेक रास बात</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12190301375409091238</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='5' src='http://bp1.blogger.com/_xd1j00Yk1I0/SIa2ZE05_UI/AAAAAAAAAAM/5SewAkn9jIs/S220/Katek+raas+baat.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-15885037.post-1678800951940071134</id><published>2009-04-20T21:36:00.004+05:30</published><updated>2009-09-21T16:55:50.685+05:30</updated><title type='text'>भरि माथ सिन्दूर</title><content type='html'>&lt;div align="right"&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;&lt;strong&gt;लेखक- आदि यायावर&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;blockquote&gt;&lt;br /&gt;&lt;/blockquote&gt;&lt;p align="justify"&gt;गार्गी आई समय सँ पहिने उठि गेल छलीह, मुदा भोर’क दैनिक काज एखनो धरि खतम नहि भेल छलन्हि. राति सँ एक्के सोच मे बाझल छलीह. चारि दिन सँ प्रभाकर केँ ओ बस मे देखि रहल छलीह. एक बात बिल्कूल कनफर्म भऽ गेल छलन्हि जे हुनके कम्पनी मे ओ ज्वाइन केने छथि. कतेक दिन पहिने, से नहि कहि. हुनकर मोन मे अन्तर्द्वन्द्व चलि रहल छलन्हि जे भऽ सकैत छैक जे प्रभाकर हुनका देखने नहि होयत. एहेन नहि भऽ सकैत अछि जे ओ देखि केँ हुनका नहि टोकने बिना रहि जायत. पछिला चारि दिन सँ ओ ध्याने नहि देने होयत. फेर दोसर मोन कहैत छलन्हि जे "एहेन सम्भव नहि छैक". ओ बिल्कूल हुनकर आगू सँ निकलल छल. तऽ की हुनका प्रभाकर इग्नोर करैत छल? ओह नहि, प्रभाकर लऽग एत्तेक सामर्थ्य नहि, जे हुनका इग्नोर करैथ. मुदा पाँच साल मे समय बहुत बदैल गेल छल. प्रभाकर सेहो बदैल गेल होयत. राति भरि हुनकर आँखि सीलीँग फैन दिस देखैत रहलन्हि. एको क्षण’क लेल नीन्द नहि भेल छलन्हि. आ आई भोर सँ हुनका अन्दर मे तेसरे अन्तर्द्वन्द्व चलि रहल छलन्हि. जे यदि प्रभाकर नहि टोकलकन्हि तऽ हुनका टोकबाक चाही. हुनका आभास भेलन्हि जे प्रभाकर केँ नहि टोकब हुनकर अहँकार तऽ नहि. कम सँ कम एक बेर पुछबाक तऽ चाही जे ओ विवाह केलैथ वा नहि. मुदा प्रभाकर के प्रति ओ अपन व्यवहार सँ लज्जित छलीह, बहुते अपरतिव लागैत छलन्हि. एक बेर हुनका सँ हाल चाल पुछि लेतीह तऽ अपन प्रभाकर’क प्रति व्यवहार सँ प्रायश्चित भऽ जेतन्हि. मुदा दोसर मोन पुनः कहैत छलन्हि, आब ओ विवाहित जीवन मे छथि. प्रभाकर सँ बात केनाई पाप होयत. मुदा फेर अपना आप केँ बुझाबैत छलीह, जीवन मे बेसी अहँकार नीक नहि, आ प्रभाकर केँ टोकि देला सँ कोन पाप भऽ जायत?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओ यथार्थ’क धरातल पर तखने वापस भेलीह जखन हुनकर आँखि देवाल घड़ी पर गेलन्हि. आठ बजे मे पाँच मिनट शेष छल. यदि आब ओ सब काज छोड़ि नहेबाक लेल नहि जेतीह तऽ हुनकर कम्पनी के अन्तिम बस छुटि जेतन्हि. सब किओ साढ़े आठ बजे वाला बस पकडे चाहैत छथि. तेँ एहि अन्तिम बस मे सबसँ बेसी भीड़ होइत छैक. यथार्थ’क दुनियाँ समस्या सँ भरल रहैत छैक. तेँ ओ कल्पना’क दुनियाँ के तुरन्ते खतम कऽ दैत छैक. हुनकर अन्तर्द्वद्व खत्म भऽ गेल छलन्हि. आब हुनका वास्तविक दुनियाँ सँ लड़बाक छलन्हि. आलू आ रामझिन्गनी’क भूजिया केँ छोलनी सँ चलबैत गार्गी ई आशा छोड़ि देने छलीह जे हुनका कोनो सीट भेटतन्हि. आब तऽ हुनका जल्दी एहि बात’क छलन्हि जे कोनो तरहेँ ओ अन्तिम बस पकड़ा जान्हि. अन्तिम बेर भूजिया केँ चला केँ, आँटा सानल हाथ केँ पानि सँ धो केँ, ओ झट सँ नहेबाक लेल चलि गेलीह. दुनियाँ मे के कतेक जल्दी नहा लैत छथि यदि एहि बात’क प्रतियोगिता हो तऽ ओहि मे गार्गी केँ आई सर्वप्रथम स्थान भेटल रैहतन्हि. झट सँ पूजा वाला घर मे दू टा अगरबत्ती जरा केँ, गौरी पूजा’क उपरान्त माथ मे सिन्दूर लगा केँ फेर सँ भनसा घर चलि गेलीह.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीन टा सोहारी आ भूजिया लन्चबाक्स मे पैक कऽ लेलथिन्ह. दू टा सोहारी थारी मे लऽ ओ सोफा पर बैसि गेलीह. डायनिँग टेबुल केवल घर’क शोभा बढ़ेबाक लेल छलन्हि. जलखई आ खाना हरदम सोफा पर बैसि करैत छलीह. कखनहुँ कखनहुँ सोचैत छलीह, डायनिँग टेबुल मे ओतेक टाका बेकार मे खर्चा केलथिन्ह दरभन्गा सँ बँगलोर आनबा मे. खैर आब ओ बिल्कूल तैयार भऽ चुकल छलीह. देवाल घड़ी पर पुनः आँखि देलथिन्ह, साढ़े आठ बजबा मे एखनहुँ दस मिनट बचले छलन्हि. समय सँ पहिने तैयार भऽ गेलाक कारणे हुनका बहुत आत्मविश्वास भेटलन्हि. बेडरुम मे जा केँ ड्रेसिँग टेबुल’क सामने मे ठाढ़ भऽ गेलीह. केवल अपन आत्मविश्वास केँ आओर बेसी मजगूत करबाक लेल. अपन प्रतिबिम्ब देखि आत्मविश्वास आओर बेसी भेलन्हि. एत्तेक जल्दी मे एत्तेक नीक सँ सब काज सम्पन्न. अपन प्रतिबिम्ब मे अपन पैघ पैघ आँखि सँ हुनकर ध्यान दोसर दिस गेलन्हि. ओढ़नी बिल्कूल सही सलामत. ओह मुदा माथ दिस ध्यान जैते ओ चौँकि गेलीह. हरबड़ी मे गरबड़ी भऽ गेल रहन्हि. माथ मे सिन्दूर बेसी लागि गेल छलन्हि. आ आवश्य़कता सँ बेसी पसरल छलन्हि. रुमाल’क कोन सँ पसरल सिन्दूर केँ पोछि देल गेल. एक बेर फेर सँ अपना आप केँ निहारऽ लागलथिन्ह. ओएह पैघ पैघ आँखि, भरल भरल गाल, पाँच फुट चारि इन्च’क कद काठी, बिना लिपिस्टिक के लाल लाल ठोर, खुजल, आधा-छीधा भीजल आ पँखा’क हवा लहराबैत केश. बुझि मे एलन
